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प्रतिबंध के 29 साल बाद भी बाज़ार में क्यों बिक रही है थाई मांगुर मछली?

स्वास्थ्य एवं पर्यावर्णीय जोखिमों की वजह से भारत में थाई मांगुर के पालन और विक्रय पर वर्ष 1997 से प्रतिबंध है। लेकिन मध्य प्रदेश के स्थानीय बाजारों में यह मछली बिकती दिखाई देती है। 
राजगढ़, मध्य प्रदेश के मछली बाज़ार में बिकती थाई मांगुर | फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी
राजगढ़, मध्य प्रदेश के मछली बाज़ार में बिकती थाई मांगुर | फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

राजगढ़, मध्य प्रदेश में बुधवार को लगने वाले हाट में बिक रही काली चमड़ी और बड़ी काया वाली यह मछली अफ्रीकन कैटफिश है। क्योंकि यह भारत में थाईलैंड से आई, इसे आमतौर पर ‘थाई मांगुर’ के नाम से जाना जाता है। भारत में इस मछली की बिक्री और ब्रीडिंग करीब तीन दशक पहले प्रतिबंधित कर दी गई थी,  इसके बावजूद यह मध्य प्रदेश के बाजारों में देखने को मिल जाती है। 

मध्य प्रदेश में इसे लेकर कार्रवाई भी होती रही है। हाल ही में रीवा में 65 किलो, राजगढ़ में करीब 50 किलो और जबलपुर रेलवे स्टेशन पर करीब 8,000 थाई मांगुर जब्त की गई। 

संयुक्त राष्ट्र की संस्था, फ़ूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गोनाइजेशन (FAO) के अनुसार भारत में यह मछली वर्ष 1993 में थाईलैंड से आई थी। इस मछली से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की आशंका को देखते हुए, 1996 में केंद्र सरकार ने विदेशी जलीय प्रजातियों के भारत में आने के असर का आकलन करने के लिए एक राष्ट्रीय समिति बनाई। दिसंबर 1997 में समिति की पहली बैठक हुई। इसमें सामने आया कि अफ्रीकन मांगुर को बिना सरकारी मंजूरी के भारत लाया गया था।

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समिति को डर था कि यह मछली प्राकृतिक जलस्रोतों में फैल सकती है, देसी मांगुर (Clarias batrachus) के साथ संकरण कर सकती है और विदेशी बीमारियां फैला सकती है। इसके साथ ही लंबे समय में यह प्रजाति पारिस्थितिक असंतुलन भी ला सकती है। इसलिए थाई मांगुर को नष्ट करने की सिफारिश की गई। इसके बाद 1997 में केंद्र सरकार ने इसके पालन पर रोक लगा दी और राज्यों को इसके प्रसार को रोकने के निर्देश दिए।

थाई मांगुर की कहानी सिर्फ एक प्रतिबंधित मछली के बाजार में बिकने तक सीमित नहीं है। इसकी तेज वृद्धि, व्यापक भोजन क्षमता और प्राकृतिक जलस्रोतों में फैलने की संभावना इसे देशी जलीय प्रजातियों के लिए चिंता का विषय बनाती है। वहीं, इसके पालन और बिक्री पर लंबे समय से रोक के बावजूद जब्ती के बाद इसे नष्ट करने तक सीमित कार्रवाई और स्पष्ट दंडात्मक व्यवस्था की कमी इसके कारोबार को रोकने में बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि थाई मांगुर बाजार तक कैसे पहुंच रही है, बल्कि यह भी है कि इसके प्रसार को रोकने की व्यवस्था अब तक कितनी प्रभावी रही है।                     

‘मांगुर-मांगुर ‘ फर्क 

राजगढ़ के हाट बाज़ार में बिकने आई थाई मांगुर | फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी
राजगढ़ के हाट बाज़ार में बिकने आई थाई मांगुर | फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और लिम्नोलॉजिस्ट, डॉ विपिन व्यास भारत में प्रचलित मांगुर की दो प्रजातियों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए थाई मांगुर की कहानी समझाते हैं। डॉ व्यास बताते हैं कि भारत कि अपनी मांगुर मछली की एक प्रजाति है, जिसे आम बोलचाल में ‘देसी मांगुर’ कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Clarias batrachus है। 

