इंदौर जिले में पानी को लेकर लगातार बन रही मुश्किलों के बीच इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा ने 27 अक्टूबर को इंदौर जिले (ग्रामीण तथा शहरी) को जल आभावग्रस्त घोषित कर दिया। यह घोषणा मध्य प्रदेश पेयजल परिरक्षण अधिनियम, 1986 और अधिनियम के 2002 संशोधन के तहत की गई। आदेश के मुताबिक जिले में निजी नलकूप खनन पर आगामी आदेश तक प्रतिबंध लगा दिया गया।
इसके बाद इंदौर जिले में राजस्व, पुलिस एवं नगर निगम अधिकारियों को अवैध रूप से नलकूप खनन और बोरिंग खोदाई में उपयोगी मशीनें जप्त करने और संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई का अधिकार मिल गया। मध्य प्रदेश पेयजल परिरक्षण अधिनियम की धारा 3 या धारा 4 के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर 2,000 रुपये तक के जुर्माने, दो वर्ष तक का कारावास या दोनों से दंडित किए जाने का प्रावधान है। हालांकि शासकीय नलकूप उत्खनन को छूट है और ज़रुरत पड़ने पर प्रशासन निजी जलकूपों के साथ दूसरे निजी जल स्रोतों का सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था के लिए धारा 4 के अंतर्गत अधिग्रहण कर सकता है।
मगर इस फौरी कार्रवाई के बीच इंदौर का एक हिस्सा गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। यहां रहने वाले लोग हाशिए के तबके से आते हैं। फिर भी इन तक सुविधाएं नहीं पहुंची। नर्मदा पाइपलाइन के चौथे चरण में इन्हें थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है मगर उसे पूरा होने में अभी 3 साल और हैं।

लगातार बढ़ता जल संकट
मध्य प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में स्थित इंदौर जिले में इस साल 1 जून से 28 सितंबर के दौरान 633.1 मिमी बारिश हुई। मौसम विभाग के अनुसार यह सामान्य (863.4 मिमी) से 27% कम है। इंदौर शहर बीते गर्मी के महीनों में अप्रत्याशित जल संकट का सामना कर रहा था। मानसून की अल्प वर्षा ने इस संकट को और बढ़ा दिया।
नगर निगम से मिली जानकारी के अनुसार अभी इंदौर शहर को हर दिन यशवंत सागर से 30 मिलियन लीटर (एमएलडी) और नर्मदा से 415 एमएलडी पानी मिलता है। शहर में 83% जलापूर्ति पाइपलाइन से होती है मगर बचे हुए लोग नलकूप या टैंकर पर निर्भर हैं।
वर्तमान संकट से सबसे बुरी मार 2014 में निगम सीमा में जुड़े 29 गांव झेल रहे हैं। 2011 की जणगणना के अनुसार इन गांवों की आबादी 2 लाख थी। फिलहाल यहां मतदाताओं की संख्या 2.60 लाख और आबादी के 5 लाख से ज़्यादा होने का अनुमान है।
इनमें से वार्ड 16 की लगभग सत्तर फीसद आबादी नर्मदाहीन है। 54 कॉलोनियों का यह क्षेत्र निम्न मध्यम वर्ग और सांवेर उद्योग क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूर आबादी से भरा है।
पार्षद प्रतिनिधि मुकेश धारकर ने बताया, “लगभग 80000 आबादी है और पानी के लिए सभी सरकारी बोरिंग पर निर्भर हैं। क्षेत्र में छोटा बांगड़दा तालाब है जो आज सूखा पड़ा है। पिछले साल इसे कब्जाने की कोशिश में कुछ लोगों ने यहां सौ-डेढ़ सौ डंपर मलबा डाल दिया। कलेक्टर के हस्तक्षेप से कब्जा तो रुका लेकिन मलबा साफ़ ना होने की वजह से तालाब नहीं बचा।”
इसी तरह वार्ड 37 के पार्षद प्रतिनिधि महेश जोशी ने बताया, “वार्ड के आठ में से छह सेक्टर में दिक्कत है। अभी से ही आधी जगह पानी नहीं है और आधी जगह प्रेशर नहीं है।”
कहां खर्च होंगे 50 करोड़
इन परेशानियों के चलते नगर निगम क्षेत्र में जलापूर्ति के लिए महापौर ने मुख्यमंत्री से अतिरिक्त 50 करोड़ रुपए की मांग की। इंदौर नगर निगम इस राशि का उपयोग नए टैंकर खरीदने, टंकी निर्माण, बोरिंग एवं हाईड्रेन्ट खोदाई, साथ ही अन्य जलापूर्ति कार्य के खर्चों के लिए करेगी।
अपर आयुक्त आशीष पाठक ने बताया, “फिलहाल की स्थिति में उन इलाकों की पहचान और आकलन हो रहा है जहां गर्मियों में स्थिति ख़राब हो सकती है।”
वार्ड 81 के पार्षद और चतुर्थ नर्मदा फेज के जल-कार्य प्रभारी अभिषेक शर्मा ने बताया, “शहर में कुल 6040 बोरिंग हैं जिनमें 361 बंद हैं। जल आपूर्ति के लिए 200 नए बोरिंग और 71 नए हाईड्रेन्ट (टैंकर इत्यादि को भरने में उपयोगी उच्च क्षमता और प्रेशर का जल निकासी) बनेंगे।”

नर्मदा के ज़रिए जलापूर्ति
निगम ने अपने एक सर्वे में बताया कि कुल 52 हज़ार परिवारों तक नर्मदा लाइन नहीं पहुंचती और 33 हज़ार परिवार पूर्ण रूप से टैंकर पर निर्भर हैं। शर्मा ने बताया कि 2013 में नर्मदा के तृतीय फेज के दौरान शहर की आबादी 23 लाख और तीन लाख घर थे। लेकिन आबादी बढ़कर 40 लाख और घरों की संख्या 8 लाख हो चुकी है।
नर्मदा के चतुर्थ चरण के बजट में लगातार वृद्धि होते रही है और 2029 तक पूरे इंदौर को नर्मदा पानी पहुंचाने का टारगेट है। 2500 करोड़ की लागत से तैयार इस योजना में सरकार से 800 करोड़ की सहायता मिलेगी, बाकी ऋण होगा।
2050 तक की जलापूर्ति योजना और 24/7 पानी की सुलभता को ध्यान में रखते हुए इस परियोजना में शहर की पानी सप्लाई को बढ़ाकर 900 एमएलडी पहुंचाना और अमूमन 65 लाख की आबादी को ध्यान में रखते हुए तैयार किया है।
जल संसाधन प्रबंधन विशेषज्ञ सुधींद्र मोहन शर्मा बताते हैं, “इंदौर में ग्राउंड वाटर की चिंताजनक स्थिति आज की बात नहीं है। भू-जल के प्रति हमारी संवेदना शून्य रही हैं। अब हम इसके प्रति सजग हुए हैं इसीलिए पिछले 4 साल में दोहन का फीसद 121 से घट कर 117 हुआ है।” उन्होंने भविष्य के आसन्न खतरों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा, “इस साल आस-पास के जिलों, जैसे बड़वानी, खंडवा और खरगोन में कम बारिश हुई है, जिसके चलते रोज़गार की तलाश में लोग इंदौर आएंगे, तब जल प्रबंधन एक चुनौती होगी।”
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