मध्य प्रदेश में 1.56 लाख से ज्यादा साल के पेड़ों की कटाई की तैयारी , महाराष्ट्र के 265 तालुकों में सूखा घोषित, भोपाल के मास्टर प्लान 2047 में हरियाली घटने को लेकर विशेषज्ञों की चिंता। जानिए आज की प्रमुख पर्यावरणीय और कृषि खबरें “पर्यावरण आज” पॉडकास्ट के साथ।
सुर्खियां
मध्य प्रदेश के डिंडोरी और अनूपपुर के अमरकंटक क्षेत्र में साल बोरर कीट के प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए 1,56,319 साल के पेड़ काटने की अनुमति दी गई है। इनमें डिंडोरी में 1,46,784 और अमरकंटक में 9,535 पेड़ शामिल हैं। पेड़ों की कटाई अक्टूबर 2026 से शुरू होने की योजना है।
भोपाल में गीता भवन निर्माण के लिए 425 पेड़ों की कटाई की तैयारी शुरू हो गई है, जबकि प्रस्तावित 1500 सीट वाले भवन के लिए करीब 1500 पेड़ काटे जाने की आशंका जताई गई है। पर्यावरणविदों के अनुसार शहर में करीब 3,000 पेड़ों की कटाई से तापमान 2 से 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है और अर्बन हीट आइलैंड का प्रभाव बढ़ेगा।
मध्य प्रदेश के वन क्षेत्रों में जनवरी से सितंबर 2026 के बीच 1,315 अतिक्रमण के मामले दर्ज हुए, जिनमें अकेले जुलाई में 337 मामले सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार वन विभाग की कार्रवाई के बावजूद जंगल की जमीन पर अवैध कब्जे जारी हैं और कई मामलों में वन सुरक्षा समितियां भी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रही हैं।
सितंबर में ग्रामीण क्षेत्रों से सोलर पैनल की केबल चोरी की आधा दर्जन से अधिक घटनाएं सामने आई हैं। अरनियाकलां में 25 सितंबर को किसान के खेत से करीब 5,500 रुपये की केबल चोरी हुई, जबकि ग्रामीणों ने खेतों और सुनसान क्षेत्रों में रात की गश्त बढ़ाने की मांग की है।
भोपाल के मास्टर प्लान ड्राफ्ट 2047 में शहर के हरित क्षेत्र को लेकर विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार प्रस्तावित विकास और निवेश क्षेत्रों के विस्तार से हरियाली का हिस्सा घट सकता है, वहीं रातापानी टाइगर रिजर्व से जुड़े इको-सेंसिटिव जोन में पहाड़ियों और जलस्रोतों की सुरक्षा के नियम भी ड्राफ्ट में स्पष्ट नहीं हैं।
छत्तीसगढ़ में भारी बारिश के बाद उफनती नदियों के कारण पिछले दो दिनों में करीब 5,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। बस्तर में प्रशासन ने 43 राहत शिविर बनाए हैं, जबकि इंद्रावती नदी का जलस्तर 12.56 मीटर तक पहुंच गया, जो खतरे के निशान से 4.26 मीटर ऊपर था।
महाराष्ट्र सरकार ने कमजोर मानसून और फसल नुकसान के बीच 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। इनमें मराठवाड़ा और विदर्भ के बड़े हिस्से शामिल हैं। सरकार ने फसल नुकसान का जमीनी आकलन शुरू करने के निर्देश दिए हैं, जबकि राहत में भू-राजस्व में छूट, फसल ऋण पुनर्गठन और रोजगार गारंटी के काम बढ़ाने जैसे उपाय शामिल हैं।
विस्तृत चर्चा
पाल के प्रस्तावित मास्टर प्लान ड्राफ्ट-2047 को लेकर पर्यावरणविदों और शहरी नियोजन विशेषज्ञों ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नए ड्राफ्ट में शहर के विस्तार के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रावधान कमजोर या अस्पष्ट नजर आते हैं।
सबसे बड़ा सवाल शहर के हरित क्षेत्र को लेकर है। विशेषज्ञों के मुताबिक, 2005 के मास्टर प्लान में करीब 601 वर्ग किलोमीटर के प्लानिंग एरिया में 16 फीसदी हरित क्षेत्र निर्धारित था। नए ड्राफ्ट में प्लानिंग एरिया बढ़कर करीब 1016 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जबकि हरित क्षेत्र का हिस्सा 27 फीसदी प्रस्तावित किया गया है।
