...
Skip to content

एफपीओ: साथ आए तो बढ़ी आमदनी, मिलकर करोड़ों कमा रहे ये किसान

gogavan FPO Khargone

“एक किसान को बाज़ार नहीं मिलता और दूसरा भाव नहीं मिलता। यही दो किसानों की सबसे बड़ी समस्या हैं।” यह कहने वाले मोहन सिंह सिसोदिया का खुद का परिवार 100 एकड़ में खेती करता है। वो कहते हैं कि उनके परिवार में केवल 30 नहीं बल्कि 1000 से भी ज्यादा सदस्य हैं। 

दरअसल सिसोदिया खरगोन ज़िले के गोगावां फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (FPO) के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर के सदस्य हैं। यह एफपीओ मुख्य रूप से बीज उत्पादन का व्यापार करता है। 

सिसोदिया के अनुसार इस एफपीओ में 750 किसान पंजीकृत हैं। मगर उनके साथ काम करने वाले गैरपंजीकृत किसानों को मिलाकर सदस्यों की संख्या 1000 से भी अधिक है।

वह कहते हैं कि उनसे जुड़े किसानों को अब न बाज़ार खोजने की ज़रूरत होती है ना ही भाव की चिंता। वहीं किसान कहते हैं कि एफपीओ से जुड़ने के बाद उनकी जोखिम लेने की क्षमता बढ़ गई है। इससे वो फसलों और तकनीकों में प्रयोग कर पा रहे हैं। 

केंद्र सरकार ने 2020 में “10,000 किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के गठन और संवर्धन” की योजना शुरू की थी। 6,865 करोड़ रू की इस योजना के तहत 2027-28 तक 10,000 नए एफपीओ बनाने और उन्हें बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि समय से पहले फरवरी 2025 में ही यह लक्ष्य पूरा हो गया। 

ऐसे में ज़रूरी है यह देखना कि योजना के तहत बने इन एफपीओ से किसानों को क्या फायदा हुआ है? ये कैसे काम कर रहे हैं और इनके सामने क्या चुनौतियां हैं?

Moong seed Gogavan FPO story Khargone Mohan Singh Sisodiya khargone
गोगावां एफपीओ द्वारा 15 तरह की फसलों के बीज उत्पादन का काम किया जा रहा है | गोगावां | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

12 लोगों से शुरू हुआ सफ़र

किसान उत्पादक संगठन यानि एफपीओ किसानों-उत्पादकों के वो व्यापारिक समूह होते हैं जो खेती और उससे जुड़े सेक्टर में प्रोडक्शन और मार्केटिंग से जुड़े हुए व्यापार में किसी कंपनी की तरह ही शामिल होते हैं। यह कंपनीज़ एक्ट, 1956 के पार्ट IXA के तहत या संबंधित राज्यों के को-ऑपरेटिव सोसाइटीज़ एक्ट के तहत शामिल या पंजीकृत होते हैं। आसान भाषा में कहें तो ये किसानों की कंपनी है। हालांकि इसके अंतर्गत फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी (FPC) और सहकारी समितियां दोनों शामिल होती हैं। 

नाबार्ड (NABARD) के खरगोन जिला विकास महाप्रबंधक विजेंद्र दिनकर पाटिल बताते हैं कि किसी भी एफपीओ के पंजीकरण के लिए 5 बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स और इतने ही प्रमोटर्स आवश्यक होते हैं। पंजीकरण के बाद शेयर होल्डर्स के तौर पर किसानों को जोड़ा जाता है। इसके लिए आम तौर पर शेयर के रूप में प्रति किसान 2000 रूपए लिए जाते हैं। सरकार भी मैचिंग इक्विटी ग्रांट के रूप में 2000 रूपए प्रति किसान निवेश करती है। इसकी अधिकतम सीमा 15 लाख रूपए है। 

सिसोदिया ने 2021 में नाबार्ड की सलाह पर एफपीओ बनाने का निर्णय लिया। कुल 12 लोगों ने 1.20 करोड़ रूपए का शुरूआती निवेश कर गोगावां एफपीओ का गठन किया। 2014 से बीज उत्पादन कर रहे सिसोदिया ने एफपीओ के माध्यम से बीज व्यापार करने का प्रस्ताव बोर्ड मेंबर्स के सामने रखा। 

इस एफपीओ के सदस्य अब गेहूं, प्याज़, मिर्च, भिंडी, मूंग और कपास सहित कुल 15 तरह के बीजों की खेती कर रहे हैं। 

Farmer of Khargone Gogavan FPO Story
प्रताप वर्मा को अब न लाइन में लगना पड़ता है न भाव के लिए संघर्ष | गोगावां | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

किसानों का क्या फायदा है?

