खाद वितरण की अव्यवस्थाओं और किसानों की लंबी लाइनों को देखते हुए मध्य प्रदेश में 1 अप्रैल से एग्रीस्टैक-लिंक्ड ई-विकास पोर्टल की शुरुआत की गई। इस नई प्रणाली के तहत अब किसानों को वितरण केंद्रों पर कतार में लगने से पहले ऑनलाइन टोकन जनरेट करना अनिवार्य है, जिसके बाद मोबाइल पर प्राप्त ‘गुप्त कोड’ (ओटीपी) के सत्यापन के बाद ही खाद का वितरण किया जा रहा है।
प्रशासनिक स्तर पर इसे एक बड़ी नीतिगत पारदर्शिता माना जा रहा है। मई महीने में इकोनोमिक टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में प्रदेश के कृषि सचिव निशांत वर्वड़े ने बताया कि इस प्लेटफ़ॉर्म से अब तक 130 लाख किसानों को फायदा हुआ है और करीब 20 लाख टन खाद वितरित की जा चुकी है।
साक्षात्कार में कृषि सचिव वरवड़े ने कहा, “किसानों को खास समय पर खाद की ज़रूरत होती है। समय पर खाद न मिलने पर भीड़, लंबी लाइनें और असमान वितरण होता है, जिससे अक्सर छोटे किसानों को सबसे ज़्यादा नुकसान होता है।” उनका कहना था कि नया सिस्टम इन समस्याओं का हल होगा।

खरीफ का सीजन शुरू होते ही राजधानी से 141 किमी दूर राजगढ़ कलेक्ट्रेट के सामने मार्केटिंग सोसायटी के गोदाम के सामने कई किसान कतार में खड़े हुए हैं। ज़्यादातर किसान अपने-अपने मोबाईल की स्क्रीन पर मैसेज आने का इंतज़ार कर रहे हैं। भेनपुरा गांव के किसान बद्रीलाल तंवर कहते हैं, “पहले किसान केवल बही-पट्टी और पहचान पत्र दिखाकर खाद ले लेते थे, लेकिन अब पहले टोकन लो और यहां आकर ओटीपी बताओ। साधन किराया करके यदि यहां आ जाओ और ओटीपी नहीं आए, तो खाली हाथ वापस जाना पड़ता है।”
तंवर अकेले ऐसे किसान नहीं है। वितरण केंद्र में मौजूद कई किसान तकनीकी समस्या की शिकायत करते हैं। जहां एक ओर अधिकारी इससे किसान की सुविधा बढ़ने का दावा कर रहे हैं वहीं ज़मीन पर वे दाम में अंतर सहित कई समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इसके साथ ही हर बार की तरह इस बार भी डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी) की किल्लत बनी हुई है। ऐसे में न तो किसानों का इंतज़ार ख़त्म हुआ है, ना ही कतारें।
तकनीकी सीमाएं और इंतज़ार करता किसान
जिला मुख्यालय के कई केंद्रों में किसान ई-टोकन होने के बाद भी इंतज़ार कर रहे हैं। नई व्यवस्था का नियम यह है कि जब तक भोपाल के मुख्य सरकारी सर्वर से मोबाइल पर ओटीपी नहीं आता, तब तक सिस्टम खाद लॉक रखता है। ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क की कमी या सरकारी कंप्यूटर सिस्टम की खराबी के कारण किसानों को टोकन होने के बाद भी घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।
बांसखेड़ी के जगन्नाथ इस नई डिजिटल प्रक्रिया के बारे में कुछ नहीं जानते। उन्होंने अपने घर के पास स्थित एक साइबर कैफे के कर्मचारी के ज़रिए ऑनलाइन ई-टोकन के लिए आवेदन किया था। मगर जगन्नाथ बताते हैं, “ऑनलाइन वाले ने एक सेंटर यह चुन लिया और दूसरा सेंटर कहीं और का।” अब उन्हें खाद के चार कट्टे यहां से लेने पड़ेंगे और बाकी कहीं और से जगह से। ऐसे में उनके सामने दिक्कत है कि वो दोनों ही जगह का भाड़ा दें या फिर टोकन कैंसिल होने का इंतजार करें।

