घर की रसोई में तवे पर सिकती रोटी, कड़ाही में गरम होता तेल व दाल की कटोरी। पहली नजर में इनका रिश्ता किसी अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्ग से नहीं जुड़ता। लेकिन जब खेत में खाद समय पर न पहुंचे, बुवाई में देरी हो। तब यही रसोई और खेत एक ही आर्थिक कहानी के दो चेहरे बन जाते हैं।
पुराने भोपाल का जुमेराती बाजार। शहर का सबसे बड़ा थोक और खुदरा बाजार है। जून माह में भीड़ के बीच 42 वर्षीय गृहिणी साधना शर्मा ”अजय ट्रेडर्स” पर सोयाबीन रिफाइन तेल का भाव पूछती हैं। दुकानदार बताता है – 15 लीटर का केन अब 2250 रूपये का है, मई माह में कीमत 2100 रुपए थी, यानी एक माह में 150 रूपये महंगा।
साधना के पति ऑटो रिक्शा चलाते हैं, उनके दो बेटे हैं। वे कुछ देर अपना छोटा सा बटुआ टटोलती हैं, फिर कहती हैं, ”भैया, 15 लीटर रहने दो, अभी 5 लीटर ही दे दो।”
यह सिर्फ एक गृहिणी की मायूसी नहीं है। काउंटर के उस पार खड़े व्यापारी अजय गुप्ता का दर्द भी कम नही हैं, ”हम क्या करें? पीछे से ही माल महंगा आ रहा है।” अजय सफाई देते हैं, ” पेट्राेल-डीजल और मालभाड़ा बढ़ा है। हमारा धंधा भी मंदा हो गया हैं।”
भोपाल से करीब 40 किलोमीटर दूर बैरसिया के सगोनीकलां गांव में किसान बलराम मालवीय (34) पांच एकड़ खेत में सोयाबीन बाेने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन उनकी चिंता बारिश से ज्यादा खाद को लेकर है। वे कहते हैं, ”एक हफ्ते से सहकारी समिति के चक्कर लगा रहा हूं। ई-टोकन के बिना खाद नहीं मिलती। स्लॉट मिल भी जाए तो स्टॉक खत्म हो जाता है। समय पर डीएपी नहीं मिला तो बोवनी पिछड़ जाएगी।” समिति उनके खेत से करीब दस किलोमीटर दूर बैरसिया मंडी में है।
साधना और बलराम की परेशानी अलग दिखती हैं। लेकिन दोनों की डोर हजारों किलोमीटर दूर होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़) से जुड़ी हैं। वेस्ट एशिया में तनाव बढ़ने से जहाजों का बीमा, समुद्री मालभाड़ा व गैस की कीमतें बढ़ती हैं। भारत डीएपी (60 प्रतिशत), पोटाश (100 प्रतिशत) और उवर्रक उद्योग के लिए जरूरी कच्चे माल का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसका असर आखिरकार मध्य प्रदेश के खाद वितरण केंद्रों तक दिखाई दे रहा है। जहां किसान आधार कार्ड, किसान आईडी और ई-टोकन लेकर घंटों कतार में खड़े दिखाई देते हैं।
मध्य प्रदेश में मांग, आपूर्ति और सरकारी दावे

बलराम की परेशानी अकेले एक किसान की नहीं है। यह पूरे मध्य प्रदेश के कृषि ढांचे के दबाव की तस्वीर है। केंद्र सरकार ने खरीफ-2026 के लिए देश की कुल उर्वरक आवश्यकता 383.9 लाख मीट्रिक टन आंकी है। इसमें 197.56 लाख मीट्रिक टन का अग्रिम बफर स्टॉक उपलब्ध था।
मध्य प्रदेश: उर्वरक स्टॉक, बिक्री व कवरेज अनुपात
केंद्रीय उर्वरक पोर्टल (iFMS) — 17 जून 2026 तक के आंकड़े
यूरिया कवरेज
15%
डीएपी कवरेज
19%
एमओपी कवरेज
20%
एनपीके कवरेज
27%
एसएसपी कवरेज
25%
स्रोत: केंद्रीय उर्वरक पोर्टल (iFMS)
कागजों पर कहीं खाद संकट नहीं दिखता, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। सीहोर जिला मुख्यालय स्थित कृषि उपज मंडी में सरकारी खाद विक्रय केंद्र के बाहर किसानों की लंबी लाइन लगी हुई है। इसी लाइन में खड़े खाईखेड़ा गांव के किसान तुलसीराम राय (36) कहते हैं, ”पिछले दो हफ्ते से खाद के लिए आ रहा हूं। कभी ओटीपी तो कभी सर्वर डाउन रहता है।”
