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कौन हैं अमित भटनागर जो केन बेतवा आंदोलन की धुरी बन गए हैं?

जिस शख्स ने ठान लिया है कि बुंदेलखंड को जवाब मिले बिना वह अन्न ग्रहण नहीं करेगा
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अमित भटनागर छतरपुर जिला अस्पताल के बिस्तर पर थे। उन्होंने खाना खाने से इनकार कर दिया था। उन्होंने IV ड्रिप और दवाइयां लेने से भी मना कर दिया था। रविवार, 19 जुलाई की सुबह, आमरण अनशन के 14वें दिन पुलिस उन्हें बराना नदी के पास धरने पर बैठे अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ हिरासत में लेकर शहर ले आई थी। वे केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से विस्थापित ग्रामीणों को उचित मुआवजा दिलाने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। भटनागर का कहना था कि कुछ लोगों को छोड़ दिया गया, लेकिन उन्हें हिरासत में ही रखा गया।

उनके साथ चल रही छोटी मीडिया टीम के जरिए यह संदेश आया कि वह हिरासत में भी भोजन नहीं करेंगे, जैसे उन्होंने धरना स्थल पर नहीं किया था। उन्होंने अपनी टीम से यह भी कहा था कि यदि डॉक्टर उन्हें जबरन ड्रिप लगाने की कोशिश करेंगे, तो वह पानी पीना भी छोड़ देंगे और सांस रोकने तक का रास्ता अपनाएंगे, लेकिन सरकार को बिना किसी समझौते के इलाज देकर उन्हें फिर से स्वस्थ नहीं होने देंगे। यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने ऐसा कहा था।

घटना के बाद बिजावर के एसडीएम विजय द्विवेदी ने मीडिया को बताया कि भटनागर की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति और खराब मौसम को देखते हुए उन्हें बिजावर के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। द्विवेदी ने कहा कि पन्ना जिले से उनके साथ धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों को समझाकर वापस भेज दिया गया था। खराब मौसम को देखते हुए उन्हें सरकारी व्यवस्था के तहत तीन बसों से उनके गांव पहुंचाया गया। भटनागर को 20 जुलाई को बिजावर अस्पताल में रखा गया था और उसी रात करीब नौ बजे उन्हें छतरपुर जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया।

रिपोर्ट लिखे जाने तक अमित भटनागर छतरपुर जिला अस्पताल में भर्ती थे और उनका आमरण अनशन जारी था।

अमित भटनागर: कॉलेज के दफ्तर से आंदोलन के मंच तक

अपने आंदोलन के साथी हिसाब सिंह राजपूत के साथ बारना नदी के किनारे अमित भटनागर। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

अमित भटनागर की शुरुआत एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं हुई थी। भटनागर की शिक्षा, ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट से हुई है। इसके बाद वह अपने परिवार के बी.एड. कॉलेज का संचालन करते थे और वहीं प्रोफेसर भी थे। वर्षों से आंदोलन का मीडिया संभाल रहे पवन पटेल के अनुसार, उन्हें इस रास्ते पर लाने वाली कोई एक बड़ी घटना नहीं थी, बल्कि छोटी-छोटी अन्यायपूर्ण घटनाओं का लगातार जमा होता अनुभव था। समय पर खाद न मिलना, सामान्य सरकारी कामों के लिए रिश्वत मांगी जाना, और हर सरकारी दफ्तर में व्यवस्था का लोगों के खिलाफ खड़ी दिखाई देना। इन्हीं अनुभवों ने उन्हें 2011 के अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की ओर आकर्षित किया। उसी समय वह आम आदमी पार्टी से जुड़े और 2012-13 तक पूरी तरह सामाजिक कार्य में उतर गए। पटेल कहते हैं कि वह गांधी के विचारों से गहराई से प्रभावित हैं।

भटनागर के साथ बैठे आंदोलनकारी बताते हैं कि उनकी यह जीवनशैली आज भी बनी हुई है। भटनागर चमकदार जूते पहनने वाले नेताओं की तरह नहीं, बल्कि चप्पल पहनते हैं और गांवों में लोग जो भी भोजन परोस दें, दाल और सूखी रोटी सहित, वही खा लेते हैं।

अमित भटनागर के साथ लंबे समय से काम कर रहे पवन पटेल बताते हैं कि, भटनागर सादगी भरे जीवन में विश्वास रखते हैं। फोटो: पवन पटेल

