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जल जीवन मिशन: कैसे पंचायतों पर बढ़ रहा है आर्थिक बोझ?

15 करोड़ के भारी-भरकम बिल, वसूली सिर्फ 61 लाख; क्या पंचायतों पर बोझ बन गई नल-जल योजना?
Jal Jeevan Mission Rural Madhya Pradesh
नल जल से पानी भरती महिलाएं, ग्राम भोजपुर, राजगढ़

मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में जल जीवन मिशन का सपना था — हर घर नल, हर घर जल। नल तो लग गए, पाइपें भी बिछ गईं, लेकिन अब एक नया संकट दरवाजे पर खड़ा है। जहाँ पानी पहुँचा, वहाँ बिल पहुँचा। और जहाँ बिल पहुँचा, वहाँ विवाद पहुँचा।

जल निगम के आँकड़े बताते हैं कि जिले की पाँच मुख्य जनपद पंचायतों पर 14.37 करोड़ रुपये का जलकर बकाया है। कुल 15 करोड़ के बिल जनरेट हुए, लेकिन वसूली हुई मात्र 61 लाख रुपये। यानी हर सौ रुपये में से सिर्फ चार रुपये।

जिले के 1313 गाँवों में से करीब 400 गाँव आज भी नियमित पानी से वंचित हैं — यह खुद जल निगम की प्रोग्रेस रिपोर्ट स्वीकार करती है। हज़ारों नल कनेक्शन कागज़ों पर दर्ज हैं, लेकिन टोटी खोलने पर पानी की जगह हवा निकलती है।

ग्राउंड रिपोर्ट ने पहले भोपाल संभाग के कुंडीबे गाँव की कहानी बताई थी — जिसे “24 घंटे नल से जल” देने वाला पहला गाँव घोषित किया गया था। लेकिन एक ही साल में वहाँ भी आपूर्ति घटाकर दो घंटे करनी पड़ी, क्योंकि ग्राम पंचायत जलकर का बोझ नहीं उठा सकी। यह कहानी अकेले कुंडीबे की नहीं — राजगढ़ जिले की अधिकांश पंचायतें इसी दौर से गुज़र रही हैं।

कलेक्टर से निवेदन

राजगढ़ के भोजपुर गांव में बनी पानी की टंकी
राजगढ़ के भोजपुर गांव में बनी पानी की टंकी

राजगढ़ जनपद की लिम्बोदा ग्राम पंचायत के सरपंच दुर्गालाल किरार ने नवंबर 2025 में कलेक्टर गिरीश कुमार मिश्रा को एक शिकायत पत्र लिखा। इसमें उन्होंने माँग की कि जल निगम के कर्मचारी खुद ग्रामीणों से पैसे वसूलें और नल दें — पंचायत को इस झमेले से बाहर रखा जाए।

पत्र में उन्होंने लिखा कि गाँव में लगभग 300 नल कनेक्शन हैं, लेकिन एक-एक घर में तीन-तीन अवैध कनेक्शन दे रखे हैं। सरपंच दुर्गालाल किरार कहते हैं,

“हमसे पहले 24 घंटे पानी देने को कहा गया, मिला सिर्फ आधे घंटे। शुरुआत में 14 हज़ार का बिल आता था, एक साल तक विभाग ने बिल दिया ही नहीं और अब अचानक 30 हज़ार महीने का बिल थमाया जा रहा है, कुल 9 लाख बकाया बता रहे हैं।”

पंचायत ने 3 लाख रुपये जमा भी कर दिए, फिर भी 6 लाख बाकी हैं। लेकिन अनियमित सप्लाई से तंग आए ग्रामीणों ने नलों से टोटियाँ निकालकर मोटर लगा ली है, और पैसे माँगने पर झगड़ा होता है।

जब इस शिकायत के संबंध में लिम्बोदा के सचिव कमल सिंह से बात की गई, तो वे कहते हैं, “जब वे इस राशि को गांव में वसूलने और अवैध कनेक्शनों को हटवाने के लिए जाते हैं, तो ग्रामीण उनके विरुद्ध सीएम हेल्पलाइन (181) को अपना हथियार बनाते हैं। यदि पंचायत वसूली के लिए हितग्राही का कोई सा भी प्रमाणपत्र या लाभ रोक भी लेती है, तो ग्रामीण बेबुनियाद शिकायतें करते हैं जिससे वाद-विवाद की स्थिति बनती है। जलकर समिति का कोई सहयोग ग्राम पंचायत को नहीं मिलता, वसूली की पूरी जिम्मेदारी अकेले पंचायतों के मत्थे मढ़ दी गई है।”

“पानी नहीं मिलता, तो पैसे क्यों दें?”

भोजपुर गांव में नल से जल भरती महिलाएं
भोजपुर गांव में नल से जल भरती महिलाएं

फूलखेड़ी ग्राम पंचायत के सचिव धर्मेंद्र सिंह बताते हैं कि उन पर 6-7 लाख रुपये बकाया हैं।

“ग्रामीण सीधे कहते हैं — पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो भुगतान क्यों करें? जल निगम को सूचित किया, पर वे भी नहीं सुनते। हमसे ही कहा जाता है कि ‘स्थिति मैनेज करो।'”

यहाँ करीब 300 कनेक्शन हैं और हर कनेक्शन पर लगभग 2800 रुपये बकाया है।

खिलचीपुर जनपद की भोजपुर ग्राम पंचायत की हालत और भी चौंकाने वाली है। सरपंच कैलाश बताते हैं कि गाँव में रहते हैं 700 परिवार, लेकिन नल कनेक्शन दर्ज हैं 1100। अवैध कनेक्शन हटाने की माँग लिखित में की, जवाब नहीं मिला। अब पंचायत पर 3.5 लाख रुपये बकाया हैं।

