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नहर है, पानी है, सोलर पंप योजना है, फिर क्यों बढ़ रहा है किसानों पर जलकर का कर्ज़?

मध्य प्रदेश में सरफेस वॉटर सोलर पंप की अनदेखी की जमीनी पड़ताल
Solar Pumps Rajgarh District
सोलर पंप के साथ राजगढ़ के किसान

राजगढ़ जिले के ब्यावरा ब्लॉक के सुंदरहेड़ा गांव के किसान प्रेमनारायण शर्मा के खेत के ठीक बगल से एक नहर गुजरती है। मोहनपुरा डैम का पानी, अरबों रुपये की लागत से बनी नहर प्रणाली के जरिए, उनके खेत की मेड़ तक पहुंचता है। नहर के पानी के लिए प्रेमनारायण 100 से 200 रुपये प्रति बीघा के हिसाब से भुगतान करते हैं। इस पानी को खेत के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए उन्हें हर साल 4 हजार रुपये बिजली बिल अलग से चुकाना पड़ता है। यह तब होता है जब बिजली और नहर का पानी एक साथ उपलब्ध हों, जो अक्सर होता नहीं।

“जब विभाग नहर चलाता है, उस समय बिजली बंद रहती है। और जब बिजली होती है, नहर बंद रहती है,” प्रेमनारायण बताते हैं। इस विरोधाभास की मार सीधे उनकी फसल पर पड़ती है।

यह कहानी सिर्फ प्रेमनारायण की नहीं है। मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में जहां मोहनपुरा, कुंडलियां, कुशलपुरा और मुंडला जैसी विशाल बांध-नहर परियोजनाओं का जाल बिछा है, वहां हजारों किसान आज भी पारंपरिक बिजली और डीजल पंपों पर निर्भर हैं। और इस पूरी तस्वीर में एक बड़ा सवाल गायब है, जब नहर का पानी खेत की मेड़ तक आ ही रहा है, तो उसे उठाने के लिए सरफेस वॉटर सोलर पंप क्यों नहीं लगाया जा सकता?

राजगढ़ स्थित कुशलपुरा डैम, जहां से नहरों के ज़रिए किसानों के खेतों तक पानी पहुंचता है।
राजगढ़ स्थित कुशलपुरा डैम, जहां से नहरों के ज़रिए किसानों के खेतों तक पानी पहुंचता है।

सोलर पंप का मतलब सिर्फ ट्यूबवेल नहीं

भारत में पीएम कुसुम योजना के तहत लाखों सोलर पंप लगाए गए हैं। केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2025 तक पीएम कुसुम के कंपोनेंट-बी के तहत देशभर में 8 लाख 40 हजार से अधिक सोलर पंप स्थापित हो चुके हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने भी 52 हजार किसानों को सोलर पंप से जोड़ने की योजना की घोषणा की है।

लेकिन इस पूरी योजना की एक बड़ी सीमा है, इसका ध्यान लगभग पूरी तरह से सबमर्सिबल पंपों यानी ट्यूबवेल के जरिए जमीन के नीचे से पानी खींचने पर केंद्रित है।

किसान नहरों से इस तरह डीजल पंप लगाकर पानी अपने खेतों तक लेकर जाते हैं, फोटो- अब्दुल वसीम अंसारी, राजगढ़
किसान नहरों से इस तरह डीजल पंप लगाकर पानी अपने खेतों तक लेकर जाते हैं, फोटो- अब्दुल वसीम अंसारी, राजगढ़

सोलर पंप दो तरह के होते हैं। पहला, सबमर्सिबल पंप — जो बोरवेल या ट्यूबवेल में डाला जाता है और जमीन की गहराई से पानी खींचता है। दूसरा, सरफेस वॉटर पंप — जो नहर, तालाब, नदी या डैम से उपलब्ध सतही पानी को उठाकर खेत तक पहुंचाता है। जहां 15 मीटर से कम गहराई पर पानी हो, या जहां नहर और तालाब का पानी पहले से मौजूद हो, वहां सरफेस पंप एक आदर्श और किफायती समाधान है।

