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बालाघाट में 30 बच्चों की मौत पर अब तक क्या हुआ, समझते हैं…

बालाघाट में 30+ बच्चों की मौत की पूरी कहानी — कारण, आंकड़े और सरकार की लापरवाही। पूरा सच समझते हैं...
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मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले में जून के आख़िरी हफ़्ते से जो सिलसिला शुरू हुआ, वो ढाई महीने बाद भी थमा नहीं है। बैगा आदिवासी बहुल गांवों में एक के बाद एक बच्चों की मौत हो रही है। सरकार ने पहले सिर्फ़ 8 मौतें मानी थीं, लेकिन अब यह आंकड़ा 30 पार कर चुका है। सैकड़ों बच्चे अब भी बीमार हैं और पूरा इलाका सवालों के घेरे में है।

बालाघाट के बैहर और बिरसा ब्लॉक के सोनगुड्डा, बोंदारी, कुंडेकसा, कोर्का, गठिया, मछुला और मतला जैसे गांवों में बैगा समुदाय के बच्चे बीमार पड़ने लगे। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पहली आधिकारिक मौत 26 जून 2026 को बोंदारी गांव में दर्ज हुई। जब तक प्रशासन को इसकी गंभीरता समझ आई, तीन बच्चे जान गंवा चुके थे। बच्चों में तेज़ बुखार, शरीर पर दाने, पेट में इन्फेक्शन और किडनी से जुड़ी दिक्कतें देखी गईं। ये गांव जिला अस्पताल से करीब 85 किलोमीटर दूर हैं, इसलिए समय पर इलाज मिलना मुश्किल रहा।

11 अगस्त तक प्रशासन ने सिर्फ़ 6 मौतें और 101 बीमार लोगों की जानकारी दी थी। इसके बाद यह आंकड़ा 19, फिर 22, 24 और 27 तक पहुंचा। सितंबर में भी संख्या को लेकर भ्रम बना हुआ है — कांग्रेस 30 मौतों का दावा करती है, मीडिया रिपोर्टों में यह संख्या 31 बताई गई, जबकि प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह ने इसे 28 बताया। प्रशासन ने अब तक कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है।

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जांच में क्या निकला

ग्राम कुंडेकसा में बच्चों को अस्पताल ले जाते परिजन | फोटो: अशोक गिरी, ग्राउंड रिपोर्ट

केंद्र सरकार की टीम ने इलाके में 32,433 लोगों की जांच की। इनमें 7,711 बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार मिले, जिनमें से 518 को पोषण पुनर्वास केंद्रों में भर्ती कराया गया। 13,406 बच्चे डायरिया से और 274 गंभीर निमोनिया से पीड़ित पाए गए। जुलाई से अब तक 431 बच्चे अस्पताल में भर्ती हुए, जिनमें 379 को छुट्टी मिल चुकी है और 52 का इलाज अभी जारी है। खास बात यह है कि मौत की कोई एक वजह सामने नहीं आई है — अलग-अलग बच्चों में अलग-अलग कारण मिले हैं।

माना जा रहा है कि गंभीर कुपोषण ने बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर कर दी, जिससे आम बीमारियां भी जानलेवा साबित हुईं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन गांवों में टेक होम राशन करीब छह महीने से बंद था — ठीक उसी दौर में जब बीमारी फैलनी शुरू हुई। मध्य प्रदेश में राशन बनाने वाले संयंत्रों पर 31 मार्च को ताला लग गया था और नई व्यवस्था अब तक बहाल नहीं हुई।

कुंडेकसा गांव में नाले से पानी भरते ग्रामीण सहर सिंह | फोटो: अशोक गिरी, ग्राउंड रिपोर्ट

कुंडेकसा गांव में ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान पता चला कि लोगों के पास पीने का साफ पानी तक नहीं है। ग्रामीण सहर सिंह के मुताबिक लोग सालों से पास के नाले का पानी पीते आ रहे हैं। गांव के हैंडपंप से गंदा पानी आता है और सरकारी पानी की टंकी खाली पड़ी है। इलाज से पहले झाड़-फूंक पर भरोसा करना भी बीमारी बढ़ने की एक वजह मानी गई है।

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मौतों का आंकड़ा 22 पार करने के बाद भी तत्कालीन CMHO डॉ. परेश यह कहते रहे कि सारी मौतें मौसमी बीमारियों से हुईं और अस्पताल में सिर्फ़ एक मौत हुई — बाद में उन्हें बर्खास्त किया गया। मोहनपुर के बैगाटोला में चार साल के लवकुश की मलेरिया से मौत के बाद बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार कराने का आरोप लगा, जिसके बाद ग्रामीणों ने सड़क जाम कर दी। अस्पताल में वीडियोग्राफी पर बैन लगाया गया था, जिसे विरोध के बाद हटाया गया। मामला रिपोर्ट कर रहे स्वतंत्र पत्रकारों के सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक करवाए गए और उन पर बालाघाट छोड़ने का दबाव बनाया गया, जिस पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने चिंता जताई है।

अब मामला कहां है

मामला अब हाईकोर्ट में है। 9 सितंबर की सुनवाई में राज्य सरकार ने इलाके को नक्सल प्रभावित बताते हुए विकास में आई मुश्किलों का हवाला दिया। जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता अंशुल तिवारी ने मोबाइल अस्पताल और भर्ती बच्चों के परिजनों के लिए भोजन व्यवस्था की मांग की है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मृतक परिवारों को 2 लाख रुपए सहायता देने का ऐलान किया है, जबकि प्रदर्शनकारी 25 लाख मुआवज़े, स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे और सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं।

2024 की कैग रिपोर्ट पहले ही बालाघाट में डॉक्टरों की 62% कमी और ज़रूरी स्वास्थ्य केंद्रों की कमी उजागर कर चुकी थी। सवाल यह है कि जिन कमियों की जानकारी सरकार को पहले से थी, उन्हें समय रहते ठीक क्यों नहीं किया गया।

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Authors

  • Climate journalist and visual storyteller based in Sehore, Madhya Pradesh, India. He reports on critical environmental issues, including renewable energy, just transition, agriculture and biodiversity with a rural perspective.

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  • Journalist, focused on environmental reporting, exploring the intersections of wildlife, ecology, and social justice. Passionate about highlighting the environmental impacts on marginalized communities, including women, tribal groups, the economically vulnerable, and LGBTQ+ individuals.

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