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अनियमित इको-टूरिज़्म से मध्य प्रदेश के जैव विविधता वाले क्षेत्रों पर बढ़ता दबाव

बढ़ते पर्यटन और नए इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच पचमढ़ी और तामिया में संरक्षण और विकास के संतुलन पर सवाल
बढ़ते पर्यटन और नए इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच पचमढ़ी और तामिया में संरक्षण और विकास के संतुलन पर सवाल
तामिया स्थित छोटा महादेव में ईको पर्यटन बोर्ड द्वारा तैयार किया गया नेचर इंटरप्रिटेशन ट्रेल। फोटो: पल्लव जैन

पचमढ़ी छावनी में चंपक झील किनारे बने मध्य प्रदेश पर्यटन (एमपीटी) रिसॉर्ट ‘चंपक बंग्लो’ के डायनिंग एरिया से हर 15 मिनट में झील के ऊपर ज़िपलाइन और हर दो मिनट में मोटर बोट से गुज़रते लोगों को देखा जा सकता था। यहां एमपीटी द्वारा सौंदर्यीकरण के काम भी करवाए जा रहे थे। इसमें झील किनारे कंक्रीट की रिटेनिंग दीवार और इससे सटा एक पैदल मार्ग बनाया जा रहा था।

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने 11 सितंबर 2026 को चंपक झील के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को देखते हुए सभी गतिविधियों को वेटलैंड (संरक्षण और प्रबंधन) नियम 2017 के अनुरुप नियंत्रित करने का आदेश दिया है। पेट्रोल-डीज़ल से चलने वाली मोटर बोट के संचालन और बिना सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के झील के आसपास विकास कार्य करने पर रोक लगा दी है।

पचमढ़ी, पचमढ़ी बायोस्फीयर रिज़र्व और सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व का हिस्सा है, इसलिए पर्यटकों को यह जगह जितना अपनी ओर खींचती है, उतनी ही पर्यावरण के लिहाज़ से नाज़ुक भी है।

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पिछले पांच सालों में मध्य प्रदेश के पर्यटन क्षेत्र में हर साल हुई औसतन 66.65% की वृद्धि को देखते हुए राज्य का पर्यटन विभाग स्थापित पर्यटन स्थलों से आगे इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा रहा है। इसके लिए पर्यावरण के लिहाज़ से संवेदनशील क्षेत्रों में ईको पर्यटन का सहारा लिया जा रहा है। मध्य प्रदेश 27 राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के लिए इको-सेंसिटिव ज़ोन मास्टर प्लान बनाने वाला देश का पहला राज्य है।

लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या संरक्षण और पारिस्थितिक बहाली से पहले इन जगहों पर पर्यटन का विकास किया जा रहा है? मध्य प्रदेश की सतपुड़ा रेंज में बसे पंचमढ़ी और तामिया में जारी ईको पर्यटन गतिविधियों से इसे समझा सकता है।

पंचमढ़ी स्थित चंपक झील के किनारे जारी कंस्ट्रक्शन कार्य। फोटो: पल्लव जैन

पचमढ़ी की स्थिति

सतपुड़ा पर्वत शृंखला के इर्द-गिर्द फैला पचमढ़ी बायोस्फीयर रिज़र्व मध्य भारत के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले इलाकों में गिना जाता है। घाटियां, दलदल, नदी-नाले और झरने से बना यह भूभाग अलग-अलग जीव-जंतुओं का घर है। रिज़र्व का करीब 63% हिस्सा जंगलों से ढका है।

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पंचमढ़ी में मुख्य रूप से प्राकृतिक-दर्शनीय, वन्यजीव और धार्मिक पर्यटन होता है। दिनभर हाईकिंग, ट्रेकिंग और जंगल सफारी करने के बाद जब पर्यटक वापस लौटते हैं, तो वे चंपक झील का रुख करते हैं। सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच स्थित, यह एक शांत स्थान है, जहां ईको पर्यटन के तहत बोटिंग, कैंपिंग, ज़िप लाईन, घुड़सवारी, पैरासेलिंग जैसी गतिविधियां संचालित की जाती है। झील के किनारे ही स्थित है एमपीटी का रिसॉर्ट ‘चंपक बंग्लो’ जहां पर्यटकों के रुकने के लिए भव्य इंतज़ाम मौजूद हैं।