वर्षों से उनके साथ काम कर रहे पटेल उन्हें ऐसा व्यक्ति बताते हैं जिसे खुद को महत्वपूर्ण दिखाने में कोई रुचि नहीं है, जबकि आज उनके आंदोलनों को कवर करने के लिए राष्ट्रीय टीवी चैनलों की टीमें भी पहुंचती हैं। वह अपने माता-पिता, छोटे भाई के परिवार, अपनी पत्नी, जो एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका हैं, और लगभग 15 वर्ष के बेटे के साथ रहते हैं। पटेल अक्सर एक घटना का जिक्र करते हैं कि भटनागर ने अपने ही परिवार के कॉलेज में बिजली की फिजूलखर्ची के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी।

उन्होंने चुनाव भी लड़ा, लेकिन जीत नहीं सके। वह एक बार लोकसभा चुनाव और दो बार बिजावर विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। आखिरी बार उन्होंने 2023 में आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। उनके चुनाव अभियान के पीछे कोई बड़ा दानदाता नहीं था। पटेल के अनुसार, स्वयंसेवक गांव-गांव दान पेटी लेकर घूमते थे और लोग अपनी क्षमता के अनुसार पांच रुपये, पचास रुपये या पांच सौ रुपये तक का सहयोग देते थे। मतदाताओं से भटनागर की अपील सीधी होती थी। वह कहते थे कि लोग उन्हें वोट दें या न दें, वह समुदाय के लिए काम करते रहेंगे। 2023 के उनके चुनावी शपथपत्र के अनुसार, उनकी कुल संपत्ति लगभग 37 लाख रुपये थी, उन पर कोई बकाया कर्ज नहीं था, और उनके खिलाफ केवल एक आपराधिक मामला लंबित था। यह मामला 2017 में भोपाल में राज्य सचिवालय के बाहर हुए एक प्रदर्शन से जुड़ा है और इसका जुलाई, 2026 में हुए आंदोलन से कोई संबंध नहीं था।

एक बांध से शुरू हुई लड़ाई, जो पांच परियोजनाओं तक पहुंच गई

चिता आंदोलन करती महिलाओं के साथ दिव्या अहिरवार। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना, जो भारत की पहली अंतर-नदी बेसिन जल अंतरण परियोजना है, भटनागर के वर्तमान आंदोलन का मुख्य केंद्र है। इसके पहले चरण में पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर बनने वाला दौधन बांध शामिल है। इस परियोजना की पूर्ण जलभराव क्षमता पर लगभग 9,000 हेक्टेयर क्षेत्र डूब जाएगा। इसमें 4,141 हेक्टेयर पन्ना टाइगर रिजर्व का कोर क्षेत्र और 1,620 हेक्टेयर अन्य वन क्षेत्र शामिल है, यानी कुल 5,761 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित होगी। इसके अलावा, दस गांव पूरी तरह विस्थापित हो जाएंगे। 

पन्ना जिले की दो मध्यम सिंचाई परियोजनाएं, मझगांव और रूंझ, तथा बरेठी की एक सौर ऊर्जा परियोजना भी इसी आंदोलन का हिस्सा बन गई हैं, क्योंकि इन चारों परियोजनाओं से छतरपुर और पन्ना के कई गांव प्रभावित और विस्थापित हो रहे हैं।

पटेल बताते हैं कि भटनागर इस मुद्दे से 2022 से जुड़े हुए हैं, लेकिन मौजूदा टकराव की शुरुआत 2023 की शुरुआत में छतरपुर कलेक्ट्रेट के बाहर किए गए उनके 19 दिन के आमरण अनशन से मानी जाती है। यह अनशन समाप्त होने के बाद वह और उनकी टीम प्रभावित गांवों में घर-घर गए। उन्होंने यह दर्ज किया कि किन लोगों के नाम मुआवजा सूची से बाहर रह गए और किन जगहों पर सर्वे गलत तरीके से किया गया या बिल्कुल नहीं किया गया। पटेल का कहना है कि इसी जमीनी काम ने लोगों का भरोसा जीता। आज यह आंदोलन 22 प्रभावित गांवों में से लगभग 14 से 15 गांवों के लोगों का समर्थन जुटा चुका है। बकौल पटेल, यह समर्थन किसी एक बड़े प्रदर्शन से नहीं, बल्कि हर घर तक पहुंचकर किए गए लगातार संवाद से बना है।

सांकेतिक चिता पर लेटे हुए अमित भटनागर। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

