Read in English | भानु प्रताप यादव मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले की बिजावर तहसील के पलकौंहा गांव में रहते हैं। भानु ने फरवरी 2026 के शुरुआती दिनों में प्रदर्शन किया, पुलिस की मार भी खाई और तीन दिनों की जेल भी काटी। दरअसल भानु का गांव केन-बेतवा रिवर लिंकिंग परियोजना के पहले चरण में बनने वाले दौधन डैम के डूब क्षेत्र में आता है। दौधन डैम का निर्माण अब मिशन स्तर पर शुरू हो चुका है। इसके चलते उन्हें अपना गांव, अपनी जमीन और अपना घर छोड़ना पड़ेगा।

निर्माण स्थल पर टकराव और गिरफ्तारियां
भानु मन मारकर यह सब छोड़ने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उन्हें इसके बदले पर्याप्त मुआवजा और पुनर्वास मिले। उनके पास कुल 3 एकड़ जमीन है। बकौल भानु इसके एवज में उन्हें 5 लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से 15 लाख रुपये का मुआवजा मिला है। लेकिन वे इस राशि से असंतुष्ट हैं। वजह पूछने पर वे बताते हैं, “हमने आसपास जमीन का दाम पता किया है। यह कहीं भी 8 से 10 लाख रुपये प्रति एकड़ से कम नहीं है।”

यह असंतोष सिर्फ भानु का नहीं, बल्कि पूरे दौधन और पलकौंहा गांव का है। सीमित और अस्पष्ट मुआवजा राशि के बीच हो रहे डैम के निर्माण कार्य को रोकने के लिए इन गांवों की महिलाओं ने 6 से 8 फरवरी के बीच निर्माण स्थल पर प्रदर्शन किया और काम रुकवाया। इस प्रदर्शन में सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर भी शामिल हुए।
8 फरवरी को प्रशासनिक अमले ने एक माह का समय लेकर दोबारा सर्वे कराने का आश्वासन दिया। लेकिन इसके ठीक अगले दिन, 9 फरवरी को अमित को हिरासत में ले लिया गया। इस गिरफ्तारी से तनाव तब बढ़ गया। अमित भटनागर को पुलिस ने, भारतीय न्याय संहिता की धारा 191 के तहत हिरासत में ले लिया।

इस मामले पर बिजावर के एसडीएम राकेश शुक्ला कहते हैं, “केन-बेतवा परियोजना के तहत दौधन में बन रहे बांध स्थल पर कुछ लोगों ने बिना पूर्व सूचना दिए काम रुकवा दिया। यह कदम अमित भटनागर और कुछ अन्य लोगों के नेतृत्व में उठाया गया और प्रशासन को पहले से कोई लिखित सूचना नहीं दी गई।”
अमित की गिरफ्तारी के विरोध में 10 फरवरी को दोनों गांवों के लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में बिजावर तहसील का घेराव कर अमित भटनागर को रिहा करने की मांग की जा रही थी। इस प्रदर्शन में भानु और उनकी पत्नी भागवती यादव भी शामिल हुई थीं। लेकिन यह अनुभव उनके लिए अच्छा नहीं रहा।
भानु का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया और वाटर कैनन चलाया। भानु की पत्नी भागवती बताती हैं, “उन्होंने हमें मारा। दौड़ा-दौड़ा कर मारा। सरकार ऐसा करती है क्या? क्या यही न्याय है?”
इसके बाद भानु को गिरफ्तार भी कर लिया गया। उनकी रिहाई तीन दिन बाद हुई, लेकिन अभी तक उन्हें यह नहीं बताया गया कि उनका जुर्म क्या था, किस धारा के तहत गिरफ्तारी हुई और प्राथमिकी क्या है। हालांकि भानु ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं हैं जिन्हें यह न पता हो कि वे किस जुर्म में जेल गए थे।
अमित भटनागर ने रिहाई के बाद जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को दिए ज्ञापन में इस तरह की गिरफ्तारियों से जुड़ी मांगें भी उठाई हैं। ज्ञापन में स्पष्ट मांग की गई है कि “आंदोलन से जुड़े व्यक्तियों पर दर्ज सभी एफआईआर और प्रकरणों की सूची व प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं।”

क्या हैं ग्रामीणों की शिकायतें
भानु प्रताप को मुआवजे के तौर पर 12 लाख 50 हजार रुपये मिले हैं। इसके अलावा उन्हें 3 एकड़ जमीन के 15 लाख रुपये दिए गए हैं। उनकी मांग है कि उन्हें कम से कम 25 लाख रुपये मुआवजा मिलना चाहिए, साथ ही जमीन का दाम भी बढ़ाकर दिया जाए। इसके अतिरिक्त उनकी शिकायत है कि उनकी बेटी को मुआवजे की सूची में शामिल नहीं किया गया है, जबकि वह वयस्क है।
भागवती बताती हैं कि उनकी बेटी की उम्र 25 वर्ष है। उनका आरोप है कि ग्राम सचिव ने यह कहकर नाम काट दिया कि लड़कियों को मुआवजा नहीं मिलता। भगवती सवाल उठाती हैं, “लड़कियों को मुआवजा क्यों नहीं मिलेगा? जैसे लड़का होता है, वैसे ही लड़की होती है।”