भोपाल की राखी बाला सिंगारे ने जनवरी 2026 में एनजीटी में चंपक झील के संरक्षण के लिए याचिका दायर की। उनका आरोप था कि यहां जारी ईको टूरिज़्म गतिविधियां वेटलैंड नियमों का उल्लंघन करती हैं। झील के आसपास स्थायी निर्माण और अतिक्रमण हो रहे हैं और एमपीटी होटल का बिना ट्रीटमेंट का गंदा पानी झील में छोड़ा जा रहा है। उन्होंने ज़िपलाइन जैसी एडवेंचर गतिविधियों और झील किनारे कैंपिंग से प्रदूषण की बात भी कही। उनकी मांग थी कि 40 हेक्टेयर से बड़ी इस झील को सुप्रीम कोर्ट के 2012 के फैसले के अनुसार “वेटलैंड” घोषित किया जाए।

एनजीटी द्वारा गठित संयुक्त जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के आरापों से अलग तस्वीर पेश की।

रिपोर्ट के अनुसार सतपुड़ा एडवेंचर स्पोर्ट्स क्लब की गतिविधियां, यानी झील पर ज़िपलाइन, पैरासेलिंग और अस्थायी लेकसाइड कैंपिंग, नियंत्रित और पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार ढंग से चल रही हैं। कैंपिंग साइट झील से उचित दूरी पर है। ज़िपलाइन पूरी तरह गुरुत्वाकर्षण से चलती है, उसमें कोई मोटर या ईंधन नहीं लगता, इसलिए उससे उत्सर्जन या प्रदूषण नहीं होता। रिपोर्ट में कहा गया है कि मानव अपशिष्ट और गंदा पानी झील से सुरक्षित दूरी पर बने सोक पिट में जाता है और झील में कभी सीवेज या गंदा पानी नहीं छोड़ा जाता। समिति ने निरीक्षण में सीवेज या कचरा न मिलने और पानी की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप होने की बात कही।

पचमढ़ी स्थिति चंपक झील में मोटर बोट में बैठे पर्यटक। फोटो: पल्लव जैन

एनजीटी का आदेश

सुनवाई में झील के असली क्षेत्रफल पर बड़ा अंतर सामने आया। पचमढ़ी स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (साडा) के पत्र में झील का क्षेत्रफल 43.4 हेक्टेयर बताया गया, जबकि संयुक्त समिति की रिपोर्ट में नोटिफाइड एरिया करीब 23.12 हेक्टेयर है। अधिकारियों की रिपोर्ट की समीक्षा के बाद जस्टिस शिव कुमार सिंह की बेंच ने 11 सितंबर 2026 को दिए अपने आदेश में जिला वेटलैंड संरक्षण समिति को झील का वैज्ञानिक तरीके से सीमांकन करने और पूरे वेटलैंड क्षेत्र को प्रभावी तरीके से संरक्षित करने का निर्देश दिया।

एनजीटी ने कहा कि सभी गतिविधियां वेटलैंड नियम, 2017 के अनुसार हों और सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना झील के पास कोई विकास कार्य न हो। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आधार पर झील में पेट्रोल डीज़ल से चलने वाली नावों पर भी रोक लगाने का निर्देश दिया गया क्योंकि इससे होने वाले प्रदूषण से वेटलैंड के पारिस्थितिकी तंत्र और जलाशयों में रहने वाले जीवों जैसे मछलियों और अन्य प्राणियों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुँचता है।

सिंगारे कोर्ट के आदेश का सम्मान करती हैं लेकिन वो जांच समिति की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हैं, साथ ही कहती हैं, “झील के आसपास हो चुके स्थाई निर्माण और अतिक्रमण पर क्या कार्रवाई होगी यह स्पष्ट नहीं है।”

पंचमढ़ी साडा (स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) में सहायक अधीक्षक राजेश दीवान बताते हैं कि झील के किनारे हो रहे निर्माण कार्य एमपीटी की कार्ययोजना का हिस्सा हैं।

झील के किनारे बनाई जा रही कंक्रीट की रिटेनिंग वॉल और पैदल मार्ग चिंता का सबसे बड़ा कारण हैं। वेटलैंड (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम 2017 के तहत वेटलैंड के 50 मीटर के दायरे में रिटेनिंग दीवार बनाने की इजाज़त नहीं है क्योंकि इससे प्राकृतिक जल प्रवाह और भूमिगत जल का पुनर्भरण रुक जाता है।

आदेश के बाद ज़मीन पर क्या हुआ

पंचमढ़ी के नायब तहसीलदार दिलीप शर्मा के मुताबिक अभी सीमांकन का काम शुरू नहीं हुआ है। वो कहते हैं, “जिला प्रशासन के निर्देश के बाद सीमांकन किया जाएगा। मोटर बोट का संचालन कोर्ट के आदेशानुसार बंद कर दिया गया है और अब पैडल बोट चल रही हैं।”

