करीब 2003 की बात है। मनीष दांगी की शादी हो रही थी। उन्हें आज भी बैंड-बाजा, नए कपड़े, शादी का उत्साह और लोगों का ध्यान अपने ऊपर होना याद है।
मनीष कहते हैं, “उस समय तो सब अच्छा लगता था। सातवीं या आठवीं में पढ़ने वाला बच्चा आखिर समझता ही क्या है?”
तब मनीष की उम्र 14 साल थी। शादी के बाद जब वह स्कूल जाते, तो उनके साथी एक लड़की की ओर इशारा करके कहते कि यह उनकी पत्नी है। उस समय उन्हें इसका मतलब ठीक से समझ नहीं आता था। लेकिन उन्हें इतना जरूर महसूस होने लगा था कि उनकी जिंदगी पर कुछ बंधन लग गए हैं।
वह कहते हैं, “मुझे सच में नहीं पता कि मेरी सगाई कब हुई थी। परिवार ने जैसा ठीक समझा, वैसा कर दिया।”
राजगढ़ और डांगी समाज में उस समय यह बिल्कुल सामान्य बात थी।

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के साथ 1990 के दशक की शुरुआत में राजगढ़ में काम कर चुकीं राजेश्वरी चंद्रशेखर बताती हैं कि जिले में कुछ खास जातियों में बाल विवाह सबसे ज्यादा होते थे। इनमें चमार, डांगी, सोंधवाड़ी, धाकड़ और लोधा समुदाय शामिल थे।
राजस्थान की सीमा से लगे राजगढ़ जिले में लंबे समय से बाल विवाह की परंपरा चली आ रही है। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण इलाकों में, जहां खेती स्थिर नहीं है, शिक्षा सभी तक नहीं पहुंच पाती और रोजी-रोटी के लिए पलायन आम बात है। ऐसे माहौल में बाल विवाह की प्रथा मजबूत बनी रही। मनीष के अपने भाई-बहनों की भी कम उम्र में शादी हुई थी।
जिन लड़कियों ने कभी स्कूल नहीं देखा, उनमें लगभग 48 प्रतिशत की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो गई। वहीं, उच्च शिक्षा पाने वाली लड़कियों में यह आंकड़ा केवल 4 प्रतिशत था।
इसी तरह गरीब परिवारों में भी बाल विवाह ज्यादा देखने को मिला। सबसे गरीब परिवारों की लगभग 40 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हो गई, जबकि सबसे संपन्न परिवारों में यह आंकड़ा सिर्फ 8 प्रतिशत था।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यहां बाल विवाह सिर्फ परंपरा की वजह से नहीं होता। इसके पीछे कई और कारण भी हैं। परिवारों को डर रहता है कि कहीं लड़की किसी के साथ भाग न जाए। दहेज का हिसाब-किताब भी एक वजह बनता है। कई परिवार खर्च बचाने के लिए एक साथ कई भाई-बहनों की शादी कर देते हैं। इसके अलावा ‘झगड़ा’ नाम की एक स्थानीय प्रथा भी बाल विवाह को बढ़ावा देती है।
‘झगड़ा’ प्रथा में अगर कोई परिवार सगाई या बाल विवाह का रिश्ता तोड़ना चाहता है, तो दूसरे पक्ष की ओर से बड़ी रकम की मांग की जा सकती है। कई बार सामाजिक बहिष्कार, हिंसा या समुदाय की ओर से सजा जैसी स्थिति भी बन जाती है। परिवारों को हजारों से लेकर लाखों रुपये तक देने पड़ सकते हैं। अगर वे पैसे देने से इनकार करें, तो पूरे गांव की ओर से उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा सकता है। कई मामलों में उनकी फसल या संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाया जाता है।
स्थानीय अखबारों में ‘झगड़ा’ से जुड़ी खबरें अक्सर छपती रहती हैं। यह कहना जरूरी है कि ये सभी प्रथाएं कानून के खिलाफ हैं। फिर भी समाज में कई जगह इन्हें स्वीकार किया जाता है।
