भानु कुमार राठौड़ खरगोन जिले की सेगांव तहसील के डालकी गांव में रहते हैं। फरवरी के मध्य में उनके खेत के एक हिस्से में प्याज़ के फूल दिखाई देते हैं वहीं दूसरे हिस्से में बांस की बल्लियों के बीच टमाटर की फसल। इन्हीं फसलों के बीच में कुछ पीले तख्ती नुमा कार्ड लटके हुए हैं। साथ ही खेत में मक्के के कुछ पौधे दिखते हैं।
वो यहां 8 एकड़ ज़मीन पर मिर्च, प्याज़, टमाटर, खीरा सहित मौसमी सब्ज़ियों की खेती करते हैं। प्याज़ से वह बीज उत्पादन करते हैं जबकि बाकि सब्ज़ियों को सीधे बाज़ार में बेचते हैं। मगर 6 साल पहले तक वो ऐसी खेती नहीं करते थे।
2019 तक वो कपास, मिर्च, मक्का और सोयाबीन की पारंपरिक खेती करते थे। इन फसलों में कीटों के हमले के चलते कभी-कभी लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता। ऐसे में गांव के ही बालकृष्ण पाटीदार द्वारा उन्हें निमाड़ फ्रेश फार्मर्स प्रोड्यूसर्स ऑर्गनाईजेशन (FPO) से जुड़कर बीजों और सब्ज़ियों की खेती करने के बारे में कहा गया।
कीटों के प्रबंधन के लिए पारंपरिक तरीकों के बजाय इंटिग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) तकनीक का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई। कभी मिर्च की फसल में अपनी लागत तक गंवाने वाले भानु अब न सिर्फ कीटों से अपनी फसल बचा लेते हैं बल्कि उनका खर्च भी कम हुआ है।
भानु की तरह खरगोन के इस क्षेत्र के कई और किसान हैं जिन्होंने आईपीएम तकनीक को अपनाया है और कीटनाशकों पर अपनी निर्भरता कम की है। मगर लगभग 3 दशकों के सरकारी प्रयास के बावजूद राष्ट्रिय स्तर पर इस तकनीक को अपनाने वालों की संख्या उतनी उत्साहजनक नहीं रही है।

आईपीएम मतलब क्या?
सरकारी जानकारी के अनुसार आईपीएम कीट प्रबंधन का एक इको-फ्रेंडली तरीका है जिसमें कल्चरल, मैकेनिकल, बायोलॉजिकल और ज़रूरत के हिसाब से केमिकल कंट्रोल के तरीके शामिल होते हैं। जबकि डालकी के प्रवीण राठौड़ इसे ऐसे तरीके के रूप में देखते हैं जिसमें बिना कीटनाशकों पर निर्भरता बढ़ाए कीट नियंत्रण किया जाता है।
इम्पैक्ट एंड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IMPRI) के विज़िटिंग सीनियर फैलो डॉ डोंठी नरसिम्हाराव रेड्डी इसे और स्पष्ट करते हुए कहते हैं, “आईपीएम में किसान कीटों के बारे में समझ बढ़ाता है, उनके जीवन चक्र को समझता है और उसे लार्वा स्तर पर ही ख़त्म करने के उपाए करता है।” डॉ रेड्डी के अनुसार इस तकनीक में किसान मिट्टी और इंसान को नुकसान पहुंचाने वाले केमिकल के बजाए कीटप्रबंधन के अन्य उपायों पर ज्यादा निर्भर करते हैं।
आदर्श स्थिति में इस तकनीक के अंतर्गत चार तरीकों से कीट प्रबंधन किया जाता है।
कल्चरल कीट प्रबंधन: इसके तहत फसल विविधीकरण, फसल चक्र में बदलाव, खेत को खाली छोड़ना और पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट करने जैसे पारंपरिक तरीके अपनाए जाते हैं।
फिजिकल और मैकैनिकल प्रबंधन: हाथों से कीटों को हटाना और उनके लार्वा नष्ट करना। साथ ही कीटों के व्यवहार को समझकर अलग-अलग कीटों के लिए अलग-अलग उपाय करना शामिल है। इसमें कीटों के लिए अलग-अलग ट्रैप लगाए जाते हैं।
