फरवरी 2024 में मध्य प्रदेश के सरकारी सहायता प्राप्त स्वायत्त संस्थान श्री जी.एस. इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (एसजीएसआईटीएस) ने पांच दिन का पौधारोपण अभियान शुरू किया।
एसजीएसआईटीएस के निदेशक नीतेश पुरोहित ने बताया, “करीब 3,500 लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। 65 प्रजातियों के 8,000 पौधे लगाए गए, जिनमें 25 संकटग्रस्त प्रजातियां भी शामिल थीं।”
एसजीएसआईटीएस में विकसित किए गए इस जंगल की जिम्मेदारी संभाल रहे एलेक्स मुंडापुझा ने पांच फीट गहरे गड्ढे खोदे और मिट्टी की पांच परतें तैयार कीं। इसमें संस्थान के 30 एकड़ परिसर से इकट्ठा की गई सूखी पत्तियां डाली गईं, जिनकी मात्रा लगभग 200 ट्रॉली थी। इसके ऊपर काली मिट्टी, इंदौर की चित्रा मंडी से आया जैविक कचरा, वर्मी कम्पोस्ट और कम्पोस्ट डाला गया।
उन्होंने ऐसे पौधों की तलाश की जो कभी इंदौर और आसपास के इलाकों में स्वाभाविक रूप से उगते थे, लेकिन शहरीकरण के कारण अब लगभग गायब हो चुके हैं। इनमें शहतूत और तिल जैसे पौधे शामिल हैं।
दो साल बाद यह शहरी जंगल लोगों के लिए खोल दिया गया। पुरोहित ने कहा, “लगभग 90 प्रतिशत पौधे बच गए। इनमें से कई 15 से 20 फीट तक ऊंचे हो चुके हैं।”
मुंडापुझा ने कहा, “मीडिया ने खुद यहां तापमान में कम से कम 2 से 5 डिग्री का अंतर मापा था। हमने पर्यावरण दिवस पर यही बात प्रकाशित भी की थी।”

यह जंगल मियावाकी तकनीक से विकसित किया गया है। यह एक जापानी पद्धति है जिसे जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी ने विकसित किया था। इसमें स्थानीय पौधों को बहुत घनी संख्या में लगाया जाता है, जिससे वे प्रकाश पाने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं और सामान्य पौधारोपण की तुलना में कई गुना तेजी से बढ़ते हैं। इस परियोजना को एचडीएफसी बैंक की कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) योजना से सहायता मिली।
लेकिन अब एक नई चुनौती सामने है। इंदौर में भूजल स्तर 160 मीटर तक नीचे जा चुका है, जो 2012 की तुलना में लगभग दोगुना है। इसके अलावा पानी का दोहन टिकाऊ सीमा से लगभग 20 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में बोरवेल पर निर्भर मियावाकी जंगलों के लिए पानी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या बन रही है।
मुंडापुझा ने कहा, “जितना बड़ा पेड़ होगा, उसे उतने ही अधिक पानी की जरूरत होगी। यही सबसे बड़ी चुनौती है जिसका हम सामना कर रहे हैं।”
भारत के शहर लगातार ज्यादा गर्म और ज्यादा घने होते जा रहे हैं, लेकिन हरियाली कागजों में ज्यादा दिखाई देती है। निर्माण कार्य बढ़ने के साथ शहरों का हरित क्षेत्र घट रहा है। इंदौर जैसे शहरों में गर्मियों के दौरान तापमान अक्सर 44 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है। ऐसे में जल्दी और कम खर्च में हरित क्षेत्र विकसित करने की मांग पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।
भारत में मुंबई में 64 से अधिक मियावाकी जंगल हैं। वर्ष 2024 में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने दिल्ली-एनसीआर के पास 53 एकड़ से ज्यादा भूमि को मियावाकी पौधारोपण के लिए चिन्हित किया। मध्य प्रदेश में भी भोपाल और इंदौर में ऐसी परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें से अधिकांश को सीएसआर फंड से सहायता मिलती है। दुनिया के स्तर पर जापान, ब्राजील, चिली और जॉर्डन जैसे देशों ने भी इस पद्धति को अपनाया है।
लेकिन मध्य भारत और राजस्थान में काम करने वाले पारिस्थितिकी बागवानी विशेषज्ञ फजल राशिद इस पद्धति को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
उन्होंने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “किसी भी जमीन के टुकड़े पर तीन साल तक पैसा और मेहनत लगाइए, कुछ न कुछ सुधार तो दिखेगा ही। लेकिन आपका मापदंड क्या है? आप किस आधार पर इसे सफल कह रहे हैं?”
