कुपोषण के चलते एक चार साल की बच्ची की मौत का मामला सामने आया है। सतना जिला के पथरा गांव के रहने वाले नत्थूलाल प्रजापति और उनकी पत्नी विमला प्रजापति ने अपने दो बच्चों का एक स्थानीय अनाधिकृत (झोलाछाप) डॉक्टर से इलाज करवा था।
मगर बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार न होने पर उन्हें मझगवां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया। अंत में सतना ज़िला अस्पताल में 4 माह की प्रियांशी की बुधवार, 22 अप्रैल को मौत हो गई। उसके जुड़वा भाई का इलाज अब रीवा मेडिकल कॉलेज में चल रहा है।
स्थानीय कलेक्टर के निर्देश पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सुपरवाईजर को नोटिस जारी किया गया है। साथ ही अनधिकृत डॉक्टर के दवाखाने पर भी छापेमारी की गई है। मगर यह मौत क्षेत्र को कुपोषण मुक्त करने के प्रयासों पर सवालिया निशान लगाती है। यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सतना का मझगवां क्षेत्र पहले भी कुपोषण के लिए चर्चा में रहा है।

जन्म से अंडरवेट हैं बच्चें
मृतक के पिता नत्थूलाल प्रजापति ने ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए बताया कि बीते दिनों दोनों ही बच्चों का टीकाकरण किया गया था। इसके बाद बच्चों को पहले बुखार और बाद में दस्त होना शुरू हो गए। परिजनों द्वारा राहत के लिए पहले एक स्थानीय डॉक्टर फिर मझगवां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया। सरकारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार इस दौरान बच्ची का वजन 2.86 किलो और बच्चे का 2.93 किलो था। बच्चा नैतिक इस दौरान डीहाईड्रेटेड था।
21 अप्रैल को यहां प्राथमिक उपचार के बाद बच्चों को एम्बुलेंस से जिला अस्पताल सतना रेफर किया गया। यहां पीडियाट्रिक आईसीयू में भर्ती कर उनका उपचार शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय सतना एवं जिला चिकित्सालय सतना के चिकित्सक शिक्षक एवं शिशु रोग विशेषज्ञ द्वारा किया गया।
उपचार के दौरान बालिका की स्थिति में आंशिक सुधार हुआ मगर 22 अप्रैल को उसकी स्थिति फिर गंभीर हो गई। इसके बाद आगे के उपचार के लिए उन्हें शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय रीवा रेफर किया गया। मगर एम्बुलेंस के जिला चिकित्सालय सतना पहुंचते ही बालिका की मृत्यु हो गई।
प्रजापति ने बताया कि वह बच्चे (नैतिक) को रात 3 बजे ही रीवा स्थित अस्पताल ले आए थे। यहां उसकी हालत स्थित है।
गौरतलब है कि विमला ने 21 दिसंबर 2025 को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मझगवां में इन जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था। इसके पूर्व 8 नवंबर को जिला अस्पताल में उनका ब्लड ट्रांसफ्यूजन भी करवाया गया था।
जन्म के वक़्त बच्चे का वजन 2 किलो वहीं बच्ची का 1.90 किलो था। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जन्म के वक़्त 2.5 किलो से कम वज़न के बच्चे लो बर्थ वेट (low birth weight) होते हैं। यह अवस्था लंबे समय तक मां का कुपोषण, खराब सेहत और गर्भावस्था में खराब स्वास्थ्य देखभाल को दर्शाती है।

कुपोषण और इंफेक्शन से ग्रसित दूसरा बच्चा
रीवा के श्याम शाह मेडिकल कॉलेज के शिशु एवं बाल रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ नरेश बजाज ने बताया कि नैतिक कुपोषण से ग्रसित है। इसके अलावा वह सेप्टिसीमिया से भी ग्रसित है। इस बिमारी में विषाणु (bacteria) खून की नालियों में प्रवेश कर जाते हैं और खून को दूषित (blood poisoning) कर देते हैं।
डॉ बजाज के अनुसार बच्चे में कुपोषण का कारण मां के दूध के बजाए बाहरी दूध जैसे गाय, भैंस या बकरी का दूध, का सेवन कराना है। प्रजापति हमसे बात करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने अपने दोनों बच्चों को पहले पाउडर वाला दूध फिर भैंस का दूध पिलाया था। हालांकि वह यह भी कहते हैं कि ऐसा उन्होंने अपने मन से किया था।
डॉ बजाज ने बताया कि बाहरी दूध में प्रोटीन अत्यधिक मात्रा में होता है। यह बच्चे के लिए पचा पाना कठिन होता है। इसके अलावा इस दूध में आयरन, बी 12 और फोलिक एसिड की कमी होती है। “इन तीनों की कमी के कारण खून कम हो जाता है। खून कम होने के कारण ऑक्सीजन की कमी होती है जिससे बच्चे का विकास अवरुद्ध होता है।” डॉ बजाज बताते हैं।
वह कहते हैं कि ऐसी संभावनाओं से बचने के लिए शुरूआती 6 माह तक केवल स्तनपां कराने की सलाह दी जाती है। “इसके अलावा बच्चे को पानी की भी ज़रूरत नहीं होती।” डॉ बजाज बताते हैं।
डॉ बजाज संभावना जताते हैं कि दूध की बोतल से बच्चे को इंफेक्शन (सेप्टिसीमिया) हुआ है. उन्होंने बताया कि बच्चे का इलाज किया जा रहा है और संभावना है कि उसे बचा लिया जाएगा।

