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क्यों मध्य प्रदेश में कस्टम हायरिंग सेंटर किसान की पहुंच से दूर हैं?

छोटे किसानों को कृषि के लिए मशीने उपलब्ध हो सकें इसके लिए कस्टम हायरिंग केंद्र स्थापित किये गए लेकिन कई किसान इस सुविधा से अनजाना हैं।
निपानिया कला गांव में कस्टम हायरिंग केंद्र
निपानिया कला कस्टम हायरिंग केंद्र संचालक दीपेश पटेल । फोटो: पल्लव जैन

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने पराली दहन पर संयुक्त समीक्षा बैठक की। बैठक में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश में 452% और राजस्थान में 200% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उन्होंने चिंता जताते हुए राज्यों से फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों का उपयोग बढ़ाने और ‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ (CHC) को सक्रिय करने पर जोर देने को कहा।

सरकारी सहायता से स्थापित कस्टम हायरिंग सेंटर गांव स्तर के वे केंद्र हैं, जहां से किसान सस्ती दरों पर कृषि यंत्र किराये पर ले सकते हैं। मजदूरों की कमी के बीच खेती का मशीनीकरण बढ़ रहा है। ऐसे में ये केंद्र उन किसानों के लिए अहम हैं, जो महंगी मशीन खरीदने का खर्च नहीं उठा सकते।

जाहिर है, सरकार पराली दहन जैसी समस्या के समाधान के लिए किसानों तक आधुनिक मशीनें पहुंचाना चाहती है और इसके लिए कस्टम हायरिंग सेंटरों को मजबूत करने पर जोर दे रही है। लेकिन क्या ये सेंटर किसानों तक पहुंच रहे हैं, और क्या वे इतने सक्षम हैं कि खेती से जुड़ी स्थानीय पर्यावरणीय समस्याओं को हल कर सकें?

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कस्टम हायरिंग सेंटर से अनजान किसान

देवनारायण और अन्य ग्रामीण, निपानिया कला गांव, सीहोर । फोटो: पल्लव जैन
देवनारायण और अन्य ग्रामीण, निपानिया कला गांव, सीहोर । फोटो: पल्लव जैन

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के निपानिया कला गांव में देवनारायण 2 एकड़ में खेती करते हैं। वे कहते हैं, “हमें कृषि यंत्र चाहिए होते हैं तो बड़े किसानों से किराये पर लेते हैं। कभी-कभी लंबा इंतजार करना पड़ता है। हमें तो पता ही नहीं था कि इसके लिए कोई केंद्र भी है।”

निपानिया गांव में ज्यादातर किसान खरीफ में सोयाबीन और रबी में गेहूं की खेती करते हैं। देवनारायण बताते हैं कि खेती में उन्हें ट्रैक्टर, बक्खर, हार्वेस्टर, थ्रेशर और दवा छिड़कने वाले स्प्रे पंप जैसी मशीनों की जरूरत पड़ती है। सोयाबीन के लिए रेज्ड बेड बनाने या गेहूं की पराली के प्रबंधन के लिए क्या गांव में आधुनिक मशीनें हैं? इस सवाल पर वे कहते हैं, “हां, शायद कुछ बड़े किसानों के पास हैं, लेकिन हमने कभी इनका उपयोग नहीं किया। फसल कटाई के बाद जो अवशेष (पराली) बचते हैं, उन्हें हम जला देते हैं।”

निपानिया में दीपेश पटेल सीएचसी संचालित करते हैं। वे मानते हैं कि ज्यादातर किसानों को यह नहीं पता कि कृषि यंत्र किराये पर लेने की ऐसी कोई सुविधा मौजूद है। वे कहते हैं, “हम किसानों को जागरूक करने की कोशिश कर रहे हैं।”

