रबी की बुवाई शुरू हो चुकी है, खेतों को खाद की ज़रूरत है। मंगलवार, 27 अक्टूबर को सुबह 9 बजे, भोपाल जिले के बैरसिया के किसान दशरथ सिंह राजपूत, 60 किलोमीटर दूर सीहोर की सहकारी समिति (प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटी – PACS) में खाद लेने पहुंचे हैं। खाद खरीद के लिए जब उन्होंने ई-टोकन पंजीयन किया, तो ई-विकास पोर्टल पर बैरसिया में खाद की उपलब्धता शून्य दिखाई जा रही थी। ऐसे में उन्होंने सीहोर का विकल्प चुना। वे कहते हैं, “खेत में ट्रैक्टर खड़ा है, पानी चल रहा है, बुवाई करनी है। इतनी दूर खाद लेने आया हूं, लेकिन खाद आज मिल ही जाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।”

राजपूत ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि सहकारी समिति के बाहर किसानों की लंबी कतार है। पर्याप्त खाद स्टॉक होने के बावजूद कई तकनीकी खामियों की वजह से किसानों को लंबा इंतज़ार करना पड़ रहा है। यह तब हो रहा है जब जुलाई में किसानों के विरोध के बाद सरकार को ई-टोकन प्रणाली स्थगित करनी पड़ी थी और उसकी जगह अगस्त में कई सुधारों के साथ ई-विकास प्रणाली 2.0 लागू की गई थी, इस दावे के साथ कि अब खाद वितरण व्यवस्था किसानों के लिए सुगम हो जाएगी।
ऐसे में यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि ई-विकास प्रणाली 2.0 में पहले वाली खाद वितरण व्यवस्था की तुलना में क्या बदलाव किए गए हैं, और मौजूदा व्यवस्था में ऐसी कौन-सी कमियां रह गई हैं जिनकी वजह से किसान आज भी खाद पाने के लिए जद्दोजहद करते नज़र आ रहे हैं।
आप कतार में हैं
सीहोर सहकारी समिति के बाहर कई किसान सुबह 6 बजे से कतार में लगे हैं। इंतज़ार करते-करते थक चुके किसानों ने जहां वे खड़े थे, वहां टोकन की पर्ची पर पत्थर रख दिया है। इस तरह कतार में उनकी जगह सुनिश्चित हो जाएगी। जब खाद वितरण शुरू होगा, तो किसान अपनी जगह पर लौट आएंगे।

ऐसी ही तस्वीरें राज्य के अलग-अलग जिलों में देखने को मिल रही हैं। राजगढ़ में खाद लेने आए किसान दीपक वर्मा के मुताबिक, सबसे पहले तो किसानों को सर्वर डाउन होने की वजह से ई-टोकन पंजीयन में परेशानी आती है। ऑनलाइन सर्विस कियोस्क वाले इसके लिए 50 रुपए की फीस वसूलते हैं। इस टोकन की वैधता 72 घंटे रहती है। अगर किसान को समय पर खाद नहीं मिली, तो फिर नया टोकन जनरेट करना होगा और दोबारा 50 रुपए चार्ज देना होगा।

“टोकन लेने के बाद खाद खरीद केंद्र पर वेरिफिकेशन होता है, मोबाइल पर OTP आता है। कई किसानों के दस्तावेज़ में दिक्कत होती है। इसमें प्रति किसान बहुत समय लगता है। कई बार शाम तक नंबर नहीं आता। मैं खुद पांच दिन से परेशान हो रहा हूं,” वर्मा कहते हैं।
राजगढ़ के सहायक संचालक, कृषि विभाग, प्रहलाद सिंह बारेला इस बात को स्वीकारते हैं। वे तकनीकी गड़बड़ी, इंटरनेट कनेक्टिविटी, OTP या पोर्टल संबंधी समस्याओं को देरी के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं।
प्रति बोरी ज्यादा दाम चुकाने को मजबूर

