भोपाल जिले की बैरसिया तहसील से 10 किलोमीटर दूर सगोनी कला गांव में मुकेश दांगी (34) हर सुबह अपने 3 एकड़ खेत में मिट्टी की नमी टटोलते हैं। जून की पहली बारिश देखकर उन्होंने धान की सीधी बुवाई कर दी थी। लेकिन उसके बाद कई दिन खेत सूखे रहे। ऊपरी सतह सूख चुकी है, और अब उन्हें दोबारा बुवाई का डर सता रहा है।
“पहली बारिश देखकर बीज डाल दिया था। किसान इंतजार करे तो नुकसान, जल्दी बो दे तो भी नुकसान। पौधा नहीं निकला तो बीज, मजदूरी और डीजल का खर्च फिर लगेगा,” मुकेश कहते हैं। उन्होंने बुवाई पर करीब 8 से 10 हजार रुपये खर्च किए हैं। दोबारा बुवाई की नौबत आई तो 10 से 12 हजार रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
यही सवाल बैरसिया के अरविंद दांगी, नीमच के शोभाराम और बाबूलाल धाकड़ जैसे सैकड़ों किसानों के मन में है, अभी बोएं या कुछ दिन और इंतजार करें?
कमजोर शुरुआत, फिर अचानक तेजी


मौसम वैज्ञानिकों ने मानसून से पहले ही चेतावनी दी थी। भारत मौसम विभाग ने अल-नीनो प्रभाव के चलते जून-सितंबर के दौरान सामान्य से कमजोर बारिश का अनुमान जताया था। असर मध्य भारत में सबसे ज्यादा दिखा, जून में यहां सामान्य से 50.4 प्रतिशत कम बारिश हुई, जो देश भर में 1901 के बाद पांचवां सबसे सूखा जून रहा।
मध्य प्रदेश में मानसून 24 जून को पहुंचा, लेकिन 26 जून तक सिर्फ 11 जिलों में ही बारिश हुई थी, जबकि 40 जिले सूखे से जूझ रहे थे। 27 जून को उमरिया में सीजन का सबसे अधिक तापमान 42 डिग्री दर्ज हुआ। 30 जून के बाद मानसून ने रफ्तार पकड़ी, और मौसम विभाग ने 3 से 12 जुलाई के बीच भारी बारिश की संभावना जताई है।
मौसम विज्ञान केंद्र, भोपाल के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक अजय शुक्ला कहते हैं, “मध्य भारत में मानसून का पैटर्न तेजी से बदला है। पहले लगातार व मध्यम बारिश होती थी। अब कम समय में अत्यधिक वर्षा और उसके बाद लंबे सूखे अंतराल की स्थिति बन रही है।”
यही पैटर्न किसानों की मुश्किल की जड़ है। कुछ जिलों में शुरुआती बारिश के बाद 8 से 15 दिन तक बारिश नहीं हुई, जिससे बीजों का अंकुरण प्रभावित हुआ। कृषि विस्तार केंद्र, भोपाल के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रंजय कुमार सिंह बताते हैं, “इससे बीजों के अंकुरण पर विपरीत असर पड़ता है। किसानों के सामने पुनः बुवाई का खतरा बना हुआ है।”
बरखेड़ा बरामद गांव के अरविंद दांगी ने खेत तैयार कर लिया है, बीज भी रखा है, लेकिन बुवाई का फैसला नहीं ले पा रहे। “पहले जून की बारिश देखकर किसान बुवाई का समय तय कर लेता था। अब एक-दो बारिश से भरोसा नहीं बनता। पता नहीं बादल कब साथ छोड़ दें,” वे कहते हैं।
असर सिर्फ खेत तक सीमित नहीं

मध्य प्रदेश में खरीफ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी है। राज्य में करीब 155.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में से 144.04 लाख हेक्टेयर में खरीफ की फसलें ली जाती है। इसमें अकेले सोयाबीन का रकबा 58.72 लाख हेक्टेयर के बीच रहा है। इसके अलावा धान, मक्का, उड़द, मूंग, तिल और कपास जैसी फसलें लाखों परिवारों की आय का स्रोत हैं। यही वजह है कि मानसून में थोड़ी भी गड़बड़ी का असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहता है।
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर (JNKVV) के भौतिकी एवं कृषि विज्ञान विभाग के प्रोफेसर और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष भान कहते है ”अस्थिर मानसून से केवल उपज ही नहीं, बल्कि बाजार, कृषि मजदूरी और किसानों की ऋण चुकाने की क्षमता भी प्रभावित होती हैं।”
भान चिंता जताते हैं कि अब चुनौती कम बारिश नहीं, बल्कि बारिश के बदलते पैटर्न की है। उनके मुताबिक खेती के लिए लगातार नमी जरूरी है, लेकिन अब बारिश कुछ दिनों में सिमटती जा रही है।