बायोलॉजिकल प्रबंधन: कीटों को खाने वाले पक्षियों को खेत में बुलाने के लिए फलदार पेड़ और अन्य उपाए करना। साथ ही कीटों को खाने वाले परजीवी, बैक्टीरिया, और फंजी के ज़रिए किया जाने वाला प्रबंधन।
कैमिकल प्रबंधन: अगर उपरोक्त उपायों से भी कीटों का प्रबंधन नहीं हो पाए तो फिर कीटनाशकों का छिड़काव करना। लेकिन कीट विशेष के अनुसार ही पेस्टीसाइड का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि अन्य जीवों पर असर न हो। केवल उतने हिस्से में ही कीटनाशक का छिड़काव किया जाता है जहां इनका प्रभाव बहुत ज़्यादा है।

जब लागत निकालना मुश्किल हो गया
मेनगांव के रहने वाले विनोद पाटीदार (32) वर्ष 2020 का समय याद करते हैं। उन्होंने अपनी 5 एकड़ ज़मीन पर मिर्च लगाई थी। मगर थ्रिप्स (Scirtothrips dorsalis) और व्हाइट फ्लाई (Bemisia tabaci) के हमले के कारण फसल ख़राब हो गई। उन्होंने बचाव में हर 2 दिन में कीटनाशकों का इस्तेमाल किया मगर सब व्यर्थ रहा। विनोद को फसल में 2 लाख रूपए लागत आई थी। मगर जो फसल 8 लाख तक बिकनी चाहिए थी वो केवल 3 लाख में बिकी।
भानु कुमार को 2021 में अपनी 2 एकड़ फसल में इसी तरह का घाटा हुआ। उन्होंने इस दौरान 40 से 45,000 रूपए प्रति एकड़ की लागत से मिर्च उगाई थी। मगर कीटों के हमले के बाद पेस्टीसाइड के छिड़काव के बावजूद वह अपना खर्च भी नहीं निकाल सके। वह कहते हैं, “उस साल फ़ायदा छोड़िए मेरी जेब से पैसे गए थे।”
डालकी के ही प्रवीण राठौड़ ने 4 साल पहले मिर्च की फसल इसलिए छोड़ दी क्योंकि कीटों के हमले के चलते उनका काम, खर्च और मेहनत बढ़ गई थी। खरगोन में ऐसे एक या दो नहीं कई किसान हैं जिनकी फसल कीटों के हमले से ख़राब हो गई।
अब प्रबंधन कैसे कर रहे?
भानुकुमार अब अपने खेत में मुख्य फसल के साथ ही कुछ ‘होस्ट प्लांट’ लगाते हैं। इससे कीटों का हमला इन ‘होस्ट प्लांट’ पर होता है।
कृषि क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव रखने वाले प्रमेल कुमार गुप्ता इसे उदाहरण से समझाते हैं, “बीटी कपास के पैकेट में एक छोटा पैकेट देसी कपास का होता था। इसे किसानों को मुख्य फसल के किनारे लगाना होता था ताकि इल्लियां उन पर हमला करें और मुख्य फसल सुरक्षित रहे।”
भानुकुमार होस्ट प्लांट के रूप में प्याज़ की फसल के किनारे मक्का के पौधे मिर्च के बीच गेंदे के पौधे लगाते हैं। इस उपाए से कीटों की पहचान और शुरूआती दिनों में ही उससे निपटना आसान हो जाता है।

कृषि विज्ञान केंद्र, खरगोन में वरिष्ठ वैज्ञानिक (प्रसार) डॉ एसके सिंह बताते हैं कि व्हाइट फ्लाई पीले रंग की ओर आकर्षित होती है इसलिए गेंदे के फूल असर कारक होते हैं। वह कहते हैं, “गेंदे के फूल होने पर व्हाइट फ्लाई मिर्च के बजाए फूल की ओर आकर्षित होती है। किसान इन फूलों को अपने खेत से समय-समय पर अलग करता है तो फ्लाई का प्रबंधन हो जाता है।”
गेंदे के अलावा किसान पीले स्टिकी ट्रैप का इस्तेमाल भी करते हैं। इसमें कीट आकर्षित होकर बैठते हैं और चिपक जाते हैं।