आलोचकों का कहना है कि कई कंपनियां मियावाकी जंगलों का इस्तेमाल अपनी छवि सुधारने के साधन के रूप में करती हैं। राशिद का मानना है कि यह तरीका कई बार केवल दिखावे की हरियाली बन जाता है और सरकारों तथा कंपनियों को अपनी जिम्मेदारी से बचने का मौका देता है।
कई वैज्ञानिक, पारिस्थितिकी विशेषज्ञ और जमीन पर काम करने वाले लोग कहते हैं कि मियावाकी पद्धति में कई गंभीर समस्याएं हैं, जिन्हें इसकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण नजरअंदाज कर दिया गया है। उनका कहना है कि इसकी सफलता के प्रमाण कमजोर हैं, लागत बहुत ज्यादा है और इसके दावे काफी बड़े हैं।
प्रमाण हैं या नहीं?
राशिद ने कहा, “मियावाकी ने यह तरीका अपने इलाके में 30 से 40 साल के गहरे अध्ययन के बाद विकसित किया था। आप उसी तरीके को उठाकर किसी बिल्कुल अलग इलाके में नहीं लागू कर सकते।”
दिसंबर 2025 में जर्नल ऑफ एप्लाइड इकोलॉजी में “टाइनी फॉरेस्ट्स, ह्यूज क्लेम्स” शीर्षक से मियावाकी पद्धति की एक विस्तृत समीक्षा प्रकाशित हुई।
यह अध्ययन न्यूजीलैंड, चिली और जर्मनी के शोधकर्ताओं नार्किस एस. मोरालेस, इग्नासियो सी. फर्नांडीज, लियोनार्डो डुरान और डायलन क्रेवन के नेतृत्व में किया गया था।
शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में मियावाकी पद्धति पर प्रकाशित 51 दस्तावेजों का अध्ययन किया। इनमें शोध पत्र, परियोजना रिपोर्ट और अन्य सामग्री शामिल थी।
इनमें से केवल 41 प्रतिशत दस्तावेजों में ऐसा कोई आंकड़ा था जिसे मापा जा सके।
करीब एक-तिहाई अध्ययनों में ही मियावाकी जंगलों की तुलना किसी नियंत्रण क्षेत्र से की गई थी। नियंत्रण क्षेत्र वह जगह होती है जहां या तो कुछ नहीं किया गया हो या किसी दूसरी पद्धति से पौधारोपण किया गया हो।
15 प्रतिशत से भी कम अध्ययनों में एक ही प्रयोग को कई अलग-अलग स्थानों पर दोहराया गया था। इसलिए यह तय करना मुश्किल है कि जो परिणाम मिले, वे वास्तव में इस पद्धति के कारण थे या केवल संयोग थे।
अध्ययन का निष्कर्ष था कि मियावाकी पद्धति के पक्ष में दिए जाने वाले अधिकांश दावों के लिए उपलब्ध प्रमाण बहुत कमजोर हैं या लगभग नहीं के बराबर हैं।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सांता क्रूज़ में पर्यावरण अध्ययन की प्रोफेसर करेन डी. हॉल पिछले 30 वर्षों से पुनर्वनीकरण पर काम कर रही हैं।
उन्होंने कहा, “लोग बहुत बड़े दावे करते हैं, लेकिन मैं हमेशा थोड़ी संदेह में रही हूं क्योंकि इसमें पौधे बहुत घने लगाए जाते हैं। जब वह अध्ययन आया और उसमें कहा गया कि दावों के समर्थन में पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं, तो मुझे आश्चर्य नहीं हुआ।”
उसी 2025 के अध्ययन में पाया गया कि 51 में से 8 शोध पत्रों ने दावा किया था कि मियावाकी जंगल कार्बन संग्रहण बढ़ाते हैं।
लेकिन केवल दो अध्ययनों ने सीधे कार्बन भंडारण को मापा था और उनमें से किसी में भी अन्य पौधारोपण पद्धतियों की तुलना में कोई स्पष्ट लाभ नहीं मिला।
पारिस्थितिक जरूरतें और घासभूमि बनाम बंजर भूमि का सवाल
