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आयुष्मान योजना के बहिष्कार पर रोक, प्रमाणीकरण की अनिवार्यता पर विवाद बरकरार

सरकार से बातचीत के बाद अस्पतालों ने इलाज बंद करने का फैसला फिलहाल टाल दिया है। लेकिन मान्यता की अनिवार्यता और लंबित भुगतानों को लेकर सहमति नहीं बनी। 
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मध्य प्रदेश के निजी अस्पतालों ने 8 अक्टूबर से आयुष्मान भारत योजना के तहत नए मरीजों का इलाज अनिश्चितकाल के लिए बंद करने और करीब 1,000 एम्बुलेंस के साथ दिल्ली कूच करने का ऐलान किया। मगर सरकार के साथ बातचीत के बाद यह आंदोलन में स्थगित कर दिया गया। फिर भी एनएबीएच यानि नेशनल एक्रिडेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स के प्रमाणीकरण की अनिवार्यता, आयुष्मान योजना के लंबित भुगतान सहित अन्य मामलों को लेकर विवाद बरकरार है। यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल्स डॉक्टर्स एसोसिएशन (UPHDA) के उपाध्यक्ष डॉ. धनंजय मिश्रा का कहना है कि अस्पतालों की मांगों पर ठोस समाधान नहीं निकलने की स्थिति में विरोध दोबारा शुरू हो सकता है। 

ऐसे में सवाल ये है कि आखिर सरकार इस प्रमाणीकरण पर इतना जोर क्यों दे रही है? यह पहल विवाद का विषय कैसे बन गई और अस्पतालों की आपत्तियां क्या हैं? इसके अलावा दोनों पक्षों के बीच आयुष्मान योजना से जुड़े लंबित भुगतान और क्लेम की जांच में पारदर्शिता भी टकराव के अन्य मुद्दे हैं।  

एनएबीएच सर्टिफिकेशन पर विवाद कैसे बढ़ा?

एनएबीएच, क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के अंतर्गत अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का आकलन करने वाली संस्था है। यह अस्पतालों में बुनियादी ढांचे, कर्मचारियों की योग्यता, मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा प्रक्रियाओं से जुड़े मानकों की जांच करती है। मगर सरकार को अचानक इसके सर्टिफिकेशन की ज़रूरत क्यों पड़ी?

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NABH अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा से जुड़े मानकों का आकलन करने वाली संस्था है।

ग्राउंड रिपोर्ट से बात करते हुए राज्य की स्वास्थ्य एजेंसी आयुष्मान भारत निरामयम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अरविंद शाह ने कहा, मेट्रो सिटीज में शहरों की आबादी के अनुपात में निजी अस्पतालों की संख्या कहीं ज्यादा है।  

उन्होंने कहा कि कुछ अस्पताल कोविड-19 महामारी के दौरान ऐसी इमारतों में शुरू हुए जो पहले होटल जैसी दूसरी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होती थीं। उनके मुताबिक ऐसे अस्पतालों के लिए फायर एनओसी, एम्बुलेंस की आवाजाही और अन्य बुनियादी मानकों को पूरा करना संदेहास्पद हो सकता है। इसी को देखते हुए सरकार ने एनएबीएच सर्टिफिकेशन की अनिवार्यता का फैसला लिया।

सरकार के इस फैसले के खिलाफ जबलपुर हाईकोर्ट दायर एक जनहित याचिका में कहा गया कि इससे छोटे और मध्यम अस्पतालों की आयुष्मान योजना में भागीदारी प्रभावित हो सकती है और मरीजों की इलाज तक पहुंच सीमित हो सकती है। 

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मगर मामले पर जबलपुर हाईकोर्ट ने 23 सितंबर 2025 को आदेश दिया जिसके अनुसार भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में योजना से पहले से जुड़े एंट्री-लेवल सर्टिफिकेशन वाले अस्पतालों को 31 मार्च 2026 तक फाइनल-लेवल सर्टिफिकेशन हासिल करना अनिवार्य कर दिया। आदेश के अनुसार ऐसा नहीं कर पाने वाले अस्पतालों की योजना में भागीदारी प्रभावित हो सकती थी। 1 अप्रैल 2026 से योजना में नए अस्पतालों को जोड़ने के लिए भी फाइनल-लेवल सर्टिफिकेशन अनिवार्य किया गया।

