मानसून में हो रही देरी, सूखते नदी-नाले और नहरों से नदारद पानी ने खरगोन के मिर्च उत्पादकों की चिंता बढ़ा दी है। बारिश के इंतज़ार के बीच कई किसान मिर्च की रोपाई कर चुके हैं और सिंचाई करके जल आपूर्ति पूरी कर रहे हैं। मगर नदी-नालों में पानी न छोड़े जाने से किसान आक्रोशित हो गए और शुक्रवार को उन्होंने खंडवा-बड़ौदा हाईवे जाम कर दिया। इस प्रदर्शन में लाखी बिलाली, सुल्तानपुर, मोहम्मदपुर सहित चार गांवों के करीब 250 किसान शामिल हुए।
किसानों का कहना है कि वे कई बार प्रशासन को जल संकट की स्थिति से अवगत करा चुके हैं, लेकिन समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उनकी मांग है कि पिपलई टैंक से नहर का पानी नदी-नालों में छोड़ा जाए, ताकि पेयजल और पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था हो सके।
हालांकि चक्काजाम की सूचना मिलते ही गोगावां नायब तहसीलदार हेमलता चौहान, एनवीडीए के कार्यपालन यंत्री एसएस सोलंकी और गोगावां थाना प्रभारी दीपक यादव मौके पर पहुंचे। बातचीत के दौरान एनवीडीए अधिकारियों ने पिपलई टैंक से प्रत्येक छह दिन के अंतराल पर नालों में पानी छोड़े जाने का आश्वासन दिया है। मगर मिर्च के किसानों का कहना है कि जा तक बारिश नहीं होती तब तक राहत नहीं मिलेगी।

रोपने पड़े दूसरे पौधे
गावसन गांव के अरविंद पाटीदार बताते हैं कि उन्होंने 20 दिन पहले 3 एकड़ में मिर्च के 24 हजार पौधे लगाए थे। कुएं से ड्रिप सिंचाई पद्धति से सिंचाई कर रहे हैं। परंतु बारिश नहीं होने और तापमान में अधिकता के कारण पौधे सूख रहे हैं। उनके खेत में करीब 8 हजार पौधे सूख गए। नतीजा यह रहा कि उन्हें इन पौधों को उखाड़कर दूसरे पौधे लगाने पड़े।
अपनी मुख्य फसल पर अब तक वो 70 से 80 हजार रुपए खर्च हो चुके हैं। नए पौधे खरीदने और उनकी पुनः रोपाई के चलते लागत बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि जल्द बारिश नहीं हुई तो हालात और बिगड़ सकते हैं। पाटीदार के अनुसार पिछले साल उन्होंने 5 एकड़ में मिर्च लगाई थी। 17 लाख रुपए का उत्पादन हुआ था। जबकि 7 लाख खर्च हुए थे। इसमें लाल और हरी मिर्च शामिल थी। इसी फायदे के को देखते हुए उन्होंने इस बार भी मिर्च बोई थी मगर अबकी बार उत्पादन को लेकर वो आशंकित हैं।
पौधों का विकास रुका
उबदी गांव के कमलेश पाटीदार कहते हैं कि हर बार जून के पहले सप्ताह तक बारिश आ जाती है। इसी अनुमान से किसान अपने खेतों में नर्सरी से मिर्च के पौधों की रोपाई करवाते हैं। मगर इस बार एक पखवाड़े तक बारिश नहीं हुई है। इसके कारण तापमान बढ़ गया है और पौधों की ग्रोथ रूक गई है। उनका कहना है कि कुछ जगहों पर पौधे पीले पड़ गए हैं।
उन्होंने 26 मई को 2.5 एकड़ में 20 हजार पौधे लगाए थे। पिछले साल का अनुभव बताते हुए वे बताते हैं कि 8 लाख रुपए का शुद्ध लाभ हुआ थ। यही वजह है कि इस बार रकबा बढ़ा है। परंतु बारिश के कारण दिक्कतें आ रही है। यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो हालात और बिगड़ सकते हैं। पिछले साल उन्होंने चार एकड़ में 30 हजार पौधे लगए थे। 16 लाख रुपए का उत्पादन हुआ था। 8 लाख रुपए लागत आई थी। हरी मिर्च का भाव 12 से 50 रुपए किलो और लाल मिर्च का भाव 170 रुपए किलो तक मिला था।
वहीं डोंगरगांव के किसान नितिन पाटीदार ने बताया कि पिछली बार कपास की फसल लगाई थी। इस बार मिर्च का अच्छा सीजन देखते हुए उन्होंने चार एकड़ में मिर्च की फसल लगाई थी। 22 मई को मिर्च के पौधे लगाए थे। सिंचाई के लिए पास ही में नदी से पाइप लाइन बिछा रखी है। नदी में पानी खत्म हो जाने की वजह से वह मिर्च की फसल की सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं।
वह कहते हैं कि पिछले 10 दिनों से सिंचाई नहीं करने से अधिकांश पौधे सूख गए हैं। इससे उन्हें हजारों रुपए का नुकसान हो रहा है। जल्द बारिश नहीं हुई तो पूरे पौधे सूख जाएंगे। उन्होंने बताया कि पहले पिपरी सिंचाई योजना का पानी नदी में डाला जाता था जिससे नदी में जलस्तर बना रहता था। परंतु इस बार पानी पर्याप्त नहीं छोड़ा गया। इसके कारण नदी सूख गई है।
बरुड़ के देवेंद्र पटेल के अनुसार, मिर्च को पहले महीने में 5-6 घंटे पानी मिलना चाहिए, लेकिन गर्मियों में ट्यूबवेल आधे घंटे से ज़्यादा नहीं चलता। यूं भी इस साल 1 जून से 19 जून तक जिले में सिर्फ 55 मिमी वर्षा ही हुई है। जबकि पिछले साल इस दौरान तक कुल 527 मिमी बारिश हो चुकी थी।
हालांकि उद्यानिकी विभाग के उपसंचालक केके गिरवाल ने बताया कि बारिश नहीं होने और तापमान अधिक होने से मिर्च की फसल प्रभावित होने की अब तक सूचना नहीं है। वह रिपोर्टर से कहते हैं, “आपने बताया है तो संबंधित क्षेत्र को दिखवाया जाएगा। जुलाई के अंतिम सप्ताह तक जिले में मिर्च की बाेवनी होती है।”

