12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन हुआ। राष्ट्र्राध्यक्षों ने खाद्य सुरक्षा और अचानक खाद की कमी जैसे संकटों पर चिंता जताई। दिल्ली घोषणा-पत्र में सूखा-सहनीय बीजों और जलवायु-अनुकूल खेती पर जोर दिया गया।
इससे तीन महीने पहले, 9 से 13 जून को मध्य प्रदेश का इंदौर शहर वैश्विक कूटनीति का केंद्र बना। यहां भारत की अध्यक्षता में 16वीं ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की बैठक हुई। इसमें 20 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधियों ने दुनिया की खाद्य सुरक्षा पर मंथन किया।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, “भारत के 87 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं। जब तक हम इन्हें खासकर महिला और युवा किसानों को सशक्त नहीं करेंगे, तब तक समावेशी विकास व भविष्य की खाद्य सुरक्षा संभव नहीं है।”
दो दिवसीय ग्लोबल मंथन के बाद इंदौर घोषणा-पत्र पर आम सहमति बनी। साथ ही चार वैश्विक पहलों का आगाज हुआ। इनमें ब्रिक्स एग्रिन, डिजिटल एग्री नेटवर्क, एग्रोइकोलॉजी उत्कृष्टता केंद्र व ग्लोबल फोरम ऑन फार्मर्स राइट्स इन सीड सिस्टम्स प्रमुख हैं। यह फोरम पारंपरिक कृषि ज्ञान, नीतियों व बीज संरक्षण की साझी राह तलाशने का जरिया बनेगा।
इन फैसलों को तीन माह बाद दिल्ली में और मजबूती मिली। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन हुआ। दिल्ली घोषणा-पत्र में सूखा-सहनीय बीजों और जलवायु-अनुकूल खेती पर जोर दिया गया।
इन सुनहरे वादों व मध्य प्रदेश के गांवों की जमीनी हकीकत के बीच एक बहुत गहरी खाई है। यह खाई उन गांवों में और चौड़ी हो जाती है जहां पुरूष रोजगार के लिए महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं। खेती-बाड़ी का जिम्मा पीछे छूट गई महिलाओं के कंधों पर है।
वहीं पर्यावरणविद् व शोधकर्ता रंजन पांडा एक गंभीर सवाल उठाते हैं, “सारी नीतियां कॉर्पोरेट फार्मिंग व तकनीक के इर्द-गिर्द घूमती हैं। हकीकत में भारत की खेती का तेजी से स्त्रीकरण हो रहा है। जब तक महिला किसानों के जमीन के मालिकाना हक को शर्त नहीं बनाया जाएगा, ब्रिक्स जैसे सारे लक्ष्य कागजी रहेंगे।”
खाली होते गांव, खेतों में रह गई औरतें

मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में अमरपुर ब्लॉक का लालपुर गांव है। यहां मुकद्दम टोला में भगवती बाई, उम्र 53 साल, रहती हैं। उन्हें इंदौर में हुई ब्रिक्स देशों की बैठक के बारे में कुछ नहीं पता। 7 अगस्त की सुबह आसमान साफ है, भगवती मवेशियों के लिए चारा काट रही हैं। अपने काम के बारे में पूछने पर वे हल्की-सी मुस्कान के साथ कहती हैं, ”कुछ नहीं, बस घर संभालती हूं।”
भगवती सुबह 4 बजे उठकर रात 10 बजे तक काम करती हैं। कागजों में उनके पति किसान हैं, लेकिन वे तीन महीने पहले गुजरात की एक फैक्ट्री में मजदूरी करने चले गए। जुलाई के अंतिम सप्ताह में दो बीघा जमीन पर सोयाबीन व अन्य दलहनी फसल (मिश्रित खेती) की बुवाई की। अब खेत की निदाई, खाद, रोग नियंत्रण और सिंचाई का सारा काम भगवती अकेले कर रही हैं।
यह सिर्फ लालपुर गांव की कहानी नहीं है। पश्चिमी मध्य प्रदेश की आदिवासी पट्टी (झाबुआ, अलीराजपुर, धार और बड़वानी) से लेकर बुंदलेखंड (टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह) तक यहीं हाल है। बारिश पर निर्भर इन इलाकों में बुवाई के बाद पुरुष गुजरात, महाराष्ट्र या दिल्ली-एनसीआर की ओर निकल जाते हैं। पीछे महिलाएं–घर, बच्चों, बुजुर्गों और खेती की जिम्मेदारी संभालती हैं।
झाबुआ की संपर्क समाजसेवी संस्था के हरिशंकर पवार इस बदलाव को करीब से देखते हैं। वे कहते हैं, “गांव से आदमी शहर जाता है, तो मजदूर कहलाता है। जब औरत पूरा खेत संभालती है, तो उसे किसान नहीं माना जाता है। यह श्रम खेतीहर मजदूर के बजाय ‘घरेलू काम’ मान लिया जाता है।”