अक्सर खुले घास वाले क्षेत्रों को गलत तरीके से बंजर भूमि मान लिया जाता है और उन्हें मियावाकी परियोजनाओं में बदल दिया जाता है। जबकि घासभूमियां अपने आप में पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र होती हैं, जहां पक्षी, कीट और मिट्टी में रहने वाले अनेक जीव मौजूद रहते हैं।
बेंगलुरु स्थित एशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (एटीआरईई) में शोध कर रहे अनिर्बान रॉय ने दक्षिण भारत के मियावाकी जंगलों का अध्ययन किया है।

उन्होंने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “प्राकृतिक रूप से खुले क्षेत्रों में घने पेड़ लगाने से स्थानीय घास और झाड़ियों की विविधता कम हो सकती है। इससे उन जीवों को नुकसान पहुंच सकता है जो खुले इलाकों पर निर्भर हैं। यह जल चक्र को भी प्रभावित कर सकता है और कुछ मामलों में बदलती जलवायु के प्रति पारिस्थितिकी तंत्र की क्षमता को भी कमजोर कर सकता है।”
उसी अध्ययन के सह-लेखक इग्नासियो फर्नांडीज ने कहा कि यह पद्धति मूल रूप से ऐसे क्षेत्रों के लिए विकसित की गई थी जहां मुख्य समस्या प्रकाश की कमी होती है।
उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में पानी की कमी या तापमान मुख्य चुनौती है, जैसे भारत के बड़े हिस्से में, वहां यह तरीका शायद प्रभावी न हो।
2025 की समीक्षा का नेतृत्व करने वाली वन पारिस्थितिकी शोधकर्ता नार्किस मोरालेस ने कहा, “क्या हर बीमार व्यक्ति को एक जैसा इलाज चाहिए? शायद नहीं।”
मोरालेस ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा कि किसी भी जगह पर कोई तरीका अपनाने से पहले यह समझना जरूरी है कि उस स्थान की जरूरत क्या है और लक्ष्य क्या है। उसके बाद ही यह तय किया जाना चाहिए कि कौन सी पद्धति इस्तेमाल की जाए।
यही बात फजल राशिद और सोमिल डागा ने द वायर साइंस में भी लिखी थी। उन्होंने कहा कि भारत में काम करने वाले कई लोग “पारिस्थितिक जरूरतों” को नजरअंदाज कर देते हैं। इसमें मिट्टी का प्रकार, पानी की निकासी और मिट्टी की लवणता जैसी बातें शामिल हैं, जो यह तय करती हैं कि कोई पेड़ जीवित रहेगा या नहीं।
राशिद ने जयपुर के पास तीन साल पुराने एक मियावाकी स्थल का दौरा किया था। वहां नमी पसंद करने वाले पेड़, जैसे बबूल और मोरिंगा, ऊपर की परत में फैल गए थे।
उनका दावा है कि इसी कारण चट्टानी और खुले इलाकों में उगने वाली कई प्रजातियां नीचे छाया में मर रही थीं।
करेन हॉल ने कहा कि घासभूमियों और झाड़ीदार इलाकों में पेड़ लगाना दुनिया भर में उनकी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है।
उन्होंने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “कई घासभूमियां जैव विविधता से भरपूर होती हैं। वे मिट्टी में काफी मात्रा में कार्बन भी संचित करती हैं। अगर आप ऐसे सूखे इलाकों में पेड़ लगाते हैं जो बहुत अधिक पानी छोड़ते हैं, तो इससे उपलब्ध जल की मात्रा भी कम हो सकती है।”
इंदौर की स्टार्टअप इंडिया में पंजीकृत कंपनी ग्रीन हेवन क्रिएशंस के संस्थापक मनवीर सिंह खनूजा मियावाकी जंगल विकसित करने का काम करते हैं।