राजगढ़ जिले में और मध्य प्रदेश के अन्य नहर-सिंचित इलाकों में, यह दूसरा विकल्प लगभग अनदेखा रह गया है। मध्य प्रदेश में खेती की सिंचाई मुख्य रूप से भूजल पर निर्भर है, लेकिन नहरें भी एक अहम जीवन-रेखा बनी हुई हैं, खासकर उत्तरी, चंबल और बुंदेलखंड इलाकों में। राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 17.92% हिस्सा नहरों से सिंचित होता है।

हमने मध्य प्रदेश के नहर से सिंचाई करने वाले क्षेत्रों में पड़ताल की और पाया कि इन क्षेत्रों में सोलर पंप का चलन न के बराबर है। जहां भी सोलर पंप लगाए गए हैं वहां बोरवेल यानी ग्राउंड वॉटर खींचने के लिए ही इनका उपयोग किया जा रहा है।

राजगढ़ की जमीनी हकीकत: 359 किलोमीटर नहर, फिर भी बिजली की मांग बढ़ रही है

राजगढ़ जिले में सरकारी सिंचाई का विशाल ढांचा खड़ा है। जल संसाधन संभाग राजगढ़ के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, जिले में 41 परियोजनाओं (2 मध्यम और 39 लघु तालाब) के माध्यम से नहर सिंचाई होती है, जिनकी कुल लंबाई 259 किलोमीटर है। नरसिंहगढ़ जल संसाधन विभाग में इसके अतिरिक्त 100 किलोमीटर नहरें और हैं। कुल मिलाकर जिले में 31,500 हेक्टेयर से अधिक कमान क्षेत्र में नहर सिंचाई की व्यवस्था है।

इतने बड़े सरकारी सिंचाई नेटवर्क के बावजूद, कृषि विद्युत कनेक्शन की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। विद्युत विभाग राजगढ़ के महाप्रबंधक देवेंद्र सिंह मेहरा द्वारा दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2020 में जिले में कुल विद्युत कनेक्शन 95,210 थे जो 2026 में बढ़कर 1,37,270 हो गए हैं। यानी 6 साल में 42 हजार से अधिक नए कृषि विद्युत कनेक्शन जुड़े, और अकेले 2026 में 18 हजार से ज्यादा नए कनेक्शन हुए।

यह आंकड़ा अपने-आप में एक बड़ा सवाल उठाता है। जब नहरें हैं, डैम हैं, पाइपलाइनें हैं — तो बिजली कनेक्शन की मांग क्यों बढ़ रही है?

राजगढ़ में कुशलपुरा डैम से किसान के खेत तक आई नहर
राजगढ़ में कुशलपुरा डैम से किसान के खेत तक आई नहर

जवाब छिपा है प्रेशर्ड पाइपलाइन की तकनीकी सीमा में। माल्याहेडी गांव के किसान महेश सोंधिया के खेत में मोहनपुरा डैम की आधुनिक प्रेशर्ड पाइपलाइन से सीधे पानी आता है। लेकिन इसके बावजूद वे विद्युत पंप चलाने को मजबूर हैं। “प्रेशर्ड पाइपलाइन से मिलने वाला दबाव खेत के ऊंचे हिस्सों तक पानी पहुंचाने या ड्रिप-स्प्रिंकलर चलाने के लिए पर्याप्त नहीं होता,” वे बताते हैं। “इसीलिए पानी को आगे ‘लिफ्ट’ करने के लिए पंप चलाना पड़ता है।”

ठीक यही वह जगह है जहां सरफेस वॉटर सोलर पंप एक सटीक समाधान बन सकता है।

किसान के खेत पर लगा सबमर्सिबल सोलर पंप जिसका इस्तेमाल ग्राउंड वॉटर से सिंचाई करने में होता है
किसान के खेत पर लगा सबमर्सिबल सोलर पंप जिसका इस्तेमाल ग्राउंड वॉटर से सिंचाई करने में होता है

मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम के पोर्टल पर दर्ज आंकड़े बताते हैं कि राजगढ़ जिले में सोलर पंपों की संख्या आगे बढ़ने के बजाय पिछड़ती जा रही है:

  • फेस 1 (2017-2019): 173 सोलर पंप स्थापित
  • फेस 2 (2020-2021): 124 सोलर पंप
  • फेस 3 (2022): केवल 23 सोलर पंप
  • कुसुम पोर्टल (2023-2025): सिर्फ 1 दर्ज

और इन सभी चरणों में जो पंप लगे, उनमें सबमर्सिबल यानी ट्यूबवेल-आधारित पंपों की संख्या अधिकतम रही। नहर या तालाब के पानी पर आधारित सरफेस पंप लगभग नहीं के बराबर लगे।

यह वह विडंबना है जो इस पूरी कहानी के केंद्र में है। एक तरफ सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर नहरों का जाल बिछाया। दूसरी तरफ सोलर पंप योजना भी लागू की। लेकिन दोनों योजनाओं को कभी एक-दूसरे से जोड़कर नहीं देखा गया।

भूजल का संकट

मध्य प्रदेश में खेती मुख्य रूप से कुओं और ट्यूबवेल पर निर्भर है। भूजल सिंचाई का मुख्य स्रोत है, जो राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 66% हिस्सा है।
मध्य प्रदेश में खेती मुख्य रूप से कुओं और ट्यूबवेल पर निर्भर है। भूजल सिंचाई का मुख्य स्रोत है, जो राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 66% हिस्सा है।

यहां एक और जरूरी पहलू है जो इस समस्या को और गंभीर बनाता है। 18 दिसंबर 2025 को केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट के अनुसार, राजगढ़ जिले के राजगढ़, जीरापुर, ब्यावरा और खिलचीपुर ब्लॉक ‘सेमी-क्रिटिकल’ श्रेणी में हैं। नरसिंहगढ़ ब्लॉक ‘क्रिटिकल’ और सारंगपुर ब्लॉक ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ श्रेणी में पहुंच चुका है।

यानी जमीन के नीचे का पानी तेजी से खत्म हो रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी यह खतरा स्वीकार किया जा चुका है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल निकालने वाला देश है — अमेरिका और चीन को मिलाकर भी जितना वे निकालते हैं, उससे ज्यादा भारत अकेले निकालता है, और इसमें कृषि का सबसे बड़ा हिस्सा है। नीति-विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि सोलर पंप से मुफ्त सिंचाई की सुविधा मिलने पर भूजल दोहन और तेज हो जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, ऑफ-ग्रिड सोलर पंप अपनी उत्पन्न ऊर्जा का दो-तिहाई हिस्सा बर्बाद करते हैं और “अधिकांश सोलर पंप कभी बंद ही नहीं होते।”

जल शक्ति मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसे सीधे शब्दों में कहा है — “माइक्रो इरिगेशन का सपना नहर के पानी पर आधारित होना चाहिए। 70 एमएचए की माइक्रो इरिगेशन टारगेट के लिए जितना पानी चाहिए, उतना भूजल में है ही नहीं।”

ऐसे में राजगढ़ जैसे जिले में, जहां नहरों का विशाल नेटवर्क पहले से मौजूद है, सोलर पंप का इस्तेमाल भूजल खींचने के लिए करना न केवल अनावश्यक है बल्कि खतरनाक भी है।

जब किसान ने खुद रास्ता निकाला

खीमखेड़ी गांव के अशोक शर्मा उन किसानों में हैं जिन्होंने सरकारी अनुदान पर सबमर्सिबल सोलर पंप लगवाया है। वे बताते हैं, “जब मैंने सोलर पंप लगाने की ठानी, गांव के लोग मेरा मजाक उड़ाते थे। आज सुबह 7 से शाम 7 बजे तक बिना बिजली और बिना डीजल के मोटर दौड़ती है।” लेकिन अशोक भी यह स्वीकार करते हैं कि वे अपनी दूसरी जमीन के लिए एक और पंप का पंजीकरण कराना चाहते हैं मगर “पोर्टल ही नहीं खुल रहा।”

उसी गांव के विष्णु प्रसाद यादव ने सरकारी सब्सिडी का इंतजार छोड़कर निजी कंपनी से सोलर पंप लगवाया। “आवेदन के बाद 6 महीने लग जाते हैं। मैं नहीं चाहता था कि रबी का सीजन निकल जाए। प्राइवेट कंपनी ने 3 दिन में इंस्टॉल कर दिया। इस साल मैंने लगभग 50 क्विंटल गेहूं का उत्पादन किया।”