कुछ अस्पतालों को 31 अक्टूबर तक का वक़्त

एंट्री-लेवल सर्टिफिकेशन में मरीजों की देखभाल, दवाओं का प्रबंधन, संक्रमण नियंत्रण, मरीजों के अधिकार, अस्पताल की सुरक्षा, मानव संसाधन और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसे पैमानों पर आकलन किया जाता है। जबकि फाइनल-लेवल सर्टिफिकेशन का उद्देश्य अस्पताल की सेवाओं और व्यवस्थाओं का अधिक व्यापक आकलन करना है। 

शाह के अनुसार मार्च तक कई अस्पतालों की सर्टिफिकेशन प्रक्रिया पूरी न होने के चलते समयसीमा 30 सितंबर 2026 तक बढ़ाई गई। जब नई समय सीमा में भी यह कम पूरा नहीं हुआ तब राज्य स्वास्थ्य एजेंसी ने सितंबर में 113 अस्पतालों को ईमेल भेजकर सर्टिफिकेशन से जुड़ी आपत्तियों और अधूरी प्रक्रिया के बारे में सूचित किया और नई समयसीमा 31 अक्टूबर रखी गई।

शाह ने बताया कि इनमें से 21 अस्पताल भौतिक निरीक्षण पूरा होने के बाद प्रमाणपत्र मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इन्हें प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने के लिए 31 अक्टूबर तक का समय दिया गया। लेकिन इस दौरान वे योजना के तहत मरीजों को भर्ती नहीं कर सकते थे। 

लंबित भुगतान और क्लेम की वैधता 

एनएबीएच प्रमाणीकरण की अनिवार्यता के अलावा विरोध का एक और मुद्दा आयुष्मान योजना के तहत भुगतान में देरी भी है। यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल्स डॉक्टर्स एसोसिएशन (UPHDA) के उपाध्यक्ष डॉ. धनंजय मिश्रा के मुताबिक कई अस्पतालों के भुगतान लगभग छह महीने से लंबित हैं। 

शाह ने बताया कि राज्य सरकार ने 1 अप्रैल से अब तक करीब 1,500 करोड़ रुपये का भुगतान किया है। इसमें पिछले तीन महीनों के दौरान दिए गए लगभग 800 करोड़ रुपये शामिल हैं। उन्होंने निजी अस्पतालों के करीब 500 करोड़ रुपये के क्लेम लंबित होने की बात भी कही।

शाह के अनुसार, लगभग 37 लाख क्लेम में से 1.5 लाख क्लेम ऑडिट या समीक्षा के दायरे में थे। इनकी जांच के लिए 40 से 50 डॉक्टर लगाए गए हैं जिसकी प्रक्रिया पूरी होने में दो महीने तक लग सकते हैं।

शाह ने बताया कि सरकार ने कुछ ऐसे दावों को चिह्नित किया जिनमें चिकित्सा रिकॉर्ड या इलाज की अवधि असामान्य दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, किसी बीमारी में लंबे समय तक आईसीयू में भर्ती दिखाना, आईसीयू से सीधे छुट्टी देना या चिकित्सा रिकॉर्ड में असंगत आंकड़े दर्ज होना। शाह ने कहा कि इससे सरकारी धन के नुकसान के साथ मरीज के इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड में भी गलत जानकारी दर्ज हो सकती है। 

अस्पताल संगठन इस मामले पर यह चाहते हैं कि क्लेम खारिज करने या भुगतान में कटौती करने पर लिखित कारण दिए जाएं, समीक्षा योग्य डॉक्टर करें, अस्पतालों को फैसले के खिलाफ अपील का अवसर मिले और इलाज के पैकेज की दरों पर पुनर्विचार किया जाए।

मिश्रा के अनुसार सरकार के साथ बातचीत के दौरान अटके भुगतानों पर कार्रवाई का आश्वासन मिला था जिसके बाद संगठन ने आंदोलन स्थगित कर दिया।


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  • Journalist, focused on environmental reporting, exploring the intersections of wildlife, ecology, and social justice. Passionate about highlighting the environmental impacts on marginalized communities, including women, tribal groups, the economically vulnerable, and LGBTQ+ individuals.

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