खरगोन से लगभग 21 किमी दूर कुंदा नदी के अपर स्ट्रीम के किनारे बसे बड़ी खुर्द गांव के रहने वाले मोहनलाल जांगड़े (60) जल विद्युत परियोजना के अधूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को देख रहे हैं। घाटी के नीचे एक 500 फीट लंबा आर्च डैम बना हुआ है। इसके सामने एक विशालकाय टरबाइन खड़ी है। अधोसंरचना का कुछ हिस्सा टूट चुका है, मगर टरबाइन अब भी सुरक्षित है।
100 किलोवाट (1×0.10 मेगावाट) की यह परियोजना खुद जांगड़े ने स्थापित की है। इसका उद्देश्य आस-पास के गांवों को बिजली और गर्मियों में पानी उपलब्ध करवाना था। बकौल जांगड़े किसान इस बांध से अपनी सुविधानुसार पानी तो ले रहे हैं मगर बिजली का उत्पादन आज तक नहीं हुआ।
दरअसल जांगड़े ने खुद की प्रेरणा से इस परियोजना की पहल 2009 में की थी। तब केंद्र सरकार की योजना के अंतर्गत उन्होंने इसके लिए आवेदन भी किया। योजना के अनुसार केवल 20% लागत जांगड़े की कंपनी द्वारा लगाई जानी थी। मगर कागज़ी मंज़ूरी में देरी और बाद में योजना ख़त्म हो जाने के कारण उन्हें आज तक इस योजना का अनुदान नहीं मिल सका। अब वो सरकार से दरख्वास्त कर रहे हैं कि उन्हें योजना के अनुसार अनुदान दे दिया जाए ताकि वह बिजली उत्पादन कर सकें।
कैसे शुरू किया निर्माण?
जांगड़े बताते हैं कि 2009 में जब अपने पिता की मौत के बाद मुंडन संस्कार के लिए वो कुंदा नदी के किनारे आए तो उस वक्त नदी के अधिकांश हिस्से में पानी नहीं था। स्थानीय किसानों ने उन्हें बताया कि मार्च के शुरूआती हफ़्तों में ही नदी सूख जाती है। इस दौरान गांव में बिजली भी 4 से 5 घंटे के लिए ही आती थी। ऐसे में घाटी चढ़कर पानी लाना ग्रामीणों की मजबूरी थी।
सिविल ठेकेदार के रूप में निर्माण कार्य से जुड़े जांगड़े को लगा की छोटा बांध बनाकर उससे बिजली उत्पादन किया जा सकता है। इससे उपर्युक्त दोनों समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
दिसंबर 2009 में ही केंद्र सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा 25 मेगावाट तक की क्षमता की जलविद्युत् परियोजनाओं के लिए स्माल हाइड्रो पॉवर प्रोग्राम (SHP) शुरू किया गया।

इसका मकसद राज्य सरकार की संस्थाओं और इंडिपेंडेंट प्राइवेट प्रोड्यूसर्स (IPPs) को नए छोटे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स लगाने के लिए बढ़ावा देना था। सरकार ऐसा इसलिए करना चाहती थी ताकि धीरे-धीरे देश की पूरी हाइडल उत्पादन क्षमता 21000 मेगावाट का इस्तेमाल किया जा सके।
योजना के तहत 100 किलोवाट तक की क्षमता वाले माइक्रो हाइडल प्रोजेक्ट को 40,000 रूपए प्रति किलोवाट की केंद्रीय वित्तीय सहायता दी जानी थी। हालांकि परियोजना के कुल खर्च का न्यूनतम 20% खर्च जांगड़े जैसे प्रोजेक्ट के मालिक को करना था।
जांगड़े जब बांध निर्माण की सोच रहे थे तब उन्हें इस नीति के बारे में नहीं पता था। डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) बनवाने के लिए स्थानीय अधिकारियों से संपर्क करने पर उन्हें बताया गया कि केंद्र सरकार की नीति के तहत उन्हें लगभग 40 लाख का अनुदान मिल सकता है।