यही अंतर खेत के श्रम और सरकारी पहचान के बीच भी दिखाई देता है।
खेत संभाल रही, फिर भी किसान नहीं

“वूमन्स कॉर्टिब्यूशन्स, अपॉर्चुनिटीस एंड चैलेंज इन इंडियन एग्रीकल्चर: अ सिस्टमेटिक रिव्यू” शीर्षक से अप्रैल 2026 में अध्ययन प्रकाशित हुआ है। इसके अनुसार ग्रामीण भारत में 80 प्रतिशत से अधिक सक्रिय महिलाएं खेती पर निर्भर हैं। फसल उत्पादन में उनका शारीरिक श्रम 75 प्रतिशत व पशुपालन में 95 प्रतिशत तक दर्ज है।
इसके बावजूद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) बताता है कि मध्य प्रदेश उन पांच राज्यों में है, जहां महिलाओं के भूमि स्वामित्व में ठहराव या गिरावट आई है।
अर्थशास्त्री बीना अग्रवाल के अध्ययन के अनुसार, भारत में कृषि भूमि रखने वाले ग्रामीण परिवारों में करीब 14 प्रतिशत महिलाओं के पास भूमि का मालिकाना हक है। उनके नाम देश की कुल कृषि भूमि का करीब 11 प्रतिशत हिस्सा दर्ज है। मध्य प्रदेश में 5.0 प्रतिशत वयस्क महिलाओं के नाम व्यक्तिगत भूमि दर्ज है।
जमीन के कागज़ पर नाम न होने का असर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। पट्टा या खतौनी में नाम दर्ज न होने से बैंक-सहकारी समितियां फसल-लोन देने से इनकार कर देती हैं। जमीन ही जमानत का आधार मानी जाती है। किसान क्रेडिट कार्ड और फसल बीमा जैसी योजनाओं में आवेदन तभी मान्य होता है जब आवेदक भू-स्वामी के तौर पर दर्ज हो। बीज-खाद सब्सिडी और आपदा या फसल नुकसान का मुआवजा भी उसी नाम पर तय होते हैं जो राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है।
किसान नेता केदार सिहोरी कहते हैं, ”पट्टा पति, सुसर या जेठ के नाम होने से बैंक, सहकारी समितियां और कृषि अधिकारी महिलाओं को कानूनी तौर पर किसान नहीं मानते।”
टीकमगढ़ की 45 वर्षीय शोभना ताई का दर्द इसे स्पष्ट करता है। 35 वर्ष की उम्र में पति की मृत्यु के बाद वे चार बीघा जमीन संभाल रही हैं, लेकिन जमीन आज भी ससुर के नाम है। शोभना के दोनों बेटे गुजरात की कपड़ा फैक्ट्री में हैं। उनके लिए खेत चलाना व खुद को किसान साबित करना, दो अलग लड़ाइयां हैं।
शोभना कहती हैं, “सालों से इसी मिट्टी में खप रहे हैं। पटवारी आता है तो मर्द का नाम पूछता है। बैंक लोन नहीं देता है, क्योंकि कागज पर हमारा नाम नहीं है।”
कम बारिश हो या अनियमित, बोझ महिला पर

2026 का खरीफ सीजन किसानों के लिए असमान बारिश का संकट लेकर आया। मानसून शुरुआत से कमजोर बना हुआ है। अगस्त तक देश के 42 प्रतिशत जिलों में बारिश कम थी। मप्र के मालवा-निमाड़ में हफ्तों तक उल्लेखनीय बारिश नहीं हुई, जबकि बुंदेलखंड में अचानक तेज बारिश की मार पड़ी। मृदा वैज्ञानिक रंजीत सिंह राघव कहते हैं, ”बारिश का कुल आंकड़ा सामान्य हो सकता है। फसल के महत्वपूर्ण चरणों (जैसा सोयाबीन में फूल आना) में लंबा सूखा भारी नुकसान पहुंचाता है।”
सिहोरी कहते हैं, ”बारिश रुकने पर किसानों को खेत में नमी बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सिंचाई व खर्च करना पड़ता है। आमतौर पर यह बिजली रात में 12 बजे से 2 बजे के बीच मिलती हैं।”
20 जुलाई को मप्र विधानसभा में अलीराजपुर की जोबट विधायक सेना महेश पटेल ने यही मुद्दा उठाया। ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह ने सफाई दी, “औसतन 6 घंटे दिन और 4 घंटे रात में बिजली दी जाती है। तकनीकी कारणों, रखरखाव व प्राकृतिक आपदाओं के चलते आपूर्ति बाधित भी होती है।”
सवाल सिर्फ बिजली मिलने का नहीं, समय का है। रात की बिजली पुरूष किसान के लिए भी कठिन होती है। लेकिन जब पुरूष पलायन कर चुका हो तो यही व्यवस्था महिला किसान के लिए अतिरिक्त श्रम व सुरक्षा का जोखिम बन जाती है। सोलर पंप दिन में सिंचाई की सुविधा देकर रात की बिजली पर निर्भरता कम कर सकता है।
सोलर पंप समाधान है, लेकिन किसके लिए ?

