भारत सरकार ने 13 जुलाई को एक मसौदा अधिसूचना जारी कर पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह एक खरपतवारनाशी है, जिससे पिछले कई दशकों में किसानों और खेतिहर मजदूरों की मौतें हुई हैं। इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका कोई विशेष इलाज या एंटीडोट नहीं है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने यह अधिसूचना एक विशेषज्ञ समिति द्वारा पांच महीने तक इसकी स्वास्थ्य संबंधी समीक्षा करने के बाद जारी की।
अगर यह आदेश लागू हो जाता है, तो पूरे देश में पैराक्वाट के आयात, निर्माण, बिक्री, परिवहन, वितरण और इस्तेमाल पर रोक लग जाएगी। वर्ष 2025 में बीएमसी पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक समीक्षा के अनुसार, यूनाइटेड किंगडम और इस रसायन के मूल देश सहित कम से कम 74 देशों ने पहले ही इसकी बिक्री की अनुमति समाप्त कर दी है।
सरकार ने 13 जुलाई से 30 दिन का समय दिया है, जिसके दौरान लोग और संबंधित पक्ष इस मसौदे पर अपनी आपत्तियां या सुझाव भेज सकते हैं। इसके बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा।
अब प्रतिबंध की जरूरत क्यों पड़ी
कृषि मंत्रालय ने 14 जनवरी को एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी। इसका काम यह जांचना था कि पैराक्वाट का पंजीकरण जारी रहना चाहिए या नहीं। समिति ने 12 जून को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद कीटनाशक अधिनियम, 1968 के तहत बनी रजिस्ट्रेशन कमेटी ने उपलब्ध वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की समीक्षा की और इस रसायन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की।
रजिस्ट्रेशन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में तीन मुख्य वजहें बताईं। पहली, इससे लंबे समय से लोगों की मौतें हो रही हैं। दूसरी, इसका कोई विशेष एंटीडोट नहीं है। तीसरी, कई दशकों के शोध में इसके गंभीर स्वास्थ्य नुकसान सामने आए हैं। सरकार ने माना कि यह रसायन इंसानों और जानवरों दोनों के लिए अस्वीकार्य जोखिम पैदा करता है।

कर्नाटक मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, हुबली में 2024 से 2026 के बीच हुए एक अध्ययन में पैराक्वाट विषाक्तता के 122 मामलों का अध्ययन किया गया। इसमें मृत्यु दर 50.81 प्रतिशत रही। जिन मरीजों में एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम यानी फेफड़ों की गंभीर समस्या विकसित हुई, उनमें 93.87 प्रतिशत की मौत हो गई। वहीं, पूर्वोत्तर भारत के एक अन्य अध्ययन में 21 मरीजों में मृत्यु दर 90.47 प्रतिशत दर्ज की गई।
इस रसायन पर अध्ययन करने वाले चिकित्सकों के अनुसार, “शरीर में जाने के बाद पैराक्वाट बहुत तेजी से फेफड़ों, किडनी और लीवर में पहुंच जाता है। इसके बाद यह ऐसे रासायनिक बदलाव शुरू करता है, जिससे इन अंगों को स्थायी नुकसान होता है।”
ऐसा रसायन जिसका कोई इलाज नहीं
पैराक्वाट शरीर के अंगों को इतनी तेजी से नुकसान पहुंचाता है कि डॉक्टरों के पास इलाज का समय बहुत कम बचता है। इसकी थोड़ी सी मात्रा भी निगलने पर कुछ दिनों या हफ्तों के भीतर फेफड़ों में गंभीर और जानलेवा क्षति हो सकती है। डॉक्टर ऐसे मामलों में एक्टिवेटेड चारकोल, स्टेरॉयड, डायलिसिस और कुछ दवाओं का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जब स्थिति गंभीर हो जाती है तो मरीज के बचने की संभावना बहुत कम रहती है।
इसका सबसे ज्यादा खतरा किसानों और खेतिहर मजदूरों को रहता है। छिड़काव के दौरान गलती से इसे निगल लेना, इसकी बारीक बूंदों को सांस के साथ अंदर लेना या शरीर पर कट या घाव के जरिए इसका संपर्क होना जानलेवा हो सकता है।
वर्ष 2024 में नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक समीक्षा में आंध्र मेडिकल कॉलेज के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के भारद्वाज साई सत्य मूर्ति मल्ला और अनंत रूपेश कट्टामरेड्डी ने बताया कि लंबे समय तक पैराक्वाट के संपर्क में रहने से पार्किंसन रोग और प्रजनन संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है।
शोधकर्ताओं ने ताइवान और दक्षिण कोरिया का उदाहरण भी दिया। ताइवान में प्रतिबंध के बाद कीटनाशकों के जरिए आत्महत्या के मामलों में 37 प्रतिशत की कमी आई। वहीं, दक्षिण कोरिया में प्रतिबंध के दो साल के भीतर ऐसे मामलों की संख्या लगभग आधी रह गई।
राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध की घोषणा से पहले भी इसके खिलाफ दबाव बढ़ रहा था। तेलंगाना ने मार्च में पैराक्वाट की बिक्री पर रोक लगाई थी। इसके बाद आंध्र प्रदेश ने भी 60 दिनों के लिए इस पर प्रतिबंध लगाया। राज्य के पुलिस महानिदेशक ने पैराक्वाट से जुड़ी आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता जताई थी।