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पराली प्रबंधन और सीएचसी

दीपेश पटेल अपने कस्टम हायरिंग सेंटर में मल्टी क्रॉप थ्रेशर के साथ । फोटो पल्लव जैन
दीपेश पटेल अपने कस्टम हायरिंग सेंटर में मल्टी क्रॉप थ्रेशर के साथ । फोटो पल्लव जैन

पटेल ने वर्ष 2022 में सीएचसी स्थापित करने के लिए आवेदन दिया था और 2023 में लॉटरी के जरिये उनका चयन हुआ। प्रोजेक्ट की कुल लागत 25 लाख रुपए थी। इसमें उन्हें 8 लाख 16 हजार रुपए की सरकारी सब्सिडी मिली और बाकी रकम उन्होंने बैंक से लोन लेकर जुटाई। उनके पास 13 कृषि उपकरण हैं, जिनमें पराली प्रबंधन के लिए स्ट्रॉ रीपर और रोटावेटर शामिल हैं।

स्ट्रॉ रीपर कंबाइन हार्वेस्टर द्वारा छोड़े गए फसल अवशेषों (जैसे गेहूं, धान या जौ के डंठल) को काटती है, उनकी मड़ाई करती है और उन्हें साफ करती है। इसके बाद रोटावेटर से बचे हुए अवशेषों को मिट्टी में मिलाया जा सकता है।

सीएचसी में मौजूद कुछ मशीनें जिनका ज़िक्र इस स्टोरी में बार बार हुआ है
सीएचसी में मौजूद कुछ मशीनें जिनका ज़िक्र इस स्टोरी में बार बार हुआ है

पटेल कहते हैं, “हमारे गांव के कुछ जागरूक किसान इन मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन खरीफ की कटाई और रबी की बुवाई के बीच समय बहुत कम बचता है। इतने कम समय में एक मशीन से पूरे गांव को कवर करना मुश्किल है। स्ट्रॉ रीपर में बार-बार तकनीकी खराबी भी आती है। कोई किसान इंतजार नहीं करना चाहता, इसलिए पराली जलाने की परंपरा जारी है।”

नर्मदापुरम के बराखड़कला गांव में सीएचसी चलाने वाले नितेश धांगे के मुताबिक उनके केंद्र को किसानों का अच्छा समर्थन मिल रहा है। उनके पास भी 13 कृषि यंत्र हैं, जिनमें सुपर सीडर शामिल है। सुपर सीडर धान या अन्य फसलों की कटाई के बाद खेत में बची पराली को बारीक काटकर मिट्टी में मिला देती है। साथ ही वह तय गहराई पर बीज की बुवाई और खाद डालने का काम भी करती है।

इस तरह जुताई, बुवाई और पराली की सफाई एक ही बार में हो जाती है। इससे ट्रैक्टर के डीजल और मजदूरी का खर्च बचता है और पराली जलाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

धांगे बताते हैं कि जागरूकता की कमी के कारण छोटे किसान सुपर सीडर में कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं, जबकि बड़ी जोत वाले किसानों में इसकी काफी मांग है। वे जोड़ते हैं, “हमारे पास एक ही मशीन है, सीजन में इसकी बुकिंग फुल रहती है।”

सीएचसी पर दबाव

सीएचसी में मौजूद, बोवनी बक्खर और मल्टी क्रॉप थ्रेशर । फोटो: पल्लव जैन
सीएचसी में मौजूद, बोवनी बक्खर और मल्टी क्रॉप थ्रेशर । फोटो: पल्लव जैन

पीक सीजन में मांग अधिक होने से सीएचसी पर दबाव बढ़ जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि अभी पर्याप्त संख्या में केंद्र स्थापित नहीं हुए हैं।

मध्य प्रदेश कृषि अभियांत्रिकी संचालनालय के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 2026 तक सरकारी सब्सिडी प्राप्त 2,734 निजी सीएचसी संचालित हैं। एफपीओ और एनजीओ द्वारा चलाए जा रहे केंद्रों को जोड़ लें तो यह संख्या 2,900 तक पहुंचती है। वहीं सीहोर जिले की कुल 542 ग्राम पंचायतों में केवल 36 सीएचसी संचालित हैं।