प्रधानमंत्री-कुसुम (PM–KUSUM) योजना के घटक-बी के तहत देशभर में करीब 13 लाख से ज्यादा सोलर पंप स्वीकृत हुए हैं। 11,49,988 पंप स्थापित हो चुके हैं, जबकि 12,02,142 ग्रिड-कनेक्टेड कृषि पंपों का सौरीकरण शामिल है।
राज्य में अब तक 59,400 सोलर पंप स्वीकृत किए गए, जबकि 24,682 पंप स्थापित हो चुके हैं। राज्य के 2026-27 के बजट में 1 लाख सोलर पंप लगाने का लक्ष्य है।
लेकिन सवाल वही है–क्या यह योजना उस महिला किसान तक पहुंच रही है जो वास्तव में खेत में सिंचाई कर रही है ? पीएम-कुसुम की आधिकारिक गाइडबुक भी इस समस्या को स्वीकार करती है, महिलाओं के कम भूमि स्वामित्व के कारण उनकी पहुंच बाधित होती है।
झाबुआ की संतरा बाई इसी खाई के बीच खड़ी हैं। बचपन से खेत संभालने के बावजूद जमीन कभी उनके नाम पर नहीं रही। पिछले साल पंचायत के जरिए सोलर पंप योजना की जानकारी मिली। जमीन पति के नाम होने के कारण आवेदन नहीं कर सकीं।
उनके पति गुजरात की कपड़ा फैक्ट्री में काम करते हैं। साल में एक-दो बार ही आते हैं। संतरा बाई कहती हैं, “त्योहार के समय पति आते हैं। सरकारी छट्टी होने और कागजी प्रक्रिया जटिल होने से हम आवेदन ही नहीं कर पाते हैं।”
पीएम-कुसुम के आधिकारिक FAQ में किसान समूहों, जल उपयोगकर्ता संघों, सहकारी समितियों, पंचायतों, किसान उत्पादक संगठनों और सामुदायिक सिंचाई प्रणालियों को योजना से जोड़ने का प्रावधान है। हरिशंकर पावर भी यही सुझाते हुए कहते हैं, “यह उन महिलाओं और छोटे किसानों के लिए विकल्प बन सकता है। जिनके पास अपने नाम की जमीन या पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।”
निष्कर्ष
12-13 जून को इंदौर में हुई कृषि बैठक से पहले कृषि कार्य समूह ने करीब तीन महीने तक चार विषयों पर काम किया। पहला: खाद्य सुरक्षा, पोषण और आजीविका, दूसरा: कृषि व्यापार और सहयोग, तीसरा: रीजेनेरेटिव व पर्यावरण-अनुकूल खेती का प्रसार, चौथा: निवेश व नई तकनीक से भविष्य की खाद्य प्रणालियों को गढ़ना।
भविष्य की खाद्य प्रणालियों, नई तकनीक और निवेश के ये चाराें वैश्विक करार ‘जमीन के मालिक’ को केंद्र में रखकर किए गए हैं। जमीन पर जलवायु परिवर्तन की सबसे गहरी मार उन महिलाओं पर पड़ रही है। जो पुरुषों के पलायन के बाद खेत संभाल रही हैं, परंतु कागजों में किसान नहीं हैं।
डिजिटल एग्री नेटवर्क हो या बीज संरक्षण की पहल, ये योजनाएं भगवती और शोभना जैसी महिलाओं के किसी काम की नहीं हैं। मालिकाना हक न होने से सिस्टम इन्हें पहचानता ही नहीं। जब तक नीतियां ‘खेत के मालिक’ के बजाय ‘खेत जोतने वाले को’ ध्यान में रखकर नहीं बनेंगी। तब तक ये सारे वादे बेमानी रहेंगे।
इन्हीं तमाम चुनौतियाें और वैश्विक करारों की खाई को समेटते हुए किसान नेता केदार सिहोरी कहते हैं, “क्लाइमेट-रेजिलिएंट खेती की बात तब ही जमीन पर उतरेगी, जब खेत संभाल रही महिलाओं तक सिंचाई, तकनीक और सरकारी योजनाओं की पहुंच होगी।”
यह पांच भागों की ”रोटी, खेती और दुनिया” श्रृंखला का दूसरा भाग है।
नोट: यह रिपोर्ट Hands Of Transition के सहयोग से तैयार की गई है।
इस सीरीज़ का पहला भाग: खेत में संकट, थाली पर असर: क्या हमारा खाना पश्चिम एशिया पर निर्भर है?
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