ग्रामीण आबादी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को उनकी संपत्ति का कानूनी अधिकार देने के लिए मध्य प्रदेश में स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन 2026 शुरु किया गया। मध्य प्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य है जो आबादी क्षेत्रों में बने प्लॉट की मुफ्त रजिस्ट्री करवा रहा है, यानि इस काम में आने वाले ₹3,800 करोड़ का खर्च सरकार खुद वहन कर रही है। इस काम को अंजाम देने की ज़िम्मेदारी जिन पटवारियों पर है वो योजना के कुछ बिंदुओं पर असहमति के कारण सरकार के विरोध में खड़े हो गए।
इस विरोध की क्या वजहें रही यह समझने के लिए पहले स्वामित्व योजना को समझना जरूरी है। पंचायती राज विभाग की अधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक केंद्र सरकार ने 24 अप्रैल 2020 को इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में देश के 9 राज्यों में शुरू किया और वर्ष 2021 से देश के सभी राज्यों में यह योजना लागू कर दी गई।
पटवारी ग्रामीण स्तर पर राजस्व विभाग का एक सरकारी प्रशासनिक अधिकारी होता है, जो किसी गांव या क्षेत्र की भूमि के रिकॉर्ड और खेती-किसानों से जुड़े लेखा-जोखा रखता है। ऐसे में इस योजना में ड्रोन सर्वे से पहले पटवारियों ने ग्रामीण क्षेत्रों के मकानों और बाड़ों का सीमांकन व सत्यापन किया। मध्य प्रदेश में लगभग 41 हजार से अधिक गांवों में 68 लाख से अधिक ग्रामीणों की संपत्ति की डिजिटल मैपिंग तैयार की गई, जिसके आधार पर डिजिटल संपत्ति कार्ड जारी किए गए।
निष्पादक बनाने पर बिगड़ी बात

लेकिन पटवारियों का विरोध तब शुरू हुआ, जब इसी योजना में एक कदम आगे बढ़ाते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने 17 सितंबर 2026 से 17 अक्टूबर तक लगभग 50 लाख डिजिटल संपत्ति कार्डों को मुफ्त रजिस्ट्री में बदलने का फैसला किया और स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन 2026 की शुरुवात की। इसमें विलेख (डीड) पर हस्ताक्षर करने के लिए पटवारियों को निष्पादन अधिकारी बना दिया गया।
निष्पादन का शाब्दिक अर्थ है, किसी कार्य, योजना, आदेश या अनुबंध को पूरा करना, लागू करना या संपन्न करना और इस काम को एग्ज़ीक्यूट (अंजाम देने) करने वाला व्यक्ति निष्पादक कहलाता है।
संपत्ति विलेख (डीड) में ग्रामीण को ‘क्रेता’ और पटवारी को ‘विक्रेता/निष्पादक’ की भूमिका दी गई है, यानी दस्तावेज पर पटवारी के हस्ताक्षर से यह दर्ज होता है कि वह सरकारी जमीन का हस्तांतरण कर रहा है, जबकि पटवारी खुद उस जमीन का मालिक नहीं है।
पटवारियों की आपत्ति यही है कि भविष्य में जमीन की सीमा, हिस्सेदारी या कब्जे को लेकर कोई विवाद हुआ तो निष्पादक के तौर पर उनकी कानूनी जिम्मेदारी तय हो सकती है।
राजगढ़ पटवारी संघ के सदस्य राजेंद्र सुमन कहते हैं, “हमने ग्रामीण क्षेत्रों में पहले जो कार्य किए हैं, जैसे सर्वे, आरओआर, जीटी और नक्शे तैयार करना, उनके आधार पर ग्रामीण भूमि स्वामित्व में दर्ज हो चुकी है। लेकिन अब उसमें पटवारी को विक्रेता बना दिया गया है। जबकि नियम के मुताबिक भूमि स्वामी ही भूमि का विक्रेता बन सकता है। हम सिर्फ पद से पटवारी हैं, भूमि के मालिक नहीं। भविष्य में यदि ग्रामीणों में संपत्ति को लेकर कोई विवाद होता है, तो वे न्यायालय की शरण लेंगे और हमें जिम्मेदार ठहराया जाएगा।”
