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भोपाल वायु प्रदूषण पर एनजीटी का नोटिस, पूछा कहां खर्च किया फंड?

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राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने भोपाल में वायु प्रदूषण नियंत्रण उपायों पर कार्रवाई न होने पर गंभीर नाराज़गी जताई है। अधिकरण ने नगर प्रशासन से पूछा है कि पिछले पांच साल में स्वच्छ हवा के लिए मिले फंड का खर्च कैसे किया गया? एनजीटी की जस्टिस अरुण कुमार त्यागी की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। 

बेंच ने कहा कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) इसलिए शुरू किया गया है ताकि शहरों में प्रदूषण कम किया जा सके। इसके तहत डस्ट मैनेजमेंट, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट, ट्रैफिक मैनेजमेंट, एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग पर फंड खर्च करने की ज़रूरत है।    

एनजीटी ने आदेश में पूछा कि भोपाल को इस योजना के तहत अब तक कितनी राशि मिली और पिछले पांच वर्षों में उसे किस काम पर खर्च किया गया?

क्या है पूरा मामला 

यह मामला भोपाल सिटिज़न्स फोरम की ओर से उसके संयोजक सुरेंद्र तिवारी ने मूल आवेदन संख्या 181/2025 के तहत दायर किया था। फोरम ने शहर में बिगड़ती हवा की गुणवत्ता को लेकर मध्य प्रदेश राज्य और अन्य पक्षों को चुनौती दी है।

आवेदक ने भोपाल शहर में हवा की क्वालिटी में खतरनाक गिरावट को हाईलाइट किया। याचिका में कहा गया कि पिछले कुछ महीनों में, शहर के एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) में बहुत ज़्यादा बढ़ोतरी देखी गई है। यह बार-बार ‘बहुत खराब’ श्रेणी तक पहुंच गया और इसकी रीडिंग 336 तक दर्ज की गई। इससे स्थानीय लोगों की सेहत और जान को फौरी और गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

अब अधिकरण ने भोपाल कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त को भी मामले में पक्षकार बना दिया है। इसका मतलब है कि अब उनकी जिम्मेदारी कानूनी रूप से तय हो गई है और उन्हें इसका जवाब देना होगा।

Air Pollution in Bhopal
बीते दिनों भोपाल में प्रदूषण कई बार गंभीर श्रेणी तक पहुंचा है। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

एनजीटी ने भोपाल कलेक्टर और भोपाल नगर निगम आयुक्त द्वारा आदेशों का पालन न करने पर कड़ा रुख अपनाया। दोनों अधिकारियों ने 7 जनवरी 2026 के पहले आदेश के अनुसार न तो जवाब दाखिल किया ना ही अनुपालन रिपोर्ट दी।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने कहा है कि दोनों अधिकारी दो सप्ताह के भीतर अपनी अनुपालन रिपोर्ट जमा करें। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें खुद अधिकरण के सामने पेश होकर जवाब देना होगा कि उन्होंने अब तक कोई रिपोर्ट क्यों नहीं दी?

पर्यावरण कार्यकर्ता नितिन सक्सेना सवाल उठाते हैं, “भोपाल प्रशासन द्वारा पानी के छिड़काव के अलावा और कौन से ठोस कदम उठाए गए?” उनका कहना है कि, “अगर छिड़काव किया गया तो क्या उसमें पानी की लागत भी करोड़ों के खर्च में जोड़ी गई।” उनके मुताबिक नगर निगम के पास खुद जल प्रबंधन व्यवस्था और उपचार संयंत्र मौजूद हैं, इसलिए खर्च का स्पष्ट हिसाब सामने आना चाहिए।

एनजीटी ने क्या कहा?

अधिकरण ने सभी पक्षों को निर्देश दिया है कि वे ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान जिसे ग्रैप (GRAP) कहा जाता है, के सख्त पालन और उच्च स्तरीय समिति द्वारा उसकी समय-समय पर समीक्षा पर अपनी अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करें।

यहां ग्रैप से तात्पर्य एक आपात योजना है जो तब लागू होती है जब किसी शहर की हवा बहुत खराब या खतरनाक स्तर पर पहुंच जाती है। इसका मकसद यह है कि जैसे जैसे प्रदूषण का स्तर बढ़े, वैसे वैसे सख्त कदम अपने आप लागू हो जाएं।

इस योजना को सबसे पहले दिल्ली और एनसीआर के लिए बनाया गया था। बाद में इसे दूसरे प्रदूषण प्रभावित शहरों में भी लागू करने की बात हुई। इसमें हवा की गुणवत्ता के स्तर के हिसाब से अलग अलग कदम तय हैं। जैसे धूल कम करने के लिए पानी का छिड़काव, निर्माण कार्य रोकना, डीजल जेनरेटर पर रोक, स्कूल बंद करना, ट्रकों की एंट्री रोकना या कुछ समय के लिए निजी वाहनों पर पाबंदी लगाना।

सीधा मतलब यह है कि GRAP एक पहले से तय नियमों का ढांचा है, ताकि सरकार आखिरी समय में घबराकर फैसले न ले बल्कि प्रदूषण बढ़ते ही तय कदम तुरंत लागू हो सकें। 