हर साल एक ही खेत में एक ही तरह की फसल बोने के बजाए ये किसान हर बार बदलाव करते रहते हैं।
डॉ सिंह गर्मी के मौसम में मिर्च की खेती शुरू करने से पहले गहरी जोताई की सलाह देते हैं ताकि मिट्टी में मौजूद कीटों के अंडे नष्ट हो जाएं। साथ ही ये किसान अपने खेतों में कुछ बड़े पेड़ भी लगाते हैं ताकि पक्षी कीटों के लार्वा को खा लें।
संजय पाटीदार 5 एकड़ में मिर्च की खेती करते हुए सिल्वर-ब्लैक मल्च का इस्तेमाल करते हैं। मल्च फिल्म का काले रंग वाला हिस्सा ज़मीन की ओर रखा जाता है जबकि सिल्वर रंग को ऊपर रखते हैं।
मगर इससे कीट प्रबंधन कैसे होता है? इसका जवाब देते हुए डॉ सिंह बताते हैं कि सिल्वर रंग सूर्य की रौशनी को परावर्तित (reflection) करता है जिससे थ्रिव्स, मकड़ी और व्हाइटफ्लाई भ्रमित हो जाते हैं।

संजय पहले जिन कीटनाशकों का इस्तेमाल करते थे वो प्रोफेनोफ़ोज़ (Profenofos), एसफेट (Acephate) और ट्राईज़ोफोज़ (Triazophos) आधारित कीटनाशकों का इस्तेमाल करते थे। इससे उन्हें शरीर में खुजली, सर दर्द और सर्दी जैसी शिकायतें रहती थीं। मगर अब वो नीम के तेल, गोबर खाद जैसे विकल्पों का इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि ऐसा नहीं है कि इस एफ़पीओ से जुड़े किसानों नें रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया है। मगर एफ़पीओ द्वारा उन्हें ऐसे कीटनाशकों की लिस्ट दी जाती है जो शरीर और मिट्टी के लिए कम हानिकारक हों।
प्रवीण बताते हैं कि उन्होंने अपने 5 महीने की टमाटर की फसल में 10-15 बार ही स्प्रे किया है जबकि पहले वो 25 से 30 बार छिड़काव कर देते थे।
लागत पर असर
आईपीएम से खेती करते हुए इन किसानों की लागत कम हुई है। संजय पहले एक एकड़ में कीटनाशकों पर औसतन 18000 रूपए खर्च करते थे जो घट कर 7000 हो गया है। इसी तरह भानु कुमार मल्चिंग और लेबर मिलाकर एक एकड़ में 35000 रूपए लगा कर अनुमानित 90 क्विंटल हरी मिर्च पैदा कर लेते हैं।
वह कहते हैं कि पूरी तरह केमिकल पर निर्भर रहने वाला किसान अगर इतना उत्पादन ले भी लेता है तब भी उसकी लागत ज्यादा होने से मुनाफे में मार्जिन कम हो जाता है।
इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट पर 4 किताबें लिख चुके शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चरल साइंस एंड टेक्नोलॉजी (SKUAST), जम्मू में प्रोफ़ेसर राजिंदर पेशिन अपने अध्यन में इस विषय पर हुए अन्य अध्यनों का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि आईपीएम प्रोग्राम लागू करने से पेस्टिसाइड के इस्तेमाल में 21 से 100% तक की कमी आई है।
हालांकि इस विश्लेषण में देश के अलग-अलग हिस्सों की सब्ज़ियों के अलावा कपास, धान और दलहन फसलों पर इसके असर पर आधारित शोध भी शामिल हैं। इसमें अधिकतर सब्ज़ी की फसलों में कीटनाशक का इस्तेमाल कम होते दिखाया गया है।

लेकिन 2008 से 2016 के बीच जम्मू कश्मीर में किए गए एक शोध में कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ता हुआ भी दिखता है।
