Read in English | नवंबर 2024 की गिरदावरी में अमर सिंह पटेल के दो खेतों में धान दर्ज कर दिया गया, जबकि उस सीजन में उन्होंने धान की खेती की ही नहीं थी।
मैहर जिले की रामनगर तहसील के बमनाहाड़ी गांव के रहने वाले पटेल करीब ढाई एकड़ जमीन पर कोदो की खेती करते थे। उनका परिवार कई पीढ़ियों से कोदो उगाता आ रहा है क्योंकि इसमें कम पानी लगता है, खाद की जरूरत नहीं पड़ती और यह उस इलाके के लिए उपयुक्त है जहां पानी की कमी रहती है।
करीब दो एकड़ के एक दूसरे खेत में उन्होंने अरहर बोई थी। लेकिन पटवारी ने दोनों खेतों में धान दर्ज कर दिया।
पटेल का कहना है कि पटवारी कभी खेत देखने ही नहीं आया। उनके अनुसार, अक्सर पटवारी घर बैठे ही गिरदावरी भर देते हैं और आसपास के खेतों में जो फसल दिखती है, उसी के आधार पर रिकॉर्ड तैयार कर देते हैं।
गिरदावरी में दर्ज फसल के आधार पर ही तय होता है कि किसान अपनी उपज सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बेच पाएगा या उसे निजी व्यापारियों को बेचना पड़ेगा। पटेल को इस गलती का पता तब चला जब उन्होंने कोदो बेचने के लिए पंजीयन कराने की कोशिश की। गलत रिकॉर्ड होने की वजह से उनका पंजीयन ही नहीं हो सका।

उन्होंने लिखित शिकायत दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद वे स्थानीय पत्रकार शैलेंद्र चौरसिया को खेत पर लेकर गए। वहां मजदूर भी मौजूद थे। उन्होंने खेत में खड़ी असली फसल का वीडियो बनवाया ताकि प्रशासन इस पर ध्यान दे।
उपखंड अधिकारी (एसडीएम) ने जांच का भरोसा दिया, लेकिन उसके बाद भी कुछ नहीं हुआ।
उस साल सरकार ने कोदो का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,500 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। लेकिन पटेल को इसे 2,200 रुपये प्रति क्विंटल पर बेचना पड़ा। एक हेक्टेयर में करीब 20 क्विंटल उत्पादन हुआ था। इसमें से दो से चार क्विंटल उन्होंने घर के लिए रख लिया और बाकी 17 से 18 क्विंटल निजी व्यापारी को कम कीमत पर बेच दिया।
अगले सीजन में उन्होंने कोदो की खेती ही नहीं की।
ऐसा ही एक मामला सीहोर जिले के नसरुल्लागंज के पास छिदगांव मौजी गांव का है। वहां एक किसान के पूरे चने की फसल को रिकॉर्ड में गेहूं दिखा दिया गया। वह भी अपनी उपज सरकार को नहीं बेच पाया और उसे नुकसान उठाकर निजी व्यापारी को बेचना पड़ा। उनकी शिकायत भी यही थी कि पटवारी खेत देखने नहीं आते।
सीहोर कलेक्ट्रेट में बातचीत के दौरान राजस्व निरीक्षक (RI) लखन लाल लोधी ने बताया कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। सुधार की तय अवधि खत्म होने के बाद भी किसान तहसील कार्यालय के माध्यम से कलेक्ट्रेट में शिकायतें भेजते हैं।
इन मामलों से यह लग सकता है कि पटवारी अब खेतों में जाना ही छोड़ चुके हैं। लेकिन ऐसा पूरी तरह सही नहीं है। मध्य प्रदेश में 2017 से मोबाइल ऐप के जरिए डिजिटल गिरदावरी की जा रही है। इसमें कागज की जगह डिजिटल व्यवस्था लागू हुई, लेकिन नियम अब भी यही है कि पटवारी को हर खसरे पर जाकर वहां खड़ी फसल दर्ज करनी होती है।
पहले पटवारी हर खेत में जाकर फसल, सिंचाई और बीज जैसी जानकारी दर्ज करते थे। हालांकि किसान लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं कि पटवारी वास्तव में खेतों तक नहीं पहुंचते।
दूसरी ओर पटवारियों का कहना है कि तय समय के भीतर हर खेत का निरीक्षण करना लगभग असंभव है।
