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कृषि हादसे में मृत खेतिहर मजदूर का परिवार मुआवज़े से वंचित क्यों?

थ्रेशर हादसे में सुमित की मौत को डेढ़ साल हुए, पर राजगढ़ के परिवार को कृषक जीवन कल्याण योजना का मुआवजा नहीं मिला।
कृषि हादसे में मृत सुमित की दादी खेत में काम करते हुए । फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी
कृषि हादसे में मृत सुमित की दादी खेत में काम करते हुए । फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

राजगढ़ जिले के बेरियाखेड़ी गांव के खेतिहर मजदूर पुरुषोत्तम के परिवार में उनकी पत्नी, तीन बेटियां, एक पुत्र और माता-पिता हैं। मार्च 2025 में उनके बड़े बेटे सुमित की कृषि कार्य के दौरान थ्रेशर मशीन में फंसकर मौत हो गई। लेकिन परिवार अभी तक मुख्यमंत्री कृषक जीवन कल्याण योजना के तहत मिलने वाले मुआवजे से वंचित है।

मध्यप्रदेश सरकार की इस योजना के तहत कृषि कार्यों के दौरान होने वाले हादसों में आंशिक अपंगता पर 50 हजार रुपये, स्थायी अपंगता पर एक लाख रुपये और मृत्यु की स्थिति में चार लाख रुपये की सहायता राशि एवं अंत्येष्टि के लिए चार हजार रुपये दिए जाने का प्रावधान है। फिर भी जमीनी स्तर पर इन हादसों को साबित करने और मुआवजा दिलाने में पीड़ित परिवारों को सालों लग जाते हैं।

देश भर में 45 हज़ार मौतें

मृतक सुमित के परिवारजन। फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी
मृतक सुमित के परिवारजन। फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

राजगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर बेरियाखेडी में पुरुषोत्तम अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों के साथ पैतृक खेत में बने मकान में रहते हैं। उनकी पत्नी उर्मिला भी मजदूरी करती हैं। माता-पिता वृद्ध हैं और घर-खेती संभालते हैं, जबकि बच्चे स्कूल जाते हैं। पूरा परिवार मजदूरी पर ही आश्रित है।

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पुरुषोत्तम बताते हैं, “सुमित ने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। घटना से एक साल पहले से ही वह गांव में मजदूरी करने लगा था।” पड़ोसी गोवर्धन घटना का वर्णन करते हुए कहते हैं, “सुमित के मशीन में पिस जाने की खबर सुनते ही हम मौके पर पहुंचे। मशीन के नीचे खून ही खून पड़ा था। सुमित मशीन के अंदर था और उसके शरीर के बारीक-बारीक टुकड़े हो गए थे।”

इस हादसे ने पूरे परिवार को तोड़ दिया। पुरुषोत्तम भावुक स्वर में कहते हैं, “उसकी याद न आए, इसलिए हमने उसका सारा सामान उसके साथ आग के हवाले कर दिया।” उनके पिता कनीराम रोते हुए कहते हैं, “वो तो मेरे बुढ़ापे की लकड़ी थी, लेकिन वही टूट गई।”

यह अकेला मामला नहीं है। केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान (CIAE), भोपाल के पूर्व परियोजना समन्वयक डॉ. एल.पी. गीते के अध्ययन के अनुसार, फार्म मशीनरी से होने वाली कुल दुर्घटनाओं में थ्रेशर (विनोवर सहित) की हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत है। प्रति हजार थ्रेशर मशीनों पर दुर्घटना दर 10.6 है। देशभर में हर साल कृषि क्षेत्र में अनुमानित 7.6 लाख दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें करीब 45 हजार मजदूरों की मौत हो जाती है। सीआईएई द्वारा मध्य प्रदेश में कृषि एक्सीडेंट से जुड़े 1995-96, 2004-05 और 2012-13 के सर्वेक्षणों में जानलेवा एक्सीडेंट क्रमशः 9.2%, 6% और 10.5% बताए गए थे।

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अब तक नहीं मिला मुआवजा

सुमित के पिता पुरुषोत्तम अपनी व्यथा बताते हुए। फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी
सुमित के पिता पुरुषोत्तम अपनी व्यथा बताते हुए। फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