इस डिजिटल प्रणाली में एक और रुकावट ‘फॉर्मर आईडी’ (Farmer ID) का न होना है। नई व्यवस्था में इस आईडी के बिना ऑनलाइन टोकन जनरेट नहीं हो सकता। हालांकि इस समस्या के समाधान के लिए कृषि विभाग का कहना है कि जिला कलेक्टर के सख्त निर्देशों के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष कैंप लगाए जा रहे हैं। कृषि अधिकारियों के अनुसार जिन किसानों की फॉर्मर आईडी अभी तक नहीं बनी है, वे अपने नजदीकी पटवारी से संपर्क करके इसे बनवा सकते हैं।
‘सुधार’ की गुंजाइश नहीं
इसके अलावा इस प्लेटफोर्म की एक सीमा यह है कि किसान ने जितनी बोरी खाद का टोकन जनरेट किया है उसे एक बार में ही पूरी खाद खरीदनी पड़ेगी। प्लेटफोर्म में एक बड़ा तकनीकी पेंच ‘नो-एडिट’ यानि संशोधन की गुंजाइश न होने का है।
गोदाम प्रभारी शाहीना खान इसे और स्पष्ट करते हुए बताती हैं, “यदि कोई किसान 10 बोरी का टोकन जनरेट करके आता है, लेकिन मौके पर उसके पास सिर्फ 5 बोरी के पैसे होते हैं, तो हमारे पास सिस्टम में संशोधन (Edit) की कोई गुंजाइश नहीं है। किसान को पूरी 10 बोरी ही खरीदनी पड़ेगी, क्योंकि टोकन स्कैन करते ही डिजिटल स्टॉक प्रभावित हो जाता है।” ऐसे में पैसे की तात्कालिक तंगी झेल रहे किसान खाद से वंचित हो रहे हैं।

एक ही दिन, एक ही जगह, दाम अलग-अलग
पढ़िया गांव के जशरथ टोकन कटवा कर डीएपी लेने के लिए आए थे। मगर फिलहाल वो खाली हाथ लौट रहे हैं। वह कहते हैं, “यहां महंगी वाली खाद है, सस्ती आएगी तब लेंगे।”
असल में जिले में एक ही ग्रेड की खाद दो अलग-अलग दामों में बिकने की बात भी सामने आई है।
18 जून को राजगढ़ जिले के दो अलग-अलग केंद्रों की रसीदों में यह अंतर साफ देखा गया। पीपलबे प्राथमिक सहकारी संस्था (सोसाइटी) से किसान बापू लाल को कोरोमंडल ग्रोमोर (Gromor) कंपनी की 50 किलोग्राम की बोरी 1900 रुपये (सरकारी एमआरपी) में दी गई। वहीं मार्केटिंग फेडरेशन गोडाउन, राजगढ़ में देहरीठाकुर गांव के किसान प्रभुलाल को मध्य भारत एग्रो प्रोडक्ट्स लिमिटेड की उसी समान वजन और समान तकनीकी ग्रेड (20:20:0:13) की बोरी 2105 रुपये में बेची गई।
गोदाम प्रभारी के अनुसार ऑनलाइन पोर्टल की तकनीकी बाध्यता यह है कि डिजिटल सिस्टम केवल उसी खाद और उसके रेट को दिखाता है जो उस वक्त गोदाम के स्टॉक में लाइव होती है। अलग-अलग कंपनियों की दरों में अंतर के कारण एक ही जिले में, एक ही दिन, एक ही ग्रेड की खाद किसानों को अलग-अलग कीमतों पर मिल रही है।

जिले में खाद की उपलब्धता
जिले के कांटिजेंसी प्लान के अनुसार जिले में खरीफ के सीजन में 381.67 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र में फसल उत्पादन किया जाता है। स्थानीय कृषि विभाग से रिपोर्टर को मिले आंकड़ों के अनुसार मौजूदा खरीफ सीजन में कुल 85,026 मीट्रिक टन उर्वरक की मांग का लक्ष्य रखा गया है। मगर अब तक गोदामों में कुल 66,976 मीट्रिक टन खाद ही पहुंची है। यानि जिले में 18,050 मीट्रिक टन खाद की कमी है। इसमें भी केवल डीएपी की कुल मांग 16,614 मीट्रिक टन थी। मगर वर्तमान में ज़रूरत का लगभग आधा 8,322 मीट्रिक टन डीएपी ही उपलब्ध है।
विभागीय आंकड़ों के अनुसार, जिले में अब तक 76,298 किसानों ने टोकन बुक कराए हैं, जिनमें से 55,000 किसान सोसायटियों से 20,000 मीट्रिक टन खाद का उठाव कर चुके हैं।
इस प्रकार जिले में अब भी खाद मांग के अनुरूप अब तक उपलब्ध नहीं हो पाया है। किसान अब भी वितरण केंद्रों के बाहर ओटीपी का इंतज़ार करते हुए कतार में खड़े हैं। कई किसान अब भी फार्मर आईडी और नई तकनीक के ज्ञान से वंचित दिखाई देते हैं। ऐसे में आधिकारिक दावों के उलट राजगढ़ में यह नया सिस्टम किसानों का काम आसान करता हुआ तो नहीं दिखता।
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