उन्होंने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “इंदौर में कई जगहों पर सड़क के दोनों ओर गुलमोहर के पेड़ लगे हैं। वे एक हरे अवरोध की तरह काम करते हैं और तापमान में थोड़ा फर्क ला सकते हैं। लेकिन वे नमी या जैव विविधता पैदा नहीं कर सकते।”
स्थानीय प्रजातियों की उपलब्धता
फजल राशिद ने तीन से चार वर्षों तक देशभर की मियावाकी परियोजनाओं को स्थानीय पौधे उपलब्ध कराए।
उन्होंने कहा, “वास्तव में स्थानीय प्रजातियों के पौधों की उपलब्धता बहुत कम है। बहुत कम लोग इन्हें तैयार करते हैं। बड़ी संख्या में सही पौधे मिलना बेहद मुश्किल है। इसलिए कई लोग नर्सरी में जो उपलब्ध होता है, उसी को अपनी सूची के अनुसार फिट कर लेते हैं।”

वहीं, खो चुके स्थानीय जंगलों को वापस लाने के लिए काम करने वाली संस्था अफॉरेस्ट के संस्थापक शुभेंदु शर्मा इस पद्धति की आलोचनाओं को खारिज करते हैं।
शर्मा पहले एक औद्योगिक इंजीनियर थे। उन्होंने 2008 में बेंगलुरु में अकीरा मियावाकी का व्याख्यान सुना था।
हालांकि वे मानते हैं कि किसी क्षेत्र की सही स्थानीय प्रजातियों की पहचान करना एक कठिन काम है, लेकिन उन्होंने गुड फूड मूवमेंट से कहा, “कई लोग कहते हैं कि वे मियावाकी पद्धति अपनाते हैं, लेकिन वे इसे गंभीरता से नहीं लेते और पास की किसी नर्सरी से पौधे खरीद लेते हैं। सही प्रजातियों और उनके सही मिश्रण की पहचान करना ही इस पद्धति की सबसे महत्वपूर्ण बात है।”
अफॉरेस्ट की वेबसाइट के अनुसार, संस्था ने एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका में जंगल विकसित किए हैं। राजस्थान के शुष्क इलाकों से लेकर नीदरलैंड के शहरी क्षेत्रों तक इसके प्रोजेक्ट मौजूद हैं।
एक पुराने इंटरव्यू में शर्मा ने कहा था कि अफॉरेस्ट ने दुनिया के 50 शहरों में 150 जंगलों के माध्यम से लगभग 5 लाख पेड़ लगाए हैं।
वेबसाइट के अनुसार उन्होंने वर्ष 2010 में उत्तराखंड में अपना पहला जंगल भी तैयार किया था।
आलोचनाओं के बावजूद बढ़ता समर्थन
दिल्ली में पहले से मौजूद कई मियावाकी जंगलों को लेकर आलोचनाएं हुई हैं। इनमें स्थानीय प्रजातियों की जगह दूसरी प्रजातियां लगाने और स्थानीय पारिस्थितिकी को बहाल न कर पाने जैसे सवाल उठे हैं।
इसके बावजूद इस पद्धति को सरकारी समर्थन मिलता जा रहा है।
नगर निगम ने 2025-26 में पांच नए मियावाकी जंगलों के लिए बजट रखा है। वहीं दिल्ली सरकार नजफगढ़ के पास दो और परियोजनाएं शुरू करने की योजना बना रही है।
मोरालेस ने कहा, “बड़े स्तर पर सार्वजनिक धन खर्च करने से पहले यह देखना चाहिए कि क्या इस पद्धति के सिद्ध लाभ इसकी अधिक लागत को सही ठहराते हैं।”
आलोचनाओं के बावजूद भारत में हरित क्षेत्र बढ़ाने की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।
भारत ने अपने अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) में वर्ष 2035 तक वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 3.5 से 4 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन भंडार बनाने का लक्ष्य रखा है।