कानूनी जिम्मेदारी स्पष्ट करने के साथ-साथ पटवारियों ने निजी पहचान संबंधी डेटा सुरक्षित रखने की भी मांग सरकार के सामने रखी।
राजगढ़ के ही एक अन्य पटवारी स्वामित्व रजिस्ट्री की प्रक्रिया समझाते हुए कहते हैं, “फिलहाल की स्थिति में अगर हम गांव में रजिस्ट्री करने जाते हैं तो अपनी आईडी से लॉगिन करके संबंधित व्यक्ति का आवेदन करते हैं और उसे वेरिफाई करके आगे बढ़ाते हैं। इसके बाद फाइल पंचायत इंस्पेक्टर या तहसीलदार के पास जाती है, जो उसे वेरिफाई करके अप्रूव करते हैं। लेकिन फाइनल रजिस्ट्री में पटवारी का नाम, पिता का नाम, पता और मोबाइल नंबर दर्ज हो जाता है।” यानी विवाद की स्थिति अगर 10 वर्षों बाद भी उत्पन्न हुई तो संबंधित पटवारी को न्यायालय के चक्कर काटने पड़ेंगे। ऐसे में निष्पादक के कॉलम में पटवारी के नाम की जगह ‘मध्य प्रदेश शासन’ लिखे जाने की मांग की गई।
इसके अलावा पटवारी रिकॉर्ड में कई स्तरों पर गड़बड़ियों की ओर भी इशारा करते हैं।
ज़मीनी स्तर पर कई खामियां

राजेंद्र के अनुसार, सरकार की मंशा है कि रजिस्ट्री होने के बाद ग्रामीणों को ऋण और अन्य सुविधाएं आसानी से मिल सकें। जबकि पहले जारी किए गए डिजिटल संपत्ति कार्ड के आधार पर मध्य प्रदेश के लगभग दो हजार से अधिक हितग्राहियों को विभिन्न बैंकों के माध्यम से 175.57 करोड़ रुपये का ऋण पहले ही वितरित हो चुका है। वे राजगढ़ के कालीपीठ का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि संबंधित व्यक्ति को डिजिटल संपत्ति कार्ड के माध्यम से ही 5 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हो चुका है।
जमीनी हकीकत से रूबरू कराते हुए राजेंद्र बताते हैं कि पहले जो पट्टे बनाए गए हैं, उनमें कई विवाद हैं और संशोधन की जरूरत है। उनका कहना है कि सरकार को पहले एक अभियान चलाकर लोगों से अपील करवानी चाहिए, ताकि एक-एक पट्टे का निरीक्षण किया जा सके और जरूरी संशोधन किए जा सकें।
वे कहते हैं, “गांव में ऐसा नहीं है कि हर डीड पूरी तरह शुद्ध हो। स्वामित्व के पट्टे देते समय पर्याप्त समय नहीं दिया गया था। जब हम लोगों के घरों में आधार कार्ड लेने गए, तो कई घरों में सिर्फ एक ही व्यक्ति मिला। बार-बार पूछने पर भी उन्होंने केवल एक सदस्य का नाम बताया। उसी आधार पर नाम लिखा गया और प्रकाशन भी किया गया। अब जब रजिस्ट्री की बारी आई है, तो समस्या खड़ी हो गई है।”
उदाहरण देते हुए वे कहते हैं, “मान लीजिए किसी घर में पिता और उसके पुत्र रहते हैं। किसी एक बेटे ने अपना नाम लिखवा दिया और उसके चार पुत्र हैं। जब यह रजिस्टर्ड डीड हो जाएगी, तो केवल एक व्यक्ति उस मकान का हकदार बन जाएगा और बाकी को घर से भी निकाला जा सकता है। क्योंकि सभी लोग ईमानदार नहीं होते।”
राजेंद्र आगे कहते हैं, “हमें इसमें पूरा अवसर मिलना चाहिए और शुद्धता से काम करने का मौका दिया जाना चाहिए। एक दिन में 40 रजिस्ट्री का लक्ष्य दिया जा रहा है, जबकि एक रजिस्ट्रार भी इतनी रजिस्ट्री एक दिन में नहीं कर सकता। फिर पटवारी कैसे करेगा? शासन-प्रशासन चाहता है कि जो कागज आए हैं, बस उन्हें भर दिया जाए और काम आगे बढ़ाया जाए। लेकिन किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने इस काम को गंभीरता से नहीं लिया।”