समय के साथ इस व्यवस्था में स्थानीय सर्वेयर, जियो टैग वाली तस्वीरें, सैटेलाइट से जांच और तीन स्तर की समीक्षा जैसी व्यवस्थाएं जोड़ी गईं। किसानों के लिए एमपी किसान ऐप भी बनाया गया ताकि वे अपने खेत की तस्वीर भेजकर खुद फसल की जानकारी दर्ज कर सकें।
लेकिन पटेल का कहना है कि उन्होंने ऐप पर जानकारी डाली थी, फिर भी वह तब तक लंबित रही जब तक पटवारी ने उसे जाकर सत्यापित नहीं किया।
जमीन पर काम करने वाले सर्वेयरों का कहना है कि SAARA ऐप चलाने में भी कई दिक्कतें आती हैं। कई जगह मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता, तकनीकी समस्याएं आती हैं और गर्मियों में मोबाइल गर्म होकर रुक जाता है या ठीक से काम नहीं करता। इससे खेत में काम करना और मुश्किल हो जाता है।
डिजिटल व्यवस्था लागू होने के बाद भी कई पक्षकारों का कहना है कि गिरदावरी की प्रक्रिया में हर स्तर पर समस्याएं बनी हुई हैं।
हालांकि वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर नई तकनीक लागू करने में शुरुआती दिक्कतें आना स्वाभाविक है। जैसे-जैसे सॉफ्टवेयर बेहतर होगा और लोग इसका इस्तेमाल सीखेंगे, तकनीकी और कामकाज से जुड़ी परेशानियां कम होती जाएंगी।
कुछ मामलों में ऐसा हुआ भी है।
लोधी का कहना है कि तकनीक पहले की तुलना में ज्यादा बेहतर और आसान हुई है, इसलिए ऐसी गलतियों की संख्या कम हुई है। लेकिन जिन किसानों के साथ आज भी ऐसी गलती होती है, उन्हें इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है।
गिरदावरी या फसल सर्वे
गिरदावरी राजस्व विभाग का एक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड है। इसमें कृषि भूमि पर बोई गई फसल, खेती का क्षेत्र और जमीन पर किसका कब्जा है, इसकी जानकारी दर्ज होती है। गांव का पटवारी तीनों फसल सीजन के दौरान खेतों का निरीक्षण करने के बाद यह रिकॉर्ड तैयार करता है।
गिरदावरी साल में तीन बार होती है। खरीफ, रबी और जायद सीजन में। अब पूरी प्रक्रिया SAARA (स्मार्ट एप्लीकेशन फॉर रेवेन्यू एडमिनिस्ट्रेशन) ऐप के जरिए होती है। इसी रिकॉर्ड का इस्तेमाल फसल खरीदी, फसल बीमा और दूसरी सरकारी योजनाओं में किया जाता है।

सरकार के आदेश जारी होने के 45 दिनों के भीतर पूरी प्रक्रिया खत्म की जानी होती है। अगला खरीफ सर्वे लगभग 10 अगस्त से शुरू होगा।
मध्य प्रदेश ने 2017 में ई-गिरदावरी परियोजना शुरू की थी। यह देश की पहली ऐसी व्यवस्था थी जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल कर फसल सर्वे को डिजिटल बनाया गया। रबी सीजन में सामान्य सैटेलाइट तस्वीरों का और खरीफ सीजन में रडार आधारित सैटेलाइट तस्वीरों का उपयोग किया जाता है, क्योंकि उस समय बादलों की वजह से सामान्य तस्वीरें साफ नहीं मिल पातीं। मशीन लर्निंग मॉडल रबी में गेहूं, चना, सरसों, कपास और मटर जैसी फसलों तथा खरीफ में धान और सोयाबीन की पहचान करने के लिए तैयार किए गए हैं।
सीहोर तहसील के पटवारी संदीप गुप्ता ने अपने मोबाइल में SAARA ऐप दिखाते हुए बताया कि सर्वेयर को संबंधित खेत तक खुद जाना पड़ता है। ऐप में दूरी दिखाने वाला संकेत तभी हरा होता है, यानी दूरी शून्य होती है, जब वह वास्तव में खेत पर पहुंच जाता है। उससे पहले यह लाल या नारंगी रहता है और गिरदावरी शुरू नहीं होने देता।

