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मध्य प्रदेश में सूखे जैसे हालात, तापमान 36 डिग्री पार

आप हमारा यह पॉडकास्ट स्पॉटीफाय, एमजॉान म्यूज़िक, जियो सावन और एप्पल पॉडकास्ट पर इंवारमेंट डेली के नाम से सर्च कर सुन सकते हैं।

पर्यावरण आज में सुनिए, सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 18वें दिन में, सेहत बिगड़ रही है। सरकार ने जबरन मज़दूरी से बने सामान के आयात पर रोक लगाई। यमुना में पहले के अनुमान से 76% ज़्यादा गंदा पानी गिर रहा है। कमज़ोर मॉनसून से तिलहन, अनाज, दलहन की बुआई घटी। वन्यजीव बोर्ड ने 96% प्रोजेक्ट मंज़ूर किए। मध्य प्रदेश में सूखे जैसे हालात, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात, हिमाचल और केरल में भारी बारिश व भूस्खलन से तबाही।

आज की प्रमुख हैडलाइंस


1. सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल

सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनकी मांग है कि पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय हो और एजुकेशन मिनिस्टर धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। हड़ताल अब 18 दिन पूरे कर चुकी है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके रोज़ाना उनकी सेहत का अपडेट दे रहे हैं। मंगलवार के अपडेट में बताया गया कि वांगचुक की मांसपेशियां कमज़ोर होने लगी हैं और उन्हें काफ़ी दर्द हो रहा है, फिर भी वे हड़ताल छोड़ने को तैयार नहीं हैं।


2. जबरन मज़दूरी वाले सामान के आयात पर रोक

केंद्र सरकार ने एक बड़ा फ़ैसला लेते हुए जबरन मज़दूरी से बने सामान के आयात पर रोक लगा दी है, चाहे वह सामान पूरी तरह से बना हो या आंशिक रूप से। यह कदम भारत के व्यापार नियमों को मज़बूत करेगा। इसके पीछे एक बड़ी वजह अमेरिका की ‘सेक्शन 301’ जांच भी है, जिसमें भारतीय निर्यात पर 12.5% का अतिरिक्त टैरिफ लगने का खतरा है। सरकार इस कदम से उन चिंताओं को दूर करना चाहती है।


3. यमुना नदी की सफ़ाई की चुनौती

दिल्ली जल बोर्ड के आकलन ने एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने रखा है। दिल्ली के 22 मुख्य नालों से यमुना में पहले के अनुमान से 76% ज़्यादा गंदा पानी गिर रहा है। यह आंकड़ा बताता है कि यमुना की सफ़ाई का काम जितना समझा जा रहा था, उससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है।


4. मॉनसून की कमज़ोरी और फ़सलों की बुआई

इस साल मॉनसून कमज़ोर और असमान रहा है, जिसका सीधा असर बुआई पर पड़ा है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक:

  • तिलहन की बुआई में सबसे बड़ी गिरावट — पिछले साल से 31.3 लाख हेक्टेयर कम
  • अनाज और मोटे अनाज — 28.6 लाख हेक्टेयर कम
  • दालें — 17.2 लाख हेक्टेयर कम
  • कपास — 14.4 लाख हेक्टेयर कम
  • चावल — 10.8 लाख हेक्टेयर कम

यह किसानों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है।


5. वन्यजीव बोर्ड की मंज़ूरियों पर सवाल

पिछले दस सालों में नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ की स्टैंडिंग कमिटी (SC-NBWL) के सामने जितने भी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट आए, उनमें से 96% को मंज़ूरी मिल गई। जानकारों का मानना है कि इतनी ऊंची मंज़ूरी दर बताती है कि प्रोजेक्ट्स की ठीक से जांच-पड़ताल नहीं हो रही और जल्दबाज़ी में फ़ैसले लिए जा रहे हैं।


देश में मौसम का दोहरा चेहरा

रिपोर्टर- वाहिद भट

Farmers in MP Facing Drought like conditions
बारिश के अभाव में अपनी खेत की नमी जांचते किसान, फोटो राजगढ़

देश में इस समय मौसम की दो बिल्कुल विपरीत तस्वीरें देखने को मिल रही हैं।

मध्य प्रदेश में सूखे जैसे हालात: भोपाल, इंदौर और ग्वालियर जैसे शहरों में तापमान 36 डिग्री के पार चला गया है, जिससे जुलाई में मार्च-अप्रैल जैसी गर्मी महसूस हो रही है। पूरे राज्य में औसत से 7% कम बारिश हुई है, जबकि जबलपुर और रीवा जैसे पूर्वी इलाकों में यह कमी 21% तक पहुंच गई है। इससे सोयाबीन, मक्का और दालों जैसी खरीफ फ़सलों पर बुरा असर पड़ सकता है। दिल्ली-एनसीआर में भी उमस भरी गर्मी बनी हुई है।

अतिवृष्टि से जूझते राज्य: दूसरी तरफ महाराष्ट्र, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश ने तबाही मचाई है। लोनावला में एक ही दिन में 600 मिलीमीटर से ज़्यादा बारिश दर्ज हुई, जिससे भूस्खलन हुआ और मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर यातायात ठप हो गया। मुंबई में गोदामों में पानी घुसने से सब्ज़ियां खराब हुईं और उनकी कीमतें 20-30% तक बढ़ गईं। सूरत में निचले इलाके जलमग्न हो गए और प्रशासन बचाव कार्य में जुटा है।

पहाड़ी राज्यों में हालात गंभीर: हिमाचल प्रदेश के कुल्लू और केरल के वायनाड में भूस्खलन, सड़कें बंद होना और बिजली कटौती से जनजीवन अस्त-व्यस्त है, और इसमें कई लोगों की जान भी जा चुकी है।

IMD का पूर्वानुमान: बंगाल की खाड़ी में एक नया ‘लो प्रेशर’ क्षेत्र बन रहा है, जिसके चलते ओडिशा, बिहार, झारखंड, असम और पश्चिम बंगाल में भारी बारिश का अलर्ट है। वहीं मध्य प्रदेश, राजस्थान और दक्षिण भारत के कुछ इलाकों में बारिश कम ही रहने की संभावना है।

मानसून का यह असमान रूप किसानों से लेकर आम शहरवासियों तक — सभी के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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We do deep on-ground reports on environmental, and related issues from the margins of India, with a particular focus on Madhya Pradesh, to inspire relevant interventions and solutions. 

We believe climate change should be the basis of current discourse, and our stories attempt to reflect the same.

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