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बंडा सिंचाई परियोजना में आज भी क्यों अपना हक मांग रहे प्रभावित

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सरकारी माध्यमिक विद्यालय से कुछ मीटर की दूरी में बने एक चबूतरे के क़रीब कई ग्रामीण उनके खेतों के आस-पास हो रही खुदाई के बारे में बात कर रहे हैं। भोपाल से 203 किमी दूर सागर जिले के हनोता उवारी गांव के पास खेतों के किनारे नहर निर्माण का कार्य शुरू हो गया है। यह जिले की बंडा मेजर सिंचाई परियोजना का हिस्सा हैं। 

लगभग 7 साल पहले प्रस्तावित हुई परियोजना का उद्देश्य पानी के संकट के लिए मशहूर बुंदेलखंड के 2 जिलों में पानी की सुविधा पहुंचाना था। इसके लिए आर्थिक मंज़ूरी 26 जून 2018 को ही दे दी गई थी। हालांकि कई सालों से निर्माण प्रक्रिया चालू रहने के बाद 2026 तक परियोजना के पूरी होने की संभावना है। इसके साथ ही 28 ग्राम डूब प्रभावित हो जाएंगे। अब एक साल बाद की डेडलाइन और नहर का कार्य शुरू होने के चलते अब ग्रामीणों में विस्थापन और उचित मुआवज़ा न मिलने से उपजी नाराज़गी और असुरक्षा बढ़ गई है।

क्या है बंडा सिंचाई परियोजना?

बेतवा की सहायक नदी धसान पर 661.50 मीटर लंबे और 28 मीटर ऊंचे बांध का निर्माण किया जाना है।  सरकारी दावे के अनुसार इस परियोजना से जल का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित होगा। जिससे सिंचाई, उद्योगों के विकास, पर्यटन, रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। 

परियोजना से लगभग 70,000 हेक्टेयर क्षेत्र में वार्षिक सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होगी। सागर जिले की मालथौन तहसील के 16,000 हेक्टेयर, बंडा तहसील के 37000 हेक्टेयर, शाहगढ़ तहसील के 12000 हेक्टेयर एवं छतरपुर जिले की बकस्वाहा तहसील के 15000 हेक्टेयर कमांड क्षेत्र में सिंचाई प्रस्तावित है। 

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मुआवज़े से जुड़ी समस्याएं बताने के लिए इकठ्ठा हुए ग्रामीण। फ़ोटो: सतीश भारतीय

2610.54 करोड़ की लागत वाली परियोजना के चलते 2700.10 हेक्टेयर निजी भूमि जबकि 499.44 हेक्टेयर सरकारी राजस्व भूमि और 396.56 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित होगी। 

परियोजना के अंतर्गत सेमरा अहीर, पिथोली, निमोन, इमलिया खुर्द, हनोता उवारी, उल्दन, बहरोल, सगोरिया, नेतना गांव सहित लगभग 28 ग्राम डूब प्रभावित होने की संभावना है, इसमें से 2 ग्राम पूर्णतः एवं 26 ग्राम आंशिक रूप से प्रभावित हो रहे है। इन सभी गांवों में लगभग 1700 परिवार प्रभावित होंगे। 

इन प्रभावितों के लिए भूमि व मकानों का मुआवजा कलेक्टर गाइडलाइन वर्ष 2017-18 के अनुसार निर्धारित किया गया है। इस परियोजना में प्रभावित जमीन के लिए सिंचित भूमि का औसत मूल्य 10 लाख प्रति हेक्टेयर, असिंचित भूमि का औसत मूल्य ₹5 लाख प्रति हेक्टेयर और वन भूमि के लिए ₹15 लाख प्रति हेक्टेयर मूल्य निर्धारित है।

लोगों में बढ़ती बेचैनी

50 वर्षीय श्याम बाई गोंड बीते 10 महीनों से ठीक से सो नहीं सकी हैं। वह अपने इकलौते बेटे और बहु के साथ हनोता उवारी गांव में पट्टे की ज़मीन पर बने कच्चे घर में रहती हैं। उन्हें केवल 94,000 रूपए बतौर मुआवजा मिले हैं। वह कहती हैं,

“मेरे पति की मौत कई साल पहले हो चुकी है। अब इतना सा मुआवजा मिल रहा है, इतने मुआवजे से हमारी ज़िन्दगी कैसे संवर पाएगी?”