सुमित के साथ हुई दुर्घटना के तुरंत बाद 16 मार्च 2025 को मर्ग कायम हुआ। पुरुषोत्तम ने मर्ग रिपोर्ट सहित तमाम दस्तावेज लगाकर मुख्यमंत्री कृषक जीवन कल्याण योजना के तहत आवेदन किया। 14 नवंबर 2025 को कलेक्टर कार्यालय से पत्र आया, जिसमें मर्ग के बाद दर्ज एफआईआर के दस्तावेज मांगे गए। तहसील कार्यालय सुठालिया ने दोबारा दस्तावेज लगाकर कलेक्टर कार्यालय भेज दिए। लेकिन परिवार को अभी तक मुआवजा राशि नहीं मिली।

ग्राम पंचायत सचिव ओमप्रकाश शर्मा बताते हैं, “सुमित की मौत के बाद पटवारी की रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज तहसील कार्यालय भेज दिए गए थे। वर्तमान में मामला कलेक्टर कार्यालय में पेंडिंग है। डेढ़ से दो साल हो चुके हैं। यह गरीब खेतिहर मजदूर का परिवार है, जो सिर्फ मजदूरी पर निर्भर है।”

सरपंच कमल पंवार कहते हैं, “मैं स्वयं कलेक्टर से तीन बार बात कर चुका हूं। पहले दस्तावेज पूरे नहीं थे, इसलिए मंगवाए गए। अब सब कुछ आ गया है, तो कहा जा रहा है कि प्रकरण मंडी बोर्ड भेज दिया गया है और वहीं से स्वीकृति होगी। जब भी जाता हूं, यही जवाब मिलता है कि भेजा हुआ है। आने वाली होली तक इस पूरे मामले को दो साल हो जाएंगे।”

ग्राउंड रिपोर्ट की पड़ताल में पता चला कि इस मामले में खेत मालिक पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 (लापरवाही से मृत्यु) के तहत प्रकरण दर्ज है। पुलिस कोर्ट में चार्जशीट भी दाखिल कर चुकी है और मामला न्यायालय में विचाराधीन है।

डिप्टी कलेक्टर निधि भारद्वाज कहती हैं, “यदि कृषि कार्य के दौरान मृत्यु का कोई केस है तो हमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट और यदि एफआईआर दर्ज हुई है तो उसकी ख़ात्मा रिपोर्ट भी चाहिए होती है, जिससे मृत्यु का कारण स्पष्ट हो सके। कलेक्टर के संतुष्ट होने पर राशि के लिए मंडी बोर्ड को पत्र लिखा जाता है और पैसा हितग्राही के खाते में ट्रांसफर किया जाता है। हालांकि सुमित का केस मेरे संज्ञान में नहीं है।”

राजगढ़ में ऐसे कई मामले

सुमित के परिवार वाले खेत में काम करते हुए । फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी
सुमित के परिवार वाले खेत में काम करते हुए । फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

मर्ग रिपोर्ट, पुलिस की एफआईआर और न्यायालय में पेश चालान रिपोर्ट के मुताबिक सुमित की मौत कृषि कार्य के दौरान हुई लापरवाही का नतीजा है, हालांकि मामला न्यायालय में विचाराधीन है।

राजगढ़ कलेक्टर कार्यालय से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, एक जनवरी 2024 से 9 अक्टूबर 2026 तक मुख्यमंत्री कृषक जीवन कल्याण योजना के तहत जिले में कुल 62 प्रकरण रजिस्टर किए गए हैं। इनमें से 37 प्रकरण स्वीकृत किए गए हैं, लेकिन उनमें से 15 प्रकरणों में अभी तक राशि नहीं डाली गई है। 12 प्रकरण अलग-अलग कारणों से रिजेक्ट किए गए हैं। सुमित का प्रकरण मार्गदर्शन के लिए भेजा गया है, जबकि 12 प्रकरण अभी प्रोसेस में हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि सिर्फ सुमित का मामला नहीं, बल्कि कई परिवारों को राशि मिलने में देरी हो रही है।

ऐसे मामलों में मुआवजा मिलने में देरी के मसले केवल राजगढ़ जिले तक सीमित नही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार शाजापुर जिले में भी कृषि कार्य के दौरान हुए एक हादसे को साबित करने के लिए मृतक के परिवार को करीब 8 महीनों तक भटकना पड़ा था। लेकिन जैसे ही विधानसभा में प्रश्न लगा, पीड़ित परिवार के खाते में राशि डाल दी गई।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक ग्राम खेड़ीनगर निवासी रविकुमार की मौत करंट लगने से हुई थी। जनपद पंचायत शुजालपुर ने इसका आवेदन करंट यानी दुर्घटना से हुई मौत की जगह सामान्य मौत की श्रेणी में संबल योजना में अनुग्रह राशि के लिए ऑनलाइन कर दिया।

