झाबुआ जिले की रामा तहसील के भुतेड़ी गांव के रहने वाले जुवान सिंह भाभर अपने पशुओं को लेकर चिंता में थे। अक्टूबर के पहले हफ्ते में उनके घर के एक हिस्से में मक्के के पौधे के अवशेष (कड़प), सोयाबीन के पौधे और कुछ हरा चारा रखा था। उनके घर में 2 बैल, 1 गाय सहित कुल 10 से अधिक मवेशी थे। उन्होंने कहा, “अभी मक्के का कड़प और चारा 1-2 महीने तो चल जाएगा उसके बाद हमारे पास खिलाने के लिए कुछ भी नहीं है।” जबकि पेटलावद तहसील के बड़लीपाड़ा की मुन्नी अरड़ ने अक्टूबर से ही अपने पशुओं को कम चारा खिलाना शुरू कर दिया ताकि 3-4 महीने चारा खरीदना न पड़े।
भाभर ने बताया कि आम तौर पर वो इस सीजन में पशुओं को बाहर चराने ले जाते थे। मगर इस बार बारिश की कमी के चलते गांव के आस-पास पर्याप्त घास नहीं है। फसल के अवशेष भी लोग अपने-अपने मवेशियों के लिए बचा रहे हैं।
मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में इस साल सामान्य से कम बारिश हुई है। किसानों ने कहा कि कम बारिश के चलते उनकी खरीफ की फसल की उत्पादकता प्रभावित हुई है। इसके साथ ही रबी की खेती होना मुश्किल जान पड़ रहा है। ऐसे में खरीफ के सीजन की फसलों के अवशेष ख़त्म होने के बाद चारे का संकट गहरा सकता है। चूंकि रबी के सीजन में गेहूं की फसल होने की संभावना भी कम है इसलिए उससे निकलने वाला चारा भी उपलब्ध नहीं होगा। हालांकि सरकारी दस्तावेज़ों और विशेषज्ञों ने इस स्थिति से निपटने के लिए विकल्प सुझाए हैं मगर जिला स्तर पर अब तक चारे के लिए कोई प्लान नहीं है।

अल नीनो का संकट
अल नीनो एक नेचुरल क्लाइमेट पैटर्न का हिस्सा है जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह असामान्य रूप से गर्म हो जाती है। यह तब होता है जब पूर्वी ट्रेड विंड्स कमजोर हो जाती हैं।
भारत मौसम विभाग, भोपाल केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक अरुण शर्मा ने बताया कि अल नीनो के चलते कहीं अत्यधिक बारिश तो कहीं सामान्य से कम बारिश देखने मिलती है। आम तौर पर अल नीनो के दौरान भारत में मानसून सामान्य से कमज़ोर होता है।
आईआईटी गांधीनगर द्वारा विकसित इंडिया ड्राउट मॉनिटर के अनुसार दक्षिण-पश्चिमी मानसून के अंत तक देश का 42.5% हिस्सा असामान्य सूखा या उससे भी विकट स्थिति में था। यूं भी इस साल का मानसून बारिश में 13% की कमी के साथ ख़त्म हुआ, जो एक दशक में सबसे ज्यादा थी।
मध्य प्रदेश का झाबुआ जिला देश के 262 और प्रदेश के 41 ऐसे जिलों में शामिल है जिन्हें अल नीनो के चलते वल्नरेबल की श्रेणी में शामिल किया गया था। 1 जून से 28 सितंबर तक दक्षिणी-पश्चिम मानसून के दौरान झाबुआ में 576.4 मिमी बारिश हुई थी। यह सामान्य (880.3 मिमी) से 35% कम है।

चारा संकट और बढ़ता आर्थिक बोझ
अरड़ 2 गाय, 2 बैल, 3 बकरियाँ और 1 भैंस सहित कुल 7 जानवर पालती हैं। वो बारिश के दौरान पशुओं को हरा चारा खिलाती हैं। जबकि खरीफ की फसल कटने के बाद मूंगफली, सोयाबीन और मक्का की फसल के अवशेष चारे की तरह इस्तेमाल करती हैं। मगर इस बार सिंचाई के साधन और बारिश न होने से उनके खेत में इन तीनों ही फसलों का उत्पादन घट गया।
भाभर ने कहा कि रबी के सीजन में गेहूं और मूंग की फसल कटने के बाद मालवा क्षेत्र से 800 रूपए प्रति क्विंटल के भाव से चारा लाना पड़ता है। उन्होंने आशंका जताई कि चूंकि इस बार सभी जगह बारिश कम है इसलिए चारे का भाव 1300 से 1500 रूपए प्रति क्विंटल तक बढ़ सकता है।
काजबी की अमरीबाई की आमदनी का बड़ा हिस्सा पशुपालन और दूध उत्पादन से आता है, ने बताया कि उन्हें हरे चारे के अलावा भूसे के लिए 30 हज़ार रूपए ट्रॉली तक खर्च करना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि अगले साल की बारिश तक उन्हें 80 हज़ार रूपए भूसे में खर्च करने पड़ेंगे।
जबकि कड़कनाथ, मुर्गे की ख़ास स्थानीय प्रजाति, पालने वाले विनोद मेडा ने बताया कि बीते 1 महीने में 50 किलो के फीड का एक बैग 350 रुपए बढ़कर 2150 रु का हो गया। उन्होंने कहा कि सूखे के चलते लोग मुर्गे खरीदने पर बहुत पैसा खर्च नहीं करना चाहते। चूंकि बाज़ार में कड़कनाथ का दाम देसी मुर्गे की तुलना में ज्यादा होता है इसलिए वो फिलहाल कड़कनाथ की बिक्री में गिरावट का सामना कर रहे हैं। उनके फ़ार्म में महीने भर में लगभग 7 क्विंटल फीड की खपत होती है। अगर बिक्री नहीं बढ़ी तो उनके लिए खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाएगा।