इस सीजन में पहली बार इस प्रक्रिया में एक दूसरा विकल्प भी जोड़ा गया है।
खरीफ 2026-27 के लिए जारी आदेश के अनुसार, कुछ खास सर्वे नंबरों में सर्वेयर के खेत पर जाने की बजाय पटवारी के लिए एक अलग व्यवस्था दी गई है।
इन चुनिंदा सर्वे नंबरों में सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर संभावित फसल या जमीन को परती दिखाते हुए जानकारी पहले से ही SAARA ऐप में पटवारी के सामने भर दी जाएगी, जबकि उस समय तक किसी ने खेत का दौरा नहीं किया होगा।
पटवारी खेत से 100 मीटर के दायरे में रहकर केवल फसल और सिंचाई की जानकारी की पुष्टि कर सकता है। इस प्रक्रिया में सर्वेयर की तरह फोटो लेना जरूरी नहीं होगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पहले से भरी हुई जानकारी केवल पटवारी को दिखाई जाएगी। स्थानीय युवा सर्वेयर को यह जानकारी नहीं मिलेगी।
अगर खेत पर पहुंचने के बाद पटवारी को लगे कि सैटेलाइट की जानकारी सही नहीं है, तो उस सर्वे नंबर के लिए यह व्यवस्था वहीं खत्म हो जाएगी और फिर सामान्य प्रक्रिया अपनाई जाएगी। यानी सर्वेयर खेत में जाकर जियो टैग वाली तस्वीर लेगा और उसे आगे जांच के लिए भेजा जाएगा।
सर्वेयर द्वारा जानकारी जमा करने के बाद उसकी जांच करना पटवारी की जिम्मेदारी होती है। अगर सर्वेयर रिकॉर्ड में गेहूं लिख दे, लेकिन फोटो में लहसुन दिखाई दे, तो इसे गलती माना जाएगा और रिकॉर्ड सुधार के लिए वापस भेज दिया जाएगा।
खरीफ 2026-27 के आदेश में एक और तरह की गड़बड़ी रोकने की भी कोशिश की गई है। इसमें कहा गया है कि खेत की अनिवार्य तस्वीर में खड़ी फसल साफ दिखाई देनी चाहिए। साथ ही किसी दूसरी तस्वीर की फोटो लेकर अपलोड करने पर रोक लगाई गई है।
गुप्ता ने बताया कि गलती पकड़ने के तीन तरीके हैं। कई बार उन्हें पहले से पता होता है कि किसान कौन सी फसल उगाता है, इसलिए गलत एंट्री तुरंत समझ में आ जाती है। कई बार सर्वेयर खुद अपनी गलती पहचानकर उसे सुधारने के लिए भेज देता है। और कई बार रिकॉर्ड में दर्ज फसल और फोटो का मिलान नहीं होता, जिससे गलती पकड़ में आ जाती है।

सरकार की ओर से तय सुधार अवधि के दौरान किसान भी एमपी किसान ऐप के जरिए आपत्ति दर्ज करा सकते हैं।
2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में खरीफ के दौरान दर्ज की गई 85 प्रतिशत और रबी के दौरान दर्ज की गई 86 प्रतिशत फसल प्रविष्टियां सही पाई गईं। इससे पता चलता है कि गिरदावरी की सटीकता का स्तर काफी अच्छा है।
सबसे आम गलती फसल के क्षेत्रफल का गलत आकलन था। खरीफ में 8 प्रतिशत और रबी में 7 प्रतिशत सर्वे नंबरों में यह गलती मिली। इसके अलावा 4 प्रतिशत मामलों में खेत में खड़ी फसल दर्ज नहीं की गई, जबकि 2 प्रतिशत मामलों में ऐसी फसल दर्ज कर दी गई जो वास्तव में बोई ही नहीं गई।
पटवारियों की मुश्किलें
गुप्ता ने बताया कि पिछले दो वर्षों से पटवारी गिरदावरी के लिए खुद खेतों में नहीं जा रहे हैं। उनका कहना है कि नई तकनीक और स्थानीय युवाओं की मदद से उनका काम पहले की तुलना में आसान हुआ है।
कई वर्षों से पटवारी अपने काम के बढ़ते बोझ और जमीन के रिकॉर्ड के अलावा मिलने वाली अतिरिक्त जिम्मेदारियों का विरोध करते रहे हैं। इनमें फसल कटाई प्रयोग, लघु सिंचाई गणना, जनगणना, मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव ड्यूटी जैसे काम शामिल हैं।

