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पल्लव जैन से जानिए मप्र में कस्टम हायरिंग सेंटर्स की स्थिति कैसी है? 

असम में बाढ़ के अलर्ट से लेकर मप्र में किसानों के प्रदर्शन तक जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ

भूटान में झील फटी; बंगाल में अलर्ट, सूखे को लेकर गुजरात में प्रदर्शन, प्रदूषण उपायों से मज़दूर परेशान, अफीम उत्पादक किसानों की रैली। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ। 


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प्रमुख ख़बरें

भूटान की शिंताफू झील फटने से संकोश नदी का जलस्तर अचानक काफी बढ़ गया। इसके चलते पश्चिम बंगाल में 12,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। असम के धुबरी और कोकराझार जिलों में भी हाई अलर्ट जारी किया गया है। 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात दौरे के बीच कांग्रेस ने ‘किसान अधिकार धरना’ दिया। यह प्रदर्शन कम बारिश, फसल नुकसान और सूखे की समस्या को लेकर किया गया। उन्होंने मांग की है कि प्रभावित इलाकों को आधिकारिक रूप से सूखाग्रस्त घोषित किया जाए।

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दिल्ली में शीतकालीन कार्य योजना और GRAP के तहत 1 नवंबर से निर्माण कार्य बंद हो रहे हैं। इस पाबंदी से पहले बिल्डर तेजी से काम पूरा करने में जुटे हैं। दूसरी ओर, प्रवासी निर्माण मजदूरों को महीनों तक बिना मजदूरी रहने का संकट सता रहा है। काम बंद होने की आशंका से कई मजदूर अपने गांवों की ओर लौटने की तैयारी कर रहे हैं।


ओडिशा के कंधमाल जिले में चक्रवात अर्नब के कारण हुए भूस्खलन में एक ही परिवार के 3 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में एक 9 महीने का मासूम बच्चा भी शामिल है। गंजाम जिले में भारी बारिश से 300 से अधिक गांव जलमग्न हो गए हैं।


मध्य प्रदेश और राजस्थान के अफीम उत्पादक किसानों ने नीमच में एक बड़ी रैली निकाली। किसानों ने अफीम का खरीद मूल्य बढ़ा कर 1 लाख रुपये प्रति किलो करने की मांग की है। बढ़ती लागत और नुकसान को देखते हुए वित्त मंत्री को छह सूत्रीय ज्ञापन सौंपा गया है। किसानों ने मार्फिन की सीमा बढ़ाने और पुराने लाइसेंस बहाल करने की मांग भी रखी है।

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विस्तृत चर्चा

कस्टम हायरिंग सेंटर्स से अनजान लोग

कस्टम हायरिंग सेंटर गांव स्तर पर मौजूद वह जगह है जहां से किसान खेती में काम आने वाले यंत्र और मशीनें, जैसे ट्रैक्टर, बखर, थ्रेशर, रोटोवेटर और स्प्रे पंप, किराये पर ले सकते हैं। मध्य प्रदेश में ज़्यादातर कस्टम हायरिंग केंद्र निजी संचालकों द्वारा चलाए जाते हैं, जिन्हें सरकार ने सब्सिडी देकर स्थापित करवाया है। इसका उद्देश्य यह है कि जो छोटे किसान महंगी मशीनें नहीं खरीद सकते, उन्हें ये मशीनें गांव में ही सस्ती दरों पर किराये पर मिल जाएं और वे अपना काम आसानी से कर सकें। इसीलिए खेती के मशीनीकरण के लिए सरकार कस्टम हायरिंग केंद्रों को बढ़ावा दे रही है।

मध्य प्रदेश में फार्म मैकेनाइज़ेशन की स्थिति 

अगर हम फार्म मैकेनाइज़ेशन की बात करें, तो मध्य प्रदेश देश में दसवें नंबर पर आता है। यानी यहां के किसानों के पास पंजाब और हरियाणा जितनी मशीनें नहीं हैं, और ज़्यादातर काम आज भी इंसानी मेहनत से ही हो रहा है। 

आप भी जब ग्राउंड पर रिपोर्टिंग करने जाते हैं, तो किसान अक्सर शिकायत करते हैं कि मज़दूर बहुत महंगे हैं और अब मिल भी नहीं रहे। इसका कारण यह है कि ज़्यादातर ग्रामीण युवा बेहतर नौकरी की तलाश में शहरों की ओर माइग्रेट कर रहे हैं। खुद किसानों के बच्चे भी पढ़ाई या नौकरी के लिए बाहर जा रहे हैं, इसलिए खेती का काम करने वाले हाथ कम हो गए हैं। ऐसे में मशीनों की ज़रूरत अब बढ़ रही है।