ये किसान बिजली और डीजल के चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता खोज रहे हैं। लेकिन उन्हें वह रास्ता नहीं मिल रहा जो उनके लिए सबसे स्वाभाविक था — नहर के पानी पर चलने वाला सोलर पंप।

कर्ज और लागत: किसान की टूटती कमर

इस पूरी स्थिति की आर्थिक कीमत किसान चुका रहा है। राजगढ़ जिले में एक सीजन में सिंचाई पर किसान का खर्च इस प्रकार बैठता है:

  • बिजली बिल: 4 से 6 हजार रुपये प्रति रबी सीजन
  • डैम का पानी खेत तक लाने की प्रारंभिक लागत: 5 से 9 हजार रुपये
  • जलकर (पानी का बिल): 100 से 300 रुपये प्रति बीघा

इस भारी आर्थिक बोझ का नतीजा यह है कि राजगढ़ सिंचाई विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अकेले राजगढ़, ब्यावरा, खिलचीपुर और जीरापुर क्षेत्र में किसानों की बकाया राशि 7 करोड़ 98 लाख 63 हजार रुपये है। और यह सिर्फ इन चार क्षेत्रों का आंकड़ा है — मोहनपुरा, कुंडलियां, पार्वती और नरसिंहगढ़ परियोजनाओं का बकाया इसमें शामिल भी नहीं है।

डीज़ल पंप लगाकर कुंए से पानी खींचते किसान
डीज़ल पंप लगाकर कुंए से पानी खींचते किसान

किसान मोहन सिंह कहते हैं “सिंचाई विभाग की जलकर की राशि केवल 40 प्रतिशत किसान ही समय पर जमा करते हैं। 60 प्रतिशत भुगतान नहीं कर पाते। पेनाल्टी और ब्याज जोड़कर किसानों पर बकाया बढ़ता जा रहा है।”

पीएम कुसुम योजना में कुल लागत का 60 प्रतिशत केंद्र और राज्य सरकार मिलकर देती हैं, 30 प्रतिशत ऋण होता है और किसान को केवल 10 प्रतिशत राशि खुद लगानी होती है। यदि नहर-सिंचित क्षेत्रों में सरफेस सोलर पंप की उपलब्धता होती, तो एक बार का यह 10 प्रतिशत निवेश किसान को हर साल के बिजली बिल से स्थायी मुक्ति दिला सकता था।

“हमें इस बारे में पता ही नहीं”

मुंडला बांध के कमान क्षेत्र की ग्राम पंचायत अमृतपुरा के किसान हेमराज रुहेला कहते हैं, “यहां किसान आज भी विद्युत और डीजल पंप पर ही निर्भर हैं। हमें इस बात की जानकारी ही नहीं है कि सोलर पंप के लिए किस पोर्टल पर आवेदन करना है और कितनी सब्सिडी उपलब्ध है।”

कुशलपुरा डैम की नहर से सिंचाई करने वाले रलायती गांव के महेंद्र सिंह कहते हैं, “हम नहर से सिंचाई करते हैं, लेकिन सोलर पंप और उसकी योजना से पूरी तरह अनजान हैं।”

यह सुनकर आश्चर्य होता है, क्योंकि ये वही किसान हैं जिनके खेत की मेड़ तक सरकारी नहर का पानी आता है। अगर इन किसानों को यह पता होता कि नहर के पानी को उठाने के लिए भी सोलर पंप लग सकता है, तो शायद तस्वीर कुछ और होती।

समस्या की जड़: नीति में एक अंधा कोना

यह सिर्फ जागरूकता की कमी नहीं है। यह एक नीतिगत चूक भी है। पीएम कुसुम योजना के दिशा-निर्देशों में तकनीकी रूप से सरफेस पंप की गुंजाइश है, लेकिन जमीनी क्रियान्वयन में लगभग पूरा जोर सबमर्सिबल-ट्यूबवेल पर रहा है। जहां नहर और डैम का पानी उपलब्ध है, वहां भी किसानों को इसी खांचे में ढालकर देखा गया।

