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आखिर मध्य प्रदेश का मक्का किसान एथेनॉल के हरे सपने से क्यों है परेशान

मक्का एथेनॉल उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है, लेकिन किसानों को उत्पादन लागत से भी कम दाम मिल रहे हैं।
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मक्का एथेनॉल उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है, लेकिन किसानों को उत्पादन लागत से भी कम दाम मिल रहे हैं।

भोपाल की करोंद कृषि उपज मंडी में दोपहर की धूप सिर पर चढ़ चुकी है। तापमान 42 डिग्री सेल्सियस के आसपास है। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरी मक्का की फसल के बीच किसान अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। मंडी के एक कोने में खड़े शुभम मालवीय बार-बार अपनी उपज की ओर देखते हैं। तीन एकड़ की फसल बेचने आए शुभम के चेहरे पर अच्छी पैदावार की खुशी नहीं, बल्कि बेचैनी साफ दिखाई पड़ती है।

भोपाल की करोंद कृषि उपज मंडी में मक्का बेचने पहुंचे किसान। यहां सरकारी एमएसपी 2,410 रुपये के मुकाबले भाव 1,400 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहा।

शुभम तंज के लहजे में कहते हैं, ”सरकार कहती है कि किसान सिर्फ अन्नदाता नहीं, ऊर्जादाता भी बनेंगे। लेकिन पहले हमारे घर तो चल जाएं।”

करोंद मंडी में तीन एकड़ की मक्का फसल बेचने पहुंचे किसान शुभम मालवीय। लागत 50 से 60 हजार रुपये, लेकिन मंडी में भाव एमएसपी से करीब 1,000 रुपये प्रति क्विंटल कम मिला।

इस साल शुभम ने करीब 50 से 60 हजार रुपये की लागत से मक्का की खेती की। बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और डीजल की बढ़ती कीमतों ने खेती का खर्च लगातार बढ़ाया है। मंडी में उन्हें 1,400 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा भाव नहीं मिल रहा, जबकि सरकार ने मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2,410 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है।

करोंद मंडी में यह शिकायत सिर्फ शुभम की नहीं है। यहां मौजूद अधिकांश किसान एक ही सवाल पूछ रहे हैं: सरकार एमएसपी बढ़ाती है, तो मंडी में दाम क्यों नहीं बढ़ते?

ऊर्जा सुरक्षा का सपना और एथेनॉल नीति

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को तेजी से बढ़ाया है। राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य पहले 2030 तक रखा गया था। वर्ष 2022 में इसे संशोधित कर 2025-26 तक हासिल करने का लक्ष्य तय किया गया। केंद्र सरकार का तर्क था कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और किसानों को नई बाजार मांग मिलेगी। गन्ने के बाद मक्का को भी एथेनॉल उत्पादन के लिए प्रमुख फीडस्टॉक के रूप में मान्यता मिली। अप्रैल 2026 से देशभर में E20 पेट्रोल की बिक्री अनिवार्य हो चुकी है।

इन नीतिगत संकेतों का असर खेतों तक पहुंचा। मध्य प्रदेश के किसानों ने बड़े पैमाने पर मक्का की खेती बढ़ाई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार राज्य में मक्का उत्पादन लगभग 6.64 मिलियन टन तक पहुंच गया, जो देश के कुल उत्पादन का करीब 15.3 प्रतिशत है। राज्य के 15 लाख से अधिक किसान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस फसल पर निर्भर हैं। लेकिन मंडी में खड़े किसान पूछ रहे हैं कि अगर मक्का देश की ऊर्जा सुरक्षा का आधार बन रहा है, तो उसके दाम क्यों गिर रहे हैं।

भोपाल की करोंद मंडी में मक्का बेचने पहुंचे किसान। गर्मी और इंतजार के बीच हर किसान के मन में एक ही सवाल है कि फसल का सही दाम कब मिलेगा।

उत्पादन बढ़ा, लेकिन दाम नहीं

पड़ोसी जिले सीहोर से करोंद मंडी पहुंचे किसान हर्ष नागर कहते हैं, ”कई सालों से सरकार मक्का पर एमएसपी घोषित कर रही है, लेकिन असल में सरकारी रेट पर खरीदी कभी नहीं होती।”