प्रस्ताव की स्वीकृति और नीतिगत बदलाव
साल 2011 में जांगड़े द्वारा परियोजना के लिए प्रस्ताव बनाकर केंद्र सरकार को भेजा गया। तब प्रोजेक्ट की कीमत 60.87 लाख रु आंकी गई थी। इसमें 40 लाख रु का सहयोग केंद्र से आपेक्षित था। इसकी स्वीकृति के लिए तत्कालीन स्थानीय विधायक जमना सिंह सोलंकी ने भी अनुशंसा की।
केंद्र का एसएचपी प्रोग्राम 31 मार्च 2012 तक के लिए ही मान्य था। ग्राउंड रिपोर्ट को मिले दस्तावेज़ों के अनुसार जांगड़े को फरवरी 2013 में परियोजना की स्वीकृति मिली। यह स्वीकृति 2011 की मध्य प्रदेश में छोटे हाइडल-पावर आधारित बिजली प्रोजेक्ट्स को लागू करने की नीति के तहत मिली।
2009 की ही तरह केंद्र सरकार ने एक बार फिर 2 जुलाई 2014 को एसएचपी प्रोग्राम लॉन्च किया। इसके एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया के अनुसार जिन प्रोजेक्ट्स में कंस्ट्रक्शन का काम 31 मार्च, 2013 को या उससे पहले शुरू हो गया था, उनके लिए वित्तीय मदद की रकम 2009 के प्रोग्राम के हिसाब से ही तय की जानी थी।
यानि इस प्रोग्राम के तहत भी जांगड़े को लगभग 40 लाख रूपए का सहयोग मिल सकता था।

नए प्रोग्राम के बाद भी क्यों अटका फंड?
मगर परियोजना की स्वीकृति मिलने के बाद भी जांगड़े बिजली बनाकर किसे बेचेंगे इसका जवाब उनके पास नहीं था। उनके पास कोई भी पावर पर्चेज एग्रीमेंट (PPA) नहीं था।
जबकि नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग मप्र के उपयुक्त मृदुल खरे ने अपने 27 जून 2016 को लिखे अपने एक पत्र में स्पष्ट किया कि आवेदक का मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड (MPPKVVCL) के साथ पीपीए होना अनिवार्य है।
इसका जवाब देते हुए जांगड़े ने बताया कि उत्पादित बिजली पहले आस-पास के गांवों और आटा मिलों को दी जाएगी। इसके बाद सरप्लस बिजली भगवानपुरा ग्रिड से 33 हजार वोल्ट पर MPPKVVCL को सप्लाई दी जायेगी।
जांगड़े द्वारा राज्य सरकार को लिखे पत्र में MPPKVVCL इन्दौर से पीपीए साइन करने की तैयारी भर का ज़िक्र किया गया है।
मगर स्वीकृति मिलने के बाद भी उन्हें यह हासिल करने में 4 साल लग गए।
21 मार्च 2017 को मप्र पॉवर मैनेजमेंट कंपनी के साथ जांगड़े ने पीपीए साइन किया। 22 मार्च को उन्होंने इसे बाय पोस्ट केंद्र सरकार के सम्बंधित कार्यालय में भेज भी दिया। मगर 31 मार्च 2017 को केंद्र का एसएचपी प्रोग्राम ख़त्म हो गया।
जांगड़े ने जब केंद्र के अधिकारियों से संपर्क किया तो उनका जवाब था कि चूंकि तत्कालीन समय में कोई नीति नहीं है अतः उन्हें केन्द्रीय वित्तीय सहायता नहीं दी जा सकती। जांगड़े कहते हैं,
“केंद्र सरकार ने हमको कहा कि नई नीति हम जब बनाएंगे, उस समय आपको शामिल करेंगे। अब वह नई नीति बनी नहीं है (जबकि) आज आठ-नौ साल हो गए हैं। हम नई नीति बनने का इंतजार करते रहे और वह आज तक नीति नहीं बनने के कारण जो काम है इसी जगह पेंडिंग पड़ा हुआ है।”
हालांकि 2017 के बाद से अब तक जांगड़े जिला स्तर से लेकर राज्य और केंद्र सरकार को कई पत्र लिख चुके हैं।

अभी क्या कर रहे हैं?