यानी हरित क्षेत्र के प्रतिशत में 11 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वृद्धि शहर के बढ़े हुए क्षेत्रफल और प्रस्तावित विकास के अनुपात में पर्याप्त है। चिंता यह है कि शहर का विस्तार तेजी से होता है और उसके मुकाबले संरक्षित हरित क्षेत्र पर्याप्त नहीं बढ़ता, तो आने वाले वर्षों में कंक्रीट का दबाव बढ़ सकता है।
चिंता सिर्फ ग्रीन एरिया के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। हथाईखेड़ा, शाहपुरा, केरवा, कलियासोत और कोलार जैसे इलाकों के जलग्रहण क्षेत्रों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पहले इन क्षेत्रों में पार्क और क्षेत्रीय हरित क्षेत्र विकसित करने के प्रावधान थे, लेकिन नए ड्राफ्ट में इनकी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
एक और महत्वपूर्ण मामला भानपुर की पुरानी खंती, यानी पूर्व कचरा डंपिंग साइट, का है। विशेषज्ञों के अनुसार, बंद की गई लैंडफिल साइट के उपयोग को लेकर ठोस कचरा प्रबंधन से जुड़े नियमों का पालन जरूरी है। इसके बावजूद नए ड्राफ्ट में यहां गोल्फ कोर्स प्रस्तावित किए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे प्रस्ताव से पहले पर्यावरणीय और नियामकीय प्रावधानों की स्पष्ट जांच जरूरी है।
अब बात भोपाल की पहाड़ियों और रातापानी टाइगर रिजर्व से जुड़े इलाकों की। 1995 के प्लान में आठ डिग्री से अधिक ढलान वाली पहाड़ियों, जिनमें अरेरा हिल्स, चार इमली, ईदगाह और सिंगारचोली जैसे क्षेत्र शामिल हैं, में निर्माण को लेकर प्रतिबंध थे। विशेषज्ञों का कहना है कि नए ड्राफ्ट में पहाड़ियों की सुरक्षा से जुड़े ऐसे स्पष्ट प्रावधान दिखाई नहीं देते और कई फैसले प्रशासनिक विवेक पर छोड़ दिए गए हैं।
इसी तरह, रातापानी टाइगर रिजर्व के बफर और उससे जुड़े वन्यजीव आवागमन वाले क्षेत्रों को लेकर भी सवाल उठे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए स्पष्ट भू-उपयोग नियम और संरक्षण प्रावधान जरूरी हैं। केवल सामान्य पर्यावरणीय या पक्षी संरक्षण संबंधी शब्दावली से वन्यजीव गलियारों की वास्तविक पारिस्थितिक भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भोपाल कितना फैलेगा। असली सवाल यह है कि यह विस्तार किस कीमत पर होगा। क्या शहर का विकास उसके जंगलों, पहाड़ियों, जलग्रहण क्षेत्रों, तालाबों और वन्यजीव आवागमन वाले क्षेत्रों की कीमत पर होगा, या मास्टर प्लान इन प्राकृतिक परिसंपत्तियों को विकास की बुनियादी शर्त मानेगा?
फिलहाल इस ड्राफ्ट पर 25 अक्टूबर तक आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए गए हैं। इसलिए यह भोपाल के नागरिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और शहरी नियोजन से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण अवसर है कि वे उन प्रावधानों पर सवाल उठाएं, जो शहर के पर्यावरणीय भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं।
क्योंकि भोपाल की पहचान सिर्फ एक तेजी से बढ़ते शहर की नहीं, बल्कि झीलों, पहाड़ियों, हरित क्षेत्रों और आसपास के वन्यजीव परिदृश्य वाले शहर की भी है। सवाल यही है कि 2047 का भोपाल इन दोनों पहचानों के बीच संतुलन कैसे बनाएगा।
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