कड़कनाथ पालने वाले हुर सिंह भाबर (56) के लिए अप्रैल का महीना चिंता में गुज़रा। 10 अप्रैल के आस-पास उनकी मुर्गियों को दस्त लगने शुरू हो गए। पहले 2-3 मुर्गियों में ये लक्षण दिखे मगर बाद में संक्रमण बढ़ गया। जिले की पेटलावद तहसील के धनपुरा में रहने वाले इस भील आदिवासी परिवार के लिए मुर्गी पालन मुख्य पेशा है।
150 से भी अधिक मुर्गियां और 10-12 बकरियां पालने वाले इस परिवार के लिए एक मुर्गी की मौत बड़ी घटना है। भाबर कहते हैं, “एक किलो का एक कड़कनाथ मरेगा तो सीधा 1500 रूपए का नुकसान होगा।”
मगर तेज़ी से फ़ैल रहे संक्रमण के बीच तहसील से किसी वेटेनरी डॉक्टर का आना मुश्किल है। ऐसे में भाबर फोन कर वाघमल खरिया को बुलाते हैं। खरिया संपर्क समाज सेवी संस्था के कार्यकर्ता हैं। उन्होंने छोटे पशुओं जैसे मुर्गी और बकरियों के प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण प्राप्त किया है इसलिए लोग उन्हें पशु मित्र के रूप में जानते हैं।
मध्य प्रदेश के इस आदिवासी जिले में अधिकतर परिवार बैकयार्ड मुर्गीपालन और बकरी पालन करते हैं। गर्मी बढ़ते ही यह पशु बीमार होने लगते हैं। कभी-कभी यह इतना खतरनाक होता है कि उनकी आधी मुर्गियां 2 दिनों में ही मर जाती हैं।
पहाड़ियों में अलग-थलग बसे इन ग्रामीणों के लिए हर बार समय पर पशुचिकित्सक का पहुंचना संभव नहीं हो पाता। ऐसे में स्थानीय स्तर पर प्राथमिक उपचार करने वाले और टीकाकरण करने वाले ये पशु मित्र और सखी उनका पहला सहारा बन गए हैं।

हीट स्ट्रेस से मरते जानवर
गर्मियां शुरू होते ही देश के अलग-अलग हिस्सों से मुर्गियों के मरने की ख़बरें प्रकाशित होना शुरू हो गईं। ओडिशा के मालकानगिरी में 3 घंटे बिजली न रहने पर घुटन और गर्मी के चलते एक ही जगह 5300 मुर्गियां मर गईं। वहीं आंध्रप्रदेश में रोजाना क़रीब 10 लाख पक्षी मर रहे हैं। इसके बाद राज्य के पशुपालन विभाग ने तत्काल सलाह (urgent advisory) जारी कर दी।
झाबुआ से 350 किमी दूर भोपाल में स्थित राज्य पशु चिकित्सालय की सीनियर वेटेनरी सर्जन डॉ राखी सिंह के केबिन के बाहर लोग बकरी-बकरा लिए खड़े हैं। वह कहती हैं, “पिछले एक महीने से हमारे पास हीटस्ट्रेस के केस ही आ रहे हैं।”
इस बातचीत के दो दिन बाद ही ईद-अल-अधा का त्यौहार मनाया जाना था। डॉ सिंह बताती हैं कि (कुर्बानी के लिए) लोग दूर-दूर से जानवर लेकर आते हैं। पशुओं मोशन सिकनेस (motion sickness) के कारण तनाव में होते हैं। उनके शरीर का तापमान बढ़ा होता है और वो जल्द ही हीट स्ट्रेस का शिकार हो जाते हैं।
झाबुआ जिले के मावड़ी गांव की रहने वाली कमला भूरिया की किस्मत भाबर जितनी अच्छी नही थी। 2 साल पहले उनकी 10 मुर्गियां मई के महीने में दस्त होने के बाद मरना शुरू हो गईं। उन्हें न डॉक्टर मिला न कोई पशु मित्र।
सामान्यतः मुर्गियों के शरीर का तापमान 41°C से 42°C तक होता है। डॉ सिंह कहती हैं कि अधिक तापमान होने पर शरीर की इम्यूनिटी कमज़ोर होने लगती है। मुर्गियों को दस्त शुरू होते हैं और इस स्थिति में उन पर कोई भी बिमारी का हमला जल्दी हो सकता है। डॉ सिंह के अनुसार अगर बीमारी संक्रामक है तो सारे ही पक्षी बीमार होकर मर सकते हैं।
एक शोध के अनुसार गर्मियों में ज़्यादा तापमान की वजह से मुर्गियों में फ़ीड की मात्रा 20-30%, अंडे का प्रोडक्शन 25-35% और शेल की क्वालिटी 15-20% तक कम हो सकती है।
गर्मी बढ़ने पर शरीर का तापमान संतुलित करने के लिए मुर्गियां मुंह से तेज़ी से सांस लेना शुरू कर देते हैं। मगर ज़्यादा समय तक सांस लेने की तेज़ दर से खून में कार्बन डाइऑक्साइड का कंसंट्रेशन कम हो जाता है, जिससे (शरीर में) एसिड-बेस बैलेंस में गड़बड़ी होती है। खून का पीएच (power of hydrogen) बढ़ने से खून में कैल्शियम कम हो जाता है, जिससे अण्डों का शेल पतला रह जाता है।
एक अन्य शोध के अनुसार 38°C या उससे ज़्यादा तापमान होने और टेम्प्रेचर-ह्यूमिडिटी इंडेक्स (THI) 75 से ज्यादा होने पर बकरियों को गर्मी महसूस होने लगती है। शोध के अनुसार इससे बकरी के विकास में 12%, दूध में 3-10% और मांस उत्पादन 4% की कमी देखी गई है।

