मध्य प्रदेश की दक्षिण-पश्चिमी सीमा में स्थित खरगौन जिले से लगभग 35 किमी दूर देवली गांव के नरेंद्र राठौड़ ने अपने कुल 15 एकड़ खेत में कपास, मिर्च, मक्का और ज्वार बोया है। 8 एकड़ में उन्होंने कपास की दो वैराइटी की बोवनी की है।
वो दोनों वैराइटी के पैकेट हमें दिखाते हैं। पीले पैकेट में बड़े अक्षरों में NCS-866 Bt-2 और फिर उससे कुछ छोटे अक्षर में अंग्रेज़ी में आशा-1 लिखा है। पैकेट पर कंपनी का नाम और बैकसाइड में निर्माता का पता, दाम, और अन्य जानकारियां हैं। पैकेट पर दी जानकारी के अनुसार नुज़ीवीडु कंपनी को जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमिटी (GEAC) से सेंट्रल ज़ोन में इस बीज के विक्रय की अनुमति 2010 में मिली है।
‘जैगुआर 5-जी’ के पैकेट में इस तरह की कोई भी जानकारी नहीं है। वैराइटी की जगह भी जैगुआर (Jaguar) लिखा हुआ है। मगर निर्माता का पता या फिर यह भी नहीं लिखा कि इसे जीईएसी से कब अनुमति मिली है। 450 ग्राम के इस पैकेट में यह ज़रूर लिखा हुआ है कि इसे केवल किसानों के बीच ट्रायल और प्रदर्शन (demonstration) के लिए जारी किया गया है। मगर नरेंद्र ने इसके लिए 1000 रूपए प्रति पैकेट चुकाए हैं। यह आशा-1 के एक पैकेट के दाम (901 रु) से अधिक है।
नरेंद्र कहते हैं, “मैंने इस बार नुज़ीवीडु कंपनी का आशा वन और दो पैकेट (450 ग्रा प्रति पैकेट) जैगुआर का ‘5जी’ बोया है।” उन्होंने बताया कि इस बार अगर उत्पादन अच्छा रहा तो अगले साल वह पूरे खेत में ‘5जी कपास’ बोएंगे।
इदारतपुर बड़ी छालपा के पंधारी पाटीदार बताते हैं कि एक किसान सिर्फ खरपतवार हटाने में एक सीजन में 5,000 रुपये तक खर्च कर देता है। वो कहते हैं, “इन (5जी) बीजों से कम लागत में खरपतवार खत्म करना संभव हो गया है।”

कृषि विज्ञान केंद्र खरगोन के वैज्ञानिक डॉ राजीव कुमार सिंह के अनुसार खरपतवार को समय-समय पर खेत से निकाल कर फेंकना ज़रूरी होता है ताकि वह पानी और मिट्टी से पोषण न अवशोषित करें।
कपास की प्रचलित किस्में (बीटी कपास) चारामार दवा ख़ास तौर पर ग्लाइफोसेट युक्त ‘राउंडअप’ से बचाव नहीं करतीं। यानि इस चरामार का छिड़काव करने पर खरपतवार के साथ कपास के पौधे भी नष्ट हो जाते हैं। ऐसे में मजदूरों से यह खरपतवार निकलवाया जाता है।
मगर प्रचलित बीटी कपास के इतर ‘जैगुआर 5जी’ जैसे हर्बिसाईट टॉलेरेंट बीटी कपास किस्म किसानों को फसल पर हर्बिसाईट छिड़कने की सहूलियत देती है।
इस वैराइटी को अब तक केंद्र सरकार ने खेतों में उगाने की अनुमति नहीं दी। मगर मध्य प्रदेश के कपास उत्पादन क्षेत्र में इस तरह के अमानक बीज लगभग हर किसान के खेतों में दिखाई देते हैं।
हमारी पड़ताल में हमने पाया कि किसान अधिक दाम चुकाकर भी ‘5जी कपास’, जैसा किसान इस किस्म को कहते हैं, खरीद रहे हैं। इसके बदले उन्हें बिल या कोई और क़ानूनी गारंटी नहीं मिलती।
मोनसेंटो के बनाए ये बीज एक दशक से ज़्यादा समय से सरकारी मंज़ूरी के लिए पेंडिंग हैं। फिर भी कम से कम 2010 से ये भारत के कॉटन बेल्ट में चुपचाप फैल गए।
किसान चाहते हैं कि सरकार इसकी मंज़ूरी दे दे जबकि विशेषज्ञ इसका खिलाफ हैं।

‘5जी कॉटन’ गैर-कानूनी क्यों है?