मिर्च के लिए उपयुक्त तापमान
कृषि विज्ञान केंद्र खरगोन के उद्यानिकी वैज्ञानिक डॉ. एसके त्यागी कहते हैं कि मिर्च मुख्य रूप से एक उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय (Tropical and Subtropical) जलवायु की फसल है, जिसके सफल उत्पादन के लिए गर्म और आर्द्र मौसम सबसे उपयुक्त माना जाता है।
बीजों के उचित अंकुरण और पौधों के स्वस्थ विकास के लिए आदर्श तापमान (Temperature) 15-35 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए। 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान होने पर पौधों में फूलों और फलों का गिरना (Flower and Fruit Drop) शुरू हो जाता है, जिससे पैदावार में भारी कमी आती है।
डॉ त्यागी के अनुसार इस फसल की अच्छी वृद्धि के लिए औसतन 60 से 120 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा (Annual Rainfall) आदर्श मानी जाती है, लेकिन फूल आने और फल बनने के दौरान शुष्क मौसम (Dry weather) की आवश्यकता होती है।
वह कहते हैं कि लंबे समय तक भारी वर्षा या खेत में जलभराव की स्थिति पौधों में सड़न (Rotting) और पत्तियों के झड़ने (Defoliation) का कारण बन सकती है। इसके अतिरिक्त फलों के समुचित विकास, अच्छे रंग और तीखेपन के लिए फसल को पर्याप्त सूर्य के प्रकाश (Sunlight) की आवश्यकता होती है।

कम होता उत्पादन और रकबा
हालांकि बरुड़ के किसान भगवान बिरला को उम्मीद है कि अगर एक हफ्ते में भी बारिश होती है तो वह पर्याप्त उत्पादन कर लेंगे। वह कहते हैं कि गर्मी के चलते मिर्च पर वायरस का खतरा बढ़ सकता है जिससे उत्पादन में कमी आने की संभावना रहती है। वायरस, बिमारियों और कीटों के हमले के चलते मिर्च को होने वाले नुकसान का ज़िक्र ग्राउंड रिपोर्ट से पहले भी यहां के किसान कर चुके हैं।
गिरवाल कहते हैं कि पिछले वर्ष जिले में 38 हजार हेक्टेयर में मिर्च की बोवनी हुई थी। जबकि इस बार 40 हजार हेक्टेयर में बोवनी होने का अनुमान है।

मध्य प्रदेश अपनी ‘निमाड़ मिर्च’ के लिए जाना जाता है। यह खरगोन, बड़वानी सहित अधिकतर निमाड़ क्षेत्र में उगाई जाती है। इसके अलावा यहां होने वाली दूसरी किस्मों जैसे ‘माही’ और ‘माही S-15’ भी अपने मीडियम से तेज़ तीखेपन और तेज़ खुशबू के लिए जानी जाती हैं। अकेले खरगोन में ही 2024 तक 45 हज़ार हेक्टेयर में किसान मिर्च की खेती कर रहे थे। हालांकि अगर 5 साल के आंकड़ों को देखें तो यहां मिर्च का उत्पादन गिरा है। 2020 में जहां 49 हज़ार 52 हेक्टेयर में 1 लाख 71 हज़ार 682 मीट्रिक टन मिर्च का उत्पादन हुआ था वहीं 2024 में रकबे के साथ ही उत्पादन भी घटकर 1लाख 57 हज़ार 500 मीट्रिक टन रह गया।
एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत तय लक्ष्यों को हासिल करने में बेहतर प्रदर्शन के लिए वर्ष 2024-25 के लिए ‘रनर-अप सर्टिफिकेट’ मिला है। मुख्य रूप से यहां सूखी मिर्च से लाल मिर्च पाउडर बनाया जा रहा है।
मगर मिर्च और तमाम फसलों के उत्पादन के लिए पानी ज़रूरी है। ऐसे में खरगोन के किसानों का कहना है कि बारिश में हो रही देर के बीच भूजल पर निर्भर रखना जोखिम भरा है। उनकी मांग है कि नहरों से नदी-नालों में पर्याप्त पानी दिया जाना चाहिए ताकि बारिश न होने से उपजे सूखे की भरपाई की जा सके।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
एफपीओ: साथ आए तो बढ़ी आमदनी, मिलकर करोड़ों कमा रहे ये किसान
इंटिग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट: कुछ की लागत बची, विस्तार का सवाल अनुत्तरित
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।







