भोपाल से 350 किमी दूर छतरपुर के सांदनी गांव में सोलर पैनल लगाने की तैयारी चल रही है। गांव में एक जगह ईंटों का मलबा नज़र आता है। कभी यहां प्रेमलाल कुशवाहा का घर हुआ करता था।
करीब दो साल पहले भीषण गर्मी में पुलिस बल की मौजूदगी में उनका घर खाली कराया गया। कुशवाहा की मां आज भी वह दिन नहीं भूलीं, “उन्होंने (पुलिस ने) कहा कि कहीं और जाकर बैठो। इस गर्मी में क्या हम वहां बैठकर मर जाएं?” उस दिन से अब तक मुआवज़े की राह देखते हुए उनका परिवार तिरपाल के नीचे रह रहा है।
इस इलाके के कई प्रभावित परिवार केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना के खिलाफ चले लंबे विरोध प्रदर्शनों में भी शामिल रहे। लेकिन उनका अपना मुद्दा, थर्मल से सौर परियोजना में बदलाव के चलते अटका मुआवजा, उस बड़े आंदोलन के शोर में कभी उतनी सुर्खियों में नहीं आया।

कुशवाहा का परिवार अकेला नहीं है। राजनगर तहसील के सांदनी और बरेठी गांवों के कई परिवार एक दशक से अधिक समय से पूरे मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं। इन परिवारों की जमीन कभी बरेठी ताप विद्युत परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी। वह परियोजना बाद में रद्द हो गई। अब उसी जमीन के बड़े हिस्से पर एनटीपीसी की नवीकरणीय ऊर्जा इकाई 630 मेगावाट का सौर ऊर्जा पार्क बना रही है। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना भले बदल गई हो, उनके मुआवजे का विवाद आज भी जस का तस बना हुआ है।
“बिना सूचना हमारा घर तोड़ दिया”

छह सदस्यों वाले 48 वर्षीय प्रेमलाल कुशवाहा के परिवार की पीढ़ियों पुरानी जमीन इस परियोजना में चली गई। उनका कहना है कि 2010 के आसपास तत्कालीन कलेक्टर समेत कई अधिकारियों ने गांव वालों की बैठक बुलाई थी। इसमें बताया गया कि सरकार को विकास, स्कूल और रोजगार लाने वाली एक बड़ी परियोजना के लिए जमीन चाहिए।
कुशवाहा ने बताया कि असिंचित जमीन के लिए उन्हें लगभग सात लाख रुपये प्रति एकड़ और सिंचित जमीन के लिए लगभग 9.75 लाख रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा मिला। उनका कहना है कि 2012-13 की गाइडलाइन के अनुसार उन्हें इससे कहीं अधिक राशि मिलनी चाहिए थी।

4 दिसंबर 2012 को पारित अवॉर्ड (प्रकरण क्रमांक 82/2010-11) जो सांदनी गांव से संबंधित है, से पता चलता है कि मुआवजे की गणना वर्ष 2011-12 की अधिसूचित गाइडलाइन दर के आधार पर की गई थी।
दस्तावेज के अनुसार सिंचित भूमि के लिए 7 लाख 4 हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर (करीब 2.85 लाख रुपये प्रति एकड़) और असिंचित भूमि के लिए 3 लाख 52 हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर (करीब 1.42 लाख रुपये प्रति एकड़) की दर तय की गई थी। इसके अलावा अधिसूचना और अवॉर्ड के बीच की अवधि के लिए 30 प्रतिशत सोलैटियम (एक ऐसा भुगतान या टोकन है जो भावनात्मक परेशानी, दुख या मानसिक पीड़ा के मुआवज़े के तौर पर दिया जाता है) और 12 प्रतिशत अतिरिक्त राशि भी जोड़ी गई थी।
इस रिपोर्ट के लिए अलग से देखे गए एक मुआवजा नोटिस में भी इसी अवॉर्ड का उल्लेख है। यह नोटिस सांदनी गांव की निवासी कमली, पत्नी प्रेमलाल काछी, के नाम जारी किया गया था और खसरा नंबर 99/1-खा (2.416 हेक्टेयर) से संबंधित है। नोटिस के अनुसार भूमि, परिसंपत्तियों और पुनर्वास अनुदान सहित कुल 59 लाख 28 हज़ार 727.80 रुपये का भुगतान स्वीकृत किया गया था।
हालांकि, कुशवाहा का आरोप है कि खसरा नंबर 98 की भूमि का मुआवजा अब तक पूरी तरह बकाया है। इसके अलावा एक कुएं का मुआवजा भी उनको नहीं मिला।
55 वर्षीय प्रेम नारायण तिवारी का घर भी करीब डेढ़ महीने पहले रात 11 बजे तोड़ दिया गया। तब वो अपने परिवार के साथ अन्य किसी जगह सो रहे थे।