दीवान मानते हैं कि इससे पर्यटन से होने वाली आमदनी घटेगी, क्योंकि पर्यटकों में मोटर बोट की मांग ज़्यादा थी।

दीवान याद दिलाते हैं कि गर्मियों में चंपक झील इतनी सूख जाती थी कि लोग उसमें क्रिकेट खेलते थे। उनके अनुसार साडा ने बिना किसी अतिरिक्त फंडिंग के साल दर साल झील का गहरीकरण और गाद निकासी करवाई, जिसकी वजह से आज झील में इतना पानी दिखता है। वे दावा करते हैं कि झील में घरेलू सीवेज न मिले, यह सुनिश्चित किया गया। आसपास पौधारोपण और कुछ सौंदर्यीकरण भी हुआ, जिससे पर्यटक आ रहे हैं। उनका तर्क है कि पचमढ़ी के पास आय का मुख्य ज़रिया पर्यटन ही है; प्रतिबंधों का असर पर्यटन पर पड़ेगा।

पंचमढ़ी में चंपक झील अकेला मामला नहीं है, सावन में यहां नागद्वारी यात्रा के 10 दिनों में अनुमानित पांच लाख से ज़्यादा श्रद्धालु पहुंचे, जबकि जंगल के कोर एरिया की यह गुफा एक बार में सिर्फ करीब 1,500 लोगों का दबाव झेल सकती है। यात्रा के बाद पंचमढ़ी में हर तरफ बड़ी मात्रा में कचरा फैला दिखाई दिया।

नागद्वारी मेले से लौटते यात्री,10 दिन जंगल में गुज़ारने के लिए इनके पास सभी सामान मौजूद होता है। फोटो: पल्लव जैन
पंचमढ़ी में नागद्वारी मेले के बाद हर जगह फैला कचरा। फोटो: राजीव त्यागी

साल 2019 की ज़ोनल मास्टर प्लान की बेसलाइन स्टडी में भी धार्मिक पर्यटन को प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बताया गया था।

सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व की फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा कहती हैं, “पानी कम हो रहा है, वन्य प्राणियों का आवास घट रहा है।” उनके मुताबिक असली ज़रूरत “कैरिंग कैपेसिटी स्टडी” की है, यानी यह आकलन कि इलाका कितना पर्यटन झेल सकता है।

“यात्रा को रोका नहीं जा सकता, यह आस्था का विषय है। हम हर वर्ष यात्रा प्रबंधन को बेहतर करने और इस दौरान होने वाले प्रदूषण को रोकने का हर संभव प्रयास करते हैं,” दीवान कहते हैं।

तामिया में इको-टूरिज़्म के क्रियान्वयन में खामियां

पचमढ़ी से 81 किलोमीटर और छिंदवाड़ा से 56 किलोमीटर दूर तामिया तहसील अपने घने जंगलों और पहाड़ों के नज़ारों के लिए जानी जाती है। अच्छी सड़कें न होने से यह इलाका लंबे समय तक पर्यटकों की नज़रों से दूर रहा। साल 2007 में स्टेट हाईवे 19 और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़कें बनने के बाद यहां पर्यटन बढ़ना शुरू हुआ।

तामिया एक अहम पर्यावरण-संवेदनशील इलाका है। यह बफर कॉरिडोर के रूप में सतपुड़ा और पेंच टाइगर रिज़र्व को जोड़ता है। इसका कुछ हिस्सा पचमढ़ी बायोस्फीयर रिज़र्व के बफर ज़ोन में भी आता है।

इको-टूरिज़्म और प्रोटेक्टेड-एरिया मैनेजमेंट पर शोध कर चुके रियाज़ आलम ने सतपुड़ा और पचमढ़ी के आसपास साफ-सफाई, कचरा प्रबंधन, पार्किंग और पीने के पानी की कमी जैसी दिक्कतें बार-बार देखीं। उनका सवाल है कि यहां वैज्ञानिक रूप से तय कैरिंग कैपेसिटी लिमिट है ही नहीं। उनके मुताबिक फैसले अक्सर मनमाने ढंग से और सिर्फ आर्थिक फायदे को देखकर होते हैं। “कुछ न होने से कुछ होना बेहतर है, लेकिन उस नीति को और मज़बूत बनाने की ज़रूरत है। इसलिए नीति-निर्माण में स्थानीय भागीदारी होनी ही चाहिए।”

