सुबह के 4 से 5 बजे का वक़्त है। कुंवरवति बाई और लल्ली बाई हाथों में बाल्टियां लेकर साल के एक पेड़ की ओर बढ़ रही हैं। पेड़ों के नीचे बिखरा बारीक भूरा बुरादा दिखाई देता है। पहली नजर में यह सूखी लकड़ी का चूरा लगता है। लेकिन यह इस बात का संकेत है कि साल हार्टवुड बोर (hoplocerambyx spinicornis) तने के भीतर पहुंच चुका है।
मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के कंरजिया वन परिक्षेत्र में चौरादादर गांव बसा है। इस गांव से कुछ दूरी पर ही साल (Shorea robusta) का जंगल है। फिलहाल यह जंगल हार्टवुड बोर के हमले से जूझ रहा है।
कुंवरवति बाई बताती हैं, “पेड़ बाहर से चाहे जितना हरे दिखे, भीतर से उसकी मौत शुरू हो चुकी है।”
कंरजिया वन परिक्षेत्र के साथ ही यह कीट डिंडौरी और इससे लगे अन्य वन क्षेत्रों में भी फ़ैल चुके हैं। अब वन विभाग स्थानीय आदिवासियों के साथ मिलकर इसे नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।
कीटों को पकड़ने के लिए ‘ट्रैप ट्री विधि’ का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें 60-90 सेमी मोटाई वाले एक से दो साल के पेड़ को 2-3 मी लंबे लट्ठों में काटा जाता है। कटे हुए सिरों के पास की छाल को पीटा जाता है ताकि कीट को छिपने की जगह मिल सके। कीट पेड़ की रस की गंध से आकर्षित होते हैं। वे इसे पीकर नशे में सुस्त हो जाते हैं जिससे उन्हें इकट्ठा कर मारना आसान हो जाता है।
प्रदेश ने केंद्र सरकार से करीब 1.5 लाख पेड़ काटने की अनुमति मांगी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जल्द ही हालत पर काबू नहीं पाया गया तो स्वस्थ्य पेड़ भी इसकी जद में आ सकते हैं। वहीं स्थानीय लोग इसके लिए विभाग की लापरवाही को ज़िम्मेदार ठहराते हैं।

एक कीड़े के लिए 2 रूपए
कुंवरवति वन विभाग द्वारा काटे गए ट्रैप ट्री के पास सुस्त पड़े काले रंग के साल बोरर कीट को निकालती हैं। वे कीड़ों के सिर धड़ से अलग कर 100-100 की मालाएं गूंथ रही हैं। यही मालाएं भुगतान का आधार है।
वन विभाग हर पकड़े गए कीड़े के बदले आदिवासियों को 2 रुपये का भुगतान कर रहा है। विभाग ने खारिडीह, चौरादादर, कबीर, जगतपुर और करंजिया में पांच संग्रहण केंद्र बनाए हैं। यहां ग्रामीण कीड़ें जमा करते हैं और भुगतान उनके बैंक खातों में भेज दिया जाता है।
उनके साथ सुखनंदन बैगा भी हैं, जो बॉल्टी में कीड़े भरते हुए कहते हैं, “अगर गांव और वन विभाग साथ न आएं। तो इतना बड़ा जंगल बचाना मुश्किल है।”
मानव उंगली के आकार का यह गहरा भूरा या काले रंग का कीट भारतीय जंगलों के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है। 1899 में साल के पेड़ों पर इसका पहला हमला रिकॉर्ड किया गया था। तब से लेकर अब तक भारतीय साल जंगलों पर इसके कम से कम 20 महामारी प्रकोप दर्ज किए जा चुके हैं।
मध्य प्रदेश में 1996 से 2001 के दौरान महामारी की तरह इन कीटों का हमला हुआ था। इस दौरान ट्रैप ट्री ऑपरेशन के ज़रिए 65,000 कीट मारे गए थे। मगर 5 सालों में कुल 15 लाख 90 हज़ार 65 पेड़ भी काटने पड़े थे।
यह कीट साल के पेड़ों के तनों में छेद कर अंदर रहता है और प्रजनन करता है। हालांकि यह शीशम (Dalbergia sissoo), देवदार (Cedrus deodara), रबर और सेब जैसे फलों के पेड़ों सहित अन्य प्रजातियों को भी संक्रमित कर सकता है।
साल बोरर कीट आमतौर पर कमजोर व क्षतिग्रस्त पेड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह स्वस्थ पेड़ों को भी संक्रमित कर सकता है।