पिछले छह महीनों में यह संघर्ष काफी तेज हो गया है। फरवरी में दौधन परियोजना स्थल पर महिलाओं के नेतृत्व में हुए एक प्रदर्शन में शामिल होने पर भटनागर को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया था। कुछ ही दिनों बाद उनकी रिहाई की मांग को लेकर लगभग एक हजार ग्रामीण, जिनमें महिलाएं और छोटे बच्चे भी शामिल थे, प्रदर्शन करने पहुंचे। इस दौरान पुलिस ने उन पर पानी की बौछारें कीं और लाठीचार्ज किया। 

मार्च में पन्ना कलेक्ट्रेट तक निकाले गए एक बड़े मार्च के दौरान भी टकराव हुआ। प्रशासन ने पहले से ही धारा 144 लागू कर रखी थी। भटनागर ने स्वयं गिरफ्तारी दी और उनके साथ दर्जनों ग्रामीणों ने भी गिरफ्तारी दी। अप्रैल में आंदोलन ने कई प्रतीकात्मक रूप लिए। चिता सत्याग्रह हुआ, नदी में खड़े होकर सत्याग्रह किया गया, फांसी का प्रतीकात्मक प्रदर्शन हुआ और प्रभावित गांवों में कई जगह भूख हड़तालें शुरू हो गईं।

8 मई को, प्रस्तावित न्याय मार्च शुरू होने से कुछ घंटे पहले, पन्ना पुलिस ने भटनागर को गिरफ्तार कर लिया। आंदोलनकारियों का कहना था कि यह आधी रात को की गई कार्रवाई थी, जिसका उद्देश्य मार्च शुरू होने से पहले ही आंदोलन को कमजोर करना था। हिरासत में भटनागर ने लिखा कि सरकार चाहे उन्हें जेल में सड़ने दे या फांसी पर लटका दे, लेकिन आंदोलन जारी रहना चाहिए। 

जमानत मिलने के तीन दिन बाद उनके परिवार ने कहा कि वह जेल के बाहर से लापता हो गए हैं। बाद में अधिकारियों ने बताया कि पन्ना टाइगर रिजर्व प्रशासन ने उन्हें अलग से हिरासत में लिया था। इसके लिए वन्यजीव अपराध से जुड़े एक मामले का हवाला दिया गया, जिसकी तारीख वास्तविक गिरफ्तारी से एक महीने पहले की बताई गई। उनके परिवार ने सार्वजनिक रूप से इस विसंगति पर सवाल उठाए हैं। लगभग इसी समय एक निर्माण कंपनी ने मझगांव बांध स्थल पर कथित विवाद को लेकर भटनागर और 19 ग्रामीणों के खिलाफ एक अलग शिकायत भी दर्ज कराई।

इसके बाद वह फिर मैदान में लौटे और 6 जुलाई को कूपी गांव के पास दोबारा आमरण अनशन पर बैठ गए। इस बार उनके साथ महिलाएं प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर विरोध प्रदर्शन कर रही थीं। 19 जुलाई 2026 की गिरफ्तारी से एक रात पहले जारी किए गए एक वीडियो संदेश में भटनागर ने आरोप लगाया कि इन पांचों परियोजनाओं में मुआवजा वितरण में सैकड़ों करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। उनका कहना था कि जिन परिवारों को वास्तव में विस्थापन का मुआवजा मिलना चाहिए था, उसकी जगह अधिकारियों और ठेकेदारों के अयोग्य रिश्तेदारों को भुगतान किया गया। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अगले दिन उन्हें निशाना बनाया जाएगा, संभव है कि वन विभाग के मनगढ़ंत मामलों में। 

उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके साथ कुछ भी होता है तो उसके लिए मुख्यमंत्री मोहन यादव, पन्ना कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन जिम्मेदार होंगे। ये सभी आरोप भटनागर के अपने हैं और स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हैं। ग्राउंड रिपोर्ट उनके द्वारा बताए गए कथित घोटाले की राशि की स्वतंत्र पुष्टि नहीं कर सका है।

सरकार का पक्ष

अमित भटनागर की शुरुआत एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं हुई थी। सामाजिक कार्यों में आने से पहले भटनागर एक प्रोफेसर थे। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