तुलसीराम तीन एकड़ खेत में सोयबीन की फसल लेने की तैयारी में है। उन्हें 3 बोरी डीएपी, 3 बोरी पोटाश (MOP) और दो बोरी यूरिया की आवश्यकता है। मगर सिर्फ 3 बोरी डीएपी ही मिली है।
तुलसीराम के पास खड़े किसान दीपेश गुर्जर (42), जो भेरुंदा गांव से खाद लेने आए है, कहते है, “सातवीं बार आया हूं। पहले लाइन में लगते थे, अब लाइन से पहले टोकन पाने के लिए परेशान हुए।”
भोपाल, सीहोर, विदिशा, राजगढ़, सागर और छिंदवाड़ा सहित अधिकांश जिलों में किसानों की शिकायत लगभग एक जैसी है। सरकारी रिकॉर्ड में स्टॉक में है, लेकिन खेत तक समय पर खाद नहीं पहुंच रही।
क्या ई-टोकन व्यवस्था से रुकी कालाबाजारी?

मध्य प्रदेश सरकार ने खाद वितरण को पारदर्शी बनाने जनवरी 2026 में ई-टोकन व्यवस्था पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू की। यह ट्रायल हरदा, विदिशा, शाजापुर और जबलपुर जैसे जिलों में किया गया। बाद में अप्रैल से इसे पूरे प्रदेश में लागू कर दिया गया।
अब आधार कार्ड से जुड़ी किसान आईडी के जरिए ई-विकास पोर्टल पर ऑनलाइन टोकन बुक कर खाद मिल रही है। पोर्टल जमीन के रकबा के आधार पर खाद की मात्रा (जैसे प्रति हेक्टेयर 2 बोरी डीएपी और 5 बोरी यूरिया) तय करता है। जबकि प्रति किसान एक माह में अधिकतम 50 बोरी खाद की सीमा निश्चित है। पोर्टल पर 24 घंटे एडवांस बुकिंग की सुविधा है, लेकिन टोकन की वैधता 3 दिन तक है।
मप्र देश के शुरूआती राज्यों में है जिसने एग्रीस्टैक आधारित ई-विकास पोर्टल से उर्वरक वितरण में ई-टोकन व्यवस्था लागू की थी। इस व्यवस्था से भूमिधारी किसान को तो खाद मिल रही है। साथ ही पंजीकृत बटाईदार, वनाधिकार पट्टाधारी, महिला किसान तथा वृद्ध व दिव्यांग किसानों को खाद दी जा रही हैं। सरकार का दावा है कि इससे वास्तविक खेती करने वाले व्यक्ति तक उर्वरक पुहंचाने, वितरण को अधिक पारदर्शी बनाने और कालाबाजारी पर अंकुश लगाने में मदद मिली है।
हरदा के जिला विपणन अधिकारी योगेश मालवीय कहते हैं, “टोकन तभी जारी होता है। जब संबंधित केंद्र पर वास्तविक स्टॉक उपलब्ध हो। इससे कालाबाजारी पर काफी हद तक लगाम लगी है।”
मप्र खाद की कालाबाजारी के खिलाफ कार्रवाई के मामले में देश में तीसरे स्थान पर है। यह कार्रवाई 1 अप्रैल से 28 नवंबर 2025 के दौरान की गई। इस दौरान 5581 निरीक्षण, 95 एफआईआर और 204 डीलरों के लाइसेंस निलंबित या रद्द किए गए।
फिर भी कई जिलों से खाद की कालाबाजारी, अवैध परिवहन और जबरन टैगिंग की खबरें सामने आ रही हैं। सबसे बड़ी कार्रवाई 23 जून 2026 को सागर जिले से सामने आई है। यहां 500 बैग में 25 टन खाद जब्त की। वहीं 9 जून को शिवपुरी जिले के कोलारस में डीएपी के नाम पर लाए गए नकली खाद से भरा ट्रक पकड़ा था।
मप्र की खाद प्रबंधन और वितरण की खामियों को सीएजी (कैग) की ऑडिट रिपोर्ट 2017-2022 में भी उजागर किया गया। राज्य में उर्वरक नियंत्रण से जुड़े 40 से 76 प्रतिशत पद खाली हैं। जबकि 18 फर्टिलाइजर टेस्टिंग लैब की जगह 6 लैब ही संचालित मिली।