बैरसिया से सीहोर खाद लेने आए किसान अभिषेक मीणा के मुताबिक, डीज़ल और किराया-भाड़ा मिलाकर देखें तो इतनी दूर से खाद ले जाने पर प्रति बोरी 100 रुपए खर्च बढ़ जाता है। सहकारी केंद्र पर खाद न मिले तो निजी व्यापारियों से लेनी पड़ती है, जहां नगद भुगतान भी करना पड़ता है।
दरअसल, यदि किसान का सहकारी समिति में किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) खाता चालू है, तो खाद की राशि उनके KCC ऋण खाते में जोड़ दी जाती है। यह राशि फसल कटने के बाद या राज्य सरकार द्वारा निर्धारित फसल ऋण चुकाने की अंतिम तिथि (रबी/खरीफ सीजन के अनुसार आम तौर पर मार्च या जून माह) तक चुकानी होती है।

सीहोर कृषि विभाग के उपसंचालक अशोक उपाध्याय किसानों से सहकारी समिति से ही खाद लेने की अपील करते हैं। वे कहते हैं, “जिले की सहकारी समितियों में पर्याप्त मात्रा में खाद का स्टॉक है। कई बार समिति में खाद आ जाता है, लेकिन रैक लगने के बाद आईडी जनरेट होने में समय लगता है। इस वजह से पोर्टल पर यह दिखाई नहीं देता। जैसे ही यह बिक्री के लिए तैयार होगा, पोर्टल पर दिखने लगेगा।”
खाद की कालाबाज़ारी

मीणा निजी व्यापारियों पर कालाबाज़ारी का आरोप भी लगाते हैं, “व्यापारी बिना टोकन भी खाद बेच रहे हैं। प्रति बोरी 100-200 रुपए ज्यादा दो और जितनी चाहे खाद ले लो।”
किसानों के आरोपों की जांच के लिए हमारे रिपोर्टर नफीस खान ने सीहोर स्थित खाद ट्रेडर से किसान बनकर बात की। इसके वीडियो साक्ष्य हमारे पास मौजूद हैं। व्यापारी ने रिपोर्टर को बताया कि बिना टोकन ही उन्हें 20-25 बोरी खाद मिल जाएगा।
बारेला के मुताबिक यह गैरकानूनी है। ई-विकास प्रणाली 2.0 के नियमों के तहत कोई निजी व्यापारी बिना ई-टोकन खाद नहीं बेच सकता। अगर कोई ऐसा करता है, तो फर्टिलाइज़र इंस्पेक्टर उस पर कार्रवाई कर सकते हैं।
सीहोर के वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी सीएस सोलंकी कहते हैं, “ई-टोकन के बिना खाद बेचने का मामला सामने आता है तो हम नियमानुसार कार्रवाई करेंगे।”
ई-विकास प्रणाली 2.0

मध्य प्रदेश ने खाद विक्रय में पारदर्शिता लाने के लिए ई-विकास (वितरण एवं कृषि उर्वरक आपूर्ति समाधान) प्रणाली बनाई थी, जिसमें ई-टोकन के माध्यम से खाद बिक्री की व्यवस्था की गई। यह प्रणाली 1 अप्रैल 2026 को पूरे राज्य में लागू की गई थी। लेकिन टोकन जनरेट होने में तकनीकी दिक्कत और किसान को अपनी पसंद और ज़रूरत के अनुसार खाद चुनने की आज़ादी न मिलने की वजह से पूरे राज्य में इसका विरोध शुरू हो गया। चार महीने के भीतर ही, 30 जुलाई 2026 को, सरकार को यह व्यवस्था स्थगित करनी पड़ी।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कृषि उत्पादन आयुक्त केसी गुप्ता की अध्यक्षता में समिति बनाई, जिसकी अनुशंसा पर कृषि विभाग ने ई-विकास प्रणाली 2.0 तैयार की। इसे 20 अगस्त 2026 को लागू किया गया।
नई प्रणाली में किसान अपनी इच्छानुसार उर्वरक खरीद सकता है। बारेला के मुताबिक, पहले की प्रणाली में किसान को कौन-सी और कितनी खाद मिलेगी, यह उसके रकबे के रिकॉर्ड और मिट्टी की सेहत के आधार पर तय किया जाता था। नई प्रणाली में किसान अपनी पसंद की खाद ले सकता है और ज़रूरत पड़ने पर अतिरिक्त खाद भी खरीद सकता है। टोकन बुक करते वक्त उसे इसका कारण बताना होगा।

