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इंसान और फसल दोनों पर भारी पड़ता प्री-मानसून सीजन

Hailstrom MP crop loss

नोट – एटलस में 30 सितंबर 2025 तक के आंकड़े ही शामिल हैं।

श्योपुर जिले के रामेश्वर गांव के रहने वाले रामलखन मीणा ने 15 बीघा में गेहूं की फसल बोई हुई थी। बेहतर उत्पादन की आशा में उन्होंने प्रति बीघा लगभग 10 से 12000 रूपए का निवेश किया था। मगर 4 अप्रैल की दोपहर में अचानक हुई बारिश और ओलावृष्टि ने उनकी फसल नष्ट कर दी। नुकसान के बारे में पूछने पर कहते हैं, “100% फसल ख़राब हुई है।” 

रामलखन अकेले ऐसे किसान नहीं हैं। इसी जिले के बेहरावदा गांव के योगेश मीणा ने 50 बीघा में गेहूं की बोवाई की थी। 4 अप्रैल को हुई ओलावृष्टि में ये भी ख़राब हो गई।    

दरअसल 4 अप्रैल को, वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की वजह से मध्य प्रदेश के कई जिलों में तेज़ ओलावृष्टि की घटना दर्ज की गई। इससे ग्वालियर क्षेत्र में सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ। यहां दोपहर 4 बजे के आस-पास लगातार 15 मिनट तक ओलावृष्टि हुई। भारत मौसम विभाग (IMD) ने दोपहर 3:50 बजे से 4:05 बजे के बीच 2.5 सेमी डायमीटर के ओले रिकॉर्ड किए, जिससे इस इलाके का 50 साल का मौसम रिकॉर्ड टूट गया।

मगर यह अकेली घटना नहीं है। राष्ट्रिय स्तर पर भी प्री-मानसून सीजन यानि मार्च से लेकर मई महीने में किसानों को होने वाला नुकसान बढ़ रहा है। इस साल केवल 1 मार्च से 7 अप्रैल के बीच ही देश 24 राज्यों में 38 में से 29 दिन बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि की घटना दर्ज की गईं। इससे देश भर में लगभग 6 लाख 21 हज़ार 501 हेक्टेयर में फसल बर्बाद हुई है। 

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4 अप्रैल को अचानक हुई बारिश और ओलावृष्टि से रामलखन की गेहूं कीई फसल ख़राब हो गई | श्योपुर | फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

प्री मानसून में बढ़ा नुकसान 

इंडियाज़ इंटरेक्टिव एटलस ऑन वेदर डिज़ासटर के अनुसार 2026 का प्री-मानसून सीजन किसानों पर पिछले साल की तुलना में कहीं ज्यादा भारी रहा है। सीजन के पहले 38 दिनों में ही जितने हिस्से में फसल तबाह हुई है उतनी बीते साल पूरे सीजन में भी नहीं हुई थी। 2025 में भारत में प्री-मानसून के दौरान 6 हज़ार 28 हेक्टेयर की फसल ही ख़राब हुई थी। इस लिहाज़ से 2026 का प्री-मानसून बीते 5 सालों में दूसरा सबसे बुरा साल रहा है। इससे पहले 2023 में सबसे ज़्यादा 6 लाख 36 हज़ार 680 हेक्टेयर क्षेत्र की फसल बर्बाद हुई थी।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के एनवायरनमेंट रिसोर्स यूनिट की प्रोग्राम डायरेक्टर किरण पाण्डेय कहती हैं, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस साल का प्रीमानसून सीजन बीते 5 सालों में सबसे बुरा साबित होगा।” वह बताती हैं, “अभी हमारे पास जो आंकड़ें हैं उसमें पश्चिम बंगाल का नुकसान शामिल नहीं है। इसके अलावा मध्य प्रदेश से भी पूरे आंकड़ें नहीं मिले।”   