“ट्राइबस्केप्स” के ज़रिए पर्यटन गतिविधियां चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता पवन श्रीवास्तव के मुताबिक, कैंपिंग, ट्रैकिंग और रिवर वॉकिंग के नियमों का सख्ती से पालन नहीं हो रहा, जिससे वातावरण लगातार प्रदूषित हो रहा है।

सड़क के साथ आए विकास से इलाके की सुंदरता बिगड़ने की चिंता में पवन ने प्लास्टिक रोकने के लिए “स्टील थाली बैंक” बनाया। यह 10 थाली-सेटों से शुरू हुआ था और अब ज़रूरतमंद आदिवासियों तक पहुंचता है।

सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व के फॉरेस्ट गाइड इंद्रजीत यादव, जो तामिया और पचमढ़ी की साइट्स पर कैंपिंग करवाते हैं, बताते हैं कि वे पर्यटकों का फैलाया कचरा खुद उठाकर लाते हैं। उनके शब्दों में, “पर्यटक तो एक बार आएगा, हमें यहीं रोज़ी-रोटी चलानी है।”

पंचमढ़ी से दिखाई देती सतपुड़ा की पहाड़ियां और घने जंगल। फोटो: पल्लव जैन

वे आगे कहते हैं, “इको टूरिज़्म बोर्ड ने तामिया में डिस्टबिन तो लगाए हैं लेकिन स्थानीय प्रशासन हफ्तों तक उन्हें खाली नहीं करता और कचरा जहां तहां फैलता रहता है।”

पवन देहलिया कैंपसाइट का उदाहरण देते हैं, जो तामिया से 35 किलोमीटर दूर देनवा नदी के किनारे स्थित है। यहां फीस देने पर गाइड मिलता है। वे कहते हैं, “यहां न तो कोई फॉरेस्ट गार्ड है, न ही कोई सीसीटीवी कैमरा।” फिर भी गाइड यह सुनिश्चित करता है कि कोई कचरा न फैलाए। उनका मानना है कि तामिया में भी परमिट व्यवस्था, सख्त नियम और स्थानीय जागरूकता से यही मॉडल लागू हो सकता है।

मध्य प्रदेश ईको टूरिज़्म बोर्ड के असिस्टेंट जनरल मैनेजर संदेश महेश्वरी बताते हैं कि गाइडेड टूर वहीं बेहतर चलते हैं जहां पर्यटक ज़्यादा हैं। वे कहते हैं, “विभाग के पास इतना फंड नहीं कि वो स्थायी रुप से गाईड्स की भर्ती कर सके।” इसीलिए पचमढ़ी के मुकाबले कम पर्यटकों वाले तामिया में ईको टूरिज़्म गतिविधियां अभी बेहतर स्थिति में नहीं हैं।

इकोटूरिज़्म डेवलपमेंट बोर्ड के सदस्य और पूर्व आईएफएस अधिकारी हरभजन सिंह पाबला कहते हैं कि टिकाऊ इको-टूरिज़्म का मकसद संवेदनशील जगहों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और संरक्षण को बढ़ावा देना है। यह स्थानीय लोगों को वैकल्पिक आजीविका देकर जंगल पर उनकी निर्भरता भी घटा सकता है। पर्यटक बढ़ेंगे तो कचरा भी बढ़ेगा, इसलिए कचरा प्रबंधन जैसा बुनियादी ढांचा ज़रूरी है।

यह स्टोरी मोंगाबे-हिंदी और ग्राउंड रिपोर्ट की साझेदारी के तहत सह-प्रकाशित की गई है। इस साझेदारी का उद्देश्य पर्यावरण, कृषि और ग्रामीण समुदायों से जुड़े कम रिपोर्ट किए गए मुद्दों को सामने लाना है जिससे उन विषयों पर सरकार, नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों, और आम जनता के बीच चर्चा हो सके।

संपादक: शैलेष श्रीवास्तव


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Authors

  • Climate journalist and visual storyteller based in Sehore, Madhya Pradesh, India. He reports on critical environmental issues, including renewable energy, just transition, agriculture and biodiversity with a rural perspective.

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  • Rajeev Tyagi is an independent environmental journalist in India reporting on the intersection of science, policy and public. With over five years of experience, he has covered issues at the grassroots level and how climate change alters the lives of the most vulnerable in his home country of India. He has experience in climate change reporting, and documentary filmmaking. He recently graduated with a degree in Science Journalism from Columbia Journalism School. When he is not covering climate stories, you’ll probably find Tyagi exploring cities on foot, uncovering quirky bits of history along the way.

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