पर्यावरण आज | भारत में एक-चौथाई कपास के रकबे में बिना मंज़ूरी वाली हाइब्रिड किस्में उगाई गईं। दिल्ली तीन साल के सबसे प्रदूषित अक्तूबर से जूझ रही है, जबकि WWF के मुताबिक वन्यजीव आबादी में 73 प्रतिशत गिरावट आई है। कमज़ोर मॉनसून से मध्य प्रदेश के बांध खाली हैं, इसलिए किसान गेहूं छोड़ दलहन-तिलहन की ओर बढ़ रहे हैं।
प्रमुख हेडलाईन्स
भारत में कपास की खेती वाले कुल इलाके के लगभग एक-चौथाई हिस्से में “गैर-कानूनी” हाइब्रिड किस्मों का इस्तेमाल हो रहा है। फेडरेशन ऑफ़ सीड इंडस्ट्री ऑफ़ इंडिया (FSII) और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (NSAI) के एक फ़ील्ड-आधारित अध्ययन के मुताबिक, 2025-26 में भारतीय किसानों ने 24 से 30 प्रतिशत रकबे में ऐसी हाइब्रिड किस्में उगाईं, जिनमें बिना मंज़ूरी वाले एचटी बीटी (HT Bt) जीन मौजूद थे।
दिल्ली पिछले तीन सालों के सबसे प्रदूषित अक्तूबर का सामना कर रही है। पहले हफ़्ते में औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 171 रहा। मॉनसून की वापसी के बाद से यहाँ हवा की गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है।
वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) की हर दो साल में आने वाली ‘लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, 1970 से 2022 के बीच 52 सालों में जिन रीढ़ वाले जानवरों (स्तनधारी, मछली, पक्षी और उभयचर) की आबादी पर नज़र रखी गई, उनकी औसत संख्या में 73 प्रतिशत की गिरावट आई है।
मॉनसून की विदाई के बाद मध्य प्रदेश के पश्चिमी हिस्सों में, जो सूखे जैसे हालात से जूझ रहे हैं, इस वर्ष गेहूं के बजाय दलहन और तिलहन के बीजों की मांग 30 प्रतिशत तक बढ़ी है। रबी में गेहूं की बुआई के लिए किसानों को ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है, जबकि दलहन और तिलहन कम पानी की फ़सलें हैं।
मॉनसून कमज़ोर रहने की वजह से मध्य प्रदेश के पश्चिमी और मध्य क्षेत्र के बांध 26 से 73 प्रतिशत तक खाली रह गए हैं। ओंकारेश्वर बांध में 10 सालों में सबसे कम पानी है। इसका असर रबी की सिंचाई पर पड़ सकता है, और पीने के पानी की समस्या भी खड़ी हो सकती है।
आज की चर्चा
हिमालयन पक्षी मोनल अपनी आवाज़ बदलने को मजबूर
भारतीय शोधकर्ताओं की दो स्टडीज़ से पता चला है कि इंसानी गतिविधियों में तेज़ी से हो रही बढ़ोतरी का असर हिमालय में पाए जाने वाले पक्षी मोनाल के रहने और आपसी संवाद के तरीके पर पड़ रहा है।
हिमालय के पहाड़ी जंगलों में पाया जाने वाला तीतर जैसा पक्षी मोनाल उत्तराखंड का राजकीय पक्षी और नेपाल का राष्ट्रीय पक्षी है, जो पूरे हिमालय क्षेत्र में इसके सांस्कृतिक महत्व को दिखाता है।
एक स्टडी में पाया गया कि ये पक्षी पहाड़ों में ज़्यादा ऊँचाई पर जाने को मजबूर हो रहे हैं। साथ ही, व्यस्त घाटियों में इंसानी शोर के बीच अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए वे अपने सुर की पिच बदल रहे हैं।
वाहिद भट, ग्राउंड रिपोर्ट
पल्लव, हिमालय का खूबसूरत पक्षी हिमालयन मोनाल अब बढ़ती इंसानी गतिविधियों के दबाव में है। भारतीय शोधकर्ताओं की दो स्टडीज़ के मुताबिक, निर्माण कार्य, पर्यटन और बढ़ता शोर इस पक्षी के रहने की जगह और आपसी संवाद के तरीके को प्रभावित कर रहे हैं।
मोनाल हिमालय के पहाड़ी जंगलों का एक अहम पक्षी है। नर मोनाल अपने हरे, नीले और तांबे जैसे रंग के खूबसूरत पंखों की वजह से आसानी से पहचाना जाता है। यह उत्तराखंड का राजकीय पक्षी और नेपाल का राष्ट्रीय पक्षी है।
पल्लव, शोधकर्ताओं के मुताबिक मोनाल का प्राकृतिक घर ऊँचे घास के मैदानों में है, जो पेड़ों की सीमा से ऊपर पहाड़ी इलाकों में होते हैं। लेकिन इंसानी दखल और निर्माण कार्यों की वजह से इन इलाकों पर दबाव बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन भी इसके आवास के लिए एक और खतरा बन रहा है।