एटलस के आंकड़ों के अनुसार जहां एक ओर अप्रैल के पहले हफ्ते में ही 4 लाख 26 हज़ार हेक्टयर फसल ख़राब हुई है वहीं मार्च में बढ़ता नुकसान भी बेहद चिंताजनक है। आंकड़ों के अनुसार 1 लाख 94 हज़ार 950.81 हेक्टेयर फसल अकेले मार्च में ही ख़राब हुई है। यह 5 सालों में सबसे ज्यादा है। 

पाण्डेय के अनुसार मार्च में 3 अलग-अलग घटनाओं के सक्रीय होने के चलते यह नुकसान हुआ है। वह इसे समझाते हुए कहती हैं, “इस बार वेस्टर्न डिस्टर्बेंस मार्च-अप्रैल में काफी सक्रीय रहा है। यह अक्सर जनवरी-फ़रवरी में सक्रीय होता है। इसके अलावा मार्च की शुरुआत में हीट वेव और बंगाल की तरफ से आने वाली पूर्वी हवाएं भी सक्रीय थीं।” उनके अनुसार इन तीन घटनाओं के एक साथ मिलने से भारी ओलावृष्टि हुई है। 

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मार्च-अप्रैल के दौरान हुई बारिश और ओलावृष्टि ने संतरे की फसल को भी नुकसान पहुंचाया है | पांढुर्णा | फ़ोटो: ग्राउंड रिपोर्ट

मध्य प्रदेश में फसलों का नुकसान

श्योपुर से लगभग 580 किमी दूर बड़वानी जिले के तलून गांव में राहुल काचरा की मक्के की फसल मार्च में आंधी और बारिश का शिकार हो गई। 19-20 मार्च के दौरान मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में ओलावृष्टि और बारिश के चलते फसल ख़राब हुई है। इस पर तब हमने एक ग्राउंड रिपोर्ट भी की थी। 

गौरतलब है कि 20 मार्च को ही केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बैठक कर फील्ड सर्वे करने के लिए निर्देश दिए थे। चौहान ने कहा था कि जिन क्षेत्रों में तेज बारिश, ओलावृष्टि या मौसम की अन्य प्रतिकूल स्थितियों से नुकसान हुआ है, वहां फील्ड स्तर पर समयबद्ध कार्रवाई अनिवार्य है ताकि किसी भी किसान को राहत के लिए इंतजार न करना पड़े।     

पाण्डेय कहती हैं कि फसल के नष्ट होने की जियोग्राफी भी बदल रही है। वह कहती हैं कि इस बार सेंट्रल इंडिया रीजन ‘क्रॉप लॉस’ का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बनकर उभरा है। हालांकि सबसे ज्यादा नुकसान महाराष्ट्र में हुआ है जहां 1,22,000 हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई है। 

जबकि मध्य प्रदेश में केवल 40 हेक्टेयर फसल ही ख़राब बताई गई है। मगर पाण्डेय के अनुसार चूंकि राज्य से स्पष्ट और पूरे आंकड़े नहीं जारी किए गए हैं इसलिए असल नुकसान इससे भी ज्यादा हो सकता है। हालांकि एटलस में भी मध्य प्रदेश में नुकसान का आंकड़ा स्पष्ट नहीं है। इसके अनुसार 2025 में प्रदेश में 12000 हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई थी जो 2024 (0.24000 हेक्टेयर) से कहीं ज्यादा है।

पाण्डेय कहती हैं कि सभी फसलों में सबसे ज्यादा नुकसान गेहूं को हुआ है। कई राज्यों में मार्च और अप्रैल के दौरान गेहूं की फसल कटाई के लिए तैयार हो रही होती है जिसे ओलावृष्टि से भारी नुकसान होता है। 

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फसलों के अलावा इस सीजन में इंसानी मौत के मामले में भी सेंट्रल इंडिया आगे है | फ़ोटो: कैनवा