इसी अनिश्चितता के कारण प्रदेश में फसल पैटर्न में भी बदलाव दिखाई दे रहे हैं। भारत सरकार के उपज पोर्टल (यूनिफाइड पोर्टल ऑफ एग्रीकल्चर स्टेटिस्टिक्स ) की एरिया एंड प्रोडक्टिविटी थर्ड एडवांस एस्टिमेट 2025-26 रिपोर्ट के आंकड़े राज्य में खरीफ सीजन के फसल पैटर्न में बदलाव के संकेत दे रहे है। सोयाबीन का रकबा 54.7 लाख हेक्टेयर पर आ गया है। जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.85 प्रतिशत कम है।
इसके विपरीत मक्का का क्षेत्रफल 27.13 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है। जिसमें 30.62 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है। धान के रकबे में भी 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह 4.21 लाख हेक्टेयर पहुंच गई है। दूसरी ओर उड़द का क्षेत्रफल 20.99 प्रतिशत घटकर 3.35 लाख हेक्टेयर रह गया है। कपास का रकबा 5.59 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा है। इसमें 4.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। जबकि मूंग लगभग 0.44 लाख हेक्टेयर पर स्थिर बनी हुई है।
कृषि वैज्ञानिक इसे बाजार भाव नहीं, बल्कि जलवायु जोखिम का परिणाम मानते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार किसान अब लंबे ड्राई स्पेल से बचने के लिए वैकल्पिक फसलों की ओर मुड़ रहे हैं। खासकर मालवा और निमाड़ के कई जिलों में किसान सोयाबीन के कुछ हिस्से को मक्का और धान की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं।
कृषि मंत्रालय के प्रोग्रेसिव एरिया साउन की वीकली खरीफ कवरेज रिपोर्ट 19 जून 2026 को जारी की गई। रिपोर्ट के अनुसार 12 जून तक देश भर में खरीफ फसलों की बुवाई 84.60 लाख हेक्टेयर तक पहुंची थी। जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 88.04 लाख हेक्टेयर से 3.44 लाख हेक्टेयर कम है। धान का रकबा बढ़ा, लेकिन कपास और दलहन में गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि अभी राज्यवार खरीफ फसलों की रिपोर्ट जारी नहींं की गई है। लेकिन कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक 20-22 जून तक राज्य में खरीफ बुवाई की रफ्तार मानसून की असमान प्रगति से प्रभावित हुई है। मालवा-निमाड़ और भोपाल संभाग के कई जिलों में किसानों ने पहली बारिश के बाद बुवाई शुरू की। लेकिन विदिशा, रायसेन, सीहोर, नीमच और मंदसौर में कई गांवों में किसान पर्याप्त नमी का इंतजार करते रहे। यही कारण है कि राज्य का बड़ा हिस्सा अभी लक्ष्य के मुकाबले शुरूआती चरण में ही दिखाई दे रहा है।
नई किस्में, पर बीज कहां हैं?

मध्य प्रदेश देश का सबसे बड़ा साेयाबीन राज्य है। यहां करीब 58.72 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की खेती होती है। मानसून की अनिश्चितता सीधे किसानों की आय को प्रभावित करती है। इसी चुनौती को देखते हुए इंदौर स्थित आईसीएआर- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सोयाबीन रिसर्च (आईआईएसआर) ने 2024 में ऐसी सोयाबीन की तीन किस्में ( NRC–157, NRC-136 और NRC-131) विकसित की है। जो सूखे अंतराल, देर से बुवाई और बदलती जलवायु परिस्थितियों का सामना कर सकती है।
आईएसीआर-आईआईएसआर के प्रधान वैज्ञानिक और ब्रीडर डॉ. ज्ञानेश कुमार सतपुते के अनुसार मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान सहित विभिन्न क्षेत्रों में कई वर्षों तक परीक्षण किए गए। इन परीक्षणों में पाया गया कि मानसून के दौरान 10 से 15 दिन के सूखे अंतराल की स्थिति में भी यह किस्म अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करती है।