स्त्रोत: मध्य प्रदेश अभियांत्रिकी संचालनालय से प्राप्त वर्ष 2026 तक का डेटा
स्त्रोत: मध्य प्रदेश अभियांत्रिकी संचालनालय से प्राप्त वर्ष 2026 तक का डेटा

हालांकि मध्य प्रदेश ने 2026-27 में 1,000 नए सीएचसी स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। अप्रैल 2026 की कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सब मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मैकेनाइजेशन के तहत कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने और पराली प्रबंधन के लिए 2,250 करोड़ रुपए के बजट को मंजूरी दी थी। कृषि अभियांत्रिकी संचालनालय ने 7 से 21 अगस्त के बीच नए सीएचसी के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे।

रखरखाव की चुनौती और नई मशीनों की मांग

निपानिया कला गांव में एक किसान के घर में रखी थ्रेशर मशीन । फोटो: पल्लव जैन
निपानिया कला गांव में एक किसान के घर में रखी थ्रेशर मशीन । फोटो: पल्लव जैन

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की सितंबर 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट ‘कस्टम हायरिंग सेंटर्स फॉर बेटर रेसिड्यू मैनेजमेंट’ के अनुसार, सीएचसी के लिए रखरखाव का खर्च एक बड़ी चुनौती है। पंजाब में यह खर्च किराये से होने वाली कुल कमाई का लगभग 35 से 55 प्रतिशत तक पाया गया। इससे सीएचसी का मुनाफा काफी घट जाता है और उनकी आर्थिक स्थिरता (फाइनेंशियल सस्टेनेबिलिटी) पर दबाव पड़ता है।

पटेल के मुताबिक लोन की ईएमआई, डीजल, रखरखाव और ड्राइवर की सैलरी निकालने के बाद वे साल भर में सीएचसी से करीब 3 लाख रुपए बचा लेते हैं। उनकी सभी मशीनें पूरे सीजन व्यस्त रहती हैं और वे इस काम से काफी संतुष्ट हैं। फिर भी वे नई मशीनें खरीदना चाहते हैं, लेकिन इसकी प्रक्रिया उन्हें बेहद जटिल लगती है।

पटेल कहते हैं, “हमारे यहां सोयाबीन की खेती होती है, लेकिन क्षेत्र में रेज्ड बेड बनाने की मशीन नहीं है। इस पद्धति से कम या ज्यादा बारिश में भी सोयाबीन सुरक्षित रहता है। इसी तरह जीरो ड्रिल मशीन हो तो बिना बक्खर चलाए गेहूं की बुवाई की जा सकती है। मैं ये मशीनें खरीदना चाहता हूं, लेकिन आवेदन की प्रक्रिया जटिल है और मशीनें लॉटरी के आधार पर ही मिलती हैं। ऐसे में लंबा इंतजार करना पड़ता है।”

दीपेश बताते हैं कि उन्हें नई मशीनों की ज़रुरत है लेकिन प्रक्रिया बेहद जटिल है । फोटो: पल्लव जैन
दीपेश बताते हैं कि उन्हें नई मशीनों की ज़रुरत है लेकिन प्रक्रिया बेहद जटिल है । फोटो: पल्लव जैन

धांगे भी पटेल की बात से सहमत हैं। उनके क्षेत्र में मुख्य रूप से धान और मूंग की खेती होती है। उन्होंने तीन महीने पहले एक अतिरिक्त ट्रैक्टर और मल्चर के लिए आवेदन दिया था, लेकिन अब तक संचालनालय से कोई जवाब नहीं आया। वे कहते हैं, “सरकार को नई मशीनों के बारे में बताना चाहिए और सीएचसी संचालकों को ये मशीनें प्राथमिकता पर मिलनी चाहिए।”

