Skip to content

मेघनगर इंडस्ट्रियल एरिया प्रदूषण: क्या प्रदर्शन और कार्रवाई से कुछ बदला?

औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किए और फैक्ट्रियां अस्थाई तौर पर बंद भी हुईं मगर इन सबसे क्या बदल गया?

5 सितंबर को झाबुआ जिले के मेघनगर इंडस्ट्रियल एरिया से उत्पन्न जल एवं वायु प्रदूषण की समस्या और उसके प्रभावी समाधान के संबंध में कलेक्टर डॉ योगेश तुकाराम भरसट और पुलिस अधीक्षक देवेंद्र पाटीदार ने बैठक आयोजित की। 

बैठक में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर डॉ भरसट को बताया कि निरीक्षण के दौरान मध्यभारत इंडस्ट्री, राठौर इंडस्ट्री, सिद्धिविनायक इंडस्ट्री एवं शीतल इंडस्ट्री में निर्धारित मापदंडों के पालन में अनियमितताएं पाई गई थीं। इस पर भरसट ने इन औद्योगिक इकाइयों को तत्काल सील करने के निर्देश दिए।

बैठक में 4 फैक्ट्रियों को सील करने के अलावा कलेक्टर डॉ भरसट ने कहा कि मेघनगर क्षेत्र में प्रदूषण की समस्या के स्थाई समाधान के लिए शॉर्ट टर्म एवं लॉन्ग टर्म एक्शन प्लान तैयार किया जाए। शार्ट टर्म प्लान में तत्काल राहत और प्रदूषण नियंत्रण के उपाय शामिल करने जबकि लॉन्ग टर्म में पानी, हवा, कचरा प्रबंधन, सुरक्षित पानी और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित स्थायी व्यवस्थाएं विकसित की जाएं।

Advertisements

हालांकि इस कार्रवाई के बावजूद 3 दिन बाद स्थानीय लोगों ने प्रदूषण के खिलाफ एक रैली का आयोजन किया। इस रैली के आयोजक राज मुनिया ने बताया कि उन्होंने 1 सितंबर से ही रैली की तैयारी शुरू कर दी थी। उनका मानना था कि कलेक्टर की कार्रवाई के बाद भी मामले का स्थाई समाधान निकले इसलिए ज़रूरी है कि सभी ग्रामीण एकजुट रहें।

meghnagar Pollution Story 8
फतेहपुरा के एक तालाब में भरा प्रदूषित पानी | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

मेघनगर इंडस्ट्रियल एरिया मध्य प्रदेश के सबसे पुराने औद्योगिक क्षेत्र में से एक है। यहां न तो प्रदूषण की समस्या नई है, ना ही इस तरह की कार्रवाई। हालांकि इस बार आंदोलन के नेतृत्व करने वाले लगातार प्रदर्शन और सोशल मीडिया के इस्तेमाल जैसे तरीके अपना रहे हैं। उन्हें यह उम्मीद भी है कि स्थानीय प्रशासन उनकी बात सुनकर समस्या का कोई स्थायी हल निकालेगा। जबकि कई स्थानीय लोग इस बात से बहुत सहमत नहीं नज़र आते। 

लगभग 2 साल पहले की तरह स्थानीय प्रशासन इस बात को लेकर खुल कर नहीं बोल रहा कि जिन फैक्ट्रियों को बंद किया गया है आखिर उनमें क्या अनियमितता थीं? साथ ही मौके पर एमपीसीबी ने जो सैम्पल लिए हैं उनका स्टेटस न तो ग्रामीणों को पता है ना ही प्रशासन ने सार्वजनिक किए हैं। 

Advertisements

प्रदूषित करता इंडस्ट्रियल एरिया

1984 में विकसित किया गया मेघनगर इंडस्ट्रियल एरिया 223.75 हेक्टेयर में फैला है। 2024 में हमें सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार मेघनगर में तब तक 9 एग्रो-केमिकल फैक्ट्रियां संचालित हो रही थीं। जबकि सितम्बर 2026 को फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान मिली जानकारी के अनुसार यहां कम से कम 21 एग्रोकेमिकल मेनुफेक्चरिंग यूनिट्स हैं। यहां एग्रोकेमिकल से मतलब कृषि के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी तरह के रासायनिक पदार्थों से है। 

इंडस्ट्रियल एरिया के अंतर्गत आने वाले फ़तेहपुरा के लोगों ने शिकायत की के फैक्ट्रियों से निकलने वाले केमिकल युक्त पानी और धुंए से उनकी फसलें ख़राब हो रही हैं। फ़तेहपुरा के अरविंद मुनिया ने मूंगफली, कपास, अरहर और मक्के की फसल दिखाते हुए हमसे कहा कि धुंए के चलते फसल के पत्ते जल गए हैं। इसी तरह रामसिंह मुनिया ने कहा कि उनके गांव के एकमात्र तालाब का पानी केमिकल प्रदूषण के चलते लाल हो चुका है जिससे सिंचाई करने पर उनकी फसलें ख़राब हो रही हैं। 