कई पटवारियों ने बताया कि वे प्रशासनिक विभाग का हिस्सा हैं, इसलिए ऐसे लगभग सभी काम उन्हें ही सौंप दिए जाते हैं। जब हमारी मुलाकात गुप्ता से हुई, तब इलाके के कई दूसरे पटवारी कुबेरेश्वर धाम में चल रहे धार्मिक आयोजन में स्वास्थ्य, सफाई और दूसरी व्यवस्थाओं के लिए अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय का काम कर रहे थे। इसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त भुगतान भी नहीं मिलता।
जाहिर है, इतने अतिरिक्त काम की वजह से जमीन के रिकॉर्ड को बिना गलती के संभालने की उनकी मुख्य जिम्मेदारी प्रभावित होती है।
इम्प्रूवमेंट ऑफ क्रॉप स्टैटिस्टिक्स योजना की 2023-24 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एक पटवारी के जिम्मे औसतन आठ गांव, करीब 1,300 सर्वे नंबर और हर गांव में लगभग 500 हेक्टेयर क्षेत्र था। मध्य प्रदेश में औसतन एक पटवारी के जिम्मे चार गांव, करीब 800 सर्वे नंबर और प्रति गांव लगभग 500 हेक्टेयर क्षेत्र था।
रिपोर्ट में राष्ट्रीय कृषि आयोग की उस सिफारिश को भी दोहराया गया है, जिसमें कहा गया था कि जहां पटवारी का कार्यक्षेत्र बहुत बड़ा हो, वहां उसे कम किया जाना चाहिए।

फिलहाल मध्य प्रदेश के हरदा समेत कई जिलों में पटवारी आंदोलन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश पटवारी संघ ने अपनी लंबे समय से लंबित मांगों को लेकर राज्यभर में आंदोलन तेज कर दिया है। उनका कहना है कि सरकार को कई बार ज्ञापन देने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
आंदोलन के तीसरे चरण में पटवारियों ने सरकारी व्हाट्सएप समूह छोड़ दिए हैं और 28 जुलाई से 2 अगस्त तक WebGIS, SAARA और सरकार के दूसरे ऑनलाइन कामों का बहिष्कार करने का ऐलान किया है।
उनकी प्रमुख मांगों में पटवारी कैडर रिव्यू लागू करना, पदोन्नति और समयमान वेतन देना, नायब तहसीलदार की विभागीय परीक्षा कराना, लंबित मानदेय का भुगतान करना और पटवारियों को जॉब प्रोटेक्शन एक्ट के दायरे में लाना शामिल है। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया तो 3 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की जाएगी।

सर्वेयरों का भुगतान अब भी बाकी
इसी बीच सरकार ने हाल ही में नियम बदला है। अब एक ही स्थानीय युवा सर्वेयर को लगातार दो सीजन में काम नहीं दिया जाएगा। उसके दोबारा चयन से पहले एक सीजन का अंतर जरूरी होगा। गुप्ता का कहना है कि इससे काम और कठिन हो गया है।
अमित शर्मा दो गांवों, बिजौरा और बकतल, में सर्वेयर के रूप में काम कर चुके हैं। उन्होंने ढाई साल पहले मध्य प्रदेश सरकार की ऑनलाइन भर्ती प्रक्रिया के तहत स्थानीय पटवारी के माध्यम से आवेदन किया था। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें नियुक्ति पत्र मिला।
इस काम के लिए कम से कम आठवीं पास होना और इंटरनेट के साथ एंड्रॉयड 9 या उससे ऊपर का मोबाइल होना जरूरी है। प्राथमिकता पहले उसी गांव के युवक या युवती को दी जाती है। यदि ऐसा व्यक्ति न मिले तो ग्राम पंचायत के किसी अन्य युवक या युवती को, और उसके बाद पास की ग्राम पंचायत के व्यक्ति को मौका दिया जाता है। इनमें भी महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है।