हमारी स्टोरी का विचार और पड़ताल 

हमारी इस स्टोरी का मूल विचार यहीं से आया। हम जानना चाहते थे कि जो कस्टम हायरिंग केंद्र इस समस्या को हल करने की कोशिश करते हैं, उनकी स्थिति आखिर कैसी है। इसके लिए हमने मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के निपानिया कला गांव और नर्मदापुरम के एक गांव के कस्टम हायरिंग केंद्रों की स्थिति को समझा, और साथ ही कई अलग-अलग केंद्र संचालकों से बात की।

हमने यह भी समझने की कोशिश की कि क्या इन केंद्रों पर स्थानीय ज़रूरत के हिसाब से वे मशीनें उपलब्ध हैं जो खेती से जुड़ी पर्यावरणीय समस्याओं को सुलझा सकें। जैसे पराली की समस्या बहुत बड़ी है। सरकार खुद इसका हल सुपर सीडर और हैप्पी सीडर जैसी पराली प्रबंधन मशीनों में खोज रही है, और राज्यों को अनुदान भी दे रही है ताकि वे सीएचसी (कस्टम हायरिंग सेंटर) के माध्यम से ये मशीनें किसानों तक पहुंचाएं।

ज़मीनी हालात 

सोयाबीन बेल्ट के निपानिया कला में हमने देखा कि वहां के कस्टम हायरिंग केंद्र में रेज़्ड बेड बनाने वाली मशीन और पराली प्रबंधन के लिए हैप्पी सीडर जैसी मशीन नहीं है। रेज़्ड बेड हो तो बारिश की अनियमितता में भी फसलें सुरक्षित रहती हैं, जबकि हैप्पी सीडर पराली का अच्छी तरह प्रबंधन कर सकती है।

वहीं नर्मदापुरम के धान बेल्ट में हमने पाया कि मल्चर और हैप्पी सीडर जैसी मशीनों के साथ-साथ धान की सीधी बुवाई करने वाली मशीनों की भी कमी है।

कस्टम हायरिंग केंद्रों के संचालकों ने बताया कि नई मशीनें खरीदने की प्रक्रिया जटिल है, और सरकारी सब्सिडी समय पर न मिलने की समस्या भी सामने आती है।

किसानों में जागरूकता की कमी 

गांव के किसानों में इन केंद्रों के बारे में जागरूकता भी बहुत कम पाई गई।

डेटा देखें तो इन केंद्रों की संख्या भी कम है। आमतौर पर एक केंद्र सिर्फ एक गांव की ज़रूरत पूरी कर पाता है, लेकिन हम देख रहे हैं कि जिस जिले में 500 से अधिक गांव हैं, वहां कस्टम हायरिंग केंद्र करीब 30 ही हैं।

ऐसे में मशीनों के ज़रिए कृषि को उन्नत बनाने का जो सपना सरकार देख रही है, वह अभी कोसों दूर दिखाई देता है।

इस स्टोरी से क्या समझ आएगा? 

अगर हमारे श्रोता यह स्टोरी पढ़ेंगे, तो उन्हें कम से कम यह स्पष्ट हो जाएगा कि मध्य प्रदेश की स्थिति क्या है। साथ ही यह भी समझ आएगा कि ये केंद्र फार्म मैकेनाइज़ेशन में कितनी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

अगर मैं इस स्टोरी को करने का अपना अनुभव बताऊं, तो मैं अपनी स्कूटी से गांवों तक पहुंचा था और हमने इसे भारी बारिश के बीच कवर किया था। ज़्यादातर ग्रामीणों ने तो “कस्टम हायरिंग केंद्र” शब्द पहली बार ही सुना था। सभी का यही कहना था कि वे बड़े किसानों से मशीनें किराये पर लेते हैं, और जब उन किसानों का काम निपट जाता है, उसके बाद अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं।

हमारी यह स्टोरी ग्राउंड रिपोर्ट डॉट इन पर हिंदी और अंग्रेज़ी में प्रकाशित हो चुकी है। मैं श्रोताओं से कहना चाहूंगा कि वे इसे ज़रूर पढ़ें।

ग्राउंड रिपोर्ट की बात

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Author

Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India

We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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