इंसानी मौत के मामले में आगे मप्र

2025 में प्री मानसून सीजन इंसानी मौत के मामले में भी सबसे खतरनाक रहा है। साल भर में चरम मौसमी घटनाओं के चलते जहां 4,064 मौतें हुई हैं। मगर प्री मानसून सीजन में इनमें से 3,071 मौतें हुई हैं।  

इसी तरह सेंट्रल इंडिया के छः राज्यों (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, ओड़िशा और गोवा) में साल भर में 1093 मौत हुई हैं। हालांकि इन आंकड़ों में बाढ़, भूस्खलन, हीटवेव और कोल्डवेव के चलते मारे गए लोग भी शामिल हैं। मगर 926 मौतें मार्च से मई महीने के बीच ही हुई हैं। मध्य प्रदेश के लिए सबसे चिंताजनक बात ये है कि देश भर में सबसे ज्यादा 498 मौतें इसी राज्य में हुई हैं। 

पाण्डेय के पास इन आंकड़ों का कारण उपलब्ध नहीं है। वह कहती हैं कि बिजली गिरने से मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा मौत होती हैं। वो संभावना जताते हुए कहती हैं कि यह राज्य में सबसे ज्यादा मौत का कारण हो सकता है। 

ग्राउंड रिपोर्ट ने 2 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि भारत में हर रोज़ 7 लोग गिजली गिरने से मारे जाते हैं। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के अनुसार प्राकतिक आपदाओं में से 39.7% (2560) मौतें बिजली गिरने से हुई हैं। इसमें सबसे ज्यादा 397 मौत मध्य प्रदेश में हुई हैं। 

ओडिशा में फकीर मोहन यूनिवर्सिटी में इस विषय के विशेषज्ञ प्रोफेसर मनोरंजन मिश्रा ने कहा कि सेंट्रल इंडिया को खास तौर पर खतरा है। “बड़े पैमाने पर माइनिंग, जंगलों की कटाई और एरोसोल की वजह से इस इलाके में बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ रही हैं। मॉनसून से पहले गर्मी और नमी मिलकर सेंट्रल इंडिया को नॉर्थ-ईस्ट या दक्षिण भारत के मुकाबले ज़्यादा खतरे में डालता है।” 

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मौत और नुकसान के बरक्स राहत के सरकारी प्रयास कम ही दिखाई देते हैं | श्योपुर | फ़ोटो: शिशिर अग्रवाल

सरकार से कितनी राहत

जहां एक ओर फसलें ख़राब हो रही हैं और दूसरी ओर लोग अपनी जान गवां रहे हैं, वहीं इंसानों कि फसल और परिवार को राहत देने में सरकार लचर दिखाई देती है। रामलखन मीणा ने 2021 से ही अपनी फसल का बीमा करवाना छोड़ दिया है क्योंकि उन्हें इसका कोई रिटर्न नहीं मिल रहा था। एक अन्य किसान दीपक मीणा को बीते साल 5 बीघे की धान की फसल ख़राब होने पर 1500 मुआवजा मिला था। 

फिर भी श्योपुर के कृषि उपसंचालक जीके पचौरिया बारिश और ओलावृष्टि से प्रभावित किसानों को 72 घंटे के अंदर एआईसी इंश्योरेंस कंपनी भोपाल के टोल-फ्री नंबर 14447 पर अपनी शिकायत दर्ज कराने की अपील कर रहे थे। कृषि विभाग ने तहसील स्तर पर इंश्योरेंस कंपनी के प्रतिनिधियों के लिए नंबर भी जारी किए। उन्होंने कहा कि जिन किसानों की फसलें ख़राब हुई हैं उनके नुकसान का सर्वे पूरा हो गया है राहत के लिए प्रस्ताव बनाकर राज्य सरकार को भेजा है। 

वहीं बिजली गिरने से होने वाली मौत पर सरकार कितनी मुस्तैदी से राहत देती है इसका उदाहरण आपको ग्राउंड रिपोर्ट की इस खबर में मिल जाएगा।

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