इसी कारण शहरी जंगलों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) प्रति व्यक्ति कम से कम 9 वर्ग मीटर हरित क्षेत्र की सिफारिश करता है। लेकिन भारत के अधिकांश शहर इस मानक से काफी पीछे हैं।
इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023 के अनुसार, देश के छह बड़े महानगरों में दिल्ली में सबसे अधिक 194 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। इसके बाद मुंबई में 110 वर्ग किलोमीटर और बेंगलुरु में 89 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है।
मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर में हरित क्षेत्र केवल 9.3 प्रतिशत है। यह शहरी क्षेत्रों के लिए तय 12 से 18 प्रतिशत के राष्ट्रीय मानक से काफी कम है।
राजधानी भोपाल में जिले के कुल क्षेत्रफल का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
उज्जैन में यह आंकड़ा केवल 0.59 प्रतिशत है।
मध्य प्रदेश देश में सबसे अधिक वन क्षेत्र वाला राज्य है, लेकिन उसके शहर हरित क्षेत्र के मामले में पीछे हैं।
फजल राशिद का कहना है कि केवल पौधे लगाने से काम नहीं चलेगा।
उन्होंने कहा, “इसके बजाय हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रकृति को फिर से जीवित करने का मतलब स्थानीय लोगों का अपनी स्थानीय पारिस्थितिकी से दोबारा जुड़ना है। यह लोगों और जमीन के बीच रिश्ते को धीरे-धीरे फिर से बनाने की प्रक्रिया है।”
एलेक्स मुंडापुझा मियावाकी पद्धति पर होने वाली आलोचनाओं को समझते हैं। इसके बावजूद वे इंदौर में किए गए अपने काम को लेकर आश्वस्त हैं।
उनका कहना है कि पेड़ अच्छी तरह बढ़ रहे हैं और हाल ही में वहां एक सियार ने भी अपना ठिकाना बना लिया है। कुछ लोग इसे इस परियोजना की वास्तविक उपलब्धि मान सकते हैं।
भारत के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के लिए, जो जलवायु संकट की चुनौतियों का सामना कर रहा है, यह उपलब्धि काफी महत्वपूर्ण हो सकती है।
जब उनसे पूछा गया कि ऐसी परियोजनाओं को बड़े स्तर पर सफल बनाने के लिए सरकार को क्या चाहिए, तो मुंडापुझा ने कहा, “समर्पित लोग। उनके बिना सफलता की संभावना कम होगी।”

अनिर्बान रॉय का कहना है कि भारत के अधिकांश मियावाकी जंगल अभी बहुत नए और बहुत छोटे हैं। इसलिए उनके प्रभाव को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
उन्होंने कहा, “छोटे जंगलों पर बाहरी प्रभाव ज्यादा पड़ते हैं और उनका आसपास के प्राकृतिक क्षेत्रों से जुड़ाव भी सीमित होता है। भारत में मौजूद अधिकांश मियावाकी जंगल अभी अपने शुरुआती चरण में हैं। इसलिए उनके बारे में कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।”
इसी अध्ययन के सह-लेखक इग्नासियो फर्नांडीज ने कहा, “हम मियावाकी पद्धति के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन हमें चिंता इस बात की है कि एक खास परिस्थितियों के लिए विकसित की गई पद्धति को हर जगह लागू किया जा रहा है।”
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