मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से वायरल हुए एक वीडियो में करीब 9 बच्चे स्कूल पहुंचने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर एक ऊंचे स्टॉप डैम की दीवारों को छलांग लगाकर पार करते दिख रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्ट की पड़ताल में सामने आया कि यह खतरनाक सफर इन बच्चों का कोई शौक नहीं, बल्कि मिडिल स्कूल के बाद हाईस्कूल दूर होने की बड़ी मजबूरी है।
यह पूरा मामला विदिशा जिले की तीन ग्राम पंचायतों, जीवजीपुर, मूंदरा हरिसिंह और किरमिची बंधेरा से जुड़ा हुआ है।
किरमिची बंधेरा पंचायत के सचिव अनमोल सिंह ने बताया कि उनके गांव के बच्चों को हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए जीवजीपुर के पलोह गांव जाना पड़ता है। मुख्य सड़क मार्ग से यह दूरी एक तरफ से 18 किलोमीटर यानी आना-जाना 36 किलोमीटर बैठती है। इसी थकाऊ सफर से बचने के लिए बच्चे शार्टकट का इस्तेमाल कर रहे थे।
मूंदरा हरिसिंह पंचायत के सचिव दुर्गाप्रसाद शर्मा के मुताबिक, उनके गांवों (इमलिया और काकरवा) से भी सड़क का रास्ता करीब 14 किलोमीटर पड़ता है, जिसमें बीच में खतरनाक रेलवे फाटक भी आता है। बीच में पड़ने वाली बेतवा नदी गर्मियों में सूख जाती है, जिस पर 10 वर्ष पूर्व ग्रामीणों की सिंचाई के लिए स्टॉप डैम बनाया गया था। बारिश के बाद दीपावली तक इसमें घुटने तक पानी रहता है। लंबी दूरी और जोखिम भरे रास्तों से बचने के लिए बच्चे इसी स्टॉप डैम की दीवारों को फांदकर निकलने का रास्ता चुनते हैं। हालांकि प्रशासन ने बच्चों को साइकिलें दी हैं, लेकिन रोज 30 से 36 किलोमीटर साइकिल चलाना बच्चों के लिए व्यावहारिक नहीं है।
हर साल 5 से 6 बच्चे छोड़ देते हैं पढ़ाई
सरकारी दावों से जमीनी हकीकत कितनी अलग है, इसका अंदाजा शासकीय माध्यमिक विद्यालय किरमची बांधेरा में पदस्थ शिक्षक भगवान सिंह रावत के बयान से मिलता है। ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए उन्होंने एक चौंकाने वाला आंकड़ा साझा किया।
शिक्षक भगवान सिंह रावत ने बताया, “इसी वर्ष हमारे स्कूल से 12 बच्चे आठवीं कक्षा पास करके निकले थे, जिनमें से 5 बच्चे (दूरी और रास्ते के डर से) आगे न पढ़कर घर बैठ गए। साल 2007 से इस स्कूल में आठवीं कक्षा शुरू हुई है और मैं यहाँ 2009 से पदस्थ हूँ। तब से लेकर अब तक का रिकॉर्ड देखें तो हर साल यहाँ से आठवीं पास करने वाले औसतन 5 से 6 बच्चे पढ़ाई छोड़कर हमेशा के लिए घर बैठ जाते हैं। यह तो सिर्फ एक अनुमानित आंकड़ा है, हकीकत में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है।”
प्रशासनिक पक्ष
इस पूरे मामले पर जब ग्राउंड रिपोर्ट ने विदिशा के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) एन.के. अहिरवार से बात की, तो उन्होंने नियमों और परिस्थितियों का हवाला देते हुए कहा, “नियम के मुताबिक किसी भी गांव से हाईस्कूल की दूरी अधिकतम 7 किलोमीटर होनी चाहिए। पहले बच्चे बेतवा नदी के रास्ते से आते-जाते थे, जहां पत्थरों को रखकर एक अस्थाई रास्ता बनाया गया था। लेकिन इस बार बरसात में वे पत्थर बहे, जिससे बच्चों को दिक्कत हुई और तब यह पूरा मामला हमारे संज्ञान में आया।”