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जिस मछली पर प्रतिबंध लगाया गया है वह एक अफ्रीकी मछली, अफ्रीकन कैटफिश है। इसका वैज्ञानिक नाम  Clarias gariepinus है। चूंकि बांग्लादेश और भारत में इसका इंट्रोडक्शन थाईलैंड से हुआ था इसलिए इसे ‘थाई मांगुर’ भी कहा जाता है।

डॉ व्यास बताते हैं कि यह मछली देसी मांगुर की तुलना में बड़ी और भारी होती है, साथ ही यह तेजी से प्रजनन भी करती है। बकौल व्यास, भारत की बड़ी आबादी के लिए यह प्रोटीन का एक सस्ता स्रोत है। यह देसी मांगुर की तुलना में अधिक उत्पादक है, इसलिए इसे भारत में लाया गया। हालांकि थाई मांगुर के भारत आने के कुछ ही वर्षों बाद इसके नकारात्मक परिणाम सामने आने लगे। 

थाई मांगुर के पर्यावरणीय खतरे 

महाशीर मछली पर लंबे समय से काम कर रहीं सेज यूनिवर्सिटी के एक्वाकल्चर विभाग की विभागाध्यक्ष और लिम्नोलॉजिस्ट, डॉ श्रीपर्णा सक्सेना रेखांकित करती हैं कि थाई मांगुर एक सर्वाहारी यानि ओम्निवोरस प्रजाति है। इसका उदाहरण देते हुए वे कहती हैं कि “आप इसके सामने अपनी उंगली रखिए, यह उसे भी खा जाएगी।”

थाई मांगुर की यही क्षमता इसे पारिस्थितिकी के लिए चिंता का विषय बनाती है। 2011 में केरल की वेंबनाड झील पर हुए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि थाई मांगुर अलग-अलग तरह के भोजन पर निर्भर कर सकती है। इसका भोजन सूक्ष्म जलीय जीवों से लेकर अपने शरीर की लंबाई के लगभग आधे आकार तक की मछलियों और कभी-कभी उभयचर, सरीसृप और पक्षियों तक हो सकता है।

खतरा सिर्फ दूसरी मछलियों के इसके शिकार बनने का नहीं है। वेंबनाड झील में कई देसी मांगुर प्रजाति भी लगभग इसी तरह के भोजन पर निर्भर करती हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, थाई मांगुर की संख्या बढ़ने पर इन प्रजातियों के बीच भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। खासकर वे देशी प्रजातियां ज्यादा जोखिम में हो सकती हैं जिनकी संख्या पहले से कम है।

एक और चिंता इसके प्राकृतिक जलस्रोतों में पहुंचने और वहां अपनी आबादी कायम करने की है। डॉ सक्सेना बताती हैं कि, बाढ़ जैसी आपदाओं में यह मछली तालाब से बहकर नदी जैसे प्राकृतिक स्रोतों में पहुंचती है और वहां कि स्थानीय प्रजातियों के लिए संकट पैदा करती यही। वेंबनाड झील के अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि बाढ़ के दौरान तालाबों के तट और पानी की निकासी की कमजोर संरचनाएं टूटने से पाली गई मांगुर झील में पहुंच सकती है। इसके अलावा जीवित मछलियों के बाजार और लैंडिंग सेंटर भी इसके फैलने का संभावित ज़रिया हैं।

डॉ. सक्सेना इसके फूड बेस और स्पेस को लेकर एक और चिंता की ओर इशारा करती हैं।

बॉटम-फीडर मछली

राजगढ़ के मछली बाज़ार में विभिन्न प्रकार की मछलियों के विक्रेता | फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी
राजगढ़ के मछली बाज़ार में विभिन्न प्रकार की मछलियों के विक्रेता | फोटो: अब्दुल वसीम अंसारी