भारत में 2002 में पहली जीएम फसल के तौर पर बीटी कपास को मान्यता मिली। सभी बीटी कपास पौधों में मिट्टी में रहने वाले बैक्टीरिया, बैसिलस थुरिंजिएंसिस से मिले एक या ज़्यादा बाहरी जीन होते हैं।
इससे कपास के पौधे की कोशिकाएं क्रिस्टल इंसेक्टिसाइडल (Cry Proteins) प्रोटीन बनाती हैं। Cry1Ac बीटी प्रोटीन वाली कपास (Bollgard-I) की किस्में कपास के तीन मुख्य कीटों – टोबैको बडवर्म, बॉलवर्म और पिंक बॉलवर्म से सुरक्षा देती हैं। 2006 में 2 बीटी जीन वाली कपास (Bollgard-II) की किस्में भारत आईं।
भारतीय राष्ट्रीय बीज संघ (NSAI) के अनुसार 2010 तक, 85% भारतीय कॉटन को बीटी कपास में बदल दिया गया। अभी भारत में उगाया जाने वाला कम से कम 95% कॉटन बीटी कपास है।

लेकिन खरगोन में ‘5जी कपास’ के नाम से प्रचलित वैरायटी इससे बिल्कुल अलग बोलगार्ड-II राउंडअप रेडी फ्लेक्स (BG-II RRF) है। इसे मोनसेंटो ने बनाया था। प्रचलित बीटी कपास के उलट, इसमें CP4-EPSPS जीन सीक्वेंस होता है, जो फसल को ग्लाइफोसेट के लिए रेसिस्टेंट बनाता है – जो ‘राउंडअप’ में एक्टिव इंग्रीडिएंट है।
‘राउंडअप’ दरअसल बायर्स नामक कंपनी द्वारा विकसित एक नॉन-सिलेक्टिव हर्बिसाईट है। जमर्नी स्थित यह कंपनी कृषि के अलावा स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में दखल रखती है। जून 2018 में बायर्स ने मोंसेंटो को अधिग्रहित कर लिया।
मोनसेंटो ने 2007 में एक नई जीएम कपास की किस्म के लिए GEAC अप्रूवल के लिए अप्लाई किया और 2013 तक बायोसेफ्टी डेटा सबमिट किया। लेकिन फिर अपना एप्लीकेशन वापस ले लिया।
खरगोन के अलग-अलग गांवों में हमारी रिपोर्टिंग में, यह वैरायटी अलग-अलग नामों से बेची गई: सिकंदर-5जी, रुद्र और सुपर किंग। पैकेट नाम और रंग में अलग-अलग थे, लेकिन सभी पर ‘5जी’ का लेबल था। किसानों के बीच, इसे बस ‘5जी कपास’ के नाम से जाना जाता था।
हमने अपनी पड़ताल में क्या पाया?