तिवारी कहते हैं, “अगर कुछ करना था तो हमें बुलाकर, हमारे सामने करते।”
उनका दावा है कि कुएं से सिंचाई व्यवस्था होने के बाद भी राजस्व अभिलेखों में उनकी भूमि को असिंचित दिखाया गया। बकौल तिवारी बाद में एक सरकारी जांच दल ने पंचनामा बनाकर इस गलती को रिकॉर्ड में सुधार तो दिया लेकिन आज तक इसका कोई भुगतान नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि उनका मामला लगभग 2015 से छतरपुर कलेक्टर की अदालत में लंबित है। सुनवाई की तारीखें लगातार मिलती रहीं, लेकिन कोई फैसला नहीं हुआ।
वह कहते हैं, “उस समय जितना मुआवजा तय हुआ था, आज भी हमें वही देने की बात कही जाती है।” उनका दावा है कि तब से अब तक इस इलाके में जमीन की कीमत लगभग दस गुना बढ़ चुकी है।
अपर्याप्त मुआवजे और बिना सूचना घर तोड़े जाने के आरोपों पर छतरपुर के कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने कहा, “बरेठी गांव में तो कोई मकान गिराए ही नहीं है। बरेठी में सिर्फ कृषि जमीन गई है।” उन्होंने आगे कहा, “यहां 2016 से ही मुआवजा मिल चुका है। इसमें 10 साल पुरानी कहानी है। बाकी अगर किसी की कोई शिकायत होगी तो हम उसमें कार्रवाई कर लेंगे।”
एक परियोजना, जिसका नाम बदल गया
तत्कालीन केंद्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बरेठी में 3 मार्च 2014 को सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी थी। एनटीपीसी का यह प्लांट कुल 2,640 मेगावाट (4×660 मेगावाट) क्षमता का था।
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना की अनुमानित लागत 17,000 से 18,000 करोड़ रुपये थी। इसे प्रस्तावित कोयला खदान से जोड़ा गया था और 13वीं पंचवर्षीय योजना (2017-22) के दौरान इसे चालू करने का लक्ष्य रखा गया था।
एनटीपीसी के अपने खरीद पोर्टल पर उपलब्ध टेंडर दस्तावेज बताते हैं कि कंपनी दिसंबर 2014 तक इस ताप विद्युत संयंत्र के लिए टर्नकी निर्माण निविदाएं जारी कर रही थी।

मध्य प्रदेश के तत्कालीन ऊर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने सितंबर 2015 को बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि राज्य सरकार कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं से अपना ध्यान हटा रही है। उनके अनुसार बरेठी की इस योजना को कोयला लिंकिंग नहीं मिली थी।
ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर (GEM) के पावर प्लांट ट्रैकर में इस परियोजना को रद्द बताया गया है। इसके अनुसार जुलाई 2016 में केंद्रीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने इसकी पर्यावरणीय मंजूरी टाल दी थी।
बरेठी में नई परियोजना का आना
करीब आठ वर्ष बाद, 10 मार्च 2024 को केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने इसी स्थान पर एक नई परियोजना की आधारशिला रखी।

