रवि नायक कसरावद तहसील के ओझरा गांव में 24 एकड़ में खेती करते हैं। वो क्षेत्र की पारंपरिक कपास और मक्का के साथ ही पपीता की फसल भी लगाते हैं। मगर उनका परिचय सिर्फ इतना सा नहीं है, वो एक कंटेंट क्रिएटर भी हैं। नायक इंस्टाग्राम पर खेती से जुड़े वीडियो डालते हैं। उन्होंने केवल शौक के तौर पर इसे शुरू किया था मगर अब खेती में सही चुनाव के लिए कई किसान उनके वीडियो को आधार बनाते हैं। उनके कुछ फॉलोअर्स से बात करने के बाद हमें पता चला कि उनके गांव और आस-पास के किसान रवि के वीडियो देखकर खेती में नई चीज़ें सीख रहे हैं।
कसरावद के महेंद्र पाटीदार ऐसे ही कंटेंट के उपभोक्ता हैं। वो 6 एकड़ में नींबू, अमरुद और संतरे की खेती करते हैं। मगर अपने पिता की तरह उन्होंने भी शुरुआत में गेहूं, चना और सोयाबीन की खेती की। 2012 से 2015 के बीच इस खेती में उन्हें घाटा भी हुआ। फिर कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), खरगोन में उन्होंने बागवानी की ट्रेनिंग ली। शुरुआत में नींबू लगाने के बाद उन्होंने यूट्यूब से अमरूद और सिंदूर की खेती सीखी। ऐसी ही कहानी हल्दी की खेती करने वाले महेश पाटीदार की भी है।
निमाड़ के कई किसान अब पारंपरिक खेती छोड़कर खेती के नए तरीके अपना रहे हैं। वो इसकी प्रेरणा इंस्टाग्राम और यूट्यूब के वीडियो से ले रहे हैं। नायक जैसे क्रिएटर्स उन्हें न सिर्फ सही कीटनाशकों का चुनाव करने में मदद कर रहे हैं बल्कि नकली उत्पादों से बचा भी रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में ‘एग्रीकल्चर एक्सटेंशन’ पर पर्याप्त काम नहीं हुआ जिससे खेती के नए तरीके सरकारी संस्थानों से किसानों तक पहुंचने में काफी समय लगता है। उनके अनुसार यूट्यूब कंटेंट क्रियेटर्स इसी गैप को भरने का काम कर रहे हैं। कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सरकारी शोध संस्थान वीडियो प्रोडक्शन के नए तरीकों और सोशल मीडिया एल्गोरिदम को समझने में कामयाब नहीं हो पाए हैं। वो इन संस्थानों को पर्यटन मंत्रालय की तरह कंटेंट क्रिएटर्स की मदद लेने की सलाह देते हैं।

शौक से समाधान का सफ़र
स्थानीय कॉलेज से डिग्री हासिल करने के बाद नायक पूरी तरह खेती में ही जुट गए। उन्हें अपने खाली समय में इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर वीडियो देखना अच्छा लगता है। नायक ने यूट्यूब में पपीता की खेती के बारे बताए गए तरीकों को खेत में लागू कर मुनाफा कमाया। इसके बाद वो खुद खेत में ही छोटे-छोटे वीडियो बनाने लग गए। शुरुआत शौकिया तौर पर हुई मगर बाद में जब उन्होने यह महसूस किया कि बहुत से किसान घाटे के बावजूद केवल कपास और सोयाबीन की खेती कर रहे हैं तो वो किसानों को जागरूक करने लगे।
उन्होंने कहा, “किसान बहुत बार जहां खर्च करना चाहिए वहां खर्च नहीं करते और नकली उत्पादों के झांसे में आ जाते हैं। मैं चाहता हूं कि किसान अच्छा मुनाफा कमाए और ऐसे उत्पादों के झांसे में न आए।” बीते खरीफ सीजन उन्होंने कपास की 5जी वैराइटी के बारे में सुना था। यह कपास की एक हर्बिसाईट टोलेरेंट वैराईटी है जिसकी गैरकानूनी बिक्री की पड़ताल हम पहले भी कर चुके हैं। नायक ने इसके 6 पैकेट बीज अपने खेत में बोए मगर उत्पादन न के बराबर रहा। तब उन्होने इस पर वीडियो बनाकर किसानों को जागरूक किया। इसी तरह नकली खाद और कीटनाशकों के खिलाफ भी उनके वीडियो इंस्टाग्राम में दिखाई देते हैं।
नायक ने कहा कि वो सिर्फ उसी विषय पर वीडियो बनाते हैं जिसका प्रैक्टिकल अपने खेत में कर चुके होते हैं। इसके अलावा वो कभी भी किसी कंपनी का प्रचार नहीं करते। नायक ने बताया, “खेती में मेरा अनुभव फायदेमंद है, मुझे अच्छा मुनाफा होता है। मैं चाहता हूं बाकी किसानों को भी ऐसा ही फायदा हो इसलिए किसानों के लिए कंटेंट बनाता हूं किसी और विषय पर नहीं।”