मई-जून महीने में अपनी पड़ताल के दौरान हमने खरगोन के अलग-अलग गांवों में बीज की दुकानों में जाकर ‘5जी कपास’ के बीज मांगे। ज़्यादातर दुकानदारों ने हमसे हमारा पता पूछा और फिर इस तरह के कोई भी बीज की जानकरी होने से मना कर दिया। खरगोन शहर के बस स्टैंड और कृषि उपज मंडी के पास स्थित दुकानों में जाकर पूछने पर भी यही जवाब मिला।
हमने एक किसान को बस स्टैंड के पास स्थित रेणुका एंटरप्राइज़ नाम की दुकान पर ये बीज लेने के लिए भेजा। थोड़ा बहुत पूछताछ करने के बाद दुकानदार ने बताया कि ‘सिकंदर 5जी’ का एक पैकेट 1000 रुपये का है। उसने किसान को 2 पैकेट बीज दे दिए। हालांकि उन्होंने इसके लिए उस किसान को कोई बिल नहीं दिया।

देवली के दशरथ राठौड़ 4 एकड़ में कपास की खेती करते हैं। ग्रामीण समस्याओं के प्रति जागरूक इस किसान ने भी बरुड़ के पास अपना स्टिंग ऑपरेशन किया। मई में शूट किए गए एक वीडियो में, उन्होंने एक दुकानदार से 5जी कपास की उपलब्धता के बारे में पूछा। दुकानदार ने एक पैकेट के लिए ₹1,100 दाम बताया। उसने एक से ज़्यादा खरीदने की शर्त पर, और आग्रह करने पर खरगोन शहर से और खरीदने भी पैकेट खरीदने की पेशकश की।
दशरथ ने यह वीडियो 23 मई को खरगोन के कृषि उपसंचालक को भी भेजा। हालांकि उन्होंने खुद कभी ‘5जी कपास’ नहीं लगाया। उनके अनुसार इससे बीज ख़राब निकलने पर मुआवज़ा लेने के मौके ख़त्म हो जाते हैं।
एक दशकों से देश में बिक रहे बीज
दशरथ को इन बीजों के बारे में पहली बार 2022 में पता चला। वह याद करते हुए बताते हैं, “मई के महीने में कपास की बोवनी के समय मैं अपने साथी किसानों के साथ चाय की ‘टापरी’ पर बैठा था। हम खेत में काम करने के लिए मजदूरों न मिलने की दिक्कत के बारे में बात कर रहे थे। तब एक किसान ने बताया कि 5जी नाम से एक बीज आया है जिसमें चारामार डाल सकते हैं।”
मगर यह बीज देश भर में कहीं लंबे समय से बिक रहे हैं।
कोएलिशन फॉर ए जीएम फ्री इंडिया के सदस्य डॉ डी नरसिम्हा रेड्डी ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए कहते हैं कि 2013 में, कोएलिशन के सदस्यों को पता चला कि आंध्र प्रदेश में किसान हर्बिसाईट कपास के बीजों से खेती कर रहे हैं।
इसके बाद एक टीम बनाई गई, जिसमें कोएलिशन की सदस्य कविता कुरुगंती, सेफ फूड अलायंस के एक प्रतिनिधि और एक स्थानीय एक्टिविस्ट शामिल थे, ताकि सुरागों की जांच की जा सके।
ग्राउंड रिपोर्ट को मिली इस फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट के अनुसार श्रीकाकुलम जिले के किसान 2010 से ही इस किस्म को उगा रहे थे, जिसे वहां ‘गद्दी बीटी’ कहा जाता है।
स्थानीय वर्चस्व वाले लोग बीज लाए और डिस्ट्रीब्यूशन एजेंट के तौर पर काम करने लगे।
डॉ रेड्डी ने कहा कि यह रिपोर्ट उस समय केंद्र सरकार को भी भेजी गई थी। लेकिन उन्हें कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिला। इसके बाद सरकार ने 2017 में अपनी कमेटी बनाई।

सरकारी जांच में क्या मिला?