जनसंपर्क विभाग के प्रेस नोट के अनुसार, सरकार ने 17 सितंबर से शुरू किए गए लगभग 50 लाख मुफ्त रजिस्ट्रियों के इस अभियान को एक महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा है। इस पूरे अभियान पर करीब 4 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इतने बड़े लक्ष्य और खर्च को देखते हुए ही सरकार पटवारियों पर सख्ती बरत रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मुफ्त रजिस्ट्री योजना में कार्य न करने वाले लगभग 3500 पटवारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। वहीं नीमच, देवास, रतलाम, आगर मालवा, शाजापुर, मंदसौर समेत कई जिलों में प्रोबेशनरी पीरियड में कार्यरत 100 से अधिक पटवारियों पर निलंबन व बर्खास्तगी की कार्रवाई की गई है।
पटवारियों और सरकार के बीच चली इस खींचतान का असर आम लोगों और किसानों के कामों पर भी पड़ा। सीमांकन, नामांतरण, फसल गिरदावरी और मुआवजे से जुड़े कई जरूरी काम प्रभावित हुए, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।
पटवारियों की यह आवाज महज एक जिले की नहीं, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के लगभग 24 हजार पटवारियों की सामूहिक चिंता को दर्शाती है। प्रदेशभर में पटवारियों का साफ कहना है कि वे काम से भाग नहीं रहे हैं, बल्कि व्यवस्था की तकनीकी और विधिक खामियों को सुधारने की मांग कर रहे हैं, ताकि भविष्य में वे बेवजह कोर्ट-कचहरी के चक्करों से बच सकें।
पटवारियों की इस चिंता पर सिविल मामलों के विशेषज्ञ एडवोकेट आफताब जमील खान भी मुहर लगाते हुए कहते हैं कि पटवारियों की चिंता वाजिब है। भविष्य में इस रजिस्ट्री को लेकर कोई विवाद होता है या कोई त्रुटिपूर्ण कार्रवाई सामने आती है, तो निश्चित रूप से जिन पटवारियों ने सेल डीड निष्पादित की होगी, उनका दायित्व बनेगा। उन्हें न्यायालय में पक्षकार बनाया जा सकता है और फेक रजिस्ट्री के आरोप में पुलिस केस भी हो सकता है।
आश्वासन मिला नज़र आदेश पर
हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 9 अक्टूबर को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात के बाद पटवारी संघ को आश्वासन दिया गया है कि उन्हें विधिक संरक्षण प्रदान किया जाएगा। रजिस्ट्री विलेख में व्यक्तिगत पटवारी के स्थान पर ‘मध्य प्रदेश शासन’ को निष्पादक बनाया जाएगा और आंदोलन के दौरान की गई निलंबन व बर्खास्तगी की कार्रवाइयां भी वापस ली जाएंगी।
स्वामित्व योजना के कामकाज को लेकर सरकार और पटवारियों के बीच बनी सहमति के बाद अब निगाहें जरूरी आदेश जारी होने और उसके जमीनी क्रियान्वयन पर रहेंगी। इससे योजना के तहत ग्रामीणों को संपत्ति संबंधी अधिकारों के दस्तावेज उपलब्ध कराने के काम को गति मिलने की उम्मीद है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सरकार सिर्फ कागजी संरक्षण देकर काम आगे बढ़ाएगी, या पटवारियों द्वारा उठाई गई जमीनी खामियों, पुराने पट्टों में विवाद, परिवार के सदस्यों के नाम छूटने और अव्यावहारिक लक्ष्य को भी गंभीरता से दूर करेगी?
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