आज के एपिसोड में हम बात करेंगे नीलगिरी तार हिरन की वापसी की, दिल्ली की हवा साफ़ करने वाली नई योजना की, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर उठते सवालों की, अमरनाथ यात्रा की तैयारियों की, दिल्ली में आग से हो रही मौतों की, और सबसे अंत में एक खूबसूरत लेकिन गायब होती दुनिया की — जुगनुओं की। तो चलिए शुरू करते हैं!
तमिलनाडु के नीलगिरी तार की जनसंख्या बढ़ी, एंडेंजर्ड प्रजाति को मिली राहत
दोस्तों, पर्यावरण की दुनिया से एक अच्छी खबर आई है। नीलगिरी तार — जो कि एक लुप्तप्राय खुरदार जानवर है — इसकी संख्या में इज़ाफा हुआ है। यह जानवर सिर्फ दक्षिण-पश्चिमी घाट के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। अब सवाल है कि यह इतना ख़ास क्यों है? क्योंकि यह जानवर सिर्फ देखने में सुंदर नहीं है — यह पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र में न्यूट्रियेंट साइकलिंग यानी पोषक तत्वों के चक्र में अहम भूमिका निभाता है। इसकी जनसंख्या बढ़ना इस बात का संकेत है कि उस क्षेत्र का इकोसिस्टम धीरे-धीरे ठीक हो रहा है।
केंद्रीय कैबिनेट ने दो साल की क्लीन मोबिलिटी स्कीम को मंजूरी दी
दिल्ली-एनसीआर में सांस लेना मुश्किल होता जा रहा है। इसी को देखते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को क्लीन मोबिलिटी स्कीम को हरी झंडी दी है। इस योजना का मकसद है पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले ट्रकों और बसों को बीएस-6 मानक वाले नए वाहनों से बदलना। यह योजना दो साल के लिए है। वाहन मालिकों को इस बदलाव में सरकार सहायता देगी। यह कदम ज़रूरी था — क्योंकि दिल्ली की हवा को सबसे ज़्यादा नुकसान भारी वाहनों से निकलने वाले धुएं से होता है।
राहुल गांधी ने ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट प्रोजेक्ट के खिलाफ ऑनलाइन पिटिशन जारी की
वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे के मौके पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ग्रेट निकोबार ट्रांसशिपमेंट प्रोजेक्ट के खिलाफ एक ऑनलाइन पिटिशन जारी की। उन्होंने देश के युवाओं से सवाल पूछा — “आप किस तरह का भारत चाहते हैं? वो जहाँ कैसीनो के लिए जंगल और आदिवासियों को उजाड़ा जाए, या वो जहाँ प्राकृतिक विरासत और आदिवासी संस्कृति को सहेजा जाए?” राहुल गांधी का आरोप है कि इस प्रोजेक्ट को सेना की ज़रूरत का नाम देकर असल में व्यावसायिक हित साधे जा रहे हैं। यह विषय पर्यावरण, आदिवासी अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा — तीनों को एक साथ छूता है।
अमरनाथ यात्रा में इस बार खास सुरक्षा और फायर ऑडिट की व्यवस्था
अगले महीने से अमरनाथ यात्रा शुरू होने वाली है और इस बार इंतज़ाम पहले से ज़्यादा पक्के हैं। नई व्यवस्थाओं में शामिल हैं — विशेष सुरक्षा टीमें, होटलों और गेस्ट हाउसों का फायर ऑडिट, गाइड और पोनी ऑपरेटरों के लिए QR बेस्ड आईडी, और पूरे रूट पर विस्तारित CCTV कवरेज। फायर ऑडिट को इस बार खास तौर से जोड़ा गया है — दिल्ली के मालवीय नगर में हुए दर्दनाक अग्निकांड के बाद। यह एक अच्छा कदम है जो दिखाता है कि प्रशासन कभी-कभी सबक भी लेता है।
2019 से 2026 के बीच दिल्ली में 543 लोगों की जान आग में गई, सिर्फ 6 महीने में 65 मौतें
यह आँकड़ा दिल दहला देने वाला है। 2019 से 2026 के बीच 543 लोगों की मौत दिल्ली में आग लगने की घटनाओं में हुई है — और इनमें से 65 मौतें तो सिर्फ पिछले छह महीनों में हुई हैं। देश की राजधानी में आज भी इमारतें बिना फायर NOC के चलती हैं, बिना एग्ज़िट के बेसमेंट भरे होते हैं, और नियमों को नज़रअंदाज़ किया जाता है। असली समस्या है प्रशासनिक लापरवाही — जो तब जागती है जब हादसा हो जाता है, मीडिया में हंगामा होता है, और फिर सब कुछ ठंडा पड़ने के बाद दोबारा सो जाती है। अगले हादसे तक। यह एक ऐसा चक्र है जो टूटना चाहिए।
भारत का पहला राष्ट्रीय जुगनू सर्वे — 92 प्रजातियाँ, लेकिन अस्तित्व खतरे में
अब्दुल वसीम अंसारी- ग्राउंड रिपोर्ट
और अब एक ऐसी खबर जो रात की रोशनी की तरह मन को छू जाती है — जुगनुओं की। भारत में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर जुगनुओं का सर्वे किया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय के शोधकर्ता परवेश खान ने यह काम किया, प्रो. अम्लान दास के मार्गदर्शन में। नतीजे दिलचस्प हैं — भारत में जुगनुओं की 92 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, और इनमें से करीब 61% सिर्फ भारत में ही मिलती हैं।
पश्चिमी घाट इनका सबसे समृद्ध घर है। लेकिन चिंता की बात यह है कि यह टिमटिमाती दुनिया धीरे-धीरे बुझ रही है। प्रकाश प्रदूषण, कीटनाशक और जंगलों की कटाई — ये तीन सबसे बड़े दुश्मन हैं जुगनुओं के।
कर्नाटक के पश्चिमी घाट में हुए एक सर्वे ने यह साबित किया — जब पास के कॉफी बागानों में पेड़ काटे गए, तो जुगनुओं की संख्या एकदम घट गई। वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि फायरफ्लाई हेरिटेज साइट बनाई जाएं, वनों में सेंसर-आधारित रोशनी लगाई जाए, और इन्हें संरक्षित किया जाए। याद रखें — जुगनू सिर्फ रोशनी नहीं देते, वे पर्यावरण की सेहत का आईना हैं।
ग्राउंड रिपोर्ट की बात
पर्यावरण सिर्फ खबर नहीं, यह हमारी सांसों का सवाल है। ग्राउंड रिपोर्ट की कोशिश है कि इन मुद्दों को ज़मीनी स्तर पर उठाया जाए और चुनावी एजेंडे का हिस्सा बनाया जाए। अगर आप पर्यावरण पत्रकारिता को ज़रूरी मानते हैं, तो इस एपिसोड को शेयर करें और हमें अपना फीडबैक भेजें।
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