2017 में, केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत बायोटेक्नोलॉजी विभाग ने ‘5जी कपास’ की खेती के विस्तार का आकलन करने के लिए फील्ड इंस्पेक्शन और साइंटिफिक इवैल्यूएशन कमेटी (FISEC) बनाई।
कमेटी ने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, पंजाब और गुजरात के खेतों की जांच की।
इसने पाया कि आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना में कपास उगाने वाले 15% इलाके में यह किस्म थी, और पंजाब में 5% में। किसानों को बिना बिल या सही लेबलिंग के बिना निशान वाले पैकेट में बीज मिले थे।
कमेटी ने यह भी पाया कि कुछ बीज कंपनियां, जिनके पास राउंडअप रेडी फ्लेक्स जीन वाली पेरेंट लाइन तक पहुंच थी, वे संगठित ब्रीडिंग गतिविधियों के ज़रिए इसमें शामिल थीं।
हालांकि, इस गैर-कानूनी सप्लाई के पीछे माहिको (महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड्स कंपनी) नहीं थी, जिसने किस्म की मंजूरी के लिए औपचारिक रूप से आवेदन किया था। ग्राउंड रिपोर्ट के पास मौजूद दस्तावेजों में यह नहीं बताया गया था कि कौन सी कंपनियां जिम्मेदार थीं।
मई 2018 में, कमिटी ने अपनी रिपोर्ट जमा की और केंद्र और राज्य सरकार के डिपार्टमेंट द्वारा लागू करने के लिए एक्शन पॉइंट्स सुझाए।
रिपोर्ट ने हर्बिसाइड-टॉलरेंट कपास के बीजों और उनकी पेरेंटल लाइनों को गैर-कानूनी घोषित किया। राज्य सरकारों को 2018 के बुआई सीजन से पहले कार्रवाई कर सप्लाई चेन में कहीं भी ऐसे बीज ढूंढ कर नष्ट करने के लिए कहा गया। इसका मकसद बीजों को और फैलने से रोकना था।
रिपोर्ट में GEAC-अप्रूव्ड बीजों के लिए सख्त लेबलिंग नियमों की भी मांग की गई थी। इसका मकसद बायोसेफ्टी डेटा और कमर्शियल हाइब्रिड की पहचान को एक जैसा रखना था।
यह BG-I और BG-II जैसे अप्रूव्ड इवेंट्स पर लागू होता था। इसे सभी बीज बैच में एक जैसा रहना था। रिपोर्ट में आगे राउंडअप जैसे ग्लाइफोसेट हर्बिसाइड्स के लिए लेबल नियमों को सख्ती से लागू करने की सिफारिश की गई थी। यह इंसेक्टिसाइड्स एक्ट, 1968 और उससे जुड़े सरकारी नियमों पर आधारित था।

कमेटी के रिपोर्ट देने से पहले ही, महाराष्ट्र सरकार ने फरवरी 2018 में हर्बिसाइड-टॉलरेंट कॉटन सीड्स की बिक्री की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बना दी। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने अप्रैल और जून 2018 के बीच महाराष्ट्र में 1.8 करोड़ हर्बिसाईट टॉलेरेंट कपास बीज जब्त किए।
आंध्र प्रदेश ने भी फरवरी 2019 में गैर-कानूनी एचटी-बीटी बिक्री के लिए एक कंपनी का लाइसेंस कैंसल कर दिया। इसने 13 दूसरी कंपनियों के लाइसेंस भी एक साल के लिए सस्पेंड कर दिए।
जुलाई 2019 में संसद में पेश आंकड़े आंकड़ों में महाराष्ट्र ने 9,387 गैर-कानूनी कॉटनसीड पैकेट और 1,087 किलोग्राम खुला कॉटनसीड जब्त किया था, जिनकी कुल कीमत 102.87 लाख रुपये थी। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ अलग-अलग थानों में 20 एफआईआर दर्ज कीं।
