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दिल्ली का पहला इंटीग्रेटेड वॉटर मास्टर प्लान कैसा होगा?

यह ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के डेली मॉर्निंग पॉडकास्ट का एपिसोड-194 है। शुक्रवार, 17 अप्रैल को देश भर की पर्यावरणीय ख़बरों के साथ पॉडकास्ट में जानिए दिल्ली का पहला इंटीग्रेटेड वॉटर मास्टर प्लान कैसा होगा और यह किन-किन दिक्कतों को दूर करेगा? 


मुख्य सुर्खियां

‘स्टेट ऑफ इंडियाज बैट्स’ (2024-25) की पहली रिपोर्ट के अनुसार, भारत में चमगादड़ों की 135 प्रजातियां शहरीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे में हैं। रिपोर्ट में उनके संरक्षण और शोध की कमी पर चिंता जताई गई है।


दिल्ली नगर निगम ने नैनी लेक पुनर्जीवन परियोजना के लिए एक बार फिर टेंडर जारी किया है। यह परियोजना वर्ष 2015 से लंबित है और कई बार टेंडर प्रक्रिया असफल हो चुकी है।


दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार ₹2,454 करोड़ की इंटरसेप्टर परियोजना यमुना नदी में जाने वाले सीवेज को पूरी तरह रोकने में सफल नहीं हो सकी है। रिपोर्ट में बताया गया कि यह परियोजना केवल लगभग 60% सीवेज को ही नियंत्रित कर पाई है। 


कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने आशंका जताई है कि इस वर्ष राज्य के कई हिस्सों में सामान्य से कम मानसून (monsoon deficit) हो सकता है। सरकार ने संभावित जल संकट से निपटने के लिए पहले से तैयारी करने की बात कही है।


मध्य प्रदेश सरकार ने जनगणना-2027 के लिए गाइडलाइन जारी की है। इसके तहत गलत जानकारी देने या जनगणना कार्य में बाधा डालने पर 1000 रुपये का जुर्माना या 3 साल तक की जेल हो सकती है।


मध्य प्रदेश के करीब 3 लाख किसान सैटेलाइट सर्वे में डेटा मिसमैच और सर्वर डाउन होने की वजह से परेशान हैं। फसलों का पंजीकरण न हो पाने के कारण किसानों को मंडियों के बजाय तहसीलों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

विस्तृत चर्चा 

दिल्ली का पहला ‘इंटीग्रेटेड वाटर मास्टर प्लान’

दिल्ली सरकार ने शहर की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक 30 साल का ‘इंटीग्रेटेड वाटर मास्टर प्लान’ बनाने की तैयारी शुरू की है। यह योजना दिल्ली के ‘मास्टर प्लान 2041’ के साथ तालमेल बिठाकर बनाई जा रही है, जिसका उद्देश्य जल सुरक्षा, बढ़ती जनसंख्या और पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करना है। सरकार का ध्यान केवल कागजी योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि पुराने बुनियादी ढांचे (जैसे पुरानी पाइपलाइन और वाटर ट्रीटमेंट प्लांट) को बदलने और अपग्रेड करने पर भी है।

पानी का भारी नुकसान: चर्चा में यह बात उभर कर आई कि दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या पानी की कमी से ज्यादा पानी का नुकसान है। लगभग 45% पानी सिस्टम में आने के बाद लोगों तक पहुँचता ही नहीं है, जिसे ‘नॉन रेवेन्यू वाटर’ (NRW) कहा जाता है। इसके मुख्य कारण पुरानी पाइपलाइन, लीकेज और अवैध कनेक्शन हैं।

मांग और आपूर्ति में अंतर: दिल्ली को प्रतिदिन लगभग 1250 MGD (मिलियन गैलन प्रतिदिन) पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन केवल 1000 MGD ही मिल पाता है। इस प्रकार शहर में हर दिन 250 MGD की कमी बनी रहती है। इसके अलावा, दिल्ली के पास अब तक कोई स्पष्ट वाटर पॉलिसी नहीं है; 2011 में एक कोशिश हुई थी लेकिन वह कभी आधिकारिक रूप से लागू नहीं हो सकी। इसी स्पष्ट रोडमैप की कमी के कारण दिल्ली को बार-बार जल संकट का सामना करना पड़ता है।

जल विशेषज्ञ भीम सिंह रावत के अनुसार, केवल नए प्रोजेक्ट्स से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव जरूरी हैं। 

चर्चा में कुछ प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया गया:

रेन वाटर हार्वेस्टिंग: कानून के अनुसार 100 वर्ग मीटर से बड़ी इमारतों में यह सिस्टम होना अनिवार्य है, लेकिन वास्तव में यह गायब है।

जल निकायों का संरक्षण: दिल्ली में पहले 1000 से अधिक प्राकृतिक जल निकाय (Water Bodies) थे, जो अब या तो खत्म हो चुके हैं या प्रदूषित हैं।

अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग: ट्रीट किए गए पानी का दोबारा इस्तेमाल करना भविष्य के लिए आवश्यक है।

भूजल का दोहन: दिल्ली में भूजल का अनियंत्रित उपयोग भविष्य के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा कर रहा है।

यह मास्टर प्लान दिल्ली के जल प्रबंधन सिस्टम को रिसेट करने का एक अवसर है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, लीकेज पर कितना नियंत्रण होता है और क्या लोगों को नियमित रूप से स्वच्छ पानी मिल पाता है।

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Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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