सरकारी आदेश के अनुसार, सर्वेयरों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी सर्किल स्तर पर राजस्व निरीक्षक और तहसील स्तर पर मास्टर ट्रेनर की होती है। इसके बाद स्थानीय पटवारी उन्हें आगे मार्गदर्शन देता है। लेकिन शर्मा और एक अन्य पटवारी, जिन्होंने नाम नहीं बताने की शर्त पर बात की, दोनों ने कहा कि व्यवहार में सर्वेयरों को कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता।
वो कहते हैं, नियमों के अनुसार प्रशिक्षण होना चाहिए, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता। सर्वेयर काम करते-करते ही इसे सीखते हैं।
शर्मा के जिम्मे करीब 1,400 खसरा नंबर थे। इनमें से उन्होंने लगभग 1,100 से 1,200 की प्रविष्टियां पूरी कीं। उनका कहना है कि एक खसरे की एंट्री करने में पांच से दस सेकंड ही लगते हैं, लेकिन खेतों के बीच पैदल चलने में काफी समय लगता है। खरीफ सीजन में, जब बारिश होती है, यह काम और कठिन हो जाता है।
शर्मा और कई दूसरे सर्वेयरों ने बताया कि जियो टैगिंग की वजह से उन्हें हर खेत में खुद जाना पड़ता है। इस दौरान कई तरह के खतरे भी रहते हैं, खासकर बारिश के मौसम में कीड़े-मकोड़ों और सांपों का। उनका अनुमान है कि वे एक दिन में पांच से सात घंटे काम करके 50 से 60 खसरों का सर्वे कर सकते हैं। पूरे सीजन का सर्वे पूरा करने में करीब डेढ़ से दो महीने लगते हैं।
सर्वेयरों के लिए एक सीजन में अधिकतम 1,000 खसरों की सीमा तय है। लेकिन पटवारियों के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं है। कई पटवारी इसी बात की ओर ध्यान दिलाते हैं।





सर्वेयरों को एक सर्वे नंबर पर पहली फसल या निजी बगीचे की एंट्री के लिए 8 रुपये मिलते हैं। उसी सर्वे नंबर पर दर्ज हर अतिरिक्त फसल या बगीचे के लिए 2 रुपये मिलते हैं। एक सर्वे नंबर पर अधिकतम 14 रुपये तक का भुगतान किया जाता है।
भुगतान पाने के लिए सर्वेयर को SAARA ऐप पर पंजीयन करना होता है। इसके बाद पासबुक अपलोड करनी होती है और संबंधित पटवारी उनके विवरण की पुष्टि करता है।
लेकिन शर्मा को समय पर भुगतान नहीं मिला। देर से मिला भुगतान भी एक साथ नहीं आया, बल्कि अलग-अलग किस्तों में मिला। शर्मा खेती के साथ-साथ सर्वे का काम करते हैं। उनके लिए यह मुख्य रोजगार नहीं, बल्कि अतिरिक्त आमदनी का जरिया है। पूरे छह महीने में उन्हें करीब 10,000 रुपये मिलते हैं। यानी औसतन एक महीने में एक हजार रुपये से भी कम। जबकि सिर्फ मोटरसाइकिल से खेतों तक आने-जाने में ही तीन से चार हजार रुपये तक का पेट्रोल खर्च हो जाता है।
इसी वजह से, उनका कहना है कि यह काम ज्यादातर वही लोग करते हैं जिनके पास पहले से कोई दूसरा रोजगार होता है। जैसे डेयरी का काम करने वाले, दुकान चलाने वाले या घर के दूसरे काम करने वाले लोग। उनके लिए यह केवल अतिरिक्त आय का साधन है।
12 सितंबर 2025 को स्थानीय युवा महासंघ, मध्य प्रदेश ने अपने इंदौर जिला अध्यक्ष दीपक सोनगरे के माध्यम से इंदौर कलेक्टर कार्यालय में एक ज्ञापन दिया। इसमें सर्वेयरों के लिए हर महीने तय मानदेय और बीमा की मांग की गई। इंदौर कलेक्टर कार्यालय ने यह मांग आगे कार्रवाई के लिए आयुक्त, भू-अभिलेख प्रबंधन को भेज दी।
इसी पत्र में सर्वेयरों ने जियो टैगिंग के नियमों में भी कुछ ढील देने की मांग की।
राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने भी स्थानीय युवा कर्मचारी संघ के लेटरहेड पर सरकार को पत्र लिखा। इसमें तीन और मांगें रखी गईं। जब तक मौजूदा सर्वेयरों को स्थायी काम न मिले, तब तक नई भर्ती पर रोक लगाई जाए। भर्ती के स्पष्ट नियम बनाए जाएं और राजस्व विभाग की ओर से नियुक्ति पत्र और पहचान पत्र दिए जाएं। साथ ही श्रम कानून के तहत न्यूनतम मजदूरी की गारंटी दी जाए।