स्पष्ट रहे कि भोपाल के एनकैप डैशबोर्ड पर दिखाया गया “ग्रैप” दिल्ली-एनसीआर वाला आधिकारिक ग्रैप नहीं है। यह भोपाल के लिए तैयार एक अलग स्थानीय आपात योजना है। इसमें प्रदूषण स्तर के अनुसार चरणबद्ध कदम तय किए गए हैं।

Under-utilised funds for NCAP, an hurdle in curbing air pollution
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने नगर निगम पर स्पष्ट जवाब न देने का आरोप लगाया है। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

ग्रैप को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ता नितिन सक्सेना का कहना है कि दिल्ली जैसे महानगरों में ग्रैप लागू है और भोपाल जैसे शहर में भी इसे लागू होना चाहिए। उनके अनुसार भोपाल में ग्रैप लागू नहीं है। वह बताते हैं कि इस संबंध में पहले लेटर पिटीशन भी लगाई गई थी, लेकिन उस पर संज्ञान नहीं लिया गया। बाद में जो याचिका दायर हुई, उसमें ग्रैप को लेकर स्पष्ट मांग रखी गई। उनका कहना है कि जब प्रदूषण लगातार मानक से ऊपर है तो चरणबद्ध आपात योजना लागू करना जरूरी है और इसकी मॉनिटरिंग भी सख्ती से होनी चाहिए।

दूसरी ओर एनजीटी ने कहा कि अब तक इस योजना के तहत किए गए कामों की गंभीर समीक्षा की जरूरत है और इसे प्रभावी बनाने के लिए नई तकनीक और तरीकों को अपनाना जरूरी है ताकि तय लक्ष्य हासिल किए जा सकें।

एनकैप क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) की शुरुआत भारत सरकार ने वर्ष 2019 में की थी। इसका लक्ष्य था कि उन शहरों में जहां लगातार राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों का पालन नहीं हो पा रहा है, वहां 2024 तक वायु प्रदूषण में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी लाई जाए। भोपाल भी ऐसे शहरों में शामिल है।

भोपाल के एनकैप डैशबोर्ड में उपलब्ध जानकारियों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में शहर का औसत पीएम 10 स्तर 110 से 140 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच रहा है। ध्यान रहे कि भारत का राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन का वार्षिक मानक 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। 

इसका मतलब साफ है। भोपाल का प्रदूषण राष्ट्रीय सीमा से लगभग दोगुना है। यह वैश्विक मानक से कई गुना अधिक है। हालांकि कुछ सालों में हल्की कमी दिखी है। लेकिन शहर अब भी तय सीमा से ऊपर है। इससे संकेत मिलता है कि उठाए गए कदम पर्याप्त असर नहीं दिखा पाए।

भोपाल को एनकैप के तहत अब तक 242.56 करोड़ रु मिले हैं जिसमें से 196.45 करोड़ रु खर्च किए गए हैं। फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

फंड के मामले में भी तस्वीर साफ है। डैशबोर्ड में उपलब्ध जानकारियों के अनुसार भोपाल को अब तक 242.56 करोड़ रुपये जारी हुए। प्रशासन ने इनमें से 196.45 करोड़ रुपये खर्च किए। यानि पूरी राशि का उपयोग नहीं हुआ। 

एनकैप को लेकर नितिन सक्सेना ने मुख्य रूप से फंड के उपयोग और पारदर्शिता पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि 242 करोड़ में से 196 करोड़ खर्च होने की बात कही जा रही है और सीपीसीबी को लगाई आरटीआई में उन्हें भी लगभग यही आंकड़ा मिला है। उनके अनुसार नगर निगम से जब सूचना के अधिकार के तहत खर्च का विस्तृत ब्यौरा मांगा गया तो स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। सक्सेना कहते हैं कि यह साफ होना चाहिए कि 196 करोड़ रुपये शहर में किस काम पर खर्च हुए?

नितिन सक्सेना का कहना है कि, “फंड कहां खर्च हुआ, इसका जवाब तत्कालीन कमिश्नर हरि नारायण और वर्तमान कमिश्नर संस्कृति जैन को देना चाहिए।” उन्हें जवाब में केवल 6 करोड़ 40 लाख रुपये का हिसाब बताया गया, “लेकिन वह भी किस मद में खर्च हुआ, इसकी स्पष्ट जानकारी अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई।”

अब नगर निगम आयुक्त को खास तौर पर निर्देश दिया गया है कि वे अगली सुनवाई से पहले फंड के उपयोग पर अलग से अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करें। अगली सुनवाई 18 मार्च 2026 को तय है। यदि तब तक भोपाल कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त अपनी रिपोर्ट दाखिल नहीं करते हैं तो उन्हें खुद अधिकरण के सामने उपस्थित होना पड़ेगा। अधिकरण ने रजिस्ट्रार को यह भी निर्देश दिया है कि सभी आधिकारिक पत्र सही पते पर पहुंचें ताकि आगे ऐसी चूक न हो।

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  • Journalist, focused on environmental reporting, exploring the intersections of wildlife, ecology, and social justice. Passionate about highlighting the environmental impacts on marginalized communities, including women, tribal groups, the economically vulnerable, and LGBTQ+ individuals.

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