नतीजा? जिन इलाकों में सिंचाई विभाग ने अरबों रुपये खर्च कर पानी किसान की मेड़ तक पहुंचाया, वहां ऊर्जा विभाग ने जमीन के नीचे का पानी निकालने के लिए सोलर पंप दिए। दोनों विभागों के बीच यह तालमेल का अभाव किसान को दोहरे खर्च में डाल रहा है।

गणेशपुरा सोलर प्लांट के डिप्टी मैनेजर अमरेश सिंह एक और पहलू उठाते हैं — “जब किसानों से फीडबैक लिया गया तो पता चला कि कई किसानों की सोलर मोटरें खेत से चोरी हो गई हैं। कई किसान इसीलिए खेती के सीजन में अस्थायी विद्युत कनेक्शन लेकर सिंचाई करते हैं। जब तक सुरक्षा और पूरी जागरूकता नहीं होगी, तब तक किसान इस तकनीक को पूरी तरह नहीं अपनाएंगे।”

आगे का रास्ता: नहर + सूरज = आत्मनिर्भर किसान

समाधान जटिल नहीं है। जहां-जहां नहर, तालाब या डैम का सतही पानी उपलब्ध है, वहां पीएम कुसुम जैसी योजनाओं के तहत सरफेस वॉटर सोलर पंप को प्राथमिकता देना होगी। इससे तीन बड़े फायदे हो सकते हैं-

पहला, किसान डीजल और बिजली के खर्च से बचेगा। दूसरा, भूजल का दोहन कम होगा — जो राजगढ़ जैसे ‘सेमी-क्रिटिकल’ और ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ जिलों के लिए तत्काल जरूरी है। तीसरा, सरकार द्वारा अरबों रुपये खर्च करके बनाई गई नहर-सिंचाई प्रणाली का पूरा उपयोग हो सकेगा।

इसके लिए जरूरी है कि सिंचाई विभाग और ऊर्जा विभाग एक साथ बैठकर नीति बनाएं। जिन कमान क्षेत्रों में नहर का पानी उपलब्ध है, वहां सोलर पंप योजना के लाभार्थियों को सबमर्सिबल की बजाय सरफेस पंप देना अनिवार्य किया जाए। सोलर पोर्टल समय पर खुले, प्रक्रिया आसान हो।

माल्याहेडी के महेश सोंधिया ने जब सोलर पंप के लिए पूछा था, तो विभाग ने कहा था कि “टेंपरेरी कनेक्शन वालों को पहले प्राथमिकता है।” यानी जिसके पास जितनी ज्यादा बिजली की जरूरत है, उसे पहले सोलर से जोड़ो — लेकिन वह सोलर उसे जमीन का पानी खींचने के लिए दो, नहर का पानी उठाने के लिए नहीं।

राजगढ़ की यह कहानी अकेले राजगढ़ की नहीं है। मध्य प्रदेश में और देशभर में जहां-जहां बांध-नहर सिंचाई प्रणाली है, वहां यही तस्वीर कमोबेश दोहराई जाती है। सरकार ने नहर बनाई, पानी पहुंचाया — लेकिन उस पानी को सौर ऊर्जा से उठाने की व्यवस्था नहीं की। किसान बिजली के खर्च और कर्ज के बोझ तले दबता रहा।

प्रधानमंत्री ने किसानों से सोलर पंप अपनाने की अपील की है। सही है। लेकिन वह अपील तभी सार्थक होगी जब सरफेस वॉटर सोलर पंप को भी उतनी ही प्रमुखता से योजना में शामिल किया जाए। नहर वाले क्षेत्रों में सबमर्सिबल लगाना न केवल अनावश्यक है बल्कि भूजल संकट को और गहरा करता है।


यह रिपोर्ट राजगढ़ जिले के किसानों, सिंचाई विभाग और विद्युत विभाग के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है।


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Author

  • Abdul Wasim Ansari is an independent journalist based in Rajgarh, Madhya Pradesh, bringing nearly a decade of experience in journalism since 2014. His work focuses on reporting from the grassroots level in the region.

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