डॉ. सतपुते कहते हैं, ”एनआरसी-136 मानसून के दौरान लंबे सूखे अंतराल की समस्या से निपटने के लिए विकसित की गई है। इसका मकसद किसानों का उत्पादन जोखिम कम करना है। खासकर उन इलाकों में जहां बारिश लगातार अनिश्चित होती जा रही है।”
हालांकि सतपुते यह भी मानते हैं कि कोई भी किस्म जलवायु संकट का पूरा समाधान नहीं है। फसल की सफलता मिट्टी, तापमान, वर्षा वितरण, रोग-कीट प्रबंधन और खेती पद्धति पर भी निर्भर करती है।
दूसरी महत्वपूर्ण किस्म एनआरसी-157 है। यह बदलती जलवायु को ध्यान रखकर विकसित की गई है। यह करीब 94 दिन में पक जाती है। परीक्षणों में इसकी औसत उपज लगभग 16.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई।
आईएसीआर-आईआईएसआर के प्रधान वैज्ञानिक एवं ब्रीडर डॉ. संजय गुप्ता कहते हैं, ”कई बार जून में पर्याप्त बारिश नहीं होती। किसान जुलाई तक बुवाई इंतजार करता है। एनआरसी-157 ऐसी परिस्थितियों का विकल्प बन सकती है। परीक्षणों में 20 जुलाई तक बुवाई में न्यूनतम उपज हानि के साथ अच्छा प्रदर्शन करती पाई गई।”
लेकिन क्या ये किस्में किसानों तक पहुंची हैं? क्या बाजार में इनका बीज आसानी से मिल रहा है? आईएसीआर-आईआईएसआर के वैज्ञानिकों के मुताबिक NRC–157, NRC-136 और NRC-131 नई किस्में हैं। इनके बीज का उत्पादन राष्ट्रीय बीज निगम, राज्य बीज निगमों, कृषि विश्वविद्यालयों और अधिकृत उत्पादकों के माध्यम से बढ़ाया जा रहा है।
बीज प्रमाणिकरण अधिकारी, ग्वालियर, डॉ. श्यौदान सिंह और भारत सरकार के सेंट्रल सीड सार्टिफिकेशन बोर्ड की गाइडलाइन के अनुसार, किसी नई किस्म को अधिसूचित करने के बाद बड़े पैमाने पर बाजार तक पहुंच हासिल करने में समय लगता है। पहले ब्रीडर सीड बनता है। फिर फाउंडेशन सीड तैयार होता है। उसके बाद सर्टिफाइड सीड किसानों तक पहुंचता है।
भोपाल और सीहोर के बीच विक्रेताओं से बातचीत मे पता चला। खरीफ 2025-26 में NRC–157 और NRC-136 के सीमित पैकेट ही उपलब्ध थे। ज्यादातर दुकानों पर अभी भी जेएस-95-60, जेएस-20-34, आरवीएस-2001-4 और एनएससी-36 जैसी पुरानी किस्मों की मांग ज्यादा है। विक्रेताओं का कहना है कि नई किस्मों की उपलब्धता जिले-दर-जिले अलग है।
बीज विक्रेताओं के अनुसार इस सीजन में प्रमाणित सोयाबीन बीज का खुदरा मुल्य 80 से 110 रूपये प्रति किलोग्राम रहा। कुछ जगह पर नई किस्मों का सीमित स्टॉक 120 रूपये प्रति किलो तक बिका। कीमतें कंपनी, पैकेजिंग और स्थानीय उपलब्धता पर निर्भर करती हैं।
नीमच जिले से जावद क्षेत्र के किसान शोभाराम कहते हैं, ”उन्होंने NRC–136 का नाम कृषि विभाग की बैठक में सुना है। लेकिन गांव में ज्यादातर किसान अभी भी पुरानी और भरोसेमंद किस्में ही बो रहे हैं।

”नई किस्म की बीज आसानी से मिल जाए और कुछ किसानों के खेत में अच्छा नतीजा दिख जाए। तो बाकी किसान भी अपनाने लगते हैं। अभी जानकारी है, लेकिन बीज हर जगह नहीं मिल रहा।” शोभाराम कहते है।
बैरसिया, बरखेड़ी बरामद के किसान अरविंद दांगी बताते हैं, ”उन्होंने NRC–157 की जानकारी ली थी। उनके मुताबिक देर से बारिश होने पर कम अवधि वाली किस्मों में किसानों की रूचि बढ़ रही है। लेकिन उपलब्धता सीमित है।”
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में इन किस्मों का प्रसार बढ़ेगा। फिलहाल चुनौती वैज्ञानिक सफलता नहीं, बल्कि बीज उपलब्धता है। मध्य प्रदेश के अधिकांश किसान अभी भी पुरानी और स्थापित किस्मों पर निर्भर है। नई किस्मों को खेत तक पहुंचने और किसानों का भरोसा जीतने में अभी समय लगेगा।
मानसूनी अनिश्चितता और जलवायु परिवर्तन ने किसानों को ऐसे दोहराव पर खड़ा कर दिया है। जहां पारंपरिक फसलें और मौसम दोनों उनका साथ छोड़ रहा है। ऐसे में जब तक नई सूखा-सहनशील किस्मों के बीज किसानों तक नहीं पहुंचते है। तब तक खरीफ सीजन किसानों के लिए जोखिम भरा जुआ बना रहेगा।
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