रिपोर्ट के अनुसार फर्टिलाइजर डेवलपमेंट फंड (FDF) में पांच साल (2017-2022) में कुल 5.31 करोड़ रू थे। केवल 5.10 लाख रू ही वास्तविक कार्यों पर खर्च किए गए। बाकी 4.79 करोड़ रू अधिकारियों की गाड़ियों में पेट्रोल-डीजल व रखरखाव पर खर्च किए गए।
वहीं धार जिले की कुक्षी विधानसभा से विधायक व पूर्व मंत्री, सुरेंद्र सिंह बघेल ने 9 जुलाई 2026 को कृषि मंत्री एंदलसिंह कंसाना को पत्र लिखा था। उनके विधानसभा क्षेत्र में किसानों को खाद उपलब्ध नहीं हो पा रही है। ऑनलाइन टोकन की तीन दिन की वैधता समाप्त होने के बाद भी किसानों को खाद नहीं मिल रही हैं। बार-बार टोकन बनवाना पड़ रहे हैं। उन्हें यूरिया के साथ डीएपी, सुपर फोस्फोरस जैसे अन्य उवर्रक खरीदने के लिए बाध्य किया जा रहा है।
भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के प्रदेश अध्यक्ष, अनिल यादव भी कहते हैं, ”डिजिटल व्यवस्था बनी है, लेकिन गांवों में नेटवर्क, सर्वर और सीमित वैधता के कारण किसान परेशान है। बुजुर्ग किसान ऑनलाइन प्रक्रिया ही नहीं समझ पा रहे हैं।”
राजगढ़ के कृषि विज्ञान केंद्र की सीनियर टेक्निकल ऑफिसर गजाला खान की ई-टोकन फॉर फर्टिलाइजर इन मध्यप्रदेश: अ न्यू ऐरा ऑफ इजी एक्सेस फॉर फॉर्मर रिपोर्ट भी यही चेतावनी देती हैं। रिपोर्ट में सुझाव देते हुए कहा गया है कि अगर किसानों को लगातार ट्रेनिंग, ऑफलाइन मदद और पर्याप्त खाद आपूर्ति मिले तो यह बेहतरीन मॉडल बन सकता है।”
खाद नहीं, फिर भी बोवनी, किसान अब कैसे बचा रहे खरीफ सीजन ?
इस बार किसानों के सामने सिर्फ खाद का संकट नहीं हैं। मौसम ने भी मुश्किले बढ़ाईं। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार 1 जून से 9 जुलाई 2026 के बीच देश में वर्षा सामान्य से 14 प्रतिशत कम रही है। मप्र में कुल वर्षा सामान्य के आसपास रही, परंतु उसका वितरण बेहद असमान रहा। कई जिलों में लंबे ड्राई स्पेल (सूखे) के कारण किसान बारिश और खाद दोनों का इंतजार करते रहे। जुलाई की शुरूआत में अच्छी बारिश हुई, तो बुवाई के लिए उपलब्ध समय घट चुका था। ऐसे में अधिकांश किसानों ने इंतजार छोड़कर उपलब्ध संसाधनों में ही बोवनी कर दी।
बैरसिया तहसील के बरखेड़ा बरामद के किसान रवि दांगी कहते हैं, ”अगर खाद का इंतजार करते, तो बोवनी का समय निकल जाता। जितनी खाद मिली, उतनी डालकर बुवाई कर दी। बाकी का बाद में देखेंगे।”
देवास जिले के खातेगांव के किसान राजेश पाटीदार ने तीन एकड़ में सोयाबीन की बुवाई की। उन्होंने ने डीएपी की कमी को सिंगल सुपर फॉस्फोरस व यूरिया से पूरा करने की कोशिश की।
जबकि बैरसिया के बरखेड़ा बरामद के अरविंद दांगी कहते हैं, “मई में ही खेत में गोबर डाल दिया था। जब मिट्टी में अच्छी नमी आई तो 3 एकड़ में सोयबीन बो दी। अभी तक रिजल्ट अच्छा है।”
अरविंद करीब आधा एकड़ में गन्ने की फसल भी ले रहे हैं, यह फसल भी पूरी तरह से जैविक खाद पर निर्भर है। अरविंद कई वर्षों से जैविक खाद की खेती कर रहे हैं। इस फसल को बाजार में नहीं बेचते । यह सिर्फ हमारे उपयोग के लिए होती हैं।