राजस्व विभाग ने गिरदावरी को लेकर एक्स पर जो पोस्ट की थी, उसके कमेंट सेक्शन में भी ज्यादातर लोगों ने लंबित भुगतान का मुद्दा उठाया।
दूसरे जिलों से मिले पत्र भी बताते हैं कि स्थानीय युवा सर्वेयरों को भुगतान में देरी की समस्या कई जगह थी।
सीहोर कलेक्ट्रेट में तकनीकी सहायक संजय सिंह चौहान ने बताया कि कई बार सत्यापन की प्रक्रिया में समय लग जाता है, जिससे भुगतान में देरी होती है। उन्होंने कहा कि दो साल पहले योजना शुरू होने के बाद से अब तक एक करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया जा चुका है।
हालांकि, रीवा से 22 अगस्त 2025 को जारी एक पत्र में कहा गया कि खरीफ 2024-25 की गिरदावरी के लिए 1,552 सर्वेयरों के बिल भुगतान के लिए भेज दिए गए हैं। साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि जिन सर्वेयरों का नाम अभी भुगतान सूची में नहीं है, उनकी पहचान की जाए। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने काम छोड़ दिया है, लेकिन उनका भुगतान अब भी बाकी है।
उमरिया से 18 सितंबर 2025 को जारी एक स्मरण पत्र में बताया गया कि कई सर्वेयरों की बैंक और पासबुक की जानकारी अधूरी होने के कारण रबी 2024-25 का भुगतान अटक गया। इसके बाद अधिकारियों से जरूरी दस्तावेज जल्द उपलब्ध कराने को कहा गया।
सर्वेयरों ने यह मुद्दा सार्वजनिक रूप से भी उठाया। 25 अगस्त 2025 को जबलपुर जिले की पनागर तहसील में स्थानीय युवा सर्वेयर संगठन, मध्य प्रदेश ने एक ज्ञापन दिया। इसमें कहा गया कि सदस्यों ने डिजिटल फसल सर्वे और किसान आईडी दोनों का काम पूरा कर लिया है, लेकिन उनका बकाया भुगतान अब तक नहीं हुआ है।
संगठन ने नियमित रोजगार, हर महीने तय मानदेय, बीमा, पहचान पत्र, लंबित भुगतान जारी करने और सर्वेयरों को राजस्व सहायक का दर्जा देने की मांग की।
इसी तरह की मांगें राज्य सरकार तक भी पहुंचीं। 29 सितंबर 2025 को पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को एक पत्र भेजा। इसके साथ स्थानीय युवा महासंघ मध्य प्रदेश (राजस्व सहायक कर्मचारी) का ज्ञापन भी संलग्न था।
जाते-जाते
पटेल अपनी करीब 10 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। इसके अलावा उनके पिता और चाचा की जमीन भी है। खरीफ में वे कोदो, अरहर और रागी उगाते हैं, जबकि रबी में सरसों, गेहूं, चना और मसूर की खेती करते हैं।
पटेल बाणसागर बांध परियोजना से विस्थापित किसान हैं। उनका कहना है कि बांध बनने के बाद भी उनके खेत तक सिंचाई का पानी नहीं पहुंचा। यही वजह है कि उन्होंने कोदो जैसी कम पानी वाली फसल को अपनाया। यह सरकार के मोटे अनाज को बढ़ावा देने के अभियान से ज्यादा पानी की कमी की मजबूरी थी।
उनके परिवार में माता-पिता, पत्नी और बच्चे हैं। उनकी एक बहन की शादी हो चुकी है। पिता की आंखों की रोशनी कमजोर होने के कारण वे अब खेती नहीं कर पाते। इसलिए पूरी खेती की जिम्मेदारी पटेल अकेले संभालते हैं। उनका कहना है कि खेती से परिवार का खर्च ठीक से चल जाता है।
उन्होंने अंत में कहा कि वे खेती से संतुष्ट हैं और खुश हैं।
पटेल का मामला एक और वजह से भी महत्वपूर्ण है।