सीहोर जिले के सहायक कृषि यंत्री योगराज सावरकर के मुताबिक सीएचसी को कुछ जरूरी कृषि यंत्रों के अलावा स्थानीय जरूरत के हिसाब से भी मशीनें दी जाती हैं। इन्हें सीएचसी संचालक को खुद चुनना होता है, जैसे पराली प्रबंधन के लिए बेलर, रीपर-कम-बाइंडर, सुपर सीडर, हैप्पी सीडर और स्मार्ट सीडर। अतिरिक्त मशीनों के लिए भी ऑनलाइन आवेदन करना होता है। कृषि अभियांत्रिकी संचालनालय से स्वीकृति मिलने के बाद संचालक अधिकृत डीलर से मशीन खरीदता है और सभी दस्तावेज जमा करता है। इसके बाद सब्सिडी की राशि उसके खाते में डाली जाती है। हर मशीन पर सब्सिडी अलग-अलग होती है।

ऐप के जरिये बुकिंग

गूगल प्ले स्टोर पर FARMS ऐप का रिव्यू पेज
गूगल प्ले स्टोर पर FARMS ऐप का रिव्यू पेज

वर्ष 2019 में भारत सरकार ने कृषि उपकरण किराये पर देने के लिए ओला/उबर जैसा एक ऐप ‘FARMS’ (फार्म मशीनरी सॉल्यूशन) लॉन्च किया था। मध्य प्रदेश के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया कि यह ऐप कस्टम हायरिंग सेंटरों के साथ-साथ अन्य लोगों को भी अपने कृषि यंत्र जरूरतमंद किसानों को किराये पर देने में मदद कर रहा है।

लेकिन पटेल कहते हैं, “ग्रामीण किसान फोन पर ही बुकिंग करने में ज्यादा सहज हैं। यह ऐप तो मैंने भी कभी डाउनलोड नहीं किया।”

CEEW की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में केवल 16% कस्टम हायरिंग सेंटर और 1% किसान ऐसे ऐप अपनाते हैं। ज्यादातर सेंटर ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर मशीनें देते हैं और किसान सीधे या फोन से संपर्क करते हैं। प्ले स्टोर पर ‘FARMS’ ऐप अब तक 5 लाख बार डाउनलोड किया जा चुका है। लेकिन डेढ़ हजार से ज्यादा लोगों ने रिव्यू सेक्शन में इसे 2 से कम रेटिंग दी है। ज्यादातर रिव्यू में ऐप के बार-बार क्रैश होने की शिकायत की गई है।

निपानिया सीएचसी में रखे दो ट्रैक्टर । फोटो: पल्लव जैन
निपानिया सीएचसी में रखे दो ट्रैक्टर । फोटो: पल्लव जैन

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मुताबिक देश के 82 प्रतिशत से ज्यादा किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। इतने छोटे किसानों के लिए खेती की मशीनें खरीदना मुश्किल होता है, और कस्टम हायरिंग सेंटर इसका सरल उपाय हैं। भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। इसे पाने के लिए ऐसी मशीनों को बढ़ावा देना जरूरी है जो कम बिजली या ईंधन खर्च करें और कम प्रदूषण फैलाएं। साथ ही ऐसे उपकरण भी चाहिए जो खाद, पानी और बीज का सही मात्रा में उपयोग कराएं। ये मशीनें संरक्षण कृषि जैसे टिकाऊ तरीकों में भी मदद करती हैं।

जरूरत है कि इन केंद्रों की संख्या बढ़े, इनमें स्थानीय कृषि जरूरतों के अनुसार मशीनें हों और छोटे व सीमांत किसानों को इनसे जोड़ा जाए।


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  • Climate journalist and visual storyteller based in Sehore, Madhya Pradesh, India. He reports on critical environmental issues, including renewable energy, just transition, agriculture and biodiversity with a rural perspective.

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