भोपाल के ईंटखेड़ी छाप गांव में सुधा ऑर्गेनिक वर्मीकंपोस्ट शॉप के ऑनर चंद्रभान सिंह बताते हैं, ”पहले सिर्फ नर्सरी, बागवानी और जागरूक किसान ही जैविक खाद खरीदता था, लेकिन इस बार मांग अधिक है। ”चंद्रभाग पहले इस संकट से पहले (यानी पिछले रबी सीजन तक) 3 से 4 टन ही जैविक खाद बेच पा रहे थे। परंतु इस बार होने करीब 15 से 20 टन जैविक खाद बेची है। यह तस्वीर केवल भोपाल संभाग तक सीमित नहीं है। मालवा, निमाड़, विंध्य और महाकौशल के कई हिस्सों में देखी जा रही है। किसान केवल रसायनों के हेरफेर तक सीमित नहीं है। वे स्वदेशी कृषि विज्ञान की ओर मुड़ रहे हैं।
भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़े भी इसकी गवाही दे रहे हैं। इस चालू खरीफ सीजन में प्रदेश के किसानों ने अकेले 1.34 लाख मीट्रिक टन जैविक खाद खरीदी है। पूरे देश में पिछले साल इसी अवधि में मात्र 3.31 लाख मीट्रिक टन जैविक खाद खरीदी गई थी। जो इस संकट के बाद बढ़कर 11.82 लाख मीट्रिक टन पहुंच गई है। यह करीब 3.5 गुना की रिकॉर्ड वृद्धि है। इस समय देश में 22.60 लाख मीट्रिक टन जैविक खाद का भंडार बिक्री के लिए उपलब्ध है।
क्या यह खेती वैज्ञानिक तौर पर सुरक्षित है ?

राज्य के अधिकांश हिस्सों में देरी और बिना व कम खाद के खेतों में खरीफ फसलें बोई गई हैं। कृषि वैज्ञानिक इसे असुरक्षित मानते हैं। राज्य की मुख्य फसल सोयाबीन पर सबसे अधिक दबाव है। मध्य भारत में सोयाबीन बुवाई का आदर्श समय 20 जून से 5 जुलाई है। संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ संजय गुप्ता बताते हैं, ”सोयाबीन एक प्रकाश-संवेदनशील (शाॅर्ट-डे) फसल है। देरी से बुवाई हाेने पर पौधे पर्याप्त वृद्धि नहीं कर पाते है। समय से पहले फूल आने लगते है, इससे उत्पादन लगातार घटता है।”
रायसेन जिले में किए गए STCR (मृदा परीक्षण फसल अनुिक्रया) परीक्षण भी चेताते हैं। जैविक व रासयानिक खाद के असंतुलित उपयोग के कारण मिट्टी में कई पोषक तत्वों की कमी हो गई है। जैसे संतुलित फॉस्फोरस न मिलने से मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन व पोटेशियम का संतुलन बेहद नकारात्मक हो जाता है। जो न केवल खरीफ बल्कि आने वाली रबी फसल को भी खोखला कर देते हैं। यह अध्ययन खरीफ 2015-16 में भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान (ICAR-IISS), भोपाल और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) रायसेन के वैज्ञानिकों द्वारा मिलकर किया था। जिसमें मुख्य रूप से रंजीत सिंह राघव, वाईवी सिंह, मुकुल कुमार, प्रदीप डे और एस. दुबे शामिल थे।
मृदा वैज्ञानिक रंजीत सिंह राघव कहते हैं, ”अंधाधुंध या कम खाद के उपयोग से मिट्टी की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इससे पोषक तत्वों की कमी व विषाक्तता (Toxicity) दोनों का खतरा बना रहता है।”
रिसर्च के मुताबिक मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित पोषण अपनाने से सोयाबीन की पैदावार में 46.7 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई। पौधों की लंबाई में 11.5 प्रतिशत, जड़ों की ग्रंथियों में 11.1 प्रतिशत और प्रति पौधा फलियों की संख्या में 29.1 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। इससे किसानों को प्रति हेक्टेयर औसतन 10,612 रूपये का अतिरिक्त शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ है।
कैसे यह संकट हमारी थाली तक पहुंच रहा