झाबुआ की तरह लगभग 450 किमी दूर स्थित गुजरात के राजकोट में भी सूखे के चलते पशुपालक चारे की कमी का सामना कर रहे थे। दैनिक भास्कर की एक खबर के अनुसार देखभाल न कर पाने के चलते वहां किसान मवेशियों को गौशाला में छोड़कर आ रहे थे।
हमने अमरीबाई से पूछा कि क्या आर्थिक बोझ बढ़ने पर वो भी ऐसा करने के बारे में सोच सकती हैं? इस पर उन्होंने कहा, “भले ही कितनी भी ज़मीन गिरवी रखनी पड़े मैं अपनी गाय माता को नहीं छोडूंगी। चाहे दूध दे या न दे। मेरे घर पे मेरी गौ माता होनी चाहिए।” वहीं मेडा ने कहा कि वो मुर्गियों को घाटे के बावजूद सस्ते दाम में बेचने पर विचार कर रहे हैं ताकि उन्हें फीड पर और खर्च न करना पड़े।
कृषि विज्ञान केंद्र, झाबुआ के प्रमुख डॉ जगदीश मौर्य ने चारे की कमी के कारण जानवरों के खाने में कटौती को गलत रणनीति बताया। उन्होने कहा, “इस तरह में जानवर कमज़ोर हो जाएगा और आने वाले दिनों में वो खेतों में काम नहीं कर सकेगा।” उन्होंने कहा कि कमज़ोरी के चलते जानवर हीटवेव और बीमारियों के प्रति संवेदनशील भी हो सकता है।
भारत में चारे की स्थिति और उपाय
देश में कुल खेती लायक ज़मीन का सिर्फ़ 4% हिस्सा ही खेती वाले चारे के लिए इस्तेमाल होता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिसर्च इन एग्रोनॉमी में 2024 में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार देशभर में हरे चारे (35.6%), सूखी फसल के बचे हुए भाग (10.5%), और सांद्रित चारा सामग्री (44%) में महत्वपूर्ण कमी है।
2019 के पशुगणना के अनुसार, मध्य प्रदेश में लगभग 40622 हज़ार पशु थे, जिनमें से 18735 हज़ार मवेशी, 10307 हज़ार भैंस, 11065 हज़ार बकरियां, 325 हज़ार भेड़ें और 165 हज़ार सूअर थे। लेकिन राज्य में हरे चारे, सूखे चारे और सांद्र चारे की क्रमशः लगभग 35.04, 40.71 और 40.21% की कमी है।
मध्य प्रदेश के फॉडर प्लान के अनुसार राज्य के कई जिलों में सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण फीड और चारे की कमी और बढ़ गई है।
केंद्र सरकार द्वारा जारी ‘सूखे के लिए राष्ट्रीय संकट प्रबंधन योजना, 2024’ में चारे की कीमत में बढ़ोतरी सूखे के शुरुआती संकेत माने गए हैं। योजना में अप्रैल से जून और अक्टूबर से नवंबर के बीच चारे की स्थिति का आकलन कर उसकी आपूर्ति के तरीके खोजने का सुझाव दिया गया था।
झाबुआ जिला के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के उपसंचालक डॉ अमर सिंह दिवाकर ने बताया कि फिलहाल जिले में पशुओं के चारे की कि कमी नहीं है। हालांकि उन्होंने यह ज़रूर स्वीकार किया कि पानी की कमी के चलते लोग गेहूं की बोवनी से बच रहे हैं जिससे आने वाले दिनों में चारे की कमी और इसके भाव में बढ़ोतरी हो सकती है। इसके बावजूद अब तक विभाग द्वारा जिला स्तर पर इसके उपाए के लिए कोई प्लान तैयार नहीं किया गया।

हालांकि प्रदेश के फॉडर प्लान में सूखे के दौरान झाबुआ हिल्स और मालवा पठार के किसानों को सुबाबुल के साथ पेनिसेटम ट्राइस्पेसिफिक हाइब्रिड या चारा ज्वार को अरहर के साथ मिलाकर उगाने की सलाह दी गई है। इसके अलावा उन्हें सूखा झेलने वाली रेंज घास जैसे अंजन, दीनानाथ, मार्वल, और स्टाइलोसेंथेस उगाना चाहिए।
वहीं सूखे क्षेत्रों में कृषि की संभावनाओं पर शोध करने वाले इंटरनेशनल सेंटर फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च इन द ड्राई एरियाज (ICARDA) की नेशनल एसोसिएट साइंटिस्ट डॉ नेहा तिवारी पशुपालकों को स्पाइनलेस कैक्टस अपनाने की सलाह देती हैं। उन्होंने कहा, “यह एक क्लाइमेट-रेज़िलिएंट चारे की फसल है जिसे सूखी, कम नमी वाली और अच्छी जल निकासी वाली ‘डीग्रेडेड’ भूमि पर भी उगाया जा सकता है।” उन्होंने बताया कि इसे अनाज और फली वाली चारे की फसलों के साथ मिलाने से जानवरों के लिए नमी, एनर्जी, प्रोटीन और फाइबर का एक टिकाऊ सोर्स मिल सकता है।
मगर झाबुआ के इन किसानों के लिए आने वाले दिनों में इन विकल्पों की उपलब्धता भी एक चुनौती है। डॉ दिवाकर ने सलाह दी कि किसानों को अभी से पानी बचाने पर जोर देना होगा। उनके अनुसार वन विभाग द्वारा नीलाम किए जाने वाले चारे और फसलों के अवशेष को बचाकर रखना ही आसन्न कमी को टालने का फौरी विकल्प है।
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