थाई मांगुर का फूड बेस काफी व्यापक है और यह बॉटम-फीडर मछली है। यानी यह पानी की निचली परत में रहने वाले कई तरह के जीवों को खाती है। ऐसे में इसका ट्रॉफिक नीश, यानी भोजन और संसाधनों का इस्तेमाल करने का दायरा, कई देशी मछलियों से ओवरलैप कर सकता है। भारत के दूसरे जलाशयों से मिले अध्ययन भी इस चिंता को मजबूत करते हैं।  

करापुझा रिजर्वायर पर किए गए एक मॉडलिंग अध्ययन में थाई मांगुर का 92 प्रतिशत नीश ओवरलैप पाया गया और शोधकर्ताओं ने समान संसाधनों के लिए मजबूत प्रतिस्पर्धा की बात कही। अध्ययन में थाई मांगुर की कई मछलियों और क्रस्टेशियन पर नकारात्मक ट्रॉफिक प्रभाव भी दर्ज किए गए।

डॉ. सक्सेना के मुताबिक, उन्होंने भोपाल की अपर लेक में थाई और देसी मांगुर के बीच एक हाइब्रिड मछली भी देखी है। उनका कहना है कि दोनों प्रजातियों में समान क्रोमोसोम होने की वजह से इनके बीच संकरण संभव है। वेंबनाड झील पर हुए अध्ययन में भी शोधकर्ताओं ने थाईलैंड में देसी मांगुर और देशी बिगहेड कैटफिश (Clarias macrocephalus) के बीच संकरण से देशी आबादी के जीन पूल के प्रभावित होने का उदाहरण दिया है। 

इसी अध्ययन में बांग्लादेश में देशी मांगुर के साथ भी ऐसे संकरण के प्रमाणों का उल्लेख है।

वेंबनाड में हुए शोध के अनुसार, इसके फैलने, बड़ी संख्या में टिकने, अलग-अलग जीवों को खाने और देशी मछलियों के साथ भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता इसे एक संभावित आक्रामक प्रजाति बनाती है। इस शोध में इसे देशी मछलियों और स्थानीय मछुआरों की आजीविका के लिए खतरा बताया गया है और इसके प्रसार पर निगरानी और नियंत्रण को जरूरी माना है। 

क्या थाई मांगुर मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है? 

भारत में 2012 में हुए एक शोध में 27 ‘ग्रामीण मछली पालन तालाबों’ में पाली गई थाई मांगुर  के 324 नमूनों का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने मछलियों के ऊतकों में धातु प्रदूषण पाया। एल्युमीनियम, आयरन और खास तौर पर लेड का संचय महत्वपूर्ण स्तर पर पाया गया। कुछ तालाबों, खासकर जहां चिकन वेस्ट का इस्तेमाल हो रहा था, वहां लेड को लेकर ज्यादा चिंता सामने आई।  

भारत के बाहर हुए अध्ययनों में भी इसी तरह के परिणाम मिले हैं। औद्योगिक रूप से प्रदूषित नदियों से पकड़ी गई थाई मांगुर में आर्सेनिक, कैडमियम और निकेल के आधार पर लंबे समय तक सेवन से संभावित स्वास्थ्य जोखिम का आकलन किया गया है। 

डॉ. व्यास ने कहा, “थाई मांगुर का भोजन बहुत व्यापक है और यह अलग-अलग तरह के जलीय जीवों और जैविक पदार्थों को खा सकता है। इसलिए अगर यह किसी प्रदूषित जलस्रोत में पल रही है, तो इसके शरीर में उन प्रदूषकों के जमा होने की संभावना हो सकती है। ऐसे में यह मछली इन प्रदूषकों को फूड चेन के जरिए इंसानों तक पहुंचाने का एक माध्यम बन सकती है।”