सभी चयन के लिए यूट्यूब पर निर्भरता
महेंद्र पाटीदार की ही तरह जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर रजूर गांव के महेश पाटीदार और उनकी पत्नी संगीता पाटीदार भी कपास और मिर्च की खेती में घाटे का शिकार हुए। अब बीते 4 से भी अधिक सालों से वो जैविक हल्दी उगा रहे हैं। महेश पाटीदार ने बताया, “कपास की बोवनी से लेकर चुनाई तक हर काम में हम मजदूरों पर निर्भर थे। मगर मजदूर मिलना बहुत कठिन था।” इसके साथ ही उन्होंने यह अनुभव किया कि इस खेती में लागत के मुकाबले लाभ कम है।
इसके बाद उन्होने जैविक खेती करने का निर्णय लिया और मोबाइल पर इससे जुड़े वीडियो देखना शुरू कर दिए। महेश पाटीदार “हमने कई वीडियो देखे जैसे मशरूम की खेती के, हल्दी-अदरक और अरहर की खेती के मगर हल्दी और अदरक सबसे सही समझ आया।”
महेंद्र पाटीदार ने भी पहले नींबू की एक ही वैराइटी अपने खेत में लगाई थी। फिर यूट्यूब में देखकर नींबू की और भी किस्मों के साथ ही अमरूद की भी अलग-अलग वैराइटीज़ देश के अलग-अलग हिस्सों से बुलवाई। यूट्यूब को बेहद सुविधाजनक कहते हुए उन्होने बताया, “बहुत से वीडियो में प्रयोग करने वाले किसान अपना नंबर भी देते हैं। फोन पर खेती के तरीके के अलावा वो ये भी बता देते हैं कि पौधे कहां से मंगवाने हैं। बहुत बार तो नर्सरी वाले ही ऐसे वीडियो बनाते हैं तो पौधे के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ता।”
इसी तरह ओझरा के रविंद्र नायक कीटनाशकों के चयन लिए भी वीडियो देखते हैं। उन्होंने कहा, “वीडियों में देखते हैं कि लोग ऊंची-ऊंची (महंगी) दवाइयां उड़ा रहे हैं तो उनको देखकर हम भी लाते हैं। पहले वीडियो नहीं देखते थे अब वीडियो देखकर ही खरीदी करते हैं।” जबकि उनके पड़ोसी भीम नायक मुख्यतः पशुपालन करते हैं। पहले पहल उन्हें भैंस कहां से खरीदनी होती है इसका भी ज्ञान नहीं था। बाद में वीडियो के ज़रिए ही वो मंदसौर की पशुमंडी के विक्रेताओं के संपर्क में आए। अब सरकारी योजनाओं की जानकारी और पशुओं की बिमारी के लिए भी वो यूट्यूब सर्च करते हैं।

एग्रीकल्चर एक्सटेंशन का काम करते वीडियो
खेती आधारित पत्रकारिता करने वाले और न्यूज़ पोटली के संस्थापक अरविंद शुक्ला मानते हैं कि देश में एग्रीकल्चरल एक्सटेंशन पर पर्याप्त काम नहीं हुआ। उन्होंने इसे और स्पष्ट करते हुआ कहा, “हमने उस तरह की डेमो प्लाट नहीं बनाए जो काम केवीके को करना चाहिए था। जब अखबार अपने चरम पर थे तो सिर्फ फ्रंट पेज पर ग्रामीण भारत को बेहद कम जगह मिलती थी।” 2017 के इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) के अनुसार, केवल 20% ग्रामीण परिवारों तक टेलीविज़न और 33% तक अख़बार की पहुंच थी।
शुक्ला के अनुसार सोशल मीडिया ने एग्रीकल्चर एक्सटेंशन और किसानों को नए मॉडल दिखाने में बहुत अच्छा काम किया। “मैंने फेसबुक पर देखा है एक किसान है जिसने कंटोला (Momordica dioica Roxb।) जैसा जंगल का पौधा खेत में लगाया और ₹100 किलो बेच रहा है। उसको ₹500 मिल गए या ₹1000 मिल गए तो मेरे दिमाग में आता क्या मैं ऐसा कर सकता हूं?” किसान की मनोस्थिति समझाते हुए उन्होने कहा।
इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण भारत शहरी भारत की तुलना में ज़्यादा इंटरनेट इस्तेमाल कर रहा है। जबकि केवीके, सोलापुर के यूट्यूब चैनल “एलआरटी फार्म एडवाइज” पर हुए एक अध्ययन के अनुसार 95।10% सब्सक्राइबर युवा (25 से 34 साल) कैटेगरी के थे। अध्ययन के के अनुसार 28 दिनों में 2,362 दर्शकों ने इस चैनल के वीडियो को 3633 मिनट से ज़्यादा देखा। साथ ही पहली बार अपलोड करने के बाद से 5,25,600 मिनट से ज़्यादा व्यूटाइम मिला है। शोधकर्ताओं के अनुसार, “यह खेती की जानकारी को बेहतर बनाने, इनोवेशन को बढ़ावा देने और बेहतर टेक्नोलॉजी अपनाकर खेती की पैदावार और इनकम बढ़ाने में यूट्यूब चैनल की भूमिका को दिखाता है।”