सीहोर जिले से करोंद मंडी पहुंचे किसान हर्ष नागर। उनका कहना है कि सरकार एमएसपी घोषित करती है, लेकिन सरकारी रेट पर खरीदी कभी नहीं होती।

किसानों की इस बात की गवाही सरकारी आंकड़े भी देते हैं। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) के आंकड़ों के अनुसार खरीफ 2026-27 के लिए मक्के की उत्पादन लागत 1,544 रुपये प्रति क्विंटल आंकी गई है।

अभिषेक मारन ने इस साल 10 एकड़ में मक्का बोया था। अपनी 30 से 35 क्विंटल उपज लेकर नीलामी का इंतजार कर रहे मारन कहते हैं, ”आज पेट्रोल-डीजल, खाद-बीज और मजदूरी महंगी हो गई है। इन सबके बावजूद मक्का सिर्फ 1,400 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है। इस भाव पर तो मुश्किल से खेती का खर्च ही निकल पाता है।”

करोंद मंडी में अपनी 30 से 35 क्विंटल मक्का उपज के साथ नीलामी का इंतजार करते किसान अभिषेक मारन। इस साल उन्होंने 10 एकड़ में मक्का बोया था।

खेती की बढ़ती लागत के बावजूद सरकार ने खरीफ 2026-27 के लिए मक्का की एमएसपी में मात्र 10 रुपये की बढ़ोतरी की, जिससे यह 2,400 से बढ़कर 2,410 रुपये हो गई। 

एथेनॉल उद्योग बढ़ा, लेकिन मक्के की मांग क्यों नहीं बढ़ी

मध्य प्रदेश में एथेनॉल उद्योग का विस्तार तेजी से हुआ है। राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS) के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में कुल स्थापित एथेनॉल क्षमता 104.1 करोड़ लीटर तक पहुंच चुकी है, जिसमें 94.38 करोड़ लीटर अनाज आधारित एथेनॉल संयंत्रों का हिस्सा है। इसके बावजूद मंडी में मक्के के दाम क्यों नहीं बढ़े?

इसका जवाब केंद्र सरकार की फीडस्टॉक नीति में छिपा है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) ने डिस्टिलरियों को चावल की आपूर्ति पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। तर्क यह था कि भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में पिछले 20 सालों में सबसे बड़ा चावल भंडार, करीब 36.9 मिलियन टन, जमा हो गया था। इस स्टॉक को खपाने के लिए मई 2025 और मई 2026 में जारी दिशा-निर्देशों के तहत 52 लाख मीट्रिक टन चावल एथेनॉल फैक्टरियों को 2,320 रुपये प्रति क्विंटल की सब्सिडी दर पर बेचा गया।

करोंद मंडी में मक्के की बोरियां उतारते मजदूर। बढ़ती मजदूरी और गिरते बाजार भाव के बीच किसानों की उत्पादन लागत निकालना मुश्किल हो गया है।

इसके साथ तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने एथेनॉल बनाने वाली फैक्टरियों के लिए 40 प्रतिशत एथेनॉल एफसीआई चावल से बनाना अनिवार्य कर दिया। यहीं से मक्के की बाजार ताकत कमजोर पड़नी शुरू हुई। डिस्टिलरियों के लिए भी चावल मक्के से ज्यादा लाभकारी साबित हुआ। एक टन चावल से 450 लीटर एथेनॉल बनता है, जबकि एक टन मक्के से लगभग 380 लीटर।

राज्य के वरिष्ठ किसान नेता और राष्ट्रीय किसान महासंघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा (कक्काजी) इसे किसानों के साथ सीधा धोखा बताते हैं। वे कहते हैं, ”जब सस्ता सरकारी चावल उपलब्ध है, तो उद्योग के लिए मक्का खरीदने की मजबूरी कम हो जाती है। नतीजा यह कि खुले बाजार में मक्के की मांग घटी और मंडी के भाव नीचे आ गए।”

