मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के बरखेड़ा गांव में किसान जितेंद्र पटेल अपने 25 बीघा खेत में खरपतवार नाशक दवा का छिड़काव कर रहे हैं। हर वर्ष जितेंद्र 15 जून तक अपने खेत में खरीफ की फसल सोयाबीन की बुवाई कर देते हैं। लेकिन इस वर्ष मानसून देरी से आया। जितेंद्र ने जून के आखिरी हफ्ते में हुई बारिश के बाद अपने खेत में जैसे तैसे बुवाई की लेकिन अब फसल संकट में है क्योंकि बोवनी के बाद खेत सूख रहे हैं। मॉनसून ने जुलाई की शुरुवात तक भी रफ्तार नहीं पकड़ी।
“इस बार बोवनी बहुत लेट हुई है। शुरुआती काम में ही प्रति बीघा करीब 6 हजार रुपये खर्च हो चुके हैं, और कटाई तक पहुंचते-पहुंचते यह खर्च 20 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर तक पहुंच जाएगा,” जितेंद्र बताते हैं। उन्होंने उम्मीद के साथ 17 हजार रुपये क्विंटल का नया सोयाबीन बीज बोया है, लेकिन खराब मौसम के चलते उत्पादन सिर्फ 3 से 4 क्विंटल प्रति बीघा रहने की आशंका है।
“सोयाबीन की फसल से किसानों को कोई सीधा मुनाफा नहीं बचता। सरकारी खाद और बीज लगातार महंगे हो रहे हैं। किसान यह खेती सिर्फ इसलिए करता है ताकि उसका खेत खाली न रहे,” वे कहते हैं। उनका सबसे बड़ा डर यह है कि अगर अगले 15 दिनों तक बारिश नहीं हुई, तो पूरी फसल सूख जाएगी।
सिंचाई का सहारा भी नहीं


जितेंद्र के सामने सिर्फ आसमान का संकट नहीं है, सिंचाई के साधन भी दगा दे चुके हैं। दो साल पहले उन्होंने अपने खेत में 700 फीट गहरा ट्यूबवेल लगवाया था। जलस्तर गिरने के कारण अब यह 24 घंटे में मुश्किल से एक घंटा पानी देकर बंद हो जाता है।
“सोयाबीन को सिर्फ बारिश का पानी चाहिए। ट्यूबवेल का पानी देने से फसल पीली पड़कर सूख जाती है,” जितेंद्र आधुनिक तकनीकों की सीमाएं बताते हुए कहते हैं। उनके मुताबिक वैज्ञानिकों की ब्रॉड-बेड-फरो जैसी तकनीकें भी सिर्फ भारी बारिश में पानी निकालने के काम आती हैं, लंबे सूखे में वे बेअसर हो जाती हैं।
फसल बदलने की बात पर जितेंद्र सीधे सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं: “यहां के किसानों को सिर्फ सोयाबीन की खेती का पता है। दूसरी फसलों और उनके बीजों की जानकारी देने कृषि विभाग और ग्राम सेवक खेतों तक नहीं आते।” पहले यहां ज्वार और कपास जैसी लंबी अवधि की फसलें होती थीं, लेकिन अब जंगली जानवर उन्हें नष्ट कर देते हैं।
पूरे राज्य पर असर की आशंका

मध्य प्रदेश देश का ‘सोया स्टेट’ कहलाता है — भारत के कुल सोयाबीन उत्पादन में इस राज्य की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत से ज्यादा है। मालवा और निमाड़ अंचल में हर साल करीब 51 से 54 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन बोया जाता है, जिससे 53 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा उत्पादन मिलता है। इसलिए यहां का संकट सिर्फ स्थानीय नहीं रहता — इसका असर अमेरिका के कमोडिटी बाजार से लेकर उन विदेशी बाजारों तक पहुंचता है, जहां भारत सोया-मील चारे के रूप में भेजता है।
धीमी शुरुआत के बाद पकड़ी रफ्तार
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और केंद्रीय कृषि मंत्रालय के संयुक्त आकलन के मुताबिक, इस साल मानसून की शुरुआती बेरुखी और अल नीनो के असर के चलते मध्य प्रदेश के 16 प्रमुख कृषि जिले सूखे के हाई-रिस्क जोन में शामिल किए गए हैं। जून में मानसून करीब दो हफ्ते लेट रहा, जिससे राज्य के 48 जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज हुई और शुरुआत में सूखे जैसे हालात बन गए थे।
