सरदार सरोवर बांध को लेकर गुजरात सहित कुल 4 राज्यों के बीच चल रहे वित्तीय विवाद पर मंगलवार 7 जुलाई को एक समझौता हुआ। सरकारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार यह समाधान केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की पहल पर हुआ। समाधान के रूप में राज्यों द्वारा अब एक मुश्त राशि को तमाम लंबित भुगतानों के बदले दिया जाएगा।
इस दौरान नई दिल्ली में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जलशक्ति मंत्री चंद्रकांत रघुनाथ पाटिल समेत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस, गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। बैठक में केंद्र और चारों राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे।
दरअसल गुजरात में बने सरदार सरोवर बांध की लागत, पानी, बिजली और पुनर्वास को लेकर इन चार राज्यों के बीच लंबा विवाद रहा है। 1979 में इसके निपटारे के रूप में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने एक अवार्ड पारित किया। मगर इसके बाद भी राज्यों के बीच विवाद चलता रहा।
इस बांध से मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा हिस्सा डूब का शिकार हुआ था। इसलिए मध्य प्रदेश ने 7 हज़ार करोड़ रूपए से अधिक की मांग पुनर्वास राशि के रूप में की थी। जबकि गुजरात ने बांध की लागत के रूप में एक राशि की मांग की थी।
मौजूदा समझौते के अनुसार मध्य प्रदेश गुजरात को लागत के रूप में 231.80 करोड़ रूपए देगा। जबकि किसी भी सरकारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि मध्य प्रदेश को गुजरात से पुनर्वास के लिए कितना पैसा मिलेगा। ऐसे में सवाल यही है कि 4 दशक से भी ज्यादा समय तक चले इस विवाद और परियोजना से मध्य प्रदेश ने क्या खोया और क्या पाया?

1979 का अवार्ड और शर्तें
सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए नर्मदा का उपयोग करने बांध की आधारशिला 5 अप्रैल 1961 को पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने रखी। मगर पानी के इस्तेमाल को लेकर आम सहमती न बनने पर गुजरात सरकार ने 1968 में, भारत सरकार से इंटर-स्टेट वॉटर डिस्प्यूट्स एक्ट, 1956 के तहत एक ट्रिब्यूनल बनाने की गुज़ारिश की।
केंद्र ने विवाद के निपटारे के लिए 1969 में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) बनाया। दस साल बाद 12 दिसंबर 1979 को न्यायाधिकरण ने मध्य प्रदेश सहित चारों राज्यों में इस्तेमाल किए जाने वाले पानी की मात्रा बांट दी। इसके अनुसार नर्मदा जल की उपयोग योग्य मात्रा (28 एमएएफ) में से मध्य प्रदेश 18.25 मिलियन एकड़ फीट (MAF), गुजरात 9 एमएएफ, राजस्थान 0.5 एमएएफ और महाराष्ट्र 0.25 एमएएफ हिस्से का हकदार बन गया।
हालांकि मध्य प्रदेश को अपने हिस्से में से 8.12 एमएएफ पानी छोड़ना भी था। वहीं वार्षिक सिंचाई लाभ सबसे ज्यादा 17.92 लाख हेक्टेयर गुजरात को मिला। जबकि मध्य प्रदेश को कोई भी सिंचाई लाभ नहीं मिला।
बिजली उत्पादन और विवाद
इसके अलावा बांध से कुल 1450 मेगवाट बिजली का उत्पादन होना था। इसमें रिवर बेड पावर हाउस से 1200 MW (6×200 MW) हाइड्रो पावर और कैनाल हेड पावर हाउस से 250 MW (5×50 MW) बिजली बननी थी।
यह बिजली तीन राज्यों में बांटी गई मध्य प्रदेश के हिस्से 57% (820.5 MW) जबकि 27% महाराष्ट्र और 16% गुजरात (232 MW) को।
मगर साल 2005 तक तो बांध से बिजली का उत्पादन शुरू ही नहीं हुआ। 2019 में भी दोनों राज्यों के बीच बिजली उत्पादन की स्थिति तब बनी जब गुजरात के सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड (SSNNL) ने रिवर बेड पॉवर हाउस से बिजली उत्पादन बंद करने की मांग की। निगम का मानना था कि बांध को पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) यानि 138.63 मी तक भरा जाना ज़रूरी है ताकि उसकी संरचना की जांच की जा सके।
मगर इससे मध्य प्रदेश को मिलने वाली बिजली कम हो जाती। ऐसे में मप्र ने भी गुजरात को कम पानी देने की बात कही।
पानी और ऊर्जा पर शोध और एडवोकेसी करने वाली संस्था मंथन अध्ययन केंद्र के रेहमत ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए कहते हैं, “सरदार सरोवर से बिजली का लगातार लाभ मप्र को नहीं मिलता। गुजरात के लिए प्राथमिकता सिंचाई है ऐसे में जब इसके लिए पानी की कमी होती है तो बिजली उत्पादन बंद हो जाता है।”
दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 में सरदार सरोवर बांध से कम बिजली उत्पादन से मप्र को 904 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। जबकि मप्र के मुख्यमंत्री ने बताया कि अब तक मध्यप्रदेश को लगभग 3,900 करोड़ यूनिट बिजली औसतन 85 पैसे प्रति यूनिट की दर से उपलब्ध हुई है।