प्रतिबंध के बावजूद क्यों बाजार में बिक रही है थाई मांगुर 

थाई मांगुर पर प्रतिबंध लगे हुए 29 वर्ष हो चुके हैं। केंद्र सरकार ने बाद के वर्षों में भी दोहराया, और 2019 में एनजीटी ने भी इसकी स्पष्ट पुष्टि करते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इसके पालन पर रोक के निर्देश दिए। इसके बावजूद यह भारत की आम मछली मंडियों में खुलेआम बिक रही है। 

मध्य प्रदेश मत्स्य विभाग के संचालक, मनोज पथरोलिया कहते हैं, “बुधवार के हाट में तो मुझे सबसे ज्यादा थाई मांगुर ही दिखाई देती है।”

पथरोलिया के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में मुख्य निर्देश मछली को पकड़कर उसका पंचनामा बनाने और उसे नष्ट करने का है, लेकिन विक्रेता या ब्रीडर पर कार्रवाई के लिए स्पष्ट प्रावधान की समस्या सामने आती है। वो आगे जोड़ते हैं, “जब हमने इसे पकड़ा, तो समस्या यही आई कि पुलिस भी पूछती थी कि किस धारा के तहत हम इसे पकड़ें।”

एनजीटी मामलों के जानकार अधिवक्ता प्रतीक गिरि गोस्वामी के मुताबिक, सिर्फ मछली जब्त कर नष्ट करना प्रतिबंध को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, अगर किसी व्यक्ति या इकाई के खिलाफ NGT के आदेश के उल्लंघन का मामला स्थापित होता है, तो राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम 2010 की धारा 26 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। 

उदाहरण के तौर पर वर्ष 2021 में लुधियाना पंजाब के हुमायुपुर गांव के दो तालाबों में प्रतिबंधित थाई मांगुर मछलियां पाई गई थी। इस पर कार्रवाई करते हुए सदर थाना पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 188 के तहत FIR (फर्सट इंफॉरमेश रिपोर्ट) दर्ज की थी। 

IPC (इंडियन पीनल कोड) की धारा 188 किसी लोक सेवक द्वारा विधिवत जारी किए गए आदेश की अवज्ञा से संबंधित है। इसके तहत आदेश की अवज्ञा से मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा पैदा होता है या होने की संभावना होती है, तो ऐसी स्थिति में 6 माह तक की कैद, या एक हज़ार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जा सकता है। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में यह धारा 223 के तहत दर्ज है। इसमें कारावास को एक साल और जुर्माने की राशि को बढ़ाकर 5 हज़ार तक कर दिया गया है। 

क्योंकि हुमायुपुर में एनजीटी के ऑर्डर की अवज्ञा की जा रही थी, और मानव स्वास्थ को यह मछली नुकसान पहुंचा सकती है,  पुलिस ने IPC धारा 188 के तहत मामला दर्ज किया था। हालांकि BNSS 215 अदालतों को (धारा 206-223 तक) तब तक संज्ञान लेने से रोकता है, जब तक कि संबंधित लोक सेवक की ओर से लिखित शिकायत न मिले। शिकायत एक मत्स्य अधिकारी (फिशरीज ऑफिसर) को ही दर्ज करानी होगी; पुलिस अपनी तरफ से ऐसा नहीं कर सकती। 

यानी एक सामान्य प्रावधान मौजूद है, लेकिन इसके लिए आधिकारिक शिकायत की ज़रूरत होती है, इसमें मामूली जुर्माना लगता है और यह ज़मानत-योग्य है, इसलिए थाई मांगुर पालन पर रोकथाम का असर कमज़ोर नज़र आता है। यही वजह है कि अभी भी शहरों और कस्बों में यह मछली बिकती नज़र आती है। 

डॉ. व्यास का कहना है कि ये “प्रोटीन का सस्ता स्रोत है, इसलिए इसकी मांग बनी हुई है।”

सक्सेना थाई मांगुर को ‘पानी के राक्षस’ की संज्ञा देती हैं। वे कहती हैं कि अगर इस पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई तो यह स्वदेशी मछलियों को पूरी तरह से ख़त्म कर के हमारी पारिस्थितिकी को बड़ा नुकसान पहुंचाएगी। वो एक ठोस नीति बनाए जाने पर बल देती हैं।


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