राजेश्वरी चंद्रशेखर बताती हैं कि कई महिलाएं उनके पास आती थीं और कहती थीं कि समाज में उनकी हैसियत जूते जैसी है। जरूरत पड़ी तो पहन लिया और जरूरत खत्म हुई तो बदल दिया। महिलाओं के प्रति यही सोच बाल विवाह, नात्रा, झगड़ा जैसी प्रथाओं को बढ़ावा देती है।
चंद्रशेखर के समय से लेकर अब तक बहुत कुछ बदला है। उन्होंने नाइयों, पुजारियों और शादी कराने वाले लोगों को भी समझाया कि वे बाल विवाह का हिस्सा न बनें।
पूरे भारत में बाल विवाह के मामलों में कमी आई है, लेकिन मध्य प्रदेश अब भी उन राज्यों में शामिल है जहां यह समस्या बड़ी संख्या में मौजूद है। एनएफएचएस-5 (2019-21) के अनुसार, राज्य में 20 से 24 वर्ष की लगभग 23 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो चुकी थी।
मध्य प्रदेश विधानसभा में 2020 से 2025 के बीच पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, बाल विवाह रोकने के लिए किए गए हस्तक्षेपों की संख्या लगातार बढ़ी है। 2020 में ऐसे 366 मामले दर्ज हुए थे, जो 2025 में बढ़कर 538 हो गए।
दमोह, राजगढ़, सागर, गुना और शिवपुरी ऐसे जिले हैं जहां सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए। इनमें दमोह सबसे आगे रहा, जहां सिर्फ 2025 में ही 115 बाल विवाह रोके गए। दूसरी ओर भोपाल, खंडवा, बुरहानपुर और आगर मालवा जैसे जिलों में ऐसे मामलों की संख्या बहुत कम या लगभग शून्य रही।
हालांकि ये आंकड़े बाल विवाह के सामने आए मामलों को दिखाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। उनका मानना है कि समाज में स्थायी बदलाव लाने के लिए समुदायों के साथ लगातार काम करने की जरूरत है।
अरुण का सफर
जब मनीष दांगी की शादी हुई लगभग उसी समय अरुण साटलकर इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) से विज्ञापन और जनसंपर्क प्रबंधन में परास्नातक करने के बाद राजगढ़ लौटे थे।
अरुण बताते हैं कि बाजार लगने वाले दिनों में छोटे-छोटे बच्चों को दूल्हा-दुल्हन के कपड़ों में बाजार में घूमते देखना आम बात थी। लड़के साफा खरीदते दिखते थे और लड़कियां अपने परिवार के साथ शादी की खरीदारी करती थीं। यानी बाल विवाह किसी छिपी हुई बात की तरह नहीं था, बल्कि खुलेआम होता था।

फिर आती थी अक्षय तृतीया। यह हिंदू धर्म का एक शुभ पर्व है। फसल कटने के बाद का समय होने की वजह से इसी दौरान बड़ी संख्या में शादियां भी होती थीं। ऐसे समय में बाल विवाह के मामले भी बढ़ जाते थे।
शुरुआत में अरुण ने एक स्थानीय संस्था के साथ शिक्षा के क्षेत्र में काम किया। बाद में उन्होंने छतरपुर जिले के बक्सवाहा के जंगलों में यूनिसेफ के सलाहकार के रूप में आदिवासी बच्चों की शिक्षा और पोषण पर काम किया। इस अनुभव ने उन्हें बच्चों से जुड़े मुद्दों को और गहराई से समझने का मौका दिया।
साल 2006 में उन्होंने अहिंसा वेलफेयर सोसायटी का पंजीकरण कराया।
शुरुआत में संस्था का मुख्य काम स्कूलों में शिक्षा की स्थिति बेहतर करना था। लेकिन 2010 तक कई सालों के जमीनी अनुभव के बाद अरुण को महसूस हुआ कि राजगढ़ के बच्चे सिर्फ शिक्षा से ही वंचित नहीं हो रहे हैं, बल्कि उनका बचपन भी उनसे छिन रहा है।