गुजरात में राज्य सरकार ने 2018 और 2019 के बीच ऐसे आठ मामलों की रिपोर्ट की। अधिकारियों ने वडोदरा, कच्छ, साबरकांठा और गिर-सोमनाथ में गैर कानूनी कपास बीज बेचने के आरोपियों के खिलाफ सात एफआईआर दर्ज कीं, जबकि भावनगर जिले में एक मामले की जांच अभी भी चल रही है।
तेलंगाना में सबसे बड़े स्तर पर कार्रवाई हुई। राज्य ने 2019 में 302 सीड सैंपल टेस्ट किए, और 8 एचटी ट्रेट के लिए पॉजिटिव पाए। अधिकारियों ने 40 मामले दर्ज किए और 44 लोगों को गिरफ्तार किया। उन्होंने 7 सीड लाइसेंस के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई भी की।
कुल मिलाकर, उन्होंने 29,647 क्विंटल एचटी-ट्रेट सीड स्टॉक जब्त किया, जिसकी कीमत 907 लाख रुपये थी।
10 अगस्त 2021 को, सरकार ने लोकसभा को बताया कि किसी भी राज्य ने बिना मंजूरी वाले बीटी कॉटन सीड्स प्रोडक्शन की रिपोर्ट नहीं की।

मंजूरी का इंतज़ार करती माहिको
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1989 के तहत, भारत में जीएम फसलों को कानूनी मंज़ूरी देने के लिए कई चरणों वाली क़ानूनी प्रक्रिया है। एक प्रपोज़ल पहले इंस्टीट्यूशनल बायोसेफ्टी कमेटी (IBSC) के पास जाता है, जो इसे रिव्यू कमेटी ऑन जेनेटिक मैनिपुलेशन (RCGM) को रिकमेंड करती है।
आरसीजीएम बायोसेफ्टी और एग्रोनॉमिक डेटा कलेक्शन की देखरेख करती है। इस प्रोसेस के दौरान, मॉनिटरिंग कम इवैल्यूएशन कमेटी (MEC) फील्ड ट्रायल्स का दौरा करती है और सुरक्षित किस्मों को आरसीजीएम को भेजती है। जिसे “एनवायरनमेंटल रिलीज़,” या कमर्शियल खेती कहा जाता है, उसके लिए आखिरी मंज़ूरी जीईएसी के पास होती है।
अप्रैल 2016 में, केंद्र सरकार ने बीटी कपास के बीजों के 450 ग्राम के पैकेट पर ट्रेट वैल्यू (रॉयल्टी) कम कर दी। रॉयल्टी 174.40 रुपये (उत्तर भारत के लिए) और 163.28 रुपये (बाकी भारत के लिए) से घटकर 49 रुपये प्रति पैकेट हो गई।
बीज कंपनियां यह रॉयल्टी माहिको-मोनसेंटो बायोटेक (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (MMB) को BG-II बीज बेचने के एवज में देती हैं। एमएमबी माहिको और मोनसेंटो का एक जॉइंट वेंचर है।
कृषि मंत्रालय ने मई 2016 में एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट के तहत एक नोटिफिकेशन जारी किया। इस नोटिफिकेशन ने एमएमबी से बीटी कॉटन टेक्नोलॉजी पर उसके पेटेंट अधिकार छीन लिए।
6 जुलाई, 2016 को, मोनसेंटो ने एचटी बीटी कपास की मंजूरी के लिए जीईएसी से अपना प्रस्ताव वापस ले लिया। कंपनी की प्रवक्ता क्रिस्टी डिक्सन ने ब्लूमबर्ग को बताया कि कंपनी ने इसका कारण “रेगुलेटरी अनिश्चितता और चल रही बातचीत” बताया।
लेकिन, 2022 में, एमएमबी ने एचटी बीटी कपास के अप्रूवल के लिए एक बार फिर आवेदन किया। कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर, शिरीष बरवाले ने एनडीटीवी प्रॉफ़िट को बताया, “किसानों की चिंताओं को देखते हुए, हमने अच्छी नीयत से फिर से अप्लाई किया है।”
केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने 5 अगस्त 2025 को लोकसभा को बताया कि इन कपास बीजों के एनवायर्नमेंटल रिलीज़ का प्रस्ताव अभी भी विचाराधीन है।

स्वास्थ्य, उपज और जवाबदेही
12 अगस्त 2025 को संसद में दिए एक जवाब में सरकार ने बताया कि सीड इंडस्ट्री एसोसिएशन और कुछ किसान एचटी बीटी कॉटन रिलीज़ करने की मांग कर रहे हैं।
शेतकरी संगठन नाम के महाराष्ट्र स्थित एक किसान संगठन ने महाराष्ट्र सरकार के इन बीजों पर बैन लगाने के कदम के खिलाफ कैंपेन भी चलाया।
हालांकि किसानों राय भी बंटी हुई है।
डॉ. रेड्डी कहते हैं कि चूंकि भारत में इस कपास वैरायटी के नतीजों पर विस्तृत रिसर्च की कमी है, इसलिए खेतों में इसका इस्तेमाल खतरनाक है। उनका मानना है कि किसान खुद को खतरे में डाल रहे हैं। उनकी खास चिंता ग्लाइफोसेट के प्रति है।
मार्च 2015 में, इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने इंसानों में कम सबूत और एक्सपेरिमेंटल जानवरों में काफी सबूत के आधार पर ग्लाइफोसेट को ‘शायद इंसानों के लिए कैंसर पैदा करने वाला’ (ग्रुप 2A) बताया।
म्यूटेशन रिसर्च में छपे ज़ेंग एट अल. के 2019 के एक मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि ग्लाइफोसेट-बेस्ड हर्बिसाइड्स के ज़्यादा संपर्क में आने से नॉन-हॉजकिन लिंफोमा (NHL) का खतरा 41% बढ़ जाता है, जो ब्लड कैंसर का एक रूप है।
2016 में पेस्टिसाइड रेसिड्यू पर वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन की जॉइंट FAO/WHO मीटिंग में यह नतीजा निकला कि ग्लाइफोसेट से “इंसानी खाने से जुड़ी डोज़ में कैंसर होने का खतरा होने की संभावना नहीं है।”
हैदराबाद स्थित एक मार्केट इंटेलिजेंस फर्म मोर्डोर इंटेलिजेंस के मुताबिक ग्लाइफोसेट हर्बिसाइड मार्केट का साइज़ 2031 तक 15.58 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो सकता है।

प्रशासन का जवाब
खरगोन में किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग के डिप्टी डायरेक्टर एसएस राजपूत ने कहा कि उनके पास ‘5जी’ नाम से कपास के बीज बेचे जाने की जानकारी आई है।
उन्होंने कहा कि दुकानों की तलाशी के लिए जिले के सभी डेवलपमेंट ब्लॉक में टीमें बनाई गई थीं, लेकिन कोई बीज नहीं मिला। जिन किसानों से पूछताछ की गई, उन्होंने भी कोई जानकारी नहीं दी।
उन्होंने कहा, “अगर 5जी नाम के बीज मिलते हैं, तो कार्रवाई की जाएगी।”
यह जानने के लिए कि मध्य प्रदेश के बाहर हर्बिसाइड-टॉलरेंट बीजों की बिक्री की शिकायतों पर केंद्र सरकार ने अब तक क्या कार्रवाई की है। और, क्या जीईएसी ने इस किस्म को मंज़ूरी देने में कोई प्रगति की है, हमने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से उनके सहयोगियों के ज़रिए संपर्क करने की कोशिश की।
हालांकि, हम उनसे संपर्क नहीं कर पाए।
नोट– खरगोन के वरिष्ठ पत्रकार अमित भटोरे ने इस रिपोर्टर को फ़ील्ड विजिट में मदद की है।
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