भारत सरकार किसानों को मोटे अनाज, जिन्हें वह ‘श्री अन्न’ कहती है, उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। मध्य प्रदेश सरकार भी अपनी खरीदी योजना के तहत कोदो और कुटकी बेचने वाले किसानों को प्रति क्विंटल 1,000 रुपये की अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि देती है। इसका उद्देश्य मोटे अनाज की खेती को ज्यादा लाभकारी बनाना और ऐसी फसलों को बढ़ावा देना है जो पौष्टिक हैं और धान या गेहूं की तुलना में सूखा बेहतर झेल सकती हैं। सरकार चाहती है कि इन फसलों का उत्पादन बढ़े और लोगों के भोजन में केवल गेहूं और चावल पर निर्भरता कम हो।
भारत सरकार की इम्प्रूवमेंट ऑफ क्रॉप स्टैटिस्टिक्स (ICS) रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश उन चार राज्यों में शामिल है जहां ऐसे खेतों में, जहां एक से अधिक फसलें उगाई जाती हैं लेकिन उनका संयोजन राज्य की आधिकारिक फसल सूची में शामिल नहीं है, केवल प्रमुख फसल का क्षेत्र रिकॉर्ड किया जाता है। दूसरी फसल को सरकारी रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया जाता। ऐसे अन्य राज्य छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड हैं।
‘अमान्य मिश्रित फसल’ उन खेतों को कहा जाता है, जहां किसान एक साथ दो या उससे अधिक फसलें उगाते हैं, लेकिन फसलों का यह संयोजन राज्य की आधिकारिक सूची में दर्ज नहीं है।
हालांकि यह नियम केवल उन मिश्रित फसल वाले खेतों पर लागू होता है जिनका संयोजन राज्य की आधिकारिक सूची में नहीं है। रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि ऐसे मामले कितनी बार सामने आते हैं।
इसके अलावा पटेल का कहना है कि सरकार की नई व्यवस्था के तहत नियुक्त स्थानीय युवा सर्वेयरों से यह मान लेना सही नहीं होगा कि वे हर फसल की पहचान कर सकते हैं। उनका कहना है कि तहसीलदार या एसडीएम को उनका परीक्षण या साक्षात्कार लेना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे धान और कोदो जैसी फसलों में सही फर्क कर सकें। उनके अनुभव में कई सर्वेयर ऐसा नहीं कर पाते और इसका सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है।
पटवारी की नजर से देखें तो सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन पर उनकी मूल जिम्मेदारी के अलावा भी कई काम डाल दिए गए हैं। किसान की नजर से देखें तो पटवारी की सबसे पहली जिम्मेदारी जमीन और फसल का रिकॉर्ड सही रखना है और बाकी काम उसके बाद आने चाहिए। वहीं सर्वेयर के लिए गिरदावरी सिर्फ अतिरिक्त आमदनी का जरिया है। सरकारी भुगतान अक्सर देर से मिलता है, इसलिए वे इसे मुख्य काम की तरह नहीं लेते।
और इन तीनों के लिए नई तकनीक अपने साथ नई परेशानियां भी लेकर आई है। ऐप हमेशा आसान नहीं होता। मोबाइल पर्याप्त अच्छा नहीं होता। खेत में नेटवर्क नहीं मिलता। कई बार सर्वर फोटो स्वीकार नहीं करता या लोकेशन लॉक नहीं होती। ऐसे में कुछ मिनट में होने वाला काम लंबे समय तक अटक जाता है।
इन सबके बीच सबसे पुरानी समस्या अब भी बनी हुई है, और वह है इंसानी गलती।
आखिरकार, यह डिजिटल व्यवस्था ऐसी कोशिश है जिसमें किसान, पटवारी और सर्वेयर, तीनों से बेहतर काम की उम्मीद की जाती है, जबकि उनमें से किसी के पास भी अपना काम पूरी क्षमता से करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।
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