अरुण कहते हैं, “हमने शुरुआत दस स्कूलों से की थी। लेकिन बाद में समझ आया कि हमें सीधे बच्चों के अधिकारों पर काम करना होगा।”
दूसरी ओर, शादी के बाद भी मनीष दांगी ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। उन्होंने दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी की और बाद में इंदौर से स्नातक किया।
धीरे-धीरे उन्हें समझ आने लगा कि बचपन में हुई शादी का असली मतलब क्या था। वह कहते हैं, “धीरे-धीरे समझ आया कि यह पति-पत्नी का रिश्ता है।” इस एहसास के साथ उन्हें असहजता और पछतावा भी होने लगा।
वह कहते हैं, “लोग पहले पढ़ाई करते हैं, फिर शादी करते हैं। लेकिन हमारी पहले शादी हुई और बाद में पढ़ाई।”
करीब 2011 में उनकी भतीजी से जुड़ा एक मामला उनकी जिंदगी का अहम मोड़ बना। उनकी भतीजी पढ़ना चाहती थी। लेकिन बचपन में तय हुई सगाई टूटने के बाद परिवार को ‘झगड़ा’ प्रथा के तहत करीब सात लाख रुपये देने पड़े। यही वह घटना थी, जिसके बाद मनीष ने तय किया कि वह समाज में फैली ऐसी कुरीतियों के खिलाफ काम करेंगे।
करीब 2012 में वह अहिंसा वेलफेयर सोसायटी के साथ बाल विवाह रोकने के अभियान से जुड़ गए।
जमीनी स्तर पर हस्तक्षेप
अहिंसा वेलफेयर सोसायटी के करीब 20 सदस्य और लगभग 400 गांवों में स्वयंसेवकों का नेटवर्क है।
इन स्वयंसेवकों का काम अपने-अपने गांव में होने वाली शादियों और उनकी तैयारियों पर नजर रखना है। अगर कहीं बाल विवाह की संभावना दिखाई देती है, तो सबसे पहले परिवार से बातचीत की जाती है। कोशिश यही रहती है कि शादी टाल दी जाए और बच्चों की पढ़ाई जारी रहे।

अगर समझाने से बात नहीं बनती, तो मनीष दांगी और उनकी टीम पुलिस, महिला एवं बाल विकास विभाग, पंचायत प्रतिनिधियों और जिला प्रशासन के साथ मिलकर कार्रवाई करती है। वे गांवों में जाकर परिवारों से बात करते हैं, बच्चों की उम्र की जांच करते हैं और जरूरत पड़ने पर बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम और दूसरे संबंधित कानूनों के तहत एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया भी शुरू कराते हैं।
गांवों में नियमित रूप से चौपाल लगाई जाती है, जहां लोगों को बाल विवाह के नुकसान के बारे में बताया जाता है।
साल 2024 में शुरू किए गए बाल विवाह मुक्त भारत (BVMB) अभियान का लक्ष्य 2030 तक देश को बाल विवाह से मुक्त बनाना है। इसके तहत 2026 तक बाल विवाह के मामलों में 10 प्रतिशत कमी लाने का अंतरिम लक्ष्य रखा गया है।
इस अभियान में राष्ट्रीय पोर्टल के जरिए तुरंत सूचना देने की व्यवस्था, जिला स्तर की टास्क फोर्स और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं के साथ मिलकर काम किया जा रहा है।
इसके तहत 100 दिनों का देशव्यापी अभियान भी चलाया गया, जिसमें स्कूलों, पंचायतों और बाल विवाह से ज्यादा प्रभावित जिलों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए।
इस अभियान में प्रोत्साहन की व्यवस्था भी है। जिन गांवों में बाल विवाह नहीं होते, उन्हें बाल विवाह मुक्त गांव का प्रमाणपत्र दिया जाता है। बेहतर काम करने वाले जिलों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जाता है।