दरअसल इस परियोजना में मुआवजा ‘भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’ के तहत दिया जा रहा है। अमित भटनागर का आरोप है कि इस कानून का पालन नहीं किया जा रहा है।
कानून की धारा 3(m) में ‘परिवार’ की परिभाषा दी गई है। इसमें एक व्यक्ति, उसका पति या पत्नी, नाबालिग बच्चे और उस पर निर्भर नाबालिग भाई-बहन शामिल होते हैं। कानून यह भी स्पष्ट करता है कि हर वयस्क व्यक्ति को अलग परिवार माना जा सकता है। लेकिन पति और पत्नी को सामान्य तौर पर एक संयुक्त परिवार इकाई माना जाता है, इसलिए पत्नी के लिए अलग से अतिरिक्त मुआवजा राशि का प्रावधान नहीं है।
हालांकि गांव की महिलाएं और पुरुष मांग कर रहे हैं कि पत्नियों और अन्य महिलाओं को अलग से पुनर्वास पॅकेज दिया जाए। पलकौंहा से सटे दौधन गांव में रहने वाली शांति कोंदर मांग करती हैं कि पत्नी को भी अलग मुआवजा मिलना चाहिए। वह सवाल करती हैं, “अगर पूरी राशि पति द्वारा शराब पीकर गैर-जिम्मेदाराना ढंग से खर्च कर दी गई, तो हमारे बच्चों के भविष्य का क्या होगा?”

ग्रामीणों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में घर की वयस्क लड़कियों को भी शामिल नहीं किया गया है, जबकि कानून उन्हें एक परिवार मानता है और उन्हें मुआवजे का अधिकार देता है। पलकौंहा के विनोद अहिरवार की बहन पूजा अहिरवार (19) का नाम भी सूची में नहीं जोड़ा गया है। मुआवजे को लेकर हुए सर्वे के दौरान वह गांव से बाहर काम करने गई हुई थीं।
यह शिकायतें सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि अगर उनके घर के एक वयस्क को मुआवजा मिला है, तो दूसरे को छोड़ दिया गया है। अमित भटनागर इसके पीछे सर्वे प्रक्रिया को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि सर्वे प्रक्रिया का उचित पालन नहीं किया गया।
सर्वे पर सवालिया निशान
दौधन के बिहारी आदिवासी सर्वे प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं, “हमारे मकान की लंबाई, ऊंचाई और चौड़ाई मापी गई, लेकिन हमारे आंगन और बाड़ के हिस्से को नहीं मापा गया।”

भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार पहले अधिसूचना जारी होती है, फिर प्रभावित परिवारों का विस्तृत सर्वे किया जाता है। इसमें जमीन, मकान, आजीविका के नुकसान, सार्वजनिक सुविधाओं और सामुदायिक संसाधनों का पूरा विवरण दर्ज किया जाता है।
कानून यह भी कहता है कि जमीन अधिग्रहण से पहले सामाजिक प्रभाव आकलन किया जाए और इसके लिए स्थानीय पंचायत या नगर निकाय से परामर्श हो। इसकी अधिसूचना स्थानीय भाषा में जारी हो और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाए। रिपोर्ट बनने से पहले प्रभावित क्षेत्र में सार्वजनिक सुनवाई करना अनिवार्य है, ताकि लोग अपनी बात रख सकें।
सर्वे को लेकर छतरपुर के जिलाधिकारी पार्थ जायसवाल ने बताया कि ग्रामीणों की मांग पर विचार करते हुए 13 प्रभावित गांवों के लिए अलग से सर्वे दल गठित कर दोबारा सर्वे कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पैकेज से छूट गए लोगों का पुनः सर्वे कराया जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई पात्र व्यक्ति दस्तावेजों की कमी के कारण सूची में शामिल नहीं हो पाया है, तो उसके दस्तावेज तैयार कराने में प्रशासन मदद करेगा। ऐसे सभी पात्र लोगों का नाम जोड़कर उन्हें मुआवजा दिया जाएगा।
जिलाधिकारी के अनुसार डैम का निर्माण कार्य फिर से शुरू कर दिया गया है। उन्होंने आश्वासन दिया कि परियोजना से संबंधित जानकारी समय-समय पर प्रभावित गांवों को उपलब्ध कराई जाती रहेगी।
अगर दौधन का उदाहरण लिया जाए तो वहां की प्राथमिक शाला की एक दीवार पर परियोजना से प्रभावित 363 परिवारों को दिए गए मुआवजे की सूची चस्पा है। प्रत्येक परिवार के आगे 12 लाख 50 हजार रुपये की स्थिर राशि लिखी है। इस प्रकार दौधन के कुल 363 परिवारों को कुल 46 करोड़ 50 लाख रुपये दिए गए हैं। लेकिन गांव वालों का आरोप है कि यह राशि अपर्याप्त है और उन्हें कम से कम 25 लाख रुपये प्रति परिवार मिलना चाहिए।

दूसरी ओर ग्रामीण 25 लाख रुपये मुआवजा, हर वयस्क को अलग राशि, जमीन का उचित दाम और महिलाओं को भी अलग से मुआवजा देने की मांग पर कायम हैं। अमित भटनागर ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा, “हम सड़क से समाधान की ओर बढ़ना चाहते हैं। लेकिन अगर प्रशासन बल का प्रयोग करेगा और अन्याय करेगा, तो हम इसका जोरदार विरोध करेंगे।” वहीं पिछले कड़वे अनुभवों के बावजूद भगवती आदिवासी का कहना है कि उनकी मांग पूरी हुए बिना वे बांध नहीं बनने देंगी, चाहे उनकी जान ही क्यों न चली जाए।
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