किसानों, नीति निर्माताओं और स्टोरीटेलर्स के साथ काम करने वाली संस्था हैंड्स ऑफ़ ट्रांजिशन में नेटवर्क लीड रोहिण कुमार ने कहा, “किसानों ने अपना चैनल चुन लिया है। लोगों ने अपना चैनल चुन लिया है कि उनको कहां से कंज्यूम करना है।”
मगर केवीके खरगोन में प्रसार वैज्ञानिक डॉ आरके सिंह मानते हैं कि बहुत बार लोग लाइक और व्यूज के लिए किसानों को ऐसी जानकारी भी देते हैं जो वैज्ञानिक तौर पर सही न हो। डॉ सिंह के अनुसार सही जानकारी के लिए किसानों को या तो कृषि संस्थानों के वीडियो या फिर इससे जुड़े वैज्ञानिकों के वीडियो देखने चाहिए।

सरकारी संस्थान क्यों पीछे हैं?
रवि नायक खेती से जुड़े हुए कई वीडियो देखते हैं मगर उन्होने कभी किसी भी सरकारी संस्थान के वीडियो नहीं देखे। सोशल मीडिया क्रिएटर्स के साथ पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, जैविक खेती समेत इससे जुड़े हुए तमाम मसलों पर काम करने वाली संस्था मोमेंटम शिफ्ट्स के सीईओ प्रचूर गोयल मानते हैं कि सरकारी संस्थान और गैर सरकारी संस्थाएं (NGO) भी नए तरह के प्रोडक्शन सिस्टम, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और उसके एल्गोरिदम को समझने में संघर्ष करते हैं। गोयल ये भी मानते हैं कि अगर अच्छी जानकारी और अच्छे सोर्स के साथ ये संस्थान नियमित वीडियो डालें तो उनकी एक ‘डेडिकेटेड ऑडियंस’ बन सकती है। उदाहरण देते हुए गोयल ने कहा “जैसे ओडिशा के अरबिंद साहू (Arabinda Sahoo) एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में ही काम करते थे। वो खुद से वीडियो बनाते थे। अभी यूट्यूब पर उनके चैनल पर 2 लाख से अधिक सब्सक्राइबर हो चुके हैं।”
जबकि कुमार मानते हैं कि जिस तरह से पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई सरकारों ने कंटेंट क्रिएटर्स की मदद ली है वैसे ही कृषि की जानकारी को बढ़ाने के लिए भी इसकी मदद ली जा सकती है। उन्होने कहा कि कुछ रिसर्च संस्थान अब पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स के साथ मिलकर यह काम भी कर रहे हैं कि कैसे उनकी विज्ञानपरक बातों को आम लोगों तक पहुंचाया जाए।
रवि नायक कहते हैं कि वो लगातार वीडियो इसी तरह बनाते रहेंगे ताकि और भी किसानों को वो फायदा पहुंचा सकें। उनके बगल में बैठे भीम नायक भी इससे खुश थे कि अब उन्हें निमाड़ी भाषा में ही बहुत से वीडियो मिल जाते हैं जिससे उन्हें हिंदी के कठिन शब्द समझने की भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। यानि यह वीडियो माध्यम न सिर्फ जानकारी पहुंचा रहे हैं बल्कि इन उपभोक्ताओं के लिए भाषाई बाधा भी तोड़ रहे हैं।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
बरेठी सोलर परियोजना: तिरपाल के नीचे रहने को क्यों मजबूर हैं ग्रामीण?
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।
Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India
We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.
Connect With Us
Send your feedback at greport2018@gmail.com
Newsletter
Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.
When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.
Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.








