पर्यावरण आज | आंध्र प्रदेश के 388 मंडल सूखा प्रभावित घोषित, NFR की AI-आधारित व्यवस्था से 255 हाथियों की जान बची, बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में देरी पर सफ़ाई, दिल्ली में ANMOL स्कीम का विस्तार और आशा वर्करों का प्रोत्साहन दोगुना, और नदियों में अवैध रेत खनन पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता। चर्चा में: गर्मी और गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य।
आज की प्रमुख हेडलाइन्स
आंध्र प्रदेश सरकार ने 21 ज़िलों में फैले अपने 688 मंडलों में से 388 को सूखा प्रभावित घोषित किया है। इनमें से 283 मंडलों को ‘गंभीर रूप से प्रभावित’ और 105 को ‘मध्यम रूप से प्रभावित’ माना गया है। सूखे के कारण खरीफ की फसलें बड़े स्तर पर प्रभावित हुई हैं। इस सरकारी आदेश के बाद अब किसानों तक मदद पहुंचाई जा सकेगी।
नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे (NFR) ने ट्रेनों और हाथियों की टक्कर रोकने के लिए AI-आधारित अलर्ट, गति-सीमा, बेहतर पेट्रोलिंग और अपने ‘प्लान बी’ सिस्टम का इस्तेमाल किया है। इसकी मदद से जनवरी से सितंबर 2026 के बीच 255 हाथियों की जान बचाई जा सकी।
जब रेलवे ट्रैक के पास हाथियों की हलचल का पता चलता है, तो यह सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी करता है। इससे रेलवे कर्मचारियों को समय रहते बचाव के उपाय करने और संवेदनशील इलाकों में ट्रेन क्रू को सतर्क करने में मदद मिलती है।
मुंबई और अहमदाबाद के बीच भारत के पहले बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में देरी के आरोपों के बीच, इंटरनेशनल हाई-स्पीड रेल संस्था के प्रमुख ने कहा कि कोविड-19 महामारी और ज़मीन अधिग्रहण जैसी कई अप्रत्याशित समस्याओं को देखते हुए इसे प्रोजेक्ट में देरी नहीं कहा जाना चाहिए।
दिल्ली सरकार ने कई नई हेल्थकेयर पहलें शुरू की हैं। इनमें ANMOL स्कीम का विस्तार शामिल है, जिसके तहत नवजात शिशुओं की मुफ़्त स्क्रीनिंग में शामिल बीमारियों की संख्या 56 से बढ़ाकर 63 कर दी गई है। साथ ही, आशा वर्करों की मासिक प्रोत्साहन राशि 3,000 रुपये से दोगुनी करके 6,000 रुपये कर दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने चंबल और केन नदी में अवैध रेत खनन के मामलों की सुनवाई करते हुए नदी तल से रेत निकालने पर गंभीर चिंता जताई है। राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में अवैध रेत खनन पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने इसे विनाशकारी बताया है।
आज की चर्चा
तेज़ गर्मी से गर्भवती महिलाओं और नवजातों पर बढ़ रहा खतरा
एक नए अंतरराष्ट्रीय सर्वे के अनुसार, भीषण गर्मी पहले से ही गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ा रही है। पांच देशों में लगभग तीन-चौथाई मैटरनल हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में गर्मी से जुड़ी समस्याओं और जटिलताओं के मामले बढ़े हैं।
वाहिद भट, ग्राउंड रिपोर्ट

पल्लव, जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ रही तेज़ गर्मी अब गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों के स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा बन रही है। Wellcome की एक नई अंतरराष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, पांच देशों में करीब तीन-चौथाई मातृ स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पिछले पांच साल में गर्मी से जुड़े मामलों और जटिलताओं में बढ़ोतरी देखी है।
इस सर्वे में भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, ब्रिटेन और ज़िम्बाब्वे के 1,000 स्वास्थ्यकर्मियों को शामिल किया गया। इनमें से करीब 73 प्रतिशत विशेषज्ञों ने गर्भवती महिलाओं में गर्मी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में बढ़ोतरी बताई, जबकि 76 प्रतिशत ने भ्रूण या नवजात बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में इज़ाफा देखा।
पल्लव, लगभग सभी स्वास्थ्यकर्मियों ने कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर ऐसी गर्भवती महिला या बच्चे का इलाज किया है, जिसकी सेहत पर तेज़ गर्मी का बुरा असर पड़ा था। 98 प्रतिशत ने गर्भवती महिलाओं में और 99 प्रतिशत ने नवजात बच्चों में ऐसे मामले देखे।
सर्वे के मुताबिक, करीब 23 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने गर्भावस्था की ऐसी जटिलताएं देखीं जिनमें अतिरिक्त निगरानी या इलाज की जरूरत पड़ी। वहीं 34 प्रतिशत ने कम जन्म वजन या बच्चे के विकास में रुकावट के मामले बताए।
इसके अलावा 36 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने नवजात बच्चों में पानी की कमी और गर्मी से जुड़ी बीमारी देखी। करीब 33 प्रतिशत ने बच्चों में दूध पीने, सांस लेने और शरीर का तापमान नियंत्रित करने से जुड़ी परेशानियां दर्ज कीं।
पल्लव, तेज़ गर्मी का असर सिर्फ स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच पर भी पड़ रहा है। 27 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने कहा कि ज्यादा तापमान की वजह से गर्भवती महिलाओं और परिवारों के लिए इलाज तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। वहीं 29 प्रतिशत ने आपातकालीन मामलों में बढ़ोतरी देखी।
वैज्ञानिक शोध भी इस खतरे की पुष्टि कर रहे हैं। Wellcome के हवाले से सामने आए शोध के मुताबिक, गर्मी के संपर्क में हर 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी के साथ समय से पहले बच्चे के जन्म की संभावना करीब 5 प्रतिशत बढ़ जाती है। वहीं heatwave के संपर्क में आने से गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं का खतरा करीब 25 प्रतिशत ज्यादा पाया गया।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि स्वास्थ्यकर्मी आने वाले वर्षों को लेकर भी चिंतित हैं। करीब 81 प्रतिशत विशेषज्ञों ने कहा कि अगर अतिरिक्त कदम नहीं उठाए गए तो अगले पांच साल में तेज़ गर्मी गर्भवती महिलाओं, भ्रूण और नवजात बच्चों के स्वास्थ्य के लिए और बड़ा खतरा बन सकती है।
Wellcome की Madeleine Thomson ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही गर्मी स्वास्थ्य और रोज़मर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रही है, लेकिन कई देश अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि early warning systems और ठंडी इमारतों जैसे उपाय मौजूद हैं, लेकिन सबसे ज्यादा जोखिम वाले लोगों तक ये सुविधाएं अक्सर नहीं पहुंच पातीं।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के कार्यकारी सचिव Simon Stiell ने 5 अक्टूबर को कहा कि गर्भावस्था और प्रसव अब जलवायु संकट की एक नई “faultline” बन रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इसका असर उन लोगों पर ज्यादा पड़ेगा, जिनके पास स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षित घर, ठंडी जगह, पानी और बिजली की सीमित पहुंच है।
COP31 से पहले Wellcome ने मांग की है कि गर्भवती महिलाओं, नई माताओं और नवजात बच्चों को राष्ट्रीय जलवायु और स्वास्थ्य योजनाओं में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। संगठन ने गर्मी, गर्भावस्था और प्रसव के बाद की अवधि के लिए WHO की पहली क्लिनिकल गाइडलाइन और बेहतर निगरानी व्यवस्था विकसित करने की भी अपील की है।
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