झाबुआ से मेघनगर आते हुए ‘गारिया नाला’ दिखाई देता है। यह नाला औद्योगिक क्षेत्र से निकल कर लोगों के खेतों से गुज़रता है और जंगल के रास्ते होते हुए माही नदी की सहायक अनास नदी में मिल जाता है। मेघनगर औद्योगिक क्षेत्र से अनास नदी की दूरी लगभग 6 किलोमीटर है। यहां रहने वाले ग्रामीणों की शिकायत है कि इस नाले का पानी पीने से उनके मवेशी और जंगली जानवर मर जाते हैं।

झाबुआ के डिस्ट्रिक एनवायरनमेंट प्लान 2025 (DEP, 2025) के अनुसार यह क्षेत्र माही नदी को डिज़ॉल्व्ड ऑक्सीजन (DO), टोटल डिज़ॉल्व्ड सॉलिड्स (TDS), और pH लेवल जैसे पैमानों में प्रदूषित करता है। गौरतलब है कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत इन उद्योगों को कॉमन इफ़्लुएन्ट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) लगाना अनिवार्य है। फिलहाल जिले में केवल एक ही सीईटीपी काम कर रहा है। मगर यह कहां पर लगा हुआ है और इसकी क्षमता कितनी है, इसका कोई भी विवरण डीईपी 2025 में नहीं है।

“ऐसी इंडस्ट्री जिनसे द्रव अपशिष्ट निकलता है उन्हे खुद ही ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करके इसका उपचार करना होता है। वह इसे बाहर नहीं छोड़ सकते हैं,” मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डॉ नीरज वर्मा ने बताया। “हम किसी भी उद्योग को तभी पर्यावरणीय सहमती देते हैं जब वह या तो खुद का इफ़्लुएन्ट ट्रीटमेंट प्लांट लगवाए या फिर किसी औद्योगिक क्षेत्र के कॉमन सीईटीपी के ज़रिए अपने अपशिष्ट का उपचार करे।”

meghnagar Pollution Story 7
सितंबर के दूसरे हफ्ते में अरविंद मुनिया के खेत की फसलों के पत्ते गहरे भूरे रंग के हो चुके थे | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

इन आरोपों पर कलेक्टर डॉ भरसट ने कृषि विभाग को फसलों और कृषि भूमि पर पड़ रहे संभावित प्रभाव का विस्तृत सर्वे करने के निर्देश दिए। इसी तरह पशुपालन विभाग को प्रभावित क्षेत्रों में मवेशियों के स्वास्थ्य पर प्रदूषण के प्रभाव का परीक्षण करने को कहा। जल स्त्रोतों में प्रदूषण को मिलने से रोकने के लिए कलेक्टर ने कॉमन एफ्लुएंट कलेक्शन संप्स के अधूरे काम को पूरा करने का भी निर्देश दिया। इससे प्रदूषित पानी को कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) तक पहुंचाया जा सकेगा। 

10 साल पुरानी समस्या 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मेघनगर में प्रदूषण की समस्या लगभग 10 साल पुरानी है। 2015 में औद्योगिक केंद्र विकास निगम ने इसके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने का निर्णय लिया था। मगर इसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं है। अरविंद मुनिया ने मुझे अपनी बच्ची के पैर पर उभरी फुंसियों को दिखाते हुए दावा किया कि उसे यह समस्या खेल-खेल में पास स्थित तालाब के पानी नहाने के कारण हुई है। ऐसे ही दावे कुछ और लोगों ने भी किए।     

राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण की 16 मार्च 2018 को हुई बैठक में यह बताया गया था कि प्लॉट नंबर 193 के 4047 वर्ग मीटर के दायरे में हानिकारक अपशिष्ट (hazardus waste) और प्रदूषित पानी पाया गया था। स्थानीय शिक्षक और औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन करने वाले राज मुनिया का मानना था कि फैक्ट्रियों के अपशिष्ट से उनका भूजल भी प्रदूषित हो रहा है। हालांकि इस दावे की कोई भी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।

मगर कलेक्टर डॉ भरसट ने कहा था कि जिन क्षेत्रों में जल प्रदूषण की आशंका है, वहां जल स्रोतों एवं पेयजल की नियमित जांच और वैकल्पिक सुरक्षित पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। इसी तरह की समस्या से जूझ रहे मुंबई के डोम्बिवली इंडस्ट्रियल बेल्ट में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि औद्योगिक क्षेत्र के भूजल में कॉपर, निकिल, क्रोमियम और लेड (Cu, Ni, Cr & Pb) अत्यधिक मात्रा में उपस्थित है। 

meghnagar Pollution Story 3
अरविंद अपने बच्चे के पैर पर उभरी फुंसियों को दिखाते हैं | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

कितने बदले हालात?