मध्य प्रदेश विधानसभा में दिए गए एक जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने सरकार के प्रयासों का जिक्र किया।
उन्होंने बताया कि बाल विवाह रोकने के लिए बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों की नियुक्ति, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत जागरूकता कार्यक्रम, रैलियां, नुक्कड़ नाटक और अक्षय तृतीया व देवउठनी एकादशी जैसे अवसरों पर विशेष निगरानी दल और कंट्रोल रूम बनाए गए। उनके अनुसार इन प्रयासों से बाल विवाह रोकने में मदद मिली है।
हालांकि कई सरकारी और सामाजिक प्रयासों से बदलाव देखने को मिला है, फिर भी ग्रामीण भारत में बाल विवाह आज भी ज्यादा होता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों में भी इसकी संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। पश्चिम बंगाल, बिहार, त्रिपुरा, झारखंड, असम और राजस्थान जैसे राज्यों में बाल विवाह की दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा दर्ज की गई है।
कई शोधकर्ताओं का मानना है कि लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना और आर्थिक असमानता कम करना बाल विवाह रोकने के सबसे प्रभावी उपायों में से हैं।
सालों के काम के दौरान अहिंसा वेलफेयर सोसायटी ने स्वयंसेवकों, प्रशासन, गांवों में सूचना देने वाले लोगों और पुलिस के साथ एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया है। खासकर अक्षय तृतीया और सामूहिक विवाह के मौसम में टीम संभावित बाल विवाह की जानकारी जुटाती है, बच्चों की उम्र की पुष्टि करती है और समय रहते प्रशासन को सूचना देती है, ताकि शादी रोकी जा सके। मनीष दांगी का कहना है कि स्थानीय प्रशासन और पुलिस का साथ मिलना इस काम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी श्याम बाबू खरे बताते हैं कि जिले में बाल विवाह रोकने के लिए कई स्तरों पर व्यवस्था बनाई गई है। संभावित बाल विवाह की सूचना देने के लिए 24 घंटे चलने वाला कंट्रोल रूम बनाया गया है। उपखंड मजिस्ट्रेट की निगरानी में जिला स्तरीय रोकथाम दल काम करता है। जिन शादियों में बाल विवाह की आशंका होती है, उन्हें रोकने के लिए अदालत से आदेश भी लिए जाते हैं। हर साल पुजारियों, टेंट संचालकों, बैंड वालों, केटरिंग से जुड़े लोगों और समाज के वरिष्ठ लोगों की बैठक आयोजित की जाती है, जहां वे बाल विवाह में शामिल न होने की शपथ लेते हैं।
खरे कहते हैं, “हम अदालत से भी रोक संबंधी आदेश लेते हैं। पुजारी, टेंट हाउस, बैंड वालों सभी को कानूनी नोटिस दिया जाता है कि अगर वे बाल विवाह में शामिल हुए तो उनके खिलाफ बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी।”

अब जिले में सामूहिक विवाह कार्यक्रमों की अनुमति देने से पहले लड़का और लड़की दोनों की उम्र के दस्तावेज भी जांचे जाते हैं।
खरे बताते हैं, “अब कई बार लड़के या लड़कियां खुद हमारे पास आकर कहते हैं, ‘सर, घर वाले हमारी बात नहीं मान रहे। हमारी शादी कराना चाहते हैं।’ कई बार 12वीं में पढ़ने वाली लड़कियां आकर कहती हैं, ‘मैं आगे पढ़ना चाहती हूं।'”