जुलाई की शुरुआत से बंगाल की खाड़ी में बने सक्रिय मानसूनी सिस्टम ने राहत दी है, और अधिकांश हिस्सों में अब भारी बारिश हो रही है, जिससे व्यापक सूखे का तात्कालिक खतरा टल गया है।
इसके बावजूद धार, झाबुआ, बड़वानी, नीमच, रतलाम, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना और शिवपुरी सहित चिन्हित 16 जिले लंबे ड्राई-स्पेल के लिहाज से अब भी सबसे संवेदनशील बने हुए हैं, जिसके लिए सरकार ने विशेष आकस्मिक सुरक्षा योजना लागू की है।
राहत की बात यह है कि IMD के ताजा आंकड़ों के अनुसार राजगढ़ में जुलाई के पहले हफ्ते में मॉनसून रफ्तार पकड़ लेगा और बारिश का औसत कोटा जुलाई में पूरा होने की उम्मीद है।
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के रैपिड सर्वे की तस्वीर भी उत्साहजनक है। रिपोर्ट के अनुसार शुरुआती देरी के बाद जैसे ही प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बारिश हुई, बुवाई ने तेज रफ्तार पकड़ ली — जून के अंत तक राज्य में सोयाबीन का रकबा बढ़कर 28.92 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया, जो शुरुआती सरकारी अनुमानों से कहीं ज्यादा है। सोपा का अनुमान है कि मौसम ठीक रहा तो 15 जुलाई तक बुवाई का लक्ष्य पूरा हो जाएगा।
राजगढ़ जिले के कृषि विभाग द्वारा 6 जुलाई 2026 तक जारी आंकड़े भी इसी बदलाव की गवाही देते हैं। जिले में इस साल 4 लाख 57 हजार हेक्टेयर में सोयाबीन बुवाई का लक्ष्य था, लेकिन कम बारिश के चलते अब तक 82.42 प्रतिशत क्षेत्र यानी करीब 3 लाख 61 हजार हेक्टेयर में ही बोवनी हो सकी है। वहीं सरकारी आकस्मिक योजना के असर से ज्वार जैसी कम पानी वाली फसल का रकबा पिछले साल के मुकाबले बढ़कर 1,000 हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जबकि उड़द और मूंग जैसी दलहनी फसलें अब भी अपने सामान्य लक्ष्यों से पीछे चल रही हैं।
देरी से बोई फसल का क्या होगा?
वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि मानसून में देरी और लंबे सूखे से सोयाबीन के पौधों का विकास रुक जाता है, जिससे उत्पादन में सीधे 30 से 40 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खाद्य तेल आयात से पूरा करता है — घरेलू उत्पादन घटने से आयात बिल बढ़ता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है, और सोया-मील का निर्यात घटने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मंदी का खतरा बढ़ जाता है। जून में पूरे देश में औसत से 42 प्रतिशत कम बारिश दर्ज होना इस संकट की मुख्य वजह रही है।
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एस.के. कौशिक कहते हैं, “जब मानसून में देरी होती है, तो किसानों को मुख्य फसल के साथ दूसरा विकल्प भी तैयार रखना पड़ता है। मौसम के हिसाब से बुवाई का समय, फसलों की किस्में और खेती की तकनीकें बदलनी पड़ती हैं।” उनके मुताबिक जैसे-जैसे मानसून में देरी होती है, खरीफ फसलों के लिए समय कम बचता जाता है, इसलिए किसानों को रबी फसल की समय-सारणी ध्यान में रखकर सोयाबीन की सही किस्म चुननी चाहिए। 100 दिन से ज्यादा समय लेने वाली लंबी अवधि की किस्में जोखिम भरी हैं; मध्यम अवधि की किस्में 90 से 95 दिन में तैयार होती हैं; और इस सीजन के लिए सबसे मुफीद वे कम अवधि की किस्में हैं जो 90 दिन से पहले कट जाती हैं।
जो किसान बोवनी कर चुके हैं और अब सूखे से डर रहे हैं, उनके लिए डॉ. कौशिक एक सीधा उपाय सुझाते हैं: “आजकल किसान खरपतवार नाशक डालने के बाद खेतों में डोरा नहीं चलाते। लेकिन अल नीनो के असर से फसल बचाने के लिए डोरा चलाना बेहद जरूरी है।” डोरा चलाने से जमीन के भीतर की बारीक नसें टूटती हैं, जिससे पानी का वाष्पीकरण रुकता है और मिट्टी की नमी भीतर सुरक्षित रहती है। साथ ही मिट्टी में हवा का संचार बढ़ता है, पौधों का विकास तेज होता है, और खरपतवार मिट्टी में दबकर खाद बन जाती है। नमी बचाने के लिए किसान खेत में कटी हुई घास या पुवाल का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।