साधना शर्मा जैसी हजारों गृहिणी का रसोई बजट गड़बड़ा गया है, जबकि बलराम जैसे अधिकांश किसानों ने उपलब्ध संसाधन के फसल की बुवाई की हैं। भले ही दोनों की समस्याएं अलग दिखाई देती हैं। लेकिन खेती की बढ़ती लागत और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भारत की निर्भरता। यहीं वह बिंदु है, जहां खेत और थाली एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
वेस्ट एशिया का संकट केवल उर्वरक आपूर्ति तक सीमित नहीं है। इसे हमारी खाद्य सुरक्षा से जुड़ा दीर्घकालिक जोखिम मानते हुए नर्मदापुरम के किसान नेता, शिवकुमार शर्मा ‘कक्काजी’ कहते हैं, ”
जब खाद महंगी या समय पर नहीं मिलती। तो खेती का रकबा घटने के साथ ही लागत भी बढ़ती है। जबकि पैदावार (उत्पादन) भी कम होता है। यही असर मंडी से होते हुए हर घर की रसोई तक पहुंचता है।”
इसी कड़ी की पुष्टि क्रिसिल की मंथली रोटी राइस रेट (RRR) रिपोर्ट भी करती है। जून 2026 में घर में बनने वाली शाकाहारी व मांसाहारी थाली की कीमत क्रमश: 5 व 6 प्रतिशत बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक वेस्ट एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति संबंधी अनिश्चितता की वजह से खाद्य तेल की कीमतों पर दवाब बना रहा। जबकि मौसम की मार से सब्जियों के दाम बढ़ें।
वहीं इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IFPRI) के विश्लेषण के मुताबिक पश्चिम एशिया में संघर्ष और जलमडरूमध्य में व्यवधान भारत जैसे देशों के लिए गंभीर जोखिम है। विश्लेषण बताते हैं कि यदि संघर्ष जून 2026 तक जारी रहा। तो भारत की जीडीपी में 1.07 प्रतिशत और खेतिहर परिवारों की आय में 11.65 प्रतिशत गिरावट आ सकती है। सबसे खराब स्थिति में यानि संघर्ष 2026 के अंत तक जारी रहा। तो जीडीपी 2.38 प्रतिशत और कृषि परिवारों की आय 27 प्रतिशत तक घट सकती है।
इस रिपोर्ट में एक ओर गंभीर चेतावनी दी गई है। यदि सरकार उवर्रक कीमतों को स्थिर रखे और पूरा बोझ सब्सिडी के तौर पर स्वयं उठाएं तो राजकोषीय घाटा 159.5 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
कक्काजी समझाते हैं, ” जब खेत में पैदावार घटेगी, तो मंडी में माल कम आएगा। जिससे खाघ तेल, दाल व दूसरी जरूरी चीजें आम आदमी की थाली में महंगी होकर पहुंचेंगी। इसलिए यह सिर्फ किसान का संकट नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और हर परिवार की रसोई का सवाल है। ”
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने भी चेताया कि उर्वरकों की वैश्विक कमी अगले फसल चक्र में पैदावार को घटा सकती है। जो खाद्य आपूर्ति पर दवाब बढ़ा सकती है।
वैश्विक दबाव का असर मप्र में भी दिखाई दे रहा है। राज्य सहकारी विपणन संघ (मार्कफेड) ने खरीफ-2026 के रासयनिक उर्वरकों की संशोधित दरें जारी की। इनमें NPK (16:32:16) और NPK (10:26:26) की बोरी 1720 रू. से बढ़कर 2450 रु., NPK (16:16:16) 1475 से 2050 रू. MOP 1535 से 1975 रू., अमोनियम सल्फेट 950 रू. से 1400 रू. और SSP 505 से 605 रू. पहुंच गई है। दूसरी ओर सरकार ने यूरिया के अधिकतम खुदरा मूल्य को सब्सिडी के जरिए स्थिर रखा है।