डिंडोरी वन विभाग के उप-वनमंडल अधिकारी (SDO) सुरेंद्र जाटव के अनुसार, 21 जुलाई 2026 तक 14 लाख 17 हज़ार 915 कीड़े खरीदे जा चुके हैं। इसके एवज में ग्रामीणों को 29.4 लाख रुपये का भुगतान किया। परंतु आदिवासियों की यह फुर्ती भी लाखों पेड़ों को कटने से रोकने के लिए काफी नहीं है।
वन विभाग के मुताबिक डिंडोरी में 30,487 हेक्टेयर साल वन क्षेत्र प्रभावित है। क्षेत्र के करीब 1 लाख 47 हज़ार 784 साल वृक्ष साल बोरर कीट की चपेट में आ चुके हैं। इन पेड़ों को काटने के लिए केंद्र सरकार से अनुमति मांगी है, ताकि संक्रमण स्वस्थ जंगल तक न फैले।
जंगलों के लिए खतरनाक है कीट
पूर्व कंरजिया वन परिक्षेत्र के सोंतीरथ गांव से कुछ दूरी पर फैले साल वन में मज़दूर चौकोर निशान लगा रहे हैं। एक साल के पेड़ के पास खड़े सुकाल बैगा की नजर सामने खड़े दर्जनों साल वृक्षों पर टिक जाती है।
70 वर्षीय बैगा आदिवासी ने बताया, “अभी तो कीड़ा पेड़ के अंदर है। बारिश के बाद बाहर निकलेगा तो स्वस्थ पेड़ों पर भी चढ़ जाएगा।”
सुकाल अकेले नहीं हैं। उनके साथ करीब 35 मजदूर कई दिनों से संक्रमित पेड़ों की पहचान में लगे हैं। आम तौर पर जंगल की देखभाल करने वाले ये लोग अब यह देख रहे हैं कि कौन-सा पेड़ अब बचाया नहीं जा सकता।
अधिकारियों के मुताबिक नवंबर 2025 के बाद से ही मार्किंग चल रही है। दिसंबर 2025 तक सिर्फ तीन हेक्टेयर क्षेत्र में 3113 संक्रमित पेड़ चिह्नित हो चुके हैं। जबकि पूरे 119.25 हेक्टेयर जंगल को मार्क करना है। जिसमें एक महीने तक का समय और लग सकता है।
नजरअंदाज चेतावनियां और बढ़ता संक्रमण
ट्रॉपिकल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट (TFRI) की वार्षिक रिपोर्ट में इन जंगलों में संक्रमण के तेजी से फैली की चेतावनियां दी गई थी।
टीएफआरआई की रिपोर्ट बताती है कि 2012-13 में राज्य के साल वनों में 39,572 और 2014-15 में 87,427 साल वृक्ष साल बोरर के विभिन्न संक्रमण वर्गों में चिंहित किए गए।

अकेले डिंडोरी वनमंडल में 2012 में 699 प्रभावित वृक्ष बढ़कर 2013 में 6,139 और 2014 में 29,382 तक पहुंच गए।
डिंडोरी के ईस्ट-वेस्ट करंजिया और साउथ सामलपुर रेंज में संक्रमण लगातार फैलता रहा। यह संक्रमण नॉर्थ बालाघाट वन संभाग (बैहर रेंज), ईस्ट मंडला वन संभाग (मोबाई, मोटनाला और बिछिया रेंज), कान्हा टाइगर रिजर्व (7 कोर, 6 बफर रेंज) व सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में भी अपने पैर पसार रहा है।
डिंडोरी के सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र मरावी का मानना है कि यदि शुरुआती स्तर पर ही उचित निगरानी व कार्रवाई की गई होती। तो नुकसान का दायरा सीमित होता।
आर्द्रता से फैले कीट?
टीएफआरआई जलबपुर की कार्यवाहक निदेशक व वैज्ञानिक डॉ नीलू सिंह कहती हैं, “डिंडोरी और अमरकंटक के साल वनों में शुरुआती वैज्ञानिक सर्वेक्षण में ही कई स्थानों पर संक्रमण चिंताजनक स्तर पर मिला था।”
दरअसल टीएफआरआई के शोधकर्ताओं ने प्रभावित तनों के लार्वा, लकड़ी का बुरादा और कीटों का अध्ययन किया था। यह समझने की कोशिश की गई कि तापमान, वर्षा और आर्द्रता जैसे कारक इस कीट के फैलाव को कैसे प्रभावित करते हैं। वैज्ञानिकों ने संक्रमण की नियमित निगरानी, समय पर पहचान और वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ सिंह के अनुसार लगातार अधिक वर्षा और लंबे समय तक बनी आर्द्रता ने साल बोरर को तेजी से फैलने के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार कीं।
राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI), जबलपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ सी मोहन भी उनकी बात का समर्थन करते हैं। उनके अनुसार जब आर्द्रता 80 प्रतिशत के ऊपर और तापमान 25 से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है तो साल बोरर तेजी से प्रजनन करते हैं।