बीते सितम्बर की तरह 2016 में भी तत्कालीन ज़िला कलेक्टर ने 8 इकाइयों पर 14 दिन के लिए उत्पादन पर रोक लगा दी गई थी। फतेहपुरा की महिला ने बताया कि हर बार प्रदर्शन के बाद इस तरह की कार्रवाई होती है मगर कुछ भी नहीं बदलता। 

इस बार भी सील किए जाने के 18 दिन बाद ही मध्यभारत प्राइवेट लिमिटेड की फैक्ट्री को दोबारा खोल दिया गया। द फ्री प्रेस जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक संबंधित फैक्ट्री से कोई भी प्रदूषित पानी निकलता हुआ नहीं पाया गया। जब हमने इसकी ऑनलाइन मॉनिटरिंग रिपोर्ट देखनी चाही तो पता चला कि इस यूनिट में या तो ट्रीटमेंट, या फिर ऑनलाइन सतत निगरानी प्रणाली (OCEMS), या फिर दोनों ही काम नहीं कर रहे हैं।   

स्थानीय पत्रकार और सोशल मीडिया क्रिएटर अनिल मुनिया ने ही इस बार प्रदूषण के मुद्दे पर स्थानीय लोगों को एकजुट किया था। वो फैक्ट्रियां खोलने के कदम से निराश और गुस्से में दिखाई दिए। 5 सितंबर की कार्रवाई के बाद जब मैंने पहली बार अनिल मुनिया से बात की थी तो उन्होंने इस बात को बार-बार दोहराया कि चूंकि इस बार कलेक्टर ने यहां दौरा किया है इसलिए उनकी सारी दिक्कतें कम हो जाएंगी। उनके साथ इस मुहिम में शामिल राज मुनिया ने भी इस बात पर सहमति जताई थी। 

मगर अब इनका आरोप है कि सभी फैक्ट्रियों को दोबारा खोल दिया गया है और हालात में कोई सुधार नहीं हुआ। ऐसे में अनिल मुनिया सोशल मीडिया पर लगातार स्थानीय प्रदूषण से संबंधित कंटेंट डालकर लोगों को एकजुट करने में लगे हुए हैं।   

अरविंद मुनिया ने बताया कि एक महीना बीत लाने के बाद भी कलेक्टर के अलावा उनके खेत का सर्वे करने के लिए कोई नहीं आया। हालांकि इस बीच एक बार फिर मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गारिया नाले से पानी के सैम्पल्स लिए थे। अरविंद मुनिया मानते हैं कि लगातार प्रदर्शनों के आयोजनों से ही प्रशासन कोई ठोस कार्रवाई करने के लिए बाध्य होगा। राज मुनिया ने कहा कि सभी ग्रामीणों के बीच जल्द ही फिर से प्रदर्शन के लिए बैठक की जाएगी और तभी इसकी तारिख का ऐलान होगा। 


भारत में स्वतंत्र पर्यावरण पत्रकारिता को जारी रखने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को आर्थिक सहयोग करें। 


यह भी पढ़ें 

मध्य प्रदेश की राजकीय मछली महाशीर का अस्तित्व संकट में

गरीबी में जी रहे हैं सीहोर के मछली पालक, जलाशयों पर अमीर दबंगों का कब्ज़ा


पर्यावरण से जुड़ी खबरों के लिए आप ग्राउंड रिपोर्ट को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सएप पर फॉलो कर सकते हैं। अगर आप हमारा साप्ताहिक न्यूज़लेटर अपने ईमेल पर पाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें।

Author

  • Shishir Agrawal is the Hindi Editor of Ground Report. However he identifies himself as a young enthusiast passionate about telling tales of unheard. He covers environment and development affairs from the tribal landscape of central India.

    He has also covered issues related to agrarian crisis, wildlife, water, waste and urban development. He has been a recipient of several fellowships and grant. This includes Gandhi Fellowship, Vikas Samvad Media Fellowship and Earth Journalism Network Grant.

    Apart from having long conversations he indulges himself in reading books, watching theater and gazing at flying objects for leisure. He can be reached at shishiragrawl007@gmail.com.

    View all posts Hindi Editor

Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

Connect With Us

Send your feedback at greport2018@gmail.com

Newsletter

Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.

When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.

Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.

EXPLORE MORE

LATEST

mORE GROUND REPORTS

Environment stories from the margins