बीजापुर के रहने वाले प्रताप वर्मा 25 एकड़ में खेती करते हैं। वो रबी के सीजन में गेहूं और मक्का की खेती करते हैं। गोगावां एफपीओ द्वारा किसी भी नए बीज की टेस्टिंग वर्मा के खेत में ही की जाती है।

एफपीओ से जुड़ने का फायदा बताते हुए वो कहते हैं, “पहले फसल लेकर मंडी की लाइन में लगना पड़ता था अब फसल तैयार होने के बाद सीधे एफपीओ को बेच सकते हैं।”

वर्मा को अब फसल के दाम बेहतर और समय से मिल रहे हैं। वो बताते हैं, “मंडी में बोली के आधार पर भाव तय होता है। कभी-कभी कम रेट भी बेचना पड़ता था क्योंकि फसल वापस लाना महंगा पड़ता। एफपीओ में फसल का भाव पहले से तय होता है इसलिए उसकी चिंता नहीं होती।” 

सिसोदिया बताते हैं कि उनके एफपीओ द्वारा 3 तरह से खरीदी की जाती है। पहले तरीके में किसानों को बीज दिए जाते हैं और फसल आने पर बाज़ार मूल्य से 50 रूपए (प्रतिक्विंटल) अधिक देकर खरीद की जाती है। दूसरा, अगर किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदी करवाना चाहता है तो सरकारी खरीद शुरू होने के दिन से एमएसपी पर खरीद की जाएगी। साथ ही सभी किसानों की फसल खरीदी पूरा होने के बाद उन्हें बोनस भी दिया जाता है।   

bee polination onion seed Gogavan FPO Story Khargone
कपास और मिर्च की पारंपरिक खेती से आगे ये किसान अब कई तरह के प्रयोग कर रहे हैं | गोगावां | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

गोगावां एफपीओ ने सबसे पहले अपना गोदाम तैयार किया। एफपीओ के सदस्य इसके ज़रिए किसानों की भंडारण की समस्या को ख़त्म करना चाहते थे। अब किसानों के पास यह सुविधा है कि वह कभी भी अपने फसल का भंडारण कर सकते हैं और जिस दिन भी वह फसल बेचना चाहते हैं उस दिन मॉडल रेट पर फसल बेच सकते हैं। 

सिसोदिया कहते हैं कि बड़ी मात्रा में उत्पादन करने के चलते वह बड़ी बीज उत्पादक कंपनियों को आकर्षित करके उनके साथ व्यापार करने में सफल रहे हैं। यह शायद एक किसान के लिए अपेक्षाकृत आसान न होता।     

वहीं वर्मा कहते हैं कि उन्हें पहले केवल स्थानीय मंडी में फसल बेचने का ही ज्ञान था। अब वो अपने माल को निर्यात कैसे करना है यह भी जानते हैं। एफपीओ के माध्यम से उनकी पहुंच बड़े बाज़ार तक बढ़ी है।   

Cottton Seed Khargone Farmer gogavan FPO Story
गोगावां एफपीओ ने निमाड़ में पहली बार कपास का बीज उत्पादन करना शुरू किया | गोगावां | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

जोखिम लेने की क्षमता बढ़ी

गोगावां एफपीओ ने निमाड़ में पहली बार कपास के बीज का उत्पादन भी शुरू किया। हालांकि 2024 में जब ये काम शुरू हुआ तो उन्हें मशीनों की सही जानकारी नहीं थी। ऐसे में उन्हें दोबारा से मशीनें खरीदनी पड़ीं। सिसोदिया कहते हैं कि चूंकि एफपीओ के माध्यम से यह खरीद की गई थी इसलिए वह इस घाटे को झेलने में सक्षम थे। 

इस साल उन्हें बीज महासंघ द्वारा भी कपास के बीज की प्रेसेसिंग का काम मिला है।

निवेश करने और शुरूआती घाटा सहने की क्षमता के चलते एफपीओ के किसान नए प्रयोग करने का जोखिम भी ले रहे हैं। ऐसे ही एक प्रयोग में उन्होंने पपीते के एक लाख पौधे लगाए हैं। साल भर में 7 से 11 रूपए प्रति किलो के भाव से एफपीओ 100 टन पपीते का व्यापार कर चुका है। बीते साल उन्हें प्रति एकड़ 4 से 5 लाख रूपए का फायदा हुआ था। 

इस एफपीओ के एक अन्य डायरेक्टर श्याम सिंह सोलंकी कहते हैं कि जो छोटी जोत के किसान ट्रैक्टर के अलावा आधुनिक मशीनें ख़रीदने में हिचकिचाते हैं। एफपीओ ऐसी मशीनें खरीद सकता है जिसे कई किसान इस्तेमाल कर सकते हैं। 

Farmer of Khargone FPO
मगर तमाम अच्छाइयों के बाद भी देश में केवल 30% एफपीओ ही सफल हैं | गोगावां | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

देश में कितने सफल एफपीओ?  