यह 630 मेगावाट की बरेठी सौर ऊर्जा परियोजना है, जिसे एनटीपीसी की सहायक कंपनी एनटीपीसी रिन्यूएबल एनर्जी लिमिटेड (NTPC REL) लगभग 3,200 करोड़ रुपये की लागत से विकसित कर रही है। एनटीपीसी के टेंडर पोर्टल से भी पुष्टि होती है कि इस सौर परियोजना के लिए इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC) पैकेज का सक्रिय टेंडर नवंबर 2023 में जारी किया गया।
मगर इस बदलाव ने यहां के ग्रामीणों के जीवन में एक परेशानी को जन्म दे दिया।
कुशवाहा बताते हैं: “हमने जमीन एनटीपीसी के थर्मल प्लांट के लिए दी थी, और हमारा समझौता एनटीपीसी से हुआ था। अब यह (सौर) कंपनी कहती है कि उसका हमसे कोई लेना-देना नहीं है।”
जबकि सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर मानते हैं, “एनटीपीसी केवल कॉर्पोरेट ढांचे में बदलाव का हवाला देकर एक दशक पहले किए गए अपने वादों से पीछे नहीं हट सकती।”
इस विषय पर जब जायसवाल से पूछा गया कि क्या कंपनी बदलने, यानी थर्मल परियोजना से सौर परियोजना में बदलाव के कारण पुराना मामला उलझ गया है, तो उन्होंने कहा, “नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है।”
कंपनी की अपनी नीति क्या कहती है
एनटीपीसी की पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (आर एंड आर) नीति, जिसे पहली बार 2005 में अपनाया गया और जून 2010 में केंद्र सरकार की 2007 की राष्ट्रीय पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति के अनुरूप संशोधित किया गया, परियोजना प्रभावित परिवारों की विभिन्न श्रेणियों और उनके अधिकारों का उल्लेख करती है।
इसमें नकद मुआवजा, जमीन के बदले जमीन का विकल्प, पुनर्वास अनुदान, अस्थायी आवास सहायता तथा प्रभावित प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को योग्यता और उपलब्ध रिक्तियों के आधार पर रोजगार में प्राथमिकता शामिल है।
नीति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “एनटीपीसी में रोजगार के अवसर काफी सीमित हैं”, क्योंकि कंपनी की परियोजनाएं पूंजी और तकनीक पर आधारित हैं। साथ ही अकुशल श्रेणी की नौकरियां सरकारी आरक्षण नीति के अनुसार दी जाएंगी।
कन्हैया अहिरवार का दावा है कि दो गांवों के लोगों के लिए करीब 4,000 नौकरियां देने का वादा कंपनी ने किया था। हालांकि एनटीपीसी की लिखित आर एंड आर नीति में इस तरह की किसी निश्चित संख्या में नौकरियों का वादा नहीं किया गया।

नीति दो अलग-अलग वित्तीय व्यवस्थाओं के बीच भी स्पष्ट अंतर करती है, जिन्हें बरेठी के कई ग्रामीण एक ही मान रहे हैं। नीति के पैरा 2.19(i) के अनुसार केवल आर एंड आर पैकेज की तय राशि, जैसे वार्षिकी, पुनर्वास अनुदान और अन्य भत्ते, को 1 जनवरी 2010 के आधार वर्ष से महंगाई के अनुसार संशोधित किया जाता है।
जबकि भूमि का मूल मुआवजा भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 (जो 2013 से पहले के अधिग्रहणों पर लागू था) के तहत अलग कानूनी प्रक्रिया के अनुसार तय किया जाता है। इसके लिए उसी तारीख की सरकारी गाइडलाइन दर लागू होती है, जिस दिन संबंधित भूमि के लिए धारा 4 की अधिसूचना जारी हुई थी, न कि बाद की किसी तारीख की दर।
ग्रामीणों की जमीन पर वास्तव में कौन-सी गाइडलाइन दर लागू हुई, यह केवल संबंधित कलेक्टर अवॉर्ड की जांच से ही तय हो सकता है। इस रिपोर्ट के लिए संदानी गांव का एक अवॉर्ड देखा गया, जिसमें 2011-12 की समकालीन गाइडलाइन दर लागू होने की पुष्टि होती है।
भटनागर कहते हैं कि प्रभावित परिवारों को भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 34 के तहत पहले वर्ष 9 प्रतिशत और उसके बाद हर वर्ष 15 प्रतिशत की दर से वैधानिक ब्याज भी मिलना चाहिए।

एनटीपीसी की नीति में शिकायतों के निवारण के लिए औपचारिक व्यवस्था का भी प्रावधान है। परियोजना स्तर पर ग्राम विकास सलाहकार समिति बनाई जाती है और अपील की व्यवस्था कंपनी के जोनल कार्यकारी निदेशक तक जाती है, जिसका निर्णय नीति के अनुसार अंतिम और बाध्यकारी माना जाता है।
लेकिन इस रिपोर्ट के लिए जिन ग्रामीणों से बात की गई, उनमें से किसी ने भी यह नहीं कहा कि इस व्यवस्था से उनकी समस्या का समाधान हुआ।
उनका कहना है कि जिन मकानों को बिना औपचारिक सूचना के तोड़ा गया, उनका मुआवजा भी शामिल करते हुए पूरी राशि का वर्तमान दरों पर दोबारा आकलन किया जाए और भुगतान किया जाए। इसके बाद ही बची हुई जमीन पर निर्माण कार्य आगे बढ़ाया जाए।
बैनर इमेज: फूलबाई कुशवाहा पिछले 2 सालों से तिरपाल की छांव में रह रहीं हैं। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी
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