2023 तक जांगड़े 4 मीटर ऊंचे और लगभग 650 फीट चौड़े बांध का निर्माण कर चुके थे। उनके अनुसार वह इसमें लगभग 5 करोड़ रु खर्च कर चुके हैं। वह कहते हैं कि अब अप्रैल में भी नदी नहीं सूखती। हालांकि हम उनसे पहली बार फरवरी में मिले थे। तब नदी के कई किसान बांध से पानी लेते हुए और कुछ मछली पकड़ते हुए दिखाई दिए। इनमें एक व्यक्ति ने कहा कि बांध बनने के बाद अप्रैल के मध्य तक पानी रहने लगा है हालांकि मई में अब भी किल्लत होती है।
जांगड़े का एक उद्देश्य पूरा हो चुका है। मगर दूसरे उद्देश्य (बिजली उत्पादन) की पूर्ति के लिए वो चाहते हैं कि अगर उन्हें बांध बनाने का पैसा भी मिल जाए तो वह इसे कर सकते हैं।
4 अप्रैल 2023 को खरगोन कलेक्टर के समक्ष जन सुनवाई में बांध निर्माण का भुगतान करने का आग्रह किया। जांगड़े चाहते हैं कि उन्हें यह भुगतान जल संसाधन विभाग द्वारा दिया जाए। वह तर्क देते हैं कि गर्मी के दिनों में जल स्तर नीचे चले जाने के कारण बांध बनाने के लिए 3 पंचायतों की अनुशंसा समेत ग्रामसभा का ठहराव प्रस्ताव भी उनके पक्ष में दिया गया था। इसके लिए उन्होंने कलेक्टर से दोबारा पत्राचार भी किया।
इस संबंध में हमने जल संसाधन विभाग,खरगोन में कार्यपालन यंत्री नीलम मेडा से बात की। उन्होंने कहा, “इस परियोजना के लिए एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) बस हमारे विभाग द्वारा जारी किया गया है। प्रोजेक्ट हमारे विभाग का नहीं है इसलिए फंड देने का सवाल ही नहीं है।” उन्होंने बताया कि बांध का निर्माण विभाग ही करवाता है। चेक डैम के लिए पंचायत स्तर पर योजना है मगर इस तरह बिजली उत्पादन के लिए बनाए गए बांध के लिए उनके विभाग की कोई योजना नहीं है।
वहीं कुछ दिनों पहले ही खरगोन की प्रभारी कलेक्टर बनीं रेखा राठौर ने हमसे बात करते हुए कहा, “आप इस मामले की जानकारी मुझे भेजवा दीजिए मैं इस मामले को दिखवाती हूं।” हमने प्रोजेक्ट और संबंधित व्यक्ति की जानकारी उन्हें मैसेज के ज़रिए भेजी है।
भारत में फरवरी 2026 तक स्माल हाइड्रो पॉवर की कुल इंस्टाल्ड कैपेसिटी 5171.36 मेगावाट है। जबकि लार्ज हाइड्रो पॉवर की इंस्टाल्ड कैपेसिटी 51,164.67 मेगावाट है। ऐसे में इस क्षेत्र में और ध्यान देकर यहां बिजली उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। सरकार ने बीते मई में ही स्माल हाइड्रो पॉवर डेवेलपमेंट स्कीम लॉन्च की है। 2026 से 2030 के बीच सरकार इस पर 2584.60 करोड़ रूपए खर्चने वाली है। ऐसे में देखना होगा कि क्या अब मोहनलाल जांगड़े को बिजली बनाने का पैसा मिल पाता है या नहीं।
बैनर ईमेज – कुंदा नदी पर खड़ी बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली टरबाइन दिखाते जांगड़े | खरगोन | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल
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