क्या बदला है
मनीष दांगी मुस्कुराते हुए कहते हैं, “अब लोगों ने हमें शादी और दूसरे पारिवारिक कार्यक्रमों में बुलाना ही बंद कर दिया है।” उन्हें लगता है कि अगर मनीष किसी शादी में पहुंच गए, तो वहां सवाल उठेंगे और बाल विवाह की जांच शुरू हो जाएगी।
सिर्फ इतना ही नहीं, समाज में चली आ रही परंपराओं के खिलाफ खड़े होने की अपनी कीमत भी चुकानी पड़ती है। कई बार उन्हें गालियां सुननी पड़ती हैं, रास्ते रोक दिए जाते हैं, डराया-धमकाया जाता है और यहां तक कि हमला करने की चेतावनी भी दी जाती है।
फिर भी अरुण साटलकर कहते हैं, “अब हालात पहले से बेहतर हुए हैं।”
वह बताते हैं कि पहले 9 से 12 साल की उम्र के बच्चों की शादियां आम थीं। अब ज्यादातर मामले 14 से 17 साल के किशोर-किशोरियों से जुड़े होते हैं। उनके अनुसार यह बदलाव की एक शुरुआत है।

मनीष दांगी भी इसे इसी तरह देखते हैं। उनका कहना है कि अगर परिवारों को कुछ और साल तक बच्चों को स्कूल में पढ़ने के लिए तैयार किया जा सके, तो बच्चे पढ़-लिख जाएंगे और फिर कानूनी उम्र पूरी होने के बाद शादी कर सकेंगे।
देशभर में भी लड़कियों की शादी की औसत उम्र पहले की तुलना में बढ़ी है। महिलाओं की शादी की औसत उम्र 17.2 साल से बढ़कर 19.2 साल हो गई है।
समुदाय के बीच कई वर्षों तक लगातार काम करने के बाद आज मनीष डांगी राजगढ़ में बाल विवाह के खिलाफ चल रहे अभियान का एक प्रमुख चेहरा बन चुके हैं। लोग उन्हें इसी पहचान से जानते हैं। उनका काम सिर्फ बाल विवाह रोकने तक सीमित नहीं है। बच्चों के अधिकारों से जुड़े दूसरे मुद्दों पर भी वह युवाओं के साथ काम करते हैं। उनकी बातचीत में व्यक्तिगत अधिकारों, प्रगतिशील सोच और समाज में बदलाव लाने की बात प्रमुख रहती है।
उनका कार्यालय शहर के बीचोंबीच स्थित एक छोटे से शासकीय कॉलेज परिसर में है। कमरे की दीवारों पर बच्चों के अधिकारों से जुड़े पोस्टर लगे हैं।
आज मनीष दांगी की उम्र 36 वर्ष है। बचपन में जिस शादी की व्यवस्था उनके परिवार ने की थी, उसी वैवाहिक रिश्ते में वह आज भी हैं। इस बारे में वह बहुत संक्षेप में बात करते हैं।
वह कहते हैं, “मैं वैवाहिक रिश्ते को ज्यादा महत्व नहीं देता।”
उनका एक बच्चा है। उन्होंने शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रखी और समाज कार्य तथा कानून की डिग्री हासिल की। दूसरी ओर उनकी पत्नी कभी औपचारिक शिक्षा नहीं ले सकीं।
आज मनीष का अधिकांश समय अहिंसा वेलफेयर सोसायटी के साथ राजगढ़ में बाल विवाह रोकने के काम में बीतता है।
अरुण साटलकर शांत आवाज में कहते हैं, “सबसे बड़ी खुशी इसी बात से मिलती है कि हमारी वजह से किसी की जिंदगी बेहतर हो जाती है।”
नोट
यह रिपोर्ट तीन भागों की एक श्रृंखला का हिस्सा है। इस श्रृंखला में राजगढ़ और मध्य प्रदेश के संदर्भ में बाल विवाह, जलवायु परिवर्तन और कुपोषण के बीच के संबंधों को समझने की कोशिश की गई है।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
केन-बेतवा लिंक: चिता आंदोलन के साथ अमित भटनागर का आमरण अनशन
किन कारणों से गायब हो रही है खेजड़ी पर लगने वाली सांगरी?
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।