जल निगम का जवाब: “पंचायतें गंभीर नहीं”

पानी की गुणवत्ता को लेकर भी लोग परेशान रहते हैं
पानी की गुणवत्ता को लेकर भी लोग परेशान रहते हैं

​पंचायतों के इन गंभीर आरोपों और करोड़ों रुपये के बकाया को लेकर जब जल निगम के महाप्रबंधक उमाकांत चौधरी से बात की गई, तो उन्होंने पूरा दारोमदार ग्राम पंचायतों के पाले में डाल दिया। चौधरी ने साफ कहा कि, “यह 14.37 करोड़ की बकाया राशि वसूल करने का काम ग्राम पंचायतों का ही है, लेकिन वे इसे गंभीरता से नहीं कर रही हैं।”

​महाप्रबंधक के इस दावे और व्यवस्थागत विफलता के पैमाने को जल निगम के ही जनपद-वार आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है। विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, जिले की 5 मुख्य जनपद पंचायतों के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायतों पर कुल 14.37 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बकाया है।

जनपद-वार बकाये का हिसाब

जल निगम के आधिकारिक आँकड़ों पर नज़र डालें तो तस्वीर और साफ होती है:

  • ब्यावरा जनपद — 3.80 करोड़ रुपये
  • राजगढ़ जनपद — 3.20 करोड़ रुपये
  • खिलचीपुर जनपद — 2.90 करोड़ रुपये
  • जीरापुर जनपद — 2.35 करोड़ रुपये
  • सारंगपुर जनपद — 2.12 करोड़ रुपये

कुल मिलाकर 15 करोड़ के बिलों के मुकाबले वसूली सिर्फ 61 लाख, यानी चार फीसद से भी कम।

​विभिन्न पंचायतों की समस्याओं पर तकनीकी दलील देते हुए महाप्रबंधक ने कहा कि लिम्बोदा ग्राम पंचायत में सरपंच द्वारा लगाए गए अवैध कनेक्शनों के आरोपों पर जल निगम की टीम ने वहां मौके पर जाकर अवैध नल कनेक्शन हटाए हैं।

​वहीं भोजपुर ग्राम पंचायत को लेकर उनका तर्क है कि खुद ग्राम पंचायत ही आगे आकर ऑपरेटर नहीं रख रही है। हम पिछले 4 से 5 महीने से वहां लगातार पानी दे रहे थे, लेकिन उन्होंने ऑपरेटर नहीं लगाया। इस लापरवाही के चलते 15 दिन पानी भी बंद रखना पड़ा। बाद में काफी खींचतान के बाद एलएंडटी (L&T) कंपनी के प्राइवेट ऑपरेटर पर ही उनकी सहमति बनी है, लेकिन पंचायत ने अब तक वहां अपना स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) ऑपरेटर नियुक्त नहीं किया है।

जीएम से आगे कुछ बात हो पाती इसके पहले उन्होंने व्यस्तता का हवाला देते हुए आमने-सामने बैठकर बात करने का आग्रह किया।

​धरातल से सामने आए इन तथ्यों और विरोधाभासों के बीच, इस संकट की नीतिगत कड़ियों का उल्लेख राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (NIRDPR) की आधिकारिक मार्गदर्शिका में मिलता है। इस रिपोर्ट के पेज 2, 3 और 6 के मुताबिक, सरकार का निवेश केवल एकमुश्त इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए होता है और 15वें वित्त आयोग का अनुदान महज एक ‘क्रिटिकल गैप फंड’ (सीमित वित्तीय सहायता) है, जिसके कारण बिजली बिल और दैनिक मेंटेनेंस का खर्च अनिवार्य रूप से जलकर की वसूली से ही निकाला जाना तय है।

​मार्गदर्शिका के पेज 8 और 9 में यह भी माना गया है कि हर महीने घर-घर जाकर वसूली करना स्टाफ की कमी से जूझ रही पंचायतों के लिए एक अतिरिक्त लिपिकीय भार है, जिसके बजाय जलकर को सालाना आधार पर सीधे हाउस टैक्स (गृह कर) के साथ जोड़कर एकमुश्त वसूला जाना चाहिए।

​इसके साथ ही गाइडलाइन यह भी स्पष्ट करती है कि जब ग्रामीण कर देने में आनाकानी करें, तो ग्राम पंचायतों को यह वैधानिक अधिकार है कि वे हितग्राही को पंचायत स्तर से मिलने वाले अन्य प्रमाणपत्रों या लाभों को तब तक रोके रखें तक कि वे वार्षिक जलकर का भुगतान न कर दें। राजगढ़ जिले की इन ग्राम पंचायतों में नीतिगत दावों और जमीनी हकीकत का यही अंतर वर्तमान में इस पूरे जेजेएम मॉडल को वित्तीय संकट की ओर धकेल रहा है।

राजगढ़ का यह संकट महज़ वसूली की विफलता नहीं है। यह उस मॉडल की विफलता है जिसमें पाइपें तो बिछाई गईं, लेकिन यह नहीं सोचा गया कि उन्हें चलाएगा कौन और खर्च कौन उठाएगा।

जल निगम कहता है — “पंचायत ज़िम्मेदार है।” पंचायत कहती है — “पानी दो, तब वसूलेंगे।” ग्रामीण कहते हैं — “पानी नहीं, तो पैसे नहीं।” और इस तिकोने विवाद के बीच 400 गाँव आज भी प्यासे हैं — और 14 करोड़ से ज़्यादा का बिल धूल खा रहा है।


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Author

  • Abdul Wasim Ansari is an independent journalist based in Rajgarh, Madhya Pradesh, bringing nearly a decade of experience in journalism since 2014. His work focuses on reporting from the grassroots level in the region.

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