इसी बीच सरकार ने खरीफ-2026 के लिए 14 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मूल्य बढ़ाया। सोयाबीन का एमएसपी 5328 से 5708 रू., अरहर का 8000 से 8450 रू., उड़द का 7800 से 8200 रू. प्रति क्विंटल किया। लेकिन मक्का में केवल 10 रू. व मूंग में 12 रू. प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई।
मप्र कांग्रेस किसान सेल, प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष, केदार सिहोरी पूछते हैं, ” जब एनपीके की कीमत करीब 42 प्रतिशत तक बढ़ गई है। तब एमएसपी में 3 से 7 प्रतिशत की वृद्धि किसानों की लागत की कितनी भरपाई कर पाएगी।”
मप्र, कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना कहते हैं, ” प्रदेश में उर्वरकों का अग्रिम आवंटन किया गया। जिलवार स्टॉक की निगरानी की जा रही है। कालाबाजारी, जबरन टैगिंग करने वालों पर निरंतर कार्रवाई हो रही है।”
इस बीच संभावित अल्पवर्षा की स्थिति को देखते हुए 2 जुलाई को मुख्यमंत्री ने उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। इसमें सभी विभागों को किसानों तक समय पर तकनीकी सलाह और आवश्यक सहायता पहुंचाने के निर्देश दिए।
सरकार का उद्देश्य केवल मौजूदा खरीफ सीजन को संभालना नहीं। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते जोखिमों के बीच कम लागत और टिकाऊ खेती की दिशा में किसानों को तैयार करना है। इसी क्रम में रायसेन, विदिशा, सीहोर, देवास, हरदा और आसपास के कृषि क्षेत्रों में दीर्घकालीन कृषि रोडमैप तैयार किए जा रहे हैं।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR-IISS) भोपाल के निदेशक डॉ. एमएम मोहंती कहते हैं, ” यदि किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक का संतुलित उपयोग करें, तो डीएपी और यूरिया की अनावश्यक खपत कम की जा सकती है।”
वहीं आईसीएआर के महानिदेशक डॉ एमएल जाट का मानना है, “बदलते जलवायु जोखिमों के दौर में केवल अधिक खाद डालना समाधान नहीं है। मिट्टी आधारित पोषण प्रबंधन, फसल विविधीकरण और उर्वरक उपयोग दक्षता ही भविष्य की टिकाऊ खेती का आधार होंगे।”
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि यह रोडमैप केवल कुछ जिलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके अनुभव के आधार पर मप्र व देश के अन्य राज्यों में भी इसी तरह के कृषि रोडमैप तैयार किए जाएंगे।
भारत की खाद्य सुरक्षा अब केवल मानसून या खेती पर निर्भर नहीं रही। वह ऊर्जा, समुद्री व्यापार, उर्वरक आयात और वैश्विक भू-राजनीति से भी जुड़ चुकी है। खेत में समय पर न पहुंचने वाली एक बोरी खाद का असर किसान की आय, बाजार की कीमतों और आम परिवार की थाली तीनों पर दिखाई देता हैं।
यह पांच भागों की ” रोटी, खेती और दुनिया” श्रृंखला का पहला भाग है। इस श्रृंखला में मप्र में ग्राउंड रिपोर्ट के जरिए यह समझने की कोशिश की जा रही है। ऊर्जा संकट, उर्वरक आयात और बदलती कृषि नीतियां भारत की खाद्य सुरक्षा को कैसे प्रभावित कर रही हैं।
नोट: यह रिपोर्ट Hands Of Transition के सहयोग से तैयार की गई है। इस रिपोर्ट के लिए रिपोर्टिंग जून माह में की गई जब ई-टोकन व्यवस्था राज्य में जारी थी। किसानों के विरोध के बाद अब इस व्यवस्था को राज्य में स्थगित कर दिया गया है।
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