संतोष देवी को सांगरी की सब्ज़ी बेहद पसंद है। वो अपने खेत और घर के काम के बीच समय निकाल कर खेजड़ी के पेड़ से कच्ची सांगरी तोड़ती थीं। वो इसे बाकि सब्ज़ियों में स्वाद बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल करतीं।
खेजड़ी के पेड़ पर फली के रूप में लगने वाली सांगरी का महत्व राजस्थान विशेषकर राज्य के पश्चिमी हिस्से की पारंपरिक सब्जियों में रहा है। अपने पोषक तत्वों व स्वाद के कारण ये 1150-1500 रुपए प्रति किलो के भाव से बिकती है।
राजस्थान के झुंझुनू जिले के नवलगढ़ की निवासी संतोष के खेत में लगभग 30 से अधिक खेजड़ी के पेड़ लगे हुए हैं। मगर वो कहती हैं, “बीते कुछ वर्षों से खेजड़ी के पेड़ों से सांगरी गायब होती जा रही है। इस साल तो पेड़ों पर सांगरी नदारद।”
सूखते पेड़, खतरे में विरासत
जोधपुर जिले के लुणी तहसील के रहने श्रवण पटेल बताते हैं, “1985 तक हमारे क्षेत्र में खेजड़ी के पेड़ गिने चुने होते थे। लेकिन बाद में बड़े बुजुर्गों ने खेजड़ी की महत्वता को समझते हुए पेड़ लगाने व संरक्षित करने का कार्य किया।”
वह बताते हैं कि गांवों में खेजड़ी के पेड़ों का ख्याल रखने के लिए गांव के मुखिया और ग्रामवासियों की सहमति पर एक व्यक्ति की नियुक्ति की जाती थी। तनख्वाह के रूप में उसे बाजरा दिया जाता। यह क्रम 2012 तक चलता रहा। पटेल बताते हैं कि वर्तमान में उनके लूणी व आस पास के क्षेत्र के हर खेत में खेजड़ी के 60 से 75 तक पेड़ खड़े हुए हैं।

मगर पटेल यह भी स्वीकारते हैं कि बीते कुछ सालों में खेजड़ी के वयस्क पेड़ सूखते जा रहे हैं और सांगरी की मात्रा में भी काफी कमी हुई है। राजस्थान के अलग-अलग जिलों के व्यापारी भी सांगरी की आवक बहुत कम करने रहने की बात कहते हैं।
नागौर व बीकानेर के किसानों व छोटे दुकानदारों से सांगरी खरीदकर होटल व बड़ी मंडियों में बेचने वाले व्यापारी विजय सिंह ने बताया कि इस वर्ष बाजार में सूखी पतली सांगरी के भाव 1400-1500 रुपए प्रति किलो है। मगर मोटी व मौसम-कीट प्रभावित सांगरी के शुरुआती भाव 1100 रूपए रहे हैं।
आवक कम होने से विजय सिंह ने अभी तक लगभग 2.25 किवंटल सांगरी की खरीद की है जिसमें व्यापारी को कुल राशि 2.90 से 3.00 लाख रुपए खर्च करने पड़े है।
वहीं जोधपुर के ऑसिया क्षेत्र के व्यापारी राजू सोनी ने बताया कि 2020-21 तक बाजार में इसी महीने में सांगरी की आवक बहुत तेज रहती थी मगर इस साल मारवाड़ क्षेत्र में सांगरी का बाजार पूरी तरह खुला नहीं है। हालांकि वह संभावना जताते हैं कि बाजार पूरी तरह खुलने पर इसके भाव लगभग 1600 से 1800 रुपए प्रति किलो तक जा सकते हैं।
नागौर के कृषि महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ विकास पावड़िया राजस्थान के जीआई टैग मिशन के स्टेट काउंसलर भी हैं। वह कहते हैं, “वर्तमान में सांगरी की कमी के कारण बाजार भाव में उछाल आया है जिससे यह 2020-21 से अधिक देखा गया है।”
पेड़ में कीट और रोगों के प्रकोप के अलावा बीते कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन ने खेजड़ी व इसके फली सांगरी को प्रभावित किया है। इस कारण किसानों को अधिक नुकसान हुआ है।
प्रभावित होने की मुख्य वजह
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान केंद्र (काजरी) की प्रधान वैज्ञानिक डॉ अर्चना खेजड़ी पर 2021 से कार्य कर रही हैं। डॉ अर्चना कहती हैं कि पेड़ पर फूल आते समय और फली बनते समय बारिश और ओलों के कारण सांगरी प्रभावित हुई है। फली की बजाय पेड़ पर गिरडु (गांठ) बन जाती है, जिसके कारण उत्पादन 40-70 प्रतिशत तक प्रभावित होता है।
खेजड़ी में फरवरी के आखिर के दिनों से लेकर अप्रैल माह के शुरुआती दिनों तक फूल खिलते हैं। इसके बाद हरी फली तैयार होती है। जैसे हरी फली को सांगरी कहा जाता है वैसे ही सूखी फली, जो कि खुद-ब-खुद पेड़ से झड़ी है, उसको खोखा (अनरूदनी खाली) कहा जाता है यानि फली का अंदर वाला भाग सूखने के बाद खाली हो जाता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के कृषि संकाय के डिपार्टमेंट ऑफ़ ऍग्रोनॉमी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ संदीप गावड़िया कहते हैं कि मरुस्थलीय बालू रेत के धोरों के साथ समतल बालुई मिट्टी में पनपने वाला खेजड़ी मुख्यतया शुष्क व अर्धशुष्क क्षेत्र की जलवायु में तैयार होने वाला पेड़ है। यह सर्दी में 10 डिग्री सेल्सियस से लेकर गर्मियों में 45 डिग्री सेल्सियस तक तापमान सह सकता है।