राज्य सरकार इन परियोजनाओं को सूखा प्रभावित बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए जरूरी मानती है। अधिकारियों का कहना है कि मझगांव और रूंझ परियोजनाएं पूरी होने के बाद मिलकर 15,810 हेक्टेयर से अधिक भूमि की सिंचाई करेंगी और हजारों परिवारों को पानी उपलब्ध कराएंगी। अप्रैल में राज्य मंत्रिमंडल ने ग्रामीण भूमि अधिग्रहण के लिए मुआवजे के गुणांक को दोगुना करने का फैसला किया। यह फैसला इन परियोजनाओं पर भी पूर्व प्रभाव से लागू किया गया। 

पन्ना कलक्ट्रेट में भटनागर के प्रदर्शन के दौरान पन्ना कलेक्टर उषा परमार ने ग्राउंड रिपोर्ट से कहा था कि प्रशासन उन भूमि अभिलेखों और मुआवजा संबंधी दस्तावेजों को जारी करने की प्रक्रिया में है, जिनकी मांग ग्रामीण फरवरी से कर रहे हैं। मई में सागर संभागायुक्त की अध्यक्षता में राज्य स्तर की एक समिति भी बनाई गई, जिसे दोनों सिंचाई परियोजनाओं से जुड़े विस्थापन और मुआवजे के विवादों के समाधान की जिम्मेदारी दी गई।

ग्रामीणों का कहना है कि इन घोषणाओं का जमीन पर असर बहुत सीमित रहा है। फरवरी में जिन सर्वेक्षणों का आश्वासन दिया गया था, उन्हें कुछ गांवों में शुरू होने में लगभग छह सप्ताह लग गए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उनकी शिकायतों का समाधान किए बिना कई जगह निर्माण कार्य फिर से शुरू कर दिया गया। मझगांव और रूंझ परियोजनाओं के तहत प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि कई मामलों में मुआवजे की गणना 2012 की भूमि दरों के आधार पर की गई है, जो कानून के अनुसार मिलने वाली राशि से काफी कम है।

अब स्थिति क्या है

अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद अमित भटनागर ने अनशनअब तक जारी रखा है। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी

20 जुलाई शाम तक अमित भटनागर छतरपुर के जिला अस्पताल में हैं और इलाज लेने से अब भी इनकार कर रहे हैं। उनका आमरण अनशन 14वें दिन में पहुंच चुका है और फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि यह सरकार की शर्तों पर समाप्त होने वाला है। डॉक्टर की सुई को वह आत्मसमर्पण मानते हैं या जीवन बचाने का जरिया, यह फैसला इस समय पूरी तरह उनका अपना है।

गिरफ्तारी से दो दिन पहले मीडिया संस्थान खबर लहरिया को दिए एक इंटरव्यू में भटनागर ने अपने इस फैसले के पीछे की सोच भी जाहिर की थी। उन्होंने कहा, “अगर मैं खुद इस स्थिति में न होता, तो मैं भी सोनम वांगचुक से अनशन खत्म करने को कहता, जैसा सब कह रहे हैं। लेकिन यह सरकार निर्दयी है। यह आपकी बात नहीं सुनेगी। यह चाहती है कि आप मर जाएं। मैं भी अब मौत से नहीं डरता। पिछले सत्रह वर्षों से सुनता आया हूं कि जब तक जिंदा हैं, लड़ाई जारी रहेगी। लेकिन इसी दौरान हमने सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई और पुलिस जैसी संस्थाओं को कमजोर होते देखा है। अगर हम सिर्फ अपनी जान बचाते रहेंगे, तो कायरों की मौत मरेंगे।”

अपनी टीम के सदस्य हिसाब सिंह राजपूत और पवन पटेल के साथ अमित भटनागर। फोटो: पवन पटेल

भटनागर का मानना है कि अब यह लड़ाई केवल उनके अनशन की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसे और विस्थापितों के न्याय की लड़ाई बन चुकी है। अस्पताल के बिस्तर पर पड़े होने के बावजूद उन्होंने अब तक अपना रुख नहीं बदला है।

भटनागर के लंबे समय से सहयोगी रहे पवन पटेल उनकी एक बात अक्सर याद करते हैं। “अमित भाईसाब हमेशा कहते हैं कि संघर्ष हमेशा खाली पेट ही किया जाता है।” आज, उसी संघर्ष को उनकी इच्छा के विरुद्ध अस्पताल पहुंचाकर खत्म कराने की कोशिश की जा रही है।

बैनर इमेज: केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के विस्थापितों के समर्थन में चल रहे आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर फिलहाल गिरफ्तार हैं और छतरपुर जिला अस्पताल में भर्ती हैं। फोटो: चंद्र प्रताप तिवारी


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