पहली स्टडी में शोधकर्ताओं ने जलवायु मॉडल की मदद से देखा कि आने वाले समय में मोनाल के रहने लायक इलाके कैसे बदल सकते हैं। स्टडी के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमालयन मोनाल का आवास साल 2100 तक सिकुड़ सकता है और अस्थिर हो सकता है।
शोधकर्ता डॉ. राजीव लोचन के मुताबिक, बर्फ पिघलने और वनस्पति में बदलाव की वजह से मोनाल धीरे-धीरे हिमालय में ज़्यादा ऊँचाई की ओर जा रहा है। साथ ही, उसके प्राकृतिक आवास पर इंसानी दबाव भी बढ़ रहा है।
इसका एक गंभीर असर यह हो सकता है कि मोनाल की आबादी छोटे और कटे हुए इलाकों में बँट जाए। इससे अलग-अलग समूहों के बीच प्रजनन के मौके कम हो सकते हैं, और लंबे समय में आबादी घटने या किसी इलाके से मोनाल के पूरी तरह खत्म हो जाने का खतरा बढ़ सकता है।
पल्लव, दूसरी स्टडी में देखा गया कि इंसानी शोर का मोनाल के आपसी संवाद पर क्या असर पड़ता है। शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड के केदारनाथ कस्तूरी मृग अभयारण्य की चोपता और मद्महेश्वर घाटियों में मोनाल की 700 से ज़्यादा आवाज़ें रिकॉर्ड कीं।
चोपता एक व्यस्त पर्यटन स्थल है, जबकि मद्महेश्वर अपेक्षाकृत शांत इलाका है। शोधकर्ताओं ने अप्रैल 2023 से एक साल तक पक्षियों की आवाज़, उनकी पिच, आवाज़ की अवधि और आसपास के शोर को रिकॉर्ड किया।
स्टडी में पाया गया कि शोर वाले माहौल में मोनाल ने ऊँची फ़्रीक्वेंसी वाली आवाज़ें निकालीं। चोपता में मोनाल की आवाज़ें शांत मद्महेश्वर के मुकाबले छोटी भी थीं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऐसा ट्रैफ़िक और पर्यटकों की गतिविधियों के कम फ़्रीक्वेंसी वाले शोर के बीच अपनी आवाज़ सुनाई देने लायक बनाने के लिए हो सकता है।
डॉ. राजीव लोचन के मुताबिक, इसका मतलब यह नहीं है कि मोनाल की आवाज़ की फ़्रीक्वेंसी हमेशा के लिए या विकास के स्तर पर बदल गई है। बल्कि यह दिखाता है कि मोनाल अलग-अलग ध्वनि वाले माहौल के हिसाब से अपना व्यवहार बदल सकता है।
पल्लव, शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अभी शुरुआती शोध है और इसके पर्यावरणीय नतीजों को समझने के लिए और स्टडीज़ की ज़रूरत है। लेकिन दोनों स्टडीज़ मिलकर यह ज़रूर दिखाती हैं कि हिमालय में इंसानी दबाव वन्यजीवों के आवास के साथ-साथ उनके व्यवहार और संवाद को भी बदल रहा है।
अगर एक पक्षी पर्यटकों की गाड़ियों के शोर में सुनाई देने के लिए अपनी आवाज़ बदलने को मजबूर है, और भीड़ भरे घास के मैदानों से बचने के लिए ज़्यादा ऊँचाई पर जा रहा है, तो यह हिमालय के नाज़ुक पर्यावरण के लिए एक अहम चेतावनी है।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
पर्यावरण सिर्फ खबर नहीं, यह हमारी सांसों का सवाल है। ग्राउंड रिपोर्ट की कोशिश है कि इन मुद्दों को ज़मीनी स्तर पर उठाया जाए और चुनावी एजेंडे का हिस्सा बनाया जाए। अगर आप पर्यावरण पत्रकारिता को ज़रूरी मानते हैं, तो इस एपिसोड को शेयर करें और हमें अपना फीडबैक भेजें।
ग्राउंड रिपोर्ट का डेली इंवायरमेंट न्यूज़ पॉडकास्ट ‘पर्यावरण आज’ Spotify, Amazon Music, Jio Saavn, Apple Podcast, पर फॉलो कीजिए।
Support Ground Report to keep independent environmental journalism alive in India
We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.
Connect With Us
Send your feedback at greport2018@gmail.com
Newsletter
Subscribe our weekly free newsletter on Substack to get tailored content directly to your inbox.
When you pay, you ensure that we are able to produce on-ground underreported environmental stories and keep them free-to-read for those who can’t pay. In exchange, you get exclusive benefits.
Your support amplifies voices too often overlooked, thank you for being part of the movement.