इस आशय की प्रारंभिक रिपोर्ट पिछले साल नवंबर-दिसंबर में तत्कालीन वन बल प्रमुख वीएन अंबाड़े को टीएफआरआई ने सौंपी थी। इसी के बाद से विस्तृत मार्किंग, वैज्ञानिक निगरानी और ट्रैप ट्री जैसे अभियान संचालित हो रहे हैं।
वे यह भी बताते हैं, “यह कीट पहले घायल या राल छोड़ रहे साल वृक्षों पर हमला करता है। इसलिए सड़क किनारे और मानवीय हस्तक्षेप वाले जंगलों में संक्रमण अपेक्षाकृत अधिक दर्ज किया गया।”
मगर अब इसका उपाए क्या है? इसका जवाब देते हुए डॉ मोहन कहते हैं, “नुकसान कम करना है तो फ्रंटलाइन वनकर्मियों को नियमित प्रशिक्षण और वैज्ञानिक प्रणाली को मजबूत करना जरूरी है।”
केवल डिंडौरी तक सीमित नहीं प्रकोप
डिंडोरी से लगभग 70 किलोमीटर दूर अमरकंटक जिले का साल जंगल भी इसी संकट की गिरफ्त में है। वैज्ञानिक डॉ नीलू सिंह के अनुसार यहां करीब 24 हजार साल वृक्ष प्रभावित हैं।
यहां भी ट्रैप ट्री ऑपरेशन चलाया जा रहा है। 21 जुलाई 2026 तक करीब 15 हजार साल बोरर कीड़े पकड़े जा चुके हैं। जिसमें से करीब 6 हजार कीड़ों को नष्ट किया जा चुका है।
टीएफआरआई के वैज्ञानिकों ने चेताया कि यह संकट केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है।
छत्तीसगढ़ के चिल्पी, गरियाबंद और नारायणपुर के साल वनों से भी इसी प्रकार की सूचना मिली है। यानी मध्य भारत का पूरा साल परिदृश्य इस समय एक साझा पारिस्थितिक चुनौती का सामना कर रहा है।

“जंगल बदल रहा है”
डिंडोरी जिले का 40.45 प्रतिशत हिस्सा वनाच्छादित है। इनमें से 80,263 हेक्टेयर में साल वन हैं। जिनमें 76,230.60 हेक्टेयर घने और 4,032.42 हेक्टेयर खुले साल वन हैं। यहीं जगल बैंगा और गोंड समुदाय की आजीविका का आधार हैं।
चौरदादर गांव के विष्णु मरावी कहते हैं, “यह कीड़ा कोराेना से भी ज्यादा खतरनाक है। कोरोना ने लोगों की जान ली थी, यह हमारे पूरे जंगल को मार रहा है।”
मट्टू मरावी जोड़ते हैं, “चार-पांच साल पहले कुछ पेड़ों में कीड़ा दिखता था। अब पूरा जंगल बदलता दिखाई दे रहा है। जंगल रहेगा, तभी हमारा जीवन रहेगा।”
डिंडोरी मंडल वन अधिकारी (डीएफओ) अशोक सोलंकी कहते हैं, “पिछले वर्ष केवल 5 से 6 हजार संक्रमित पेड़ कटाई के लिए चिंहित थे। इस वर्ष संख्या बढ़कर डेढ़ लाख पहुंच गई है।” उनके मुताबिक मौजूदा प्रकोप 1997-98 जैसी 30 वर्षीय प्राकृतिक पुनरावत्ति से मेल खाता है।
वन विभाग की योजना गंभीर रूप से संक्रमित वृक्षों को हटाने के बाद प्राकृतिक पुनर्जनन (नेचुरल रीजनरेशन) की रक्षा करने की है। जंगल को अपनी मूल अवस्था में लौटने में 20 से 30 वर्ष लग सकते हैं।

उत्पादन वनमंडल की डीएफओ भारती ठाकरे ने कहा, “केंद्र सरकार से अनुमति मिलने के बाद सितंबर तक कटाई शुरू होने की उम्मीद है।”
विभाग का अनुमान है कि प्रभावित क्षेत्र से 46,390 घन मीटर इमारती लकड़ी और 43,940 घन मीटर जलाऊ लकड़ी प्राप्त होगी। कटाई व परिवहन पर 8 से 10 करोड़ रुपये खर्च आएगा। ई-नीलामी से लकड़ी का संभावित मूल्य 1,600 से 1,700 करोड़ रुपये आंका गया है।
हालांकि विशेषज्ञ इसे केवल आर्थिक प्रश्न नहीं मानते। सेवानिवृत्त अतिरिक्त मंडल वन अधिकारी आरएलएस परस्ते कहते हैं, “साल बोरर का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक प्रबंधन, नियमित निगरानी व दीर्घकालिक सूक्ष्म योजना से इसके प्रसार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।”
डिंडोरी और अमरकंटक के जंगल आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं। जहां एक तरफ कुल्हाड़ियों की गूंज और दूसरी ओर आदिवासियों के हाथ में कीड़ों की मालाएं। एक ओर वैज्ञानिक प्रबंधन की चुनौती है, दूसरी ओर सदियों पुराना जंगल। आने वाले समय में तय होगा कि यह लड़ाई केवल डेढ़ लाख पेड़ों को खोने की कहानी बनती है। या फिर विज्ञान, समुदाय और वन प्रबंधन मिलकर मध्य भारत के साल वनों को इस त्रासदी से बचा पाते हैं।
बैनर ईमेज – वन विभाग प्रत्येक कीट के बदले ग्रामीणों को 2 रूपए का भुगतान कर रहा है
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