खेत पर लाइव प्रदर्शन

सूखे के इस संकट से सोयाबीन को उबारने के लिए राजगढ़ के कृषि विज्ञान केंद्र (कोठीबाग फार्म) पर वैज्ञानिक खुद युद्धस्तर पर आधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन कर रहे हैं। यहां कृषि वैज्ञानिक डॉ. लाल सिंह के मार्गदर्शन में उन्नत ब्रॉड बेड फरो और रेज्ड बेड पद्धति से बुवाई कराई जा रही है — यह तकनीक कम बारिश में मिट्टी की नमी बरकरार रखने और भारी बारिश होने पर अतिरिक्त पानी निकालने, दोनों में कारगर मानी जाती है।
फार्म पर बुवाई के दौरान डॉ. लाल सिंह किसानों को बीज उपचार का ‘FIR फॉर्मूला’ अपनाने की सलाह देते हैं: “बोवनी से पहले सोयाबीन के बीज का उपचार बेहद जरूरी है। पहले फफूंदनाशक — जैसे कार्बेन्डाजिम या थाइरम — लगाएं, जो बीज को फंगस से बचाता है। इसके बाद कीटनाशक थायोमेथोक्सम का इस्तेमाल करें, जो शुरुआती दिनों में तना मक्खी और सफेद मक्खी जैसे कीटों से रक्षा करता है। और अंत में राइजोबियम कल्चर जीवाणु खाद लगाएं, जो जड़ों में गांठें बनाकर हवा से नाइट्रोजन सोखने की क्षमता बढ़ाता है। किसानों को हमेशा इसी क्रम में बीजोपचार करना चाहिए।”
सरकार का रुख: मोटे अनाज पर जोर

कम बारिश और सूखे की आशंका के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक उच्च-स्तरीय बैठक की अध्यक्षता कर पूरे राज्य में व्यापक जागरूकता अभियान शुरू करने के निर्देश दिए हैं। नई प्रशासनिक रणनीति के तहत कृषि अधिकारियों को मैदान में उतरकर किसानों को कम समय में पकने वाली और कम पानी की खपत वाली फसलें उगाने के लिए प्रेरित करने को कहा गया है।
मुख्यमंत्री ने खासकर ज्वार, बाजरा, उड़द, मूंग, तुअर और कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाजों व दालों की खेती को बढ़ावा देने पर सबसे ज्यादा जोर दिया है, क्योंकि ये फसलें कम पानी और विपरीत परिस्थितियों में भी टिकी रहती हैं — जिससे कम बारिश के दौर में भी किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिल सकेगी।
बीमा की आखिरी तारीख नजदीक
प्रकृति की इस अनिश्चितता के बीच राजगढ़ जिला प्रशासन ने किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए एक और कदम उठाया है। किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के प्रेसनोट के मुताबिक, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत खरीफ फसलों के बीमा हेतु आवेदन की अंतिम तारीख 31 जुलाई तय की गई है।
विभाग ने जिले के सभी किसानों से अपील की है कि सूखे, अतिवृष्टि या कीटों से होने वाले नुकसान के वित्तीय जोखिम से बचने के लिए वे समय रहते आवेदन कर लें। इसके लिए आधार कार्ड, भूमि संबंधी दस्तावेज, बैंक पासबुक और बुवाई प्रमाण-पत्र के साथ ऑनलाइन पोर्टल या नजदीकी बैंक से संपर्क किया जा सकता है, जिसमें किसानों को खरीफ फसल के लिए अधिकतम सिर्फ 2 प्रतिशत प्रीमियम देना होगा।
बारिश में हुई देरी और सूखे की आशंका के बीच अब संतुलन बनाना जरूरी है। एक तरफ कम अवधि की किस्में चुनकर, बीजोपचार कर और मोटे अनाजों को अपनाकर खेती को बचाया जा सकता है, तो दूसरी तरफ 31 जुलाई से पहले फसल बीमा कराकर किसान अपने वित्तीय नुकसान से खुद को सुरक्षित कर सकते हैं। जितेंद्र पटेल जैसे किसानों के लिए फिलहाल उम्मीद बस आसमान से बरसने वाली अगली बूंद पर टिकी है।
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