पूर्व लोकसभा सांसद बोयनापल्ली विनोद कुमार ने इस मसौदा अधिसूचना का स्वागत करते हुए कहा कि इससे डॉक्टरों, सामाजिक संगठनों और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की वर्षों की मांग सही साबित हुई है। उन्होंने फरवरी में कहा था कि केवल तेलंगाना में ही हर महीने 10 से 20 लोगों की मौत पैराक्वाट के कारण हो रही थी।
वारंगल की सांसद कडियम काव्या ने मार्च में लोकसभा में यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि दुनिया भर में पैराक्वाट को बेहद जहरीला रसायन माना जाता है और इसका कोई एंटीडोट नहीं है।
इसका असर सिर्फ अस्पतालों के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। अभिनेता राहुल रामकृष्ण ने मार्च में सोशल मीडिया पर लिखा कि उनके भाई की मौत पैराक्वाट विषाक्तता से हुई। उन्होंने इसे “बेहद घातक और आत्महत्या के लिए तेजी से इस्तेमाल किया जाने वाला रसायन” बताया।
मंजूर फसलों से बाहर भी हो रहा था इस्तेमाल
भारत में पैराक्वाट के इस्तेमाल की अनुमति केवल नौ फसलों के लिए थी। इनमें चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, मक्का, गेहूं और अंगूर शामिल हैं। लेकिन मंत्रालय की जांच में पता चला कि इसका इस्तेमाल इन फसलों से कहीं ज्यादा जगहों पर किया जा रहा था।
राजस्थान और मध्य प्रदेश में किसान मूंग की खड़ी फसल पर कटाई से ठीक पहले पैराक्वाट का छिड़काव कर रहे थे। इससे पौधे जल्दी सूख जाते थे और मजदूरी का खर्च कम हो जाता था। लेकिन इस तरह के इस्तेमाल से कीटनाशक के अवशेष खाद्य श्रृंखला तक पहुंच रहे थे। किसान तक की रिपोर्ट के अनुसार, मंत्रालय के अधिकारियों ने इसे देशभर में प्रतिबंध लगाने की सबसे बड़ी वजहों में से एक बताया। उनका मानना था कि केवल लेबल बदलने या चेतावनी बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा।
हालांकि, किसानों का कहना है कि वे यह दवा फसल उगाने के लिए नहीं, बल्कि कटाई के समय आने वाली मुश्किलों के कारण इस्तेमाल करते हैं।

सीहोर जिले के छिदगांव मौजी गांव के किसान परमसुख पटेल कहते हैं कि मूंग की खेती में कई बार दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता है। उनके अनुसार, पिछले साल सरकार की आपत्ति सामान्य कीटनाशकों पर नहीं, बल्कि कटाई से पहले डाली जाने वाली “सुखाने वाली दवा” पर थी।
दूसरी तरफ, सीहोर के निम्मा गांव के किसान हरिशंकर जाट भी कहते हैं कि पिछले साल मूंग खरीदी के दौरान इसी दवा को लेकर विवाद हुआ था, जब सरकार ने इस दवा के वजह से मूंग खरीदने से इनकार कर दिया था। उनका कहना है कि पिछले साल किसानों के आंदोलन के बाद सरकार ने मूंग की खरीदी की थी।
पटेल कहते हैं कि जब कटाई के समय बारिश हो जाती है और फसल हरी रह जाती है, तब किसान उसे जल्दी सुखाने के लिए इस दवा का इस्तेमाल करते हैं ताकि दो दिन के भीतर कटाई की जा सके। उनका कहना है कि यदि सरकार को इस दवा पर आपत्ति है तो इसका उत्पादन और बिक्री भी बंद कर दे, क्योंकि जब तक बाजार में यह उपलब्ध रहेगी, किसान इसका इस्तेमाल करते रहेंगे।
आगे क्या होगा
अगर आपत्तियों पर विचार करने के बाद सरकार इस मसौदा आदेश को अंतिम रूप देती है, तो पैराक्वाट से जुड़े सभी पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द कर दिए जाएंगे। आदेश लागू होने के बाद निर्माताओं और विक्रेताओं को तीन महीने के भीतर अपने प्रमाणपत्र रजिस्ट्रेशन कमेटी को वापस करने होंगे। ऐसा नहीं करने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
राज्य सरकारें स्थानीय स्तर पर जांच करेंगी और इस प्रतिबंध को लागू कराएंगी। मसौदा आदेश पर आपत्तियां या सुझाव नई दिल्ली स्थित कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव (पौध संरक्षण) को भेजे जा सकते हैं।
भारत में अभी भी कई ऐसे कृषि रसायनों के इस्तेमाल की अनुमति है, जिन पर दूसरे देशों में प्रतिबंध लगाया जा चुका है या उनका इस्तेमाल सीमित कर दिया गया है। इनमें ग्लाइफोसेट, 2,4-डी, डाइमेथोएट और एसीफेट शामिल हैं। फिलहाल सरकार ने यह संकेत नहीं दिया है कि इन रसायनों की समीक्षा भी पैराक्वाट की तरह जल्द की जाएगी।
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