परिजनों ने जब अफसरों को बताया कि बेटे की मौत दुर्घटना में हुई है और उन्हें सामान्य मौत का मुआवजा दिया जा रहा है, तो अफसरों ने श्रम अधिकारी शाजापुर को 4 सितंबर 2018 को चिट्ठी लिखकर खानापूर्ति कर दी। परिजन भटकते रहे और साल (2018-19) में जब शुजालपुर विधायक इंदर सिंह परमार ने विधानसभा में प्रश्न लगाकर सरकार से सवाल पूछा, तो साल भर तक मृतक के परिजनों को चक्कर लगवाने वाले अफसर सक्रिय हो गए और 13 मई 2019 को मृतक के लिए नियम अनुसार चार लाख की राशि स्वीकृत की गई और राशि को विशेष प्रकरण मानते हुए उसके परिजनों को खाते में भेज दिया गया।

शाजापुर जिला प्रशासन ने इस मामले में देरी की वजह कृषक जीवन कल्याण योजना के लिए पृथक से संचालित बैंक खाते को बंद किए जाने की वजह से राशि डालने में विलंब होना बताया। विधायक इंदरसिंह परमार ने दैनिक भास्कर से चर्चा में सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा सरकारी कल्याणकारी योजनाओ का पात्र हितग्राहियों को लाभ नहीं मिल रहा है और सरकार दोषियों को बचाने का काम कर रही है।

मशीनी असुरक्षा का सवाल

किसान के घर रखी हुई थ्रेशर मशीन । फोटो: पल्लव जैन
किसान के घर रखी हुई थ्रेशर मशीन । फोटो: पल्लव जैन

खेत मालिक सोनू मीणा, जिन पर लापरवाही का केस दर्ज है, ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, “सुमित मेरे ही खेत में गेहूं की फसल निकालने आया था। थ्रेशर मशीन का ऊपर का ढक्कन निकला हुआ था, जिसमें से भूसा उड़ रहा था। उसे ढकने के लिए वो ऊपर चढ़ा था। हैरानी की बात यह है कि जब मशीन ऑटोमैटिक बंद हो गई, तभी हमें पता चला कि यह घटना हो गई है।”

कृषि कार्य के दौरान थ्रेशर मशीनों से होने वाले हादसों को लेकर हमने किसानों, स्थानीय मैकेनिक शम्स खान और इंजीनियरिंग वर्कशॉप चलाने वाले कुछ मैकेनिकों से बात की। सभी का कहना एक ही है, इन मशीनों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होते। ज्यादातर मशीनें जुगाड़ से तैयार की जाती हैं, जिनका कोई प्रमाणीकरण नहीं होता। थोड़ी-सी चूक सीधे अपंगता या मौत का कारण बन जाती है। सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी मजदूर पर ही छोड़ दी जाती है।

भारत में पावर थ्रेसर के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने कड़े नियम बनाए हैं, जिनमें ‘IS 9020’ सबसे मुख्य सुरक्षा मानक है। इस नियम के तहत हादसों से बचने के लिए फसल डालने वाली चूट की लंबाई कम से कम 90 सेमी होना और मशीन के सभी घूमते पुर्जों पर लोहे का सुरक्षा कवर होना अनिवार्य है। इसके अलावा परीक्षण संहिता (टेस्ट कोड) ‘IS 6284’ के अनुसार थ्रेसर को न्यूनतम 98% गहाई क्षमता और 2% से कम दाना टूटने का नियम पूरा करना होता है। इन्हीं BIS मानकों पर पास होने वाली मशीनों को ही सुरक्षित माना जाता है और उन्हीं पर सरकारी सब्सिडी या लोन मिलता है।

सुमित की मौत को डेढ़ साल से अधिक हो चुका है। परिवार अभी भी मुआवजे का इंतजार कर रहा है। सवाल यह है कि जब दस्तावेज पूरे हैं और मौत का कारण साफ है, तो मुआवजा दिलाने में इतनी देरी क्यों हो रही है? क्या खेतिहर मजदूरों की जान की कीमत सिर्फ कागजी प्रक्रिया तक सीमित रह गई है? और सबसे बड़ी बात, क्या थ्रेशर जैसी खतरनाक मशीनों पर सुरक्षा मानकों को लागू करने की कोई व्यवस्था कभी बनेगी?

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  • Abdul Wasim Ansari is an independent journalist based in Rajgarh, Madhya Pradesh, bringing nearly a decade of experience in journalism since 2014. His work focuses on reporting from the grassroots level in the region.

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