उपाध्याय बताते हैं कि “नई प्रणाली के तहत खाद वितरण केंद्रों पर एक दिन में 50-100 टोकन ही जारी होते हैं। इससे भीड़ लगने की संभावना खत्म हो जाती है। बारी आने पर ही किसान को खाद मिलती है।”
इसके साथ ही अब किसान टोल फ्री नंबर और वॉट्सऐप बॉट के माध्यम से भी टोकन जनरेट कर सकते हैं। इंटरनेट सर्वर फेल होने की स्थिति में किसान इन विकल्पों का उपयोग कर सकते हैं। हालांकि ज्यादातर किसान ऑनलाइन सर्विस केंद्रों पर जाकर टोकन बुक करने में सहज हैं, क्योंकि उन्हें इसमें तकनीक का सामना खुद नहीं करना पड़ता।
ई-विकास प्रणाली 2.0 में उर्वरक की गणना प्रति हेक्टेयर बैग के आधार पर तय की गई है। यानी किसान असीमित खाद नहीं खरीद सकता।
ताकि ज़रूरत के मुताबिक ही खाद का इस्तेमाल हो

मध्य प्रदेश के किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग के सचिव निशांत वरवड़े ने फाइनेंशियल एक्सप्रेस को बताया, “जब किसी किसान द्वारा खरीदी गई खाद की मात्रा, उसके खेत के क्षेत्रफल, फसल के आकार और मिट्टी के प्रकार के आधार पर ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद’ (ICAR) की सिफारिश से 125% से अधिक हो जाती है, तो हम उस किसान के पास एक टीम भेजते हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसे ज़रूरत से ज़्यादा यूरिया या DAP खरीदने की आवश्यकता क्यों पड़ी।”
मध्य प्रदेश कृषि मंत्रालय के मुताबिक, ई-विकास प्रणाली में खाद वितरण की मात्रा ज़मीन के रिकॉर्ड, फसल के प्रकार और मौसमी ज़रूरतों पर आधारित होती है। इसी वजह से राज्य में खरीफ सीजन 2026 में उर्वरक की खपत पिछले साल की तुलना में 11 फीसदी कम रही। उर्वरक सब्सिडी के खर्च में 764 करोड़ रुपए की बचत हुई और खेतों में पोषक तत्वों के कुशल उपयोग को बढ़ावा मिला।
फर्टिलाइज़र की खपत में सबसे बड़ी गिरावट मक्का और सोयाबीन उगाने वाले राजगढ़ जिले में देखी गई।
ई-विकास प्रणाली से खपत और सब्सिडी में बचत के ये आंकड़े उत्साहित करने वाले हैं। लेकिन कतार में खड़े किसानों के लिए तकनीकी समस्याओं की वजह से खाद मिलने में हो रही देरी, और उसकी वजह से बुवाई में देरी, चिंता का विषय है।
उपाध्याय किसानों को सलाह देते हैं कि वे मौसम में मौजूद नमी का फायदा उठाएं और जल्दी बुवाई करें। अल नीनो के प्रभाव से बचने के लिए उन्होंने किसानों को कम पानी वाली गेहूं की किस्में, या कम पानी में अच्छी पैदावार देने वाली फसलें जैसे चना, मटर या सरसों लगाने का सुझाव दिया है।
कतार में खड़े एक किसान कहते हैं, “ई-टोकन व्यवस्था ज़मीन पर कैसी है, यह सरकार अपने वैज्ञानिक यहां भेजकर पता करे। हम किसान हैं, हमें क्या पता OTP क्यों नहीं आ रहा और सर्वर क्यों काम नहीं कर रहा है?”
राजगढ़ से रिपोर्टर अब्दुल वसीम अंसारी के इनपुट के साथ स्टोरी तैयार की गई है।
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