कांग्रेस नेता केदार सिरोही मक्के की गिरती कीमतों के लिए सरकारी खरीद व्यवस्था की विफलता को जिम्मेदार मानते हैं। वे कहते हैं, ”सरकार हर साल मक्के की एमएसपी तय करती है, लेकिन खरीदी नहीं करती। वह सिर्फ रेट तय कर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलती है।”

एथेनॉल संयंत्र और गहराता जल संकट

मुनाफे और घाटे की इस बहस से परे इस हरित ईंधन कार्यक्रम की एक और गंभीर तस्वीर है, जो सीधे पर्यावरण से जुड़ी है। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार एक लीटर एथेनॉल बनाने में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 10,000 लीटर पानी का उपयोग होता है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के बोरगांव में एवीजे एग्रीको प्राइवेट लिमिटेड का 350 KLPD क्षमता का अनाज आधारित एथेनॉल संयंत्र है। परियोजना रिपोर्ट के मुताबिक इस संयंत्र को हर रोज 1,750 मीट्रिक टन यानी लगभग 17.5 लाख लीटर ताजे पानी की जरूरत है।

पर्यावरण कार्यकर्ता सुभाष सी. पांडेय कहते हैं, ”जब राज्य के कई ब्लॉक पहले से ही भूजल संकट से जूझ रहे हैं, तब इन विशाल एथेनॉल संयंत्रों की पानी की भारी मांग जल संकट को और गहरा कर रही है।”

Dr Subhash Pandey bhopal
पर्यावरण कार्यकर्ता सुभाष सी. पांडेय। उनका कहना है कि राज्य के कई ब्लॉक पहले से भूजल संकट से जूझ रहे हैं और एथेनॉल संयंत्रों की पानी की भारी मांग इस संकट को और गहरा कर रही है।

यह चिंता आंकड़ों में भी दिखती है। जनवरी 2026 में लोकसभा में पेश की गई डायनेमिक ग्राउंडवाटर रिसोर्सेज असेसमेंट 2025 रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के 317 ब्लॉकों में से 26 ब्लॉक (8.20 प्रतिशत) अतिदोहित हो चुके हैं। 6 ब्लॉक गंभीर और 64 ब्लॉक अर्ध-गंभीर श्रेणी में हैं। यानी राज्य के 30 प्रतिशत हिस्से में भूजल खतरनाक स्तर तक गिर चुका है।

इसके साथ औद्योगिक प्रदूषण की समस्या भी सामने आ रही है। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले की बासी पंचायत में लगे एथेनॉल संयंत्र के विषाक्त जल से किसानों की फसलें बर्बाद हो रही हैं और भयानक दुर्गंध से ग्रामीणों का जीवन प्रभावित है। पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के पथरा गांव और तेलंगाना के चित्तनूर गांव में भी एथेनॉल संयंत्रों से प्रदूषण और त्वचा रोग की शिकायतें आ रही हैं।

राजनेताओं की बेरुखी

जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से मक्के की गिरती कीमतों पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि ”इस बारे में बाद में विस्तार से बात करेंगे।” मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंसाना ने पूरे संकट को ही नकार दिया। उन्होंने दावा किया, ”किसानों को किसी भी फसल में कोई परेशानी नहीं है। ये अफवाहें हैं।”

इसके जवाब में केदार सिरोही कहते हैं, ”अगर मंत्री जी को वास्तविक स्थिति समझनी है, तो मंडी का दौरा करें। किसानों से बात करें। उन्हें एमएसपी के आधे भाव भी नहीं मिल रहे हैं।”

यानि सरकारी आंकड़ों में देश एथेनॉल ब्लेंडिंग के अपने लक्ष्यों को तो पूरा कर रहा है मगर मध्य प्रदेश के मक्का किसानों तक इसका लाभ पहुंचता हुआ नहीं दिखता।


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  • Based in Bhopal, this independent rural journalist traverses India, immersing himself in tribal and rural communities. His reporting spans the intersections of health, climate, agriculture, and gender in rural India, offering authentic perspectives on pressing issues affecting these often-overlooked regions.

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