31 दिसंबर 2025 तक, केन्द्रीय योजना के तहत 10,000 एफपीओ रजिस्टर किए जा चुके हैं। 6,557 एफपीओ को मैचिंग इक्विटी ग्रांट के तौर पर 430.77 करोड़ रूपए बांटे गए हैं। वहीं 2671 एफपीओ को 662.71 करोड़ रूपए का क्रेडिट गारंटी कवर जारी किया गया है। 

भारत में लगभग 84% एफपीओ असल में एक कंपनी (एफपीसी) की तरह दर्ज हैं। 

अध्ययनों के अनुसार केवल 30% एफपीसी ही सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। मगर 20% अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। जबकि बचे हुए 50% अभी भी 1–3 साल के अपने शुरुआती दिनों में हैं। 

ज़्यादातर एफपीसी के पास बहुत कम पेड-अप कैपिटल है, जिससे उनका ऑपरेशनल स्कोप सीमित हो जाता है। इसके अलावा ऑपरेशनल चैलेंज, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, खराब गवर्नेंस प्रैक्टिस, मार्केट तक लिमिटेड एक्सेस और कमज़ोर इंटर-एफपीसी नेटवर्क शामिल हैं, उनके असफल होने के जोखिम को और बढ़ा देते हैं।

हालांकि 1000 से भी अधिक सदस्यों वाले गोगावां एफपीओ के पास पेड अप कैपिटल पर्याप्त है। इन्होने अलग-अलग प्रयोग कर बड़े बाज़ार तक अपनी पहुंच बढ़ाई है। इसके अलावा वह अन्य एफपीओ के साथ मिलकर भी काम कर रहे हैं। 

Farmers in the field Gogavan FPO Story Khargone
गोगावां एफपीओ के सभी सदस्य अलग अलग ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते हैं ताकि किसी एक पर सारा बोझ न आए | गोगावां | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

पाटिल बताते हैं कि नाबार्ड द्वारा एफपीओ को कई ग्रांट दी जाती हैं ताकि ऑफिस का संचालन करने का खर्च निकाला जा सके। साथ ही उन्हें समय-समय पर नए तरीके के बाज़ार से परिचित भी करवाया जाता है ताकि उनकी मार्केट तक पहुंच बढ़ती रहे। 

चुनौतियों पर वह कहते हैं कि किसी भी एफपीओ को अपने बोर्ड और डायरेक्टर्स में अलग-अलग कौशल वाले लोगों को शामिल करना चाहिए। किसी एक या दो व्यक्ति पर सारा भार डालने के बजाय बैंकिंग कौशल वाला एक सदस्य, किसानों के साथ सामंजस्य बनाने वाला एक सदस्य, तकनीक से परिचित एक सदस्य और इसी तरह अलग-अलग लोगों में उनके कौशल के अनुसार ज़िम्मेदारी बंटी होनी चाहिए।  

वह कहते हैं कि सदस्यों को खुद के बजाए समूह के रूप में आगे बढ़ने का सोचना पड़ेगा और शुरूआती दिनों में धैर्य रखना पड़ेगा। 

1.20 करोड़ के निवेश से शुरू हुआ व्यापार अब लगभग 5-5.5 करोड़ तक पहुंच गया है। सिसोदिया कहते हैं कि अब उनके पास बड़े बाज़ार का अनुभव है और जोखिम लेने का हुनर। इससे गोगावां एफपीओ के सदस्य नए प्रयोग करते हुए व्यापार के और भी मौके तलाश रहे हैं। 

नोट – रिपोर्टिंग के दौरान अमित भटोरे का सहयोग प्राप्त हुआ है। भटोरे खरगोन स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं जो ग्राउंड रिपोर्ट सहित कई संस्थानों के लिए लेखन करते हैं।

बैनर ईमेज – गोगावां स्थित गोगावां फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन का कार्यालय | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।

यह भी पढ़ें 

रीवा के जंगल में हाथी, ग्रामीण और विभाग दोनों के लिए परेशानी का सबब

कुपोषण से 4 माह की बच्ची की मौत, जुड़वा भाई की भी हालत गंभीर

पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुकट्विटरइंस्टाग्रामयूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें। 

Author

  • Shishir Agrawal is the Hindi Editor of Ground Report. However he identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers environment and development affairs from the tribal landscape of central India.

    He has also covered issues related to agrarian crisis, wildlife, water, waste and urban development. He has been a recipient of several fellowships and grant. This includes Gandhi Fellowship, Vikas Samvad Media Fellowship and Earth Journalism Network Grant.

    Apart from having long conversations he indulges himself in reading books, watching theater and gazing at flying objects for leisure. He can be reached at shishiragrawl007@gmail.com.

    View all posts Hindi Editor

Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

Connect With Us

Send your feedback at greport2018@gmail.com

Newsletter

Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.

When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.

Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.

EXPLORE MORE

LATEST

mORE GROUND REPORTS

Environment stories from the margins