डॉ रेड्डी मानते हैं कि पारंपरिक कीटनाशकों के इस्तेमाल की तुलना में ये किसान की लागत कम करता है। मगर वो यह भी कहते हैं कि इस तरह की खेती में मजदूरों का इस्तेमाल बढ़ जाता है। ऐसे में किसानों के लिए केवल खुद से इसे करना कठिन होता है।
कितने लोगों तक पहुंचा आईपीएम?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फर्टीलाइज़र उपभोक्ता है। वहीं पेस्टीसाइड इस्तेमाल करने के मामले में हमारा देश एशिया में तीसरे नंबर पर है। यानि देश में दोनों ही रसायनों का जमकर इस्तेमाल होता है।
ऐसे में कीटनाशकों पर निर्भरता सीमित करने के लिए भारत में पहली बार 1974 में कपास और धान के लिए आईपीएम से जुड़ी हुई रिसर्च शुरू की गई। 1988 में राष्ट्रिय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसन्धान संस्थान (ICAR-NRIIPM) की शुरूआत हुई। आज देशभर में 36 और मध्य प्रदेश में 2 केंद्रीय एकीकृत कीट प्रबंधन केंद्र संचालित हो रहे हैं।
इसके बावजूद भारत में अधिकतम 70 लाख हेक्टेयर में ही आईपीएम से खेती हो रही है। यानि 3 से 5% कृषि क्षेत्र ही आईपीएम के अंतर्गत आता है। 2019 से 2023 के बीच इसके लिए किसानों को प्रशिक्षण देने का टार्गेट और प्रशिक्षित किसानों की संख्या भी घटी है।
डॉ सिंह बताते हैं कि कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा अपने स्तर पर इसके प्रचार-प्रसार के लिए प्रशिक्षण और फील्ड ट्रायल आयोजित किए जाते हैं। मगर इसमें उन्हें इंदौर स्थित केंद्रीय एकीकृत कीट प्रबंधन केंद्र से कोई सहयोग नहीं मिलता।

2007 से आईपीएम पर काम कर रहे प्रमेल कुमार गुप्ता भी कहते हैं कि केवीके में प्रर्याप्त फील्ड स्टाफ न होने के कारण इसका विस्तार नहीं हुआ। वह मानते है कि इसका विस्तार एनआरआईआईपीएम द्वारा ही किया जाना था।
डॉ रेड्डी मानते हैं कि 1988 के बाद से अब तक कृषि में काफी बदलाव आ गए हैं। वह बीटी कॉटन का ज़िक्र करते हुए फसलों की नई वैराइटी और उससे संबंधित गुलाबी इल्ली (Pectinophora gossypiella) जैसे नए कीटों की भी बात करते हैं। उनका मानना है कि अब इस तकनीक पर नए सिरे से शोध होना ज़रूरी है।
आईपीएम के लिए काम कर रहे निमाड़ फ्रेश एफ़पीओ को राष्ट्रिय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) द्वारा सहायता प्राप्त है। नाबार्ड के सहायक प्रबंधक और जिला विकास प्रबंधक खरगोन, विजेंद्र दिनकर पाटिल ने बताया कि इस एफ़पीओ को 3 साल के लिए 18 लाख रूपए का अनुदान दिया गया है। इसके अलावा मैचिंग इक्विटी ग्रांट और नैबसंरक्षण जैसे फायदे मिले हैं।
डॉ सिंह मानते हैं कि अगर किसान को उसकी फसल के अच्छे दाम मिलेंगे और वो एफ़पीओ या अन्य माध्यम से कांट्रेक्ट फार्मिंग की ओर जाएगा तो उसके लिए आईपीएम से खेती करना फायदेमंद और ज़रूरत दोनों होगी।
बैनर ईमेज – खेत में बायोस्टिमुलेंट का छिड़काव करते भानु कुमार राठौड़ | खरगोन | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल
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