अपनी समस्या का भी हल: पशु सखी
हर बार बिमारी के बाद डॉक्टर की राह ताकना और न मिलने पर पशुओं का मरना, भूरिया इससे तंग आ गईं।
बीते साल अप्रैल में उन्हें संपर्क द्वारा पशु सखी की ट्रेनिंग दी गई। इससे सबसे पहले उनकी खुद की समस्या हल हुई है। लगभग 30 मुर्गियां और 10 से 15 बकरियों का पालन करने वाली भूरिया अपने पशुओं और मुर्गियों को समय पर प्राथमिक उपचार दे पाती हैं। वह गर्मियों में हीट स्ट्रेस के लक्षण पहचान कर उन्हें समय पर प्याज़ खिलाना और ठंडी जगह पर रखने का प्रबंध कर पाती हैं।
भूरिया कहती हैं, “पहले लोगों को लगता था कि मुर्गियों का इलाज नहीं हो सकता। लोग बोलते कि तुमको किसने डॉक्टर बनाया और तुम्हारे पास दवा कहां से आई?” हालांकि अपने गांव में कुछ मुर्गियों का इलाज करने के बाद अब लोग उन पर भरोसा करने लगे हैं। अब उनको फ़ोन करके लोग इलाज करने के लिए बुलाते हैं।
इस कार्यक्रम से जुड़ने वाली महिलाएं खुद के जीवन में बदलाव देख पा रही हैं। अब वो आर्थिक रूप से सबल हो रही हैं। भूरिया कहती हैं कि डॉक्टर जिस टीके और दवा के लिए 200-250 रूपए लेते हैं वो इसे 20 रूपए में कर देती हैं। इसके लिए किफ़ायती दर पर दवा उन्हें संस्था ही उपलब्ध करवाती है। आंगनवाड़ी में बतौर सहायिका काम करने वालीं भूरिया अब अपने बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ा पा रही हैं और मोटरसाइकल की किश्त भी भर पा रही हैं।

डॉक्टरों की कमी के बीच पशु सखियां
देश में कुल पशुधन आबादी 5367.6 लाख है, जो पशुधन जनगणना, 2012 की तुलना में 4.8% ज़्यादा है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अंडा उत्पादक है। मांस उत्पादन में तो हम दुनिया में पांचवें सबसे बड़े देश हैं। 21वीं लाइवस्टॉक सेंसेस के मुताबिक़ 2019 में देश में बकरियों की संख्या 1 हज़ार 488.8 लाख थी। वहीं देश में 8 हज़ार 518.1 लाख मुर्गियां (कुक्कुट) थीं। जहां बकरियों की संख्या 10.1% बढ़ी है वहीं मुर्गियों की संख्या 16.8% बढ़ी है।
झाबुआ की बात करें तो यहां 469.9 हज़ार बकरियां और 4622.05 हज़ार मुर्गियां हैं।
नीति आयोग के अनुसार भारत में लगभग 1.07 लाख वेटेरिनरी डॉक्टरों की ज़रूरत है। अभी देश में 65 हज़ार 894 वेटेरिनरी डॉक्टर हैं। जिसका मतलब है कि लगभग 41000 वेटेरिनेरियन की कमी है।
संपर्क में प्रोग्राम मैनेजर राधेश्याम पाटीदार बताते हैं कि उनकी संस्था ऐसे 30 पशु मित्र और पशु सखियों को सहयोग कर रही है। उनके माध्यम से वे लगभग 5000 पशुपालकों से जुड़े हुए हैं। ये पशु मित्र/सखी कम समय में गांव पहुंच सकते हैं और गंभीर होने की स्थिति दिखाई देने पर जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाने में भी मदद करते हैं। जिन क्षेत्रों में किसी डॉक्टर को पहुंचने में आधा दिन लग सकता है पास के गांवों में रहने वाले ये लोग उससे जल्दी पहुंच कर प्राथमिक उपचार कर सकते हैं।
यानि पशु सखी जैसे कार्यक्रम डॉक्टरों की कमी का हल नही हैं। मगर हीटवेव जैसी चरम मौसमीं घटनाओं के दौरान इस आदिवासी क्षेत्र में ये ग्रामीणों का अस्थाई सहारा ज़रूर बन रही हैं।
भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें।
यह भी पढ़ें
एफपीओ: साथ आए तो बढ़ी आमदनी, मिलकर करोड़ों कमा रहे ये किसान
इंटिग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट: कुछ की लागत बची, विस्तार का सवाल अनुत्तरित
पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।