“नहीं मिली कोई भी मदद”
मृतक के पिता हमसे बात करते हुए स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पूजा पांडेय के प्रति गुस्सा ज़ाहिर करते हैं। वह कहते हैं कि आंगनवाड़ी द्वारा उन्हें अरहर की दाल, बच्चों के लिए कपड़े और चप्पल दी गई। मगर इसके बाद कभी कोई सलाह नहीं दी गई। जब बच्चों की तबियत बिगड़ी तब से लेकर अब तक वह अकेले ही हर जगह भटक रहे हैं।
हालांकि जिला कार्यक्रम अधिकारी महिला बाल विकास राजीव सिंह ने बताया कि आंगनवाडी केन्द्र के माध्यम से बच्चों की मां को टेक होम राशन दिया गया है। फिर भी महिला बाल विकास की पर्यवेक्षक करूणा पाण्डेय और एएनएम विद्या चक्रवर्ती को अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए तथा आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पूजा पाण्डेय को सेवा समाप्ति के लिए कारण बताओ नोटिस दिया गया है।
कुपोषण की जिले में स्थिति
पांचवें राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) (2019-21) के अनुसार सतना जिला के 22.2% बच्चों को ही जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान करवाया गया है। यह आंकड़ा चौथे सर्वेक्षण की तुलना में भी कम है. 2015-16 के सर्वे के अनुसार 33% बच्चों को जन्म से एक घंटे के भीतर स्तनपान करवाया गया था।
वहीं जिले के स्तनपान करने वाले 6 से 23 माह के बच्चों में भी केवल 7.2% बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिलता है। जिले के 6 से 59 माह के 81.8% बच्चे एनीमिया से ग्रसित हैं। वहीं 15 से 49 साल की 57.3 महिलाएं एनीमिया से ग्रसित हैं।

मझगवां की मवासी जनजाति की 100 महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में 79% महिलाऐं गंभीर से मध्यम एनीमिया से ग्रसित थीं। इन महिलाओं के रोज़ के खाने में विटामिन A (75.5%), विटामिन C (54.83%), फोलिक एसिड (70.32%), विटामिन B12 (63%), आयरन (61.43%) और कैल्शियम (47.67%) न्यूट्रिएंट्स की कमी थी।
इस ब्लॉक में 6 महीने पहले ही हुसैन रजा नाम के अतिगंभीर कुपोषित बच्चे की मौत हो गई थी। तब भी कार्रवाई के नाम पर स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को बर्खास्त कर दिया गया था।
मगर इन ख़बरों के बरक्स सरकारी विज्ञप्तियों में मौसम हरा-हरा है। 17 अप्रैल को प्रदेश सरकार ने एक जानकारी देते हुए बताया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा की जाने वाली गृह भेंट (होम विजिट), जो पिछले वर्ष 91.65% थी, अब 98.44% के साथ लगभग शत-प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। इसके अलावा ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण दिवस के आयोजनों में भी पिछले वर्ष के 73.43% के मुकाबले इस वर्ष 93.33% की बड़ी उपलब्धि हासिल की गई है।
मगर इन आंकड़ों के जारी होने के एक हफ्ते बाद ही सतना की यह घटना सरकारी प्रयासों पर प्रश्नचिन्ह लगा देती है।
बैनर – रीवा में अपने 4 माह के बच्चे नैतिक के साथ नत्थूलाल और विमला प्रजापति।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
मध्य प्रदेश में बारदान की कमी से देरी से शुरु हुआ गेहूूं उपार्जन, क्या हैं ज़मीनी हालात?
केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट: आंदोलन के 10वें दिन विशेष जांच दलों का गठन
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।