डॉ अर्चना ने बताया कि खेजड़ी के पेड़ में गैनोडर्मा ल्यूसिडम नामक कवक पेड़ की जड़ों में संक्रमण करता है जिसके कारण पौधे का संवहन तंत्र (vascular system) प्रभावित होता है और धीरे-धीरे पेड़ सूखने लगता है। स्थानीय भाषा में इसे भफोड़ा या विषखोफरा के नाम से भी जाना जाता है।
इसके अलावा दीमक पेड़ों को खोखला कर देते हैं। इनका प्रभाव पहले बारिश के मौसम तक सीमित था लेकिन अब अनिश्चित बारिश भी खेजड़ी को अधिक नुकसान कर रही है।
जनवरी से मार्च के मध्य होने वाली बारिश के कारण जमीन में नमी की मात्रा अधिक हो जाती है और धूप बहुत कम मिल पाती है। नमी की अधिकता के कारण पेड़ों पर दीमक का आतंक बढ़ जाता है।
साल 2017 में शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (आफरी) जोधपुर, राजस्थान ने अपनी सर्वे रिपोर्ट में बताया कि राज्य के 5 जिले– जोधपुर, नागौर, चुरू, सीकर व झुंझुनू में खेजड़ी के पेड़ों की मृत्यु दर 18.08% से 22.67% तक दर्ज की गई। इनकी संख्या में औसत गिरावट 20.93% है।
झुंझुनू में हुए एक अध्यन के अनुसार ज़िले में पेड़ की कुल मृत्यु दर 10.82% दर्ज की गई। इस अध्यन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण खेजड़ी के पेड़ों में पेस्ट और पैथोजन के हमलों की घटना और तीव्रता बढ़ गई है। रूट बोरर और रूट रॉट की वजह से इस पेड़ का अचानक सूख जाना इसके ज़िंदा रहने के लिए एक गंभीर समस्या बनकर उभरा है।
खेजड़ी बचाने के लिए आंदोलन
बीते एक वर्ष में सोलर ऊर्जा प्लांट के विरुद्ध राज्य के पश्चिमी क्षेत्र के जिलों में खेजड़ी को कटने से बचाने के लिए आंदोलन हुए है। 03 फरवरी 2026 को राजस्थान के बीकानेर जिले के पॉलीटेक्निक कॉलेज परिसर में हजारों की तादाद में लोग इकट्ठे हुए व सोलर परियोजनाओ के खिलाफ खेजड़ी के पेड़ों को बचाने का प्रण लिया।

आंदोलित लोगों का कहना था कि बीकानेर-जयपुर हाइवे के दोनों तरफ लगे सोलर प्लांट के कारण हजारों की तादाद में खेजड़ी के पेड़ों को काटा जा रहा है। आंदोलनकारियों की मांग थी कि राज्य सरकार कठोर कानून बनाए।
आंदोलन के 11वें दिन राज्य सरकार ने भरोसा दिलाया कि सरकार जल्द नया कानून बनाएगी व तब तक एक भी पेड़ नहीं कटेगा। उसके बाद आंदोलन समाप्त हुआ।
‘कल्पवृक्ष’ कहा जाने वाला खेजड़ी राजस्थान के लोगों के लिए सांस्कृतिक और आर्थिक महत्त्व का पेड़ है। सांगरी न सिर्फ राजस्थानी व्यंजन का अहम हिस्सा है बल्कि यह व्यापारियों और किसानों के लिए आय का साधन भी है। प्रदेश से गायब होते खेजड़ी के पेड़ इस आर्थिक मौके को कम कर देते हैं। इसलिए खेजड़ी को बचाना बेहद अहम हो जाता है।
हालांकि कृषि अनुसंधान संस्थान काफी साल से खेजड़ी के लिए नए शोध में प्रयासरत है लेकिन अभी तक बड़े स्तर पर असर देखने को नहीं मिला है। राज्य सरकार को भी खेजड़ी को महत्वता को समझते हुए ठोस नीति व योजनाओ को लागू करना चाहिए, ताकि राज्य वृक्ष की प्रासंगिकता व महत्वता कायम रहे।
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