केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-6) रिपोर्ट ने भारत के स्वास्थ्य से जुड़े नए आंकड़े सामने रखे हैं। रिपोर्ट में मातृ स्वास्थ्य, बच्चों के पोषण, टीकाकरण और गैर-संचारी बीमारियों की स्थिति का आकलन किया गया है। सर्वे में मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं और पोषण से जुड़ी असमानताएं भी दर्ज की गई हैं। रिपोर्ट 2023-24 के दौरान देश की स्वास्थ्य स्थिति में आए बदलाव को दिखाती है।
बच्चों का पोषण और टीकाकरण
एनएफएचएस-6 में सबसे बड़ा सुधार बच्चों के पोषण में दर्ज हुआ है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में ठिगनापन, जो लंबे समय के कुपोषण का संकेत है, एनएफएचएस-5 के 35.5 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 29.3 प्रतिशत हो गया। 6.2 प्रतिशत अंकों की यह गिरावट लगातार दो एनएफएचएस सर्वे के बीच अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। इससे लगता है कि पूरक पोषण, सशर्त नकद सहायता और पोषण अभियान जैसी योजनाओं का मिलाजुला असर पड़ा है।
गंभीर कमजोरी यानी सीवियर वेस्टिंग, जो अचानक और जानलेवा कुपोषण को दिखाती है, 7.7 प्रतिशत से घटकर 5.2 प्रतिशत हो गई। कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत थोड़ा कम होकर 32.1 से 31.8 प्रतिशत हुआ है। बच्चों में मोटापे का प्रतिशत राष्ट्रीय स्तर पर 1.3 प्रतिशत रहा, जो अभी भी कम है।
इसके बावजूद, भारत में पांच साल से कम उम्र के 29.3 प्रतिशत बच्चे अब भी ठिगनेपन से जूझ रहे हैं। 6 से 23 महीने की उम्र के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिल रहा है। यह स्थिति परिवार की आय, भोजन की उपलब्धता और बच्चों की देखभाल से जुड़े सामाजिक व्यवहारों से प्रभावित होती है, जो केवल स्वास्थ्य सेवाओं के दायरे में नहीं आते हैं।

टीकाकरण का हाल
12 से 23 महीने की उम्र के बच्चों में पूरा टीकाकरण 82.6 प्रतिशत तक पहुंच गया। एनएफएचएस-5 में यह 76.6 प्रतिशत था। अगर केवल टीकाकरण कार्ड के आधार पर देखें तो यह आंकड़ा 87.1 प्रतिशत था। टीका लगवाने वाले लगभग सभी बच्चों यानी 95.6 प्रतिशत को सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में टीके लगे। इससे साफ होता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था अब भी सबसे अहम भूमिका निभा रही है।
रोटावायरस वैक्सीन कवरेज 85.4 प्रतिशत तक पहुंच गया, जबकि एनएफएचएस-5 में यह केवल 36.4 प्रतिशत था। बीच के वर्षों में इस वैक्सीन का देशभर में विस्तार हुआ। दूसरी खुराक वाले खसरा टीके का कवरेज 58.6 प्रतिशत से बढ़कर 71.8 प्रतिशत हो गया है। ये सुधार महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इससे टीकों से रोकी जा सकने वाली बीमारियों के फैलने का खतरा कम होता है।
देश में मातृत्व स्वास्थ्य का हाल
2023-24 में संस्थागत प्रसव बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर 90.6 प्रतिशत हो गया, जबकि एनएफएचएस-5 में यह 88.6 प्रतिशत था। प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी में हुए प्रसव 91.3 प्रतिशत तक पहुंच गए, जबकि पिछले दौर में यह 89.4 प्रतिशत था। सर्वे के अनुसार यह सुधार प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और जननी सुरक्षा योजना जैसी योजनाओं के कारण हो सका है।
रिपोर्ट के अनुसार गर्भावस्था जांच से जुड़े संकेतकों में भी सुधार हुआ। पहली तिमाही में जांच कराने वाली माताओं का प्रतिशत 70 से बढ़कर 76.2 हो गया। कम से कम चार बार गर्भावस्था जांच पूरी करने वाली माताओं का प्रतिशत भी 58.5 से बढ़कर 65.2 हो गया। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान 100 दिन या उससे ज्यादा समय तक आयरन फोलिक एसिड लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत 44.1 से बढ़कर 54.9 हो गया
