हम हर चुनाव में बात करते हैं, किसकी सरकार बनेगी, कौन जीतेगा, कौन हारेगा। लेकिन एक सवाल जो हम नहीं पूछते वो यह है कि क्या आने वाले सालों में चुनाव करा पाना भी उतना आसान रहेगा जितना आज है?
पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुई वोटिंग के दौरान हीटवेव से चार लोगों की जान गई। केरल में उम्मीदवार और वोटर दोनों बेहाल थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में वोटिंग के आखिरी दिन 33 पोलिंग अधिकारी गर्मी की वजह से जान गंवा बैठे, तापमान 45 डिग्री से ऊपर था। और 2019 में साइक्लोन फानी इतना भयंकर था कि ओडिशा में वोटिंग ही टालनी पड़ी। यह सब अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, यह एक ही कहानी के अलग-अलग अध्याय हैं।

22 अप्रैल 2026 को इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस ने एक रिपोर्ट जारी की जो इस कहानी को पूरी दुनिया के नजरिए से देखती है। रिपोर्ट कहती है कि पिछले 20 सालों में दुनिया में 94 चुनाव बाढ़, साइक्लोन या हीटवेव जैसी चरम मौसमी घटनाओं की वजह से बाधित हुए हैं। यानी जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पर्यावरण का संकट नहीं रहा, वह लोकतंत्र का संकट भी बनता जा रहा है।
भारत की बात करें तो सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के आंकड़े बताते हैं कि 2022 में 365 में से 314 दिन देश में कहीं न कहीं चरम मौसमी घटना दर्ज हुई। जनवरी से नवंबर 2025 के बीच यह आंकड़ा 331 दिनों तक जा पहुंचा, साल के 99 फीसदी से भी ज्यादा दिन। पिछले चार सालों में यह सबसे ज्यादा है। और भारत में कोई न कोई चुनाव साल के हर हिस्से में होता है। तो यह टकराव अब रुकने वाला नहीं।

सवाल यह नहीं है कि खतरा है या नहीं, वह साफ दिख रहा है। सवाल यह है कि हम इसके लिए तैयार कितने हैं। चुनाव आयोग ने 2024 में पोलिंग बूथों पर पानी, छांव और मेडिकल किट की व्यवस्था की। लेकिन यह तात्कालिक राहत थी, कोई दीर्घकालिक सोच नहीं। जो इलेक्टोरल रिस्क मैनेजमेंट गाइडलाइन मौजूद है, वह उन्हीं इलाकों पर केंद्रित है जो पहले से आपदाग्रस्त माने जाते हैं। जलवायु परिवर्तन यह नहीं देखता कि कौन सा इलाका परंपरागत रूप से संवेदनशील रहा है, वह नए इलाकों को भी अपनी चपेट में ले रहा है।
रिपोर्ट की सबसे जरूरी मांग यही है कि चुनाव आयोग, मौसम विभाग और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच एक ठोस तालमेल बने, एक मानकीकृत ढांचा बने जो पूरे देश पर लागू हो। लेकिन रिपोर्ट एक कड़वी सच्चाई यह भी कहती है कि जब तक कार्बन उत्सर्जन नहीं घटेगा, तब तक चाहे जितनी तैयारी कर लो, चरम मौसमी घटनाएं और बढ़ती रहेंगी।
वोट देना हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है। लेकिन जब वोट देने निकलने में जान जोखिम में पड़ने लगे, तो यह सिर्फ मौसम का मसला नहीं रहता। यह उस पूरी व्यवस्था का मसला बन जाता है जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं।
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