डूब और पुनर्वास का बंटवारा
सरदार सरोवर को 138.68 मीटर तक भरे जाने पर 37,690 हेक्टेयर (86,088 एकड़) भूमि डूब जाती है। इसमें 11,279 हेक्टेयर कृषि भूमि, 13,542 हेक्टेयर वन और 12,869 हेक्टेयर नदी तल और बंजर भूमि शामिल है।
इससे तीन राज्यों के कुल 245 गांव प्रभावित होते हैं जिसमें मध्य प्रदेश के 193 गांव, महाराष्ट्र के 33 गांव और गुजरात के 19 गांव शामिल हैं। सरकारी जानकारी के अनुसार इससे केवल 3 गांव (गुजरात) पूरी तरह प्रभावित हैं, जबकि शेष 242 आंशिक रूप से प्रभावित हैं।
मध्य प्रदेश में, 193 गांवों में से केवल 79 गांवों में 10% से अधिक कृषि भूमि डूब का शिकार हुई। वहीं बैक वाटर के कारण 100 साल में एक बार आने वाली बाढ़ के चलते 89 गांवों में 10% से कम कृषि भूमि या केवल घरों के डूब का शिकार होने की बात कही गई।
नर्मदा कंट्रोल अथोरिटी द्वारा ग्राउंड रिपोर्ट को सूचना के अधिकार के तहत दिए गए जवाब के अनुसार इससे कुल 32,630 परिवार प्रभावित हुए।
शुंग्लू कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार 350 फीट (106.68 मी) ऊंचाई तक प्रभावित होने वाले परिवार अगर गुजरात में बसने से इनकार नहीं करते तो पुनर्वास की व्यवस्था और उसका खर्च वहन करने का जिम्मा गुजरात सरकार का था। वहीं इससे अधिक उंचाई पर प्रभित होने वालों का पुनर्वास उनकी इच्छानुसार गुजरात/मध्य प्रदेश में किया जाएगा।
लेकिन दोनों ही स्थिति में पुनर्वास का खर्च गुजरात सरकार को ही उठाना था।
सितंबर 2024 में टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से यह कहा गया कि मध्य प्रदेश ने खदान, राजस्व और वन भूमि डूबने के बदले 7,600 करोड़ रूपए मांगे थे। इसके बदले गुजरात ने 500 करोड़ रूपए देने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि किसी भी आधिकारिक दस्तावेज में इसकी पुष्टि नहीं की गई।
मध्य प्रदेश और गुजरात के बीच आर्थिक विवाद
7 जुलाई को केंद्र सरकार द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, “यह एग्रीमेंट सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए ‘कॉस्ट-शेयरिंग अरेंजमेंट’ से जुड़े मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र राज्यों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाने में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।”
1986-87 के मूल्य स्तर के अनुसार सरदार सरोवर परियोजना की लागत 6,406.04 करोड़ रु थी। मगर 11वीं पंचवर्षीय योजना पर आधारित एक रिपोर्ट के अनुसार 2012 तक यह बढ़ कर 45673.66 करोड़ हो गई। गुजरात इसी बढ़ी हुई लागत में मध्य प्रदेश से एक हिस्सा मांग रहा था।

मगर रहमत कहते हैं कि लागत इसलिए बढ़ी क्योंकि समय से पुनर्वास पूर्ण नहीं किए गए।
मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री चैतन्य काश्यप ने कहा कि पहले सरदार सरोवर की लागत का 50% गुजरात वहन कर रहा था मगर समझौते के बाद अब 75% करेगा।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बताया कि अटॉर्नी जनरल के फरवरी 2026 के अभिमत के अनुसार पुनर्वास व्यय में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी 31.98 प्रतिशत निर्धारित की गई थी। इससे प्रदेश को लगभग 1,500 करोड़ रुपये का भुगतान गुजरात को करना पड़ता। उन्होंने कहा कि दिल्ली में हुई बैठक में सर्वसम्मति से मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी घटाकर 16.17 प्रतिशत निर्धारित की गई। इसके परिणामस्वरूप अब मध्यप्रदेश को केवल 231.80 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा।
रहमत इसे मध्य प्रदेश की विफलता मानते हैं। वह कहते हैं कि मध्य प्रदेश शिकायत निवारण प्राधिकरण (MP GRA)में अब भी 7000 से अधिक शिकायतें पेंडिंग हैं। यह शिकायतें छोटी-छोटी हैं जैसे किसी को मकान के बदले पैसा नहीं मिलना या फिर पुनर्वास स्थल में सुविधा का न होना। यह शिकायतें प्राधिकरण में सदस्यों की नियुक्ति न होने के कारण अटके हुए हैं।
वह कहते हैं कि इन शिकायतों का निवारण अब होगा भी तो पुनर्वास का पैसा कौन देगा यह अब तक स्पष्ट नहीं है।
रहमत इस समझौते पर और जानकारी आने का इंतज़ार कर रहे हैं। अब तक मौजूद जानकारी पर वो कहते हैं कि मध्य प्रदेश ने इस समझौते से सब कुछ खोया ही है, पाया कुछ नहीं।
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