ड्रॉप-आउट के आंकड़ों पर बोलते हुए डीईओ ने स्वीकार किया कि फिलहाल क्षेत्र के ड्रॉप-आउट बच्चों का सटीक लिखित आंकड़ा उनके पास नहीं है। उन्होंने कहा, “स्थिति को देखते हुए तुरंत वैकल्पिक व्यवस्था के तहत स्कूल की शुरुआत कर दी गई है। आज पहले ही दिन वहां के चार बच्चों ने एडमिशन लिया है। अब हमारे शिक्षक घर-घर जाकर सर्वे कर रहे हैं ताकि ऐसे सभी बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। इसके बाद स्कूल की स्थाई बिल्डिंग के लिए भी शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा।”
बड़ी राहत

वीडियो वायरल होने और मामला गरमाने के बाद प्रशासन ने मुस्तैदी दिखाई है। ग्राम काकरूआ, इमलिया एवं किरमिची बंधेरा के विद्यार्थियों के संकट को देखते हुए शासकीय माध्यमिक शाला, किरमिची बंधेरा (डाईस कोड 23310705502) का उन्नयन हाई स्कूल के रूप में कर दिया गया है।
अगस्त 2026 में आयुक्त द्वारा अनुमोदित निर्णय के तहत शिक्षा सत्र 2026-27 से उक्त विद्यालय में कक्षा 9वीं एवं 10वीं के संचालन की अनुमति तत्काल प्रभाव से प्रदान की गई है।
शाला संचालन व अध्यापन कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा तत्काल प्रभाव से दो शिक्षकों की अस्थाई व्यवस्था की गई है, जिसमें सामाजिक विज्ञान विषय के लिए माध्यमिक शिक्षक श्री मुकेश शर्मा और गणित विषय के लिए माध्यमिक शिक्षक श्री विमल राठौर को पदस्थ किया गया है। इस त्वरित निर्णय से आसपास के गांवों के छात्र-छात्राओं को अब लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी।
विदिशा की यह घटना क्यों है पूरे देश की कहानी?
विदिशा की यह जमीनी हकीकत भारत सरकार के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-6) और (एनएफएचएस-5) के आधिकारिक आंकड़ों पर हूबहू मुहर लगाती है।
नवीनतम एनएफएचएस-6 (2023-24) की सरकारी फैक्ट शीट के अनुसार, ग्रामीण भारत में आज भी स्कूली शिक्षा के स्तर पर भारी चुनौती बनी हुई है, ग्रामीण क्षेत्रों में 6 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग के केवल 69.2 प्रतिशत बच्चे ही कभी स्कूल की दहलीज तक पहुंच पाते हैं।
वहीं अगर हम बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाले मामलों की बात करें तो एनएफएचएस-5 की मुख्य राष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में 7.0 प्रतिशत छात्राओं (लड़कियों) ने सीधे तौर पर ‘स्कूल का बहुत दूर होना’ अपनी पढ़ाई छूटने का मुख्य कारण बताया है, जबकि 1.7 प्रतिशत लड़कियों ने ‘परिवहन साधनों की अनुपलब्धता’ को बड़ी वजह माना है। इसके विपरीत, ग्रामीण इलाकों के केवल 1.9 प्रतिशत लड़कों ने स्कूल दूर होने की बात दर्ज कराई है।
यह संयुक्त आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि ग्रामीण अंचलों में मिडिल स्कूल के बाद हाईस्कूलों की भौतिक दूरी का सबसे अधिक असर छात्राओं के स्कूल छूटने और जानलेवा शॉर्टकट अपनाने के रूप में सामने आ रहा है।
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