शहर और गांव के बीच का अंतर
लेकिन शहर और गांव के बीच अंतर अब भी हर संकेतक में बना हुआ है। जहां 95.2 प्रतिशत शहरी महिलाओं ने अस्पतालों में प्रसव कराया, वहीं ग्रामीण महिलाओं में यह आंकड़ा 89 प्रतिशत था। चार या उससे ज्यादा गर्भावस्था जांच में अंतर और ज्यादा था। शहरों में यह 75.8 प्रतिशत था, जबकि गांवों में 61.4 प्रतिशत। ये अंतर अस्पतालों की दूरी और उपलब्ध सेवाओं की गुणवत्ता दोनों को दिखाते हैं।
एक रुझान जिस पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, वह है सीजेरियन प्रसव में बढ़ोतरी। राष्ट्रीय स्तर पर 2023-24 में 27.2 प्रतिशत प्रसव सीजेरियन से हुए, जबकि एनएफएचएस-5 में यह 21.5 प्रतिशत था। निजी अस्पतालों में सीजेरियन दर 54.1 प्रतिशत रही। सरकारी अस्पतालों में भी यह 16.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है। कुछ बढ़ोतरी जोखिम वाली गर्भावस्थाओं के सही इलाज को दिखा सकती है, खासकर उन महिलाओं में जिन्हें पहले सेवाएं नहीं मिलती थीं। लेकिन इतनी तेजी और इतने बड़े स्तर पर हुई बढ़ोतरी गंभीर जांच की मांग करती है।
दूसरी ओर एनएफएचएस-6 महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़े कई संकेतकों में महत्वपूर्ण सुधार दिखाता है। खुद इस्तेमाल करने वाले बैंक खाते रखने वाली महिलाओं का प्रतिशत 78.6 से बढ़कर 89 हो गया। इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 33.3 से बढ़कर 64.3 हो गया है। पति द्वारा हिंसा झेलने की बात कहने वाली महिलाओं का प्रतिशत 29.2 से घटकर 22.3 हो गया।

गैर-संचारी बीमारियों का बढ़ता बोझ
एनएफएचएस-6 गैर-संचारी बीमारियों के बड़े और लगातार बढ़ते बोझ को दर्ज करता है। 15 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों में 17.8 प्रतिशत महिलाओं और 20.9 प्रतिशत पुरुषों में ब्लड शुगर का स्तर बहुत ज्यादा था या वे ब्लड शुगर नियंत्रित करने की दवा ले रहे थे। एनएफएचएस-5 में यह आंकड़ा क्रमशः 13.5 प्रतिशत और 15.6 प्रतिशत था। इससे पता चलता है कि शहरों और गांवों दोनों में डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है।
उच्च रक्तचाप 19.4 प्रतिशत महिलाओं और 22.1 प्रतिशत पुरुषों में पाया गया। कुपोषण के साथ मोटापा भी बढ़ रहा है। 15 से 49 साल की उम्र के 30.7 प्रतिशत महिलाएं और 27.3 प्रतिशत पुरुष ज्यादा वजन या मोटापे की श्रेणी में थे। एनएफएचएस-5 की तुलना में यह महिलाओं में 6.7 प्रतिशत अंक और पुरुषों में 4.4 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी थी।
कम वजन वाले वयस्क भी चिंता का विषय बने हुए हैं। 19.7 प्रतिशत महिलाएं और पुरुष सामान्य बॉडी मास इंडेक्स (BMI) से नीचे पाए गए हैं।
एनएफएचएस-6 भारत के स्वास्थ्य परिदृश्य में संतुलित प्रगति और लगातार बनी संरचनात्मक असमानताओं दोनों को दिखाता है। बच्चों में ठिगनापन कम होना और मातृ स्वास्थ्य में सुधार वास्तविक उपलब्धियां हैं। लेकिन सीजेरियन प्रसव में तेजी से बढ़ोतरी, गैर-संचारी बीमारियों का बढ़ता बोझ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बच्चों के गंभीर कुपोषण की स्थिति यह दिखाती है कि यह प्रगति असमान और कमजोर है। 2023-24 में भारत की स्वास्थ्य कहानी आगे बढ़ती जरूर दिखती है, लेकिन इसका लाभ अभी सभी समुदायों तक बराबरी से नहीं पहुंचा है।
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