वह जनवरी से कलेक्टर सहित तमाम सरकारी ऑफिस इस आशा में भटक रही हैं कि उन्हें कम से कम इतना मुआवजा मिलेगा जिससे वह नई जगह पर जाकर अपनी नई ज़िन्दगी शुरू कर पाएंगी। गौरतलब है कि उनके मौजूदा रहवास से 20 किमी की दूरी पर सरकार द्वारा पुनर्वास के लिए प्लाट भी दिए जा रहे हैं। मगर अनुचित मुआवज़ा के विरोध में श्याम बाई ने यह भी लेने से मना कर दिया।

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हनोता उवारी गांव में 377 घरों में 1598 लोग रहते हैं। इनमें 855 पुरूष, 743 महिलाएं और 253 बच्चे शामिल हैं। 

श्याम बाई की तरह सत्यवती गोंड (22) भी परियोजना से प्रभावित होने वालों में शामिल हैं। सत्यवती भूमिहीन हैं। उनके परिवार के लिए वह और परिवार के अन्य सदस्य मज़दूरी करने जाते हैं। वह हमें बताती हैं कि परियोजना के लिए जब सर्वे शुरू हुआ था तब सरकारी अधिकारियों द्वारा यह कहा गया था कि 18 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों को 6 लाख रूपए से ज्यादा मुआवजा मिलेगा। मगर उन्हें अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला है। 

सत्यवती कहती हैं, “मेरे नाम से शासन-प्रशासन ने मुआवजा के संबंध में एक नोटिस भी भेजा था। इसके बाद मुझे मुआवजे का इंतज़ार था।” जब कई महीनों तक मुआवजा नहीं मिला तो उन्होंने इस बारे में कई ज्ञापन भी लिखे मगर इन सबक नतीजा सिफ़र रहा।  

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परियोजना के मुआवजे से संबंधित समस्याओं पर स्थानीय महिलाएं मुखरता से बोलती हुई दिखती हैं। फ़ोटो: सतीश भारतीय

मुआवज़े में अन्य गड़बड़ियां

इस परियोजना से प्रभावित लोगों से मिलते हुए लगभग सभी लोग या तो मुआवजा पर्याप्त न मिलने, मुआवजा ही न मिलने या फिर इससे जुड़ी हुई अन्य अनियमितता का ज़िक्र करते हैं। मसलन 60 वर्षीय अनीता गोंड की डेढ़ एकड़ ज़मीन डूब का शिकार हो जाएगी। मगर उन्हें इसका कोई मुआवजा नहीं मिला। हालांकि उन्हें उनके घर के लिए ज़रूर मुआवजा मिला है। मगर इसमें भी कई अनियमितताएं हैं,   

“मेरे पति और देवर दोनों का अलग-अलग परिवार है, आईडी भी अलग-अलग है। मगर, हमारे मकानों का पूरा मुआवजा 9 लाख रूपए सिर्फ मेरे पति के नाम पर आया है। जबकि होना ये था कि, मेरे पति और देवर के नाम पर आधा-आधा मुआवजा आता।”

हालांकि इस मसले पर सागर कलेक्टर संदीप जीआर कहते हैं, “मुआवजा संबंधी राशि पात्र व्यक्ति की खाते में जाती है अन्य व्यक्ति के खाते में नहीं जा सकती। परियोजना में आने वाली सरकारी पट्टे की जमीन के लिए मुआवजा का विशेष नियम नहीं रहता।”

40 वर्षीय बलराम सेन के परिवार के पास 7 एकड़ सिंचित भूमि थी। इसका मुआवजा 7 लाख रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से दिया गया है। लेकिन अभी उनकी आधा एकड़ भूमि पर नहर खोदी जा रही है जिसका कोई भी मुआवजा उन्हें नहीं मिला।

सेन बताते हैं कि उनकी परिसंपत्ति जैसे खेत में लगे महुआ, बबूल, बेरी, छेवला जैसे पेड़ों और कुआं, घर की दहलान, गौशाला का भी मुआवजा नहीं मिला। इसी तरह पप्पू सेन को भी 3 एकड़ ज़मीन का 20 लाख रूपए मुआवजा मिला मगर खेत के कुआं और करीब 25 छोटे-बडे़ आम, महुआ, बेरी जैसे पेड़ों का कोई भी मुआवजा नहीं मिला। 

पप्पू कहते हैं, “हमने सोचा था कि मुआवजे की राशि से लगभग 2 एकड़ ज़मीन लेकर खेती कर लेंगे मगर  आस-पास 15 लाख रूपए एकड़ खेती मिल रही है।” वह अपनी बात में आगे जोड़ते हुए कहते हैं, “मेरे परिवार में पिता और भाई को अलग-अलग पीएम आवास मिला। पिता को पीएम आवास का मुआवजा 8 लाख 50 हजार रुपए मिला। जबकि, भाई को पीएम आवास का केवल 2 लाख 50 हजार रुपए मुआवजा मिला। मुआवजे में यह अंतर सरकार ने क्यों रखा हमें अभी तक समझ नहीं आया।”

इसी तरह वीर सिंह (65) के चार भाईयों की 15 एकड़ सिंचित जमीन है। उन्हें 8 लाख रूपए एकड़ के हिसाब से केवल 7 एकड़ जमीन का मुआवजा मिला है। 8 एकड़ जमीन, पेड़ों और 2 कुओं, गौशाला का मुआवजा हमें नहीं मिला।

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वीर सिंह कहते हैं कि नई जगह पर पुनर्स्थापित होने पर उनके पेशे पर संकट आ जाएगा। फ़ोटो: सतीश भारतीय

नए आवास की दिक्कतें

इस परियोजना से प्रभावित लोगों को नए जीवन की शुरुआत करने के लिए पुनर्वास प्लाट दिए जा रहे हैं। मगर आजीविका के छिन जाने और घर के स्वरूप बदलने से नई व्यवस्था से तालमेल बिठाना इन प्रभावित परिवारों को मुश्किल लग रहा है।  

वीर सिंह कहते हैं,  

“पीढ़ियों से ग्रामीण परिवेश के लोग गाय, भैस, बकरी जैसे पशुओं को भी पालते रहे हैं। अपने आवास के साथ लोगों ने पशुओं के रहने और चारा, भूसा अन्य कृषि के संसाधन रखने के लिए भी आवास बनाया है। लेकिन, सरकार जो आवासीय प्लाट दे रही है उसमें जगह बहुत कम है। हमारे पशुओं, संसाधनों के लिए कोई जगह उसमें शामिल नहीं है।”

इस गांव के लोगों के लिए विस्थापन केवल पता बदलना नहीं है। इनका कहना है कि चूंकि उन्होंने कई पीढ़ियों से कृषि का काम ही किया है इसलिए अब उनके लिए अपना पेशा बदलना एक बेहद मुश्किल काम है।  

वीर सिंह कहते हैं, “अब हमारी जिंदगी फिर से नए सिरे से शुरू होने के लिए खड़ी है और हमें समझ नहीं आ रहा हम क्या करें?”

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मुआवजा संबंधित शिकायतों को सुनते स्थानीय कलेक्टर। फ़ोटो: जनसंपर्क विभाग, सागर

मुआवजे संबंधी समस्याओं के लिए शिविर 

तत्कालीन सागर कलेक्टर दीपक आर्य ने उल्दन‌ बांध प्रभावितों की समस्याओं को लेकर 31 जुलाई 2024 को विशेष शिविर आयोजित करने की बात कही थी। उन्होंने 6 अगस्त को प्रभावितों को मुआवजे संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए बुलाया। 

ऐसे ही 3 अप्रैल 2025 को वर्तमान कलेक्टर संदीप जी आर ने परियोजना का निरीक्षण कर प्रभावित ग्रामों में पुनः सर्वे कार्य कराने का निर्देश दिया। इसके बाद प्रभावित ग्रामों में तीन-तीन दिन के शिविर लगाए गए जिसमें बैंकर्स एवं सभी राजस्व अधिकारी मौजूद रहें। मगर इन शिविरों के बावजूद भी मुआवजा संबंधी समस्याएं पूरी तरह से हल नही हुई हैं।

इस पूरे मामले में स्थानीय कलेक्टर कहते हैं, 

“निजी जमीन पर लगे पेड़ों का मुआवजा सर्वे के आधार पर दिया जाता है। परियोजना में प्रभावित लोगों को मुआवजा पूरा दिया जाता है, समय से दिया जाता है। मुआवजे से हर कोई संतुष्ट हो ये ज़रूरी नहीं। किसी-किसी परियोजना में प्रभावित व्यक्ति के केस में मुआवजा संबंधी मुश्किलें आ जातीं हैं तब उनका निराकरण करने में वक्त लगता है। प्रभावित लोगों के पास यह विकल्प होते हैं कि वे मुआवजे के लिए अपील कर सकते हैं, सिविल कोर्ट जा सकते हैं।”

इस परियोजना में भू-अर्जन अधिनियम, 2013 के अनुसार मुआवज़ा दिया जाना था। इस अधिनियम में कई महत्वपूर्ण बिंदु दर्ज हैं। इन्हीं बिंदुओं के साथ यह भी वर्णित है कि, भूमि प्रभावित परिवारों, अन्य को कम से कम परेशानी हो।‌ वहीं, जिन‌ प्रभावित परिवारों की भूमि अर्जित की जा रही हो उन्हें उचित मुआवजा प्रदान किया जाए। साथ में प्रभावित व्यक्तियों के लिए उनके पुनर्वास और पुनर्स्थापन के लिए पर्याप्त प्रावधान किए जाएं। यह सुनिश्चित किया जाए कि अनिवार्य अधिग्रहण का संचयी परिणाम यह हो कि प्रभावित व्यक्ति विकास में भागीदार बनें जिससे अधिग्रहण के बाद उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार हो। 

मगर फिलहाल स्थिति यही है कि परियोजना के प्रभावितों में डर और असुरक्षा है। वह अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं। परियोजना का उनके लिए क्या महत्त्व है? यह सवाल उछालने पर लगभग-लगभग यही जवाब मिलता है, “जब खेत नहीं रहेगा तो सिंचाई परियोजना का क्या करेंगे?”  

बैनर ईमेज – राजोला गोंड अपनी समस्या बता रही हैं। फ़ोटो- सतीश भारतीय


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  • Satish, originally from Sagar, grew up in the Indian rural milieu. He knows Bundelkhand not only as a local resident but also reports on the